Sunday, August 14, 2011

सैडल डेम और पाड़ाझर झरना

कोटा से रावतभाटा जाते समय आधी दूरी तक चढ़ाई है जो बोराबास पहुँच कर चढ़ाई समाप्त हो जाती है। यह गूजरों का गाँव है। चारों और निगाह दौड़ाएंगे तो गायों और भैंसों के बाड़े दिखाई देंगे और बीच बीच में घर दिखाई देंगे। कोटा को मिलने वाले दूध में से लगभग एक चौथाई बोराबास और आस पास के गाँवों से ही जाता है।  यहीं से पश्चिम की ओर एक मार्ग जाता है जो लगभग पाँच किलोमीटर चलने पर कोटा डेम अर्थात् जवाहर सागर बांध पहुँचा देता है। बोराबास से निकलते ही  लंबी घाटी आरंभ हो जाती है जो कोलीपुरा गाँव में जा कर समाप्त होती है। यह सुरम्य घाटी 'दरा वन्यजीव अभयारण्य का एक भाग है।'  पूरी घाटी में हरियाली छाई हुई थी। स्थान स्थान पर जलधाराएँ बह रही थीं। पिछले वर्षों में इतनी हरियाली पहली बार दिखाई दे रही थी। देती भी क्यों न, कई वर्षों बाद इस क्षेत्र में होने वाली औसत बरसात तो जुलाई के तीसरे सप्ताह तक हो चुकी थी। अब जो भी बरसात हो रही थी वह सब बोनस थी। बरसात भी इस कायदे से हुई कि उस से नुकसान कम हुआ। बाढ़ें नहीं आई थीं। घाटी से निकलने के बाद ही बायीं ओर चम्बल दिखाई देने लगी। जवाहर सागर बांध के कारण यहाँ चम्बल विस्तार पा गई है। विशाल जलराशि और उस के दोनों ओर जंगल अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहे थे। मनोरम दृश्यों को निहारते हुए बस रावतभाटा के नजदीक पहुँच रही थी। सड़क के किनारे ही बायीं और बाडोली के प्राचीन शिव मंदिर दिखाई दिए।  मन किया यहीं उतर पड़ूँ। यदि मैं अपने वाहन में होता तो मुझे कम से कम आधा घंटा यहाँ अवश्य लगता। जिन हाथों ने इन मंदिरों के निर्माण के लिए पत्थरों को आकार दिया होगा वे अपनी कला में कितने निपुण होंगे, यह अनुमान करके ही आनन्द की अनुभूति होती है। 

बाडोली के शिव मंदिर
रावतभाटा कस्बे से गुजरते हुए चंबल पुल पार कर के बस ने भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य में प्रवेश किया। इस क्षेत्र को राज्य सरकार ने इसी वर्ष अभयारण्य घोषित किया है। जिस के कारण प्रवेश शुल्क के बिना यहाँ प्रवेश संभव नहीं रह गया है। वन-चौकी पर बसें कुछ देर रुकीं। फिर चढ़ाई आरंभ हो गई। कोई दस मिनट में ही हम सेडल डेम के गेस्ट हाउस के बाहर थे। बरसात जारी थी। हम बसों से उतर कर तेजी से गेस्ट हाउस की तरफ दौड़े, जिस से कम से कम भीगे। मैं बरांडे की ओर से गेस्ट हाउस में घुसा। टीन शेड के नीचे हलवाई खाद्य सामग्री निर्माण में जुटे थे। बहुत सी जलेबियाँ निकाली जा चुकी थीं, पकौड़ियाँ तली जा रही थीं और आलू के मसाले के गोले बेसन के घोल में डूब कर गर्म तेल की कढ़ाई में जाने को तैयार थे। हमें पहुँचते देख। हलवाई ने कोफ्ते बनाने का काम आरंभ कर दिया। बारह बज चुके थे। सभी को भूख लगी थी। भोजन सामग्री बनते देख और खिल गई थी। दस मिनट में तीनों खाद्य पदार्थ चटनियों  और सॉस की बोतलों के साथ हॉल की मेज पर थे। इस के बाद क्या हुआ होगा? यह आप कल्पना कर सकते हैं। मैं प्लेट में नाश्ता ले कर बाहर आ गया। गेस्ट हाउस के बाहर के गार्डन के कोने पर तख्ती लगी थी, जिस पर लिखा था "फूल तोड़ना मना है"। लेकिन वहाँ फूल एक भी नहीं था। पूरे गार्डन में एक भी फूल खिला नहीं था। पहले सोचा मौसम ही फूल खिलने का नहीं है। लेकिन फिर ठीक से देखा तो पता लगा कि गेस्ट हाउस का रख रखाव भी कमजोर हुआ है। मैं समझ गया कि यह सब पिछले कई वर्षों से राजस्थान सरकारों में विभागों द्वारा मस्टर रोल पर कर्मचारी न रखने की जो नीति बनाई गई है यह उस का परिणाम है। अब विभागों के पास इन के रख रखाव के लिए कर्मचारी ही नहीं हैं तो फूल कहाँ से खिलेंगे? मैं ने फिर से तख्ती को देखा तो तख्ती के ठीक आस-पास बहुत ही छोटे आकार के तीन-चार जंगली फूल खिले थे। जैसे कह रहे हों कि हम तख्ती के ठीक पास इसलिए खिले हैं कि कम से कम यहाँ तो सुरक्षित रहेंगे।

 नाश्ते के दौरान ही दिनेश रावल ने नयी उम्र के वकीलों को उकसाना आरंभ कर दिया था। यार! पाड़ाझर नहीं चलेंगे क्या? कोटा तो कह रहे थे कि बसें पाड़ाझर जाएंगी, अब कोई बात ही नहीं कर रहा है। बरसात बंद हो चुकी थी और मैं सैड़ल डेम के ऊपर बनी सड़क से बांध के पानी, आस पास की पहाडियों पर बिखरे प्रकृति के सौंदर्य का नजारा देखने के लिए निकल पड़ा था। आधे घंटे बाद वापस लौटा तो बरामदे में ही रावल मिल गए। कहने लगे -तुम कहाँ चले गए थे उस्ताद? बसें पाड़ाझर जाने वाली हैं, चलो बैठो। मैं ने उन्हें बताया कि मैं जरा डेम पर चला गया था। वे कहने लगे -इस बीच बसें चल देतीं तो तुम यहीं रह जाते। हम गेस्ट हाउस के बाहर निकले तो वहाँ सेक्रेट्री सब से कह रहे थे -पाड़ाझर जाने वाले बसों में बैठ जाएँ। लोग तेजी से बसों की ओर जाने लगे। बसों तक जाने का दूसरा मार्ग भी था जो खाली था। मैं उस ओर से गया और सब से पीछे खड़ी बस में बैठ गया। मुझे कुछ लोगों ने कहा -बस तो आगे वाली जा रही है, सब तो उस में बैठ रहे हैं। मैं ने मना किया कि जाएगी तो सब से पहले यही बस जाएगी। मैं अकेला बस में चढ़ गया। कुछ देर बाद ही शेष लोग भी उसी बस में चढ़ने लगे। जब बस भर गई तो एक नया वकील कहने लगा कि -आप ने सही कहा था यही बस पहले जा रही है। दूसरा कहने लगा ये तो अनुभव की बात है।  मैं ने कहा यह अनुभव की नहीं अक्ल की बात है। तुम बसों की स्थिति ठीक से देखते तो तुम्हें भी पता लग जाता कि जब तक यह बस अपने स्थान से हटेगी नहीं दूसरी बस निकलेगी नहीं। ऐसी स्थिति में इसी बस को सब से पहले जाना था। ड्राइवर ने बस को आगे पीछे कर के बस का मुहँ घुमाया और बस पाड़ाझर के लिए चल दी।
प सभी यह सोच रहे होंगे कि यह पाड़ाझर क्या है? सैडल डेम से कोई छह किलोमीटर दूर जंगल के बीच एक झरना है, जो लगभग वर्ष भर बहता है लेकिन बरसात में तो उस का नजारा कुछ और ही होता है। कोई सौ मीटर ऊपर से झरना गिरता है, नीचे झरने के गिरने से कुंड बन गया है। झरने के ऊपर पहुँच कर नीचे कुंड तक जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं। बीच में एक गुफा भी है जहाँ शंकर का मंदिर बना हुआ है। तैरने वाले लोग नीचे कुंड में उतर जाते हैं और तैरते हुए झरने के नीचे जा कर झरने से गिरते पानी के नीचे स्नान का आनन्द लेते हैं। सैडल डेम से पाड़ाझर तक की सड़क की हालत बहुत बुरी थी। कहा जा सकता था कि कभी वहाँ डामर भी रहा होगा। अब तो डामर के अलावा वहाँ सब कुछ था जिस में गड्ढे भी थे। बस को छह किलोमीटर की दूरी पार करने में आधा घंटा लगा। आप समझ सकते हैं कि सड़क की हालत क्या रही होगी? बस झरने से आधा किलोमीटर दूर ही रुक गई। आगे बस के जाने का मार्ग नहीं था। वहाँ से हमें पैदल चल पड़े। ठीक झरने के ऊपर पहुँचे तो देखा वहाँ दो बसें और खड़ी थीं। वे किसी दूसरे मार्ग से आई थीं। पहली बार पता लगा कि झरने पर पहुँचने का दूसरा मार्ग भी है।
(जारी)

जीन ऊँट की सवारी में सहायक है
पिछली चिट्ठी पर चंदन कुमार मिश्र की टिप्पणी थी कि सैडल के लिंक से संबंध समझ नहीं आया। मैं समझता था कि कुछ लोगों को यह जिज्ञासा अवश्य होगी कि ये सैडल डेम क्या है और उसे समझने के लिए मैं ने वह लिंक दिया था। वास्तव में सैडल घोड़े, ऊँट आदि पर सवारी करने के लिए उस पर कसी जाने वाली जीन को कहते हैं। इस जीन के अभाव में इन पर ठीक से सवारी की जा सकती है, विशेष रूप से ऊँट पर। उसी तरह यदि किसी बांध की भराव क्षमता अधिक रखने पर किसी स्थान से पानी के निकल जाने की संभावना हो तो वहाँ जो बांध बनाया जाता है उस के बिना मुख्य बांध की क्षमता को बढ़ाया नहीं जा सकता। इस सहायक बांध से मूल बांध की भराव क्षमता बढ़ जाती है। क्षमता में सहायक होने के इस गुण की समानता के कारण ऐसे सहायक बांधों को सैडल डेम कहा जाता है।

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