Sunday, August 14, 2011

पिकनिक पर

र्षा ऋतु में अभिभाषक परिषद, कोटा अपने सदस्यों के लिए एक पिकनिक का आयोजन करती है। अपने सहकर्मी अभिभाषकों के साथ अदालत परिसर के अलावा किसी मनोरम स्थान पर एक दिन बिताना अपने आप में अच्छा सुअवसर है। विगत चार-पाँच वर्षों से मैं इस अवसर से वंचित रहा। इस बार जुलाई के अंतिम सप्ताह में जब यह घोषणा की गई कि 7 अगस्त को अभिभाषक परिषद सैडल डेम पर पिकनिक आयोजित कर रही है तो मैं ने उसी समय तय कर लिया कि कितनी भी बाधाएँ क्यों न हों इस पिकनिक को मैं नहीं छोड़ूंगा। मेरा प्रयास यह भी था कि मेरे सभी सहयोगी भी इस में भाग लें। लेकिन यह संभव नहीं हो सका। उन में से कोई भी विभिन्न कारणों से जाने की स्थिति में नहीं था।

राणाप्रताप सागर बांध
सैडल डेम चित्तौड़ जिले में रावतभाटा में चम्बल नदी पर निर्मित राणाप्रताप सागर बांध का सहयोगी बांध है। राणाप्रताप सागर बांध के निर्माण से चम्बल का जल जिस ऊँचाई तक संग्रहीत किया जाना था उस ऊँचाई तक जल संग्रहण असंभव था। क्यों कि मूल बांध से कोई एक किलोमीटर दूर पहाड़ों के बीच एक दर्रा मौजूद था जिस से जल निकल कर दूसरा रास्ता पकड़ कर वापस चंबल में जा मिलता। इस दर्रे पर भी जल को रोकने के लिए एक बांध बनाया जाना आवश्यक था। दर्रा अधिक चौड़ा न था, इसलिए उस पर भी बांध बनाया गया जिस का एक मात्र उद्देश्य राणाप्रताप सागर बांध की ऊँचाई बढ़ाना था। आम तौर पर जहाँ मूल बांध बनाया जाता है वह कोई मनोरम स्थान नहीं होता और जिस तरह का भारी निर्माण कार्य वहाँ होता है उस से उस की मनोरम छवि और समाप्त हो जाती है। बांध के ऊपर के बहुत से मनोरम स्थान तो रोके गए पानी में हमेशा के लिए डूब जाते हैं। लेकिन यह सैडल डेम जहाँ बना है वहाँ दोनों ओर हरी भरी पहाड़ियाँ मौजूद हैं तो  नीचे घाटी है। बीच में बांध की झील  में भरा हुआ जल। इसी बांध के निकट राजस्थान सरकार के सिंचाई विभाग ने एक गेस्टहाउस बनाया हुआ है। पिकनिक के लिए यह एक आदर्श स्थल है। यदि वर्षा होती रहे तब भी चार-पाँच सौ व्यक्तियों का भोजन बनाया जा सकता है और खिलाया जा सकता है। 

सैडल डेम
भिभाषक परिषद के सदस्यों की संख्या 1700 से अधिक है, लेकिन नियमित रूप से न्यायालय में अभ्यासरत वकीलों की संख्या इस की आधी ही है। लेकिन पिकनिक पर जाने वालों की संख्या दो सौ से कुछ ही ऊपर थी। इस के लिए तीन बसों की व्यवस्था की गई थी। तीनों बसों को जिला न्यायालय परिसर से रवाना हो कर नगर में चार-पाँच स्थानों पर रुक कर अभिभाषकों को लेते हुए जाना था। सुबह दस बजे तक बसों को कोटा नगर छोड़ देना था। शेष लोग वे थे जो अपने अपने साधनों से पिकनिक स्थल पहुँचना था। जहाँ से मुझे बैठना था वहाँ से बस को दस बजे रवाना होना था। लेकिन सुबह सुबह ही बरसात आरंभ हो गई। इस कारण बसें रवाना होने में देरी हुई। रावतभाटा के नाम से मुझे दो नाम ध्यान आए, उन में एक रविकुमार हैं। मैं ने बस की प्रतीक्षा करते हुए उन्हें फोन किया कि मैं आज उन के क्षेत्र में रहूँगा। यदि मिलना संभव हुआ तो उन्हें फिर फोन करूंगा।

दिनेश रावल
सुबह ग्यारह बजे बसें कोटा से छूट गई थीं। कोटा नगरीय क्षेत्र से निकलते ही जंगल आरंभ हो गया। दोनों ओर देखने पर हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती थी। जिस के बीच बीच में वर्षा के कारण जंगल से निकल कर आती हुई जल धाराएँ दिखाई पडती थी। ऐसा लगता था जैसे जंगल ने नवयौवना का रूप धारण कर वर्षा के जल में स्नान कर रहा हो। वर्षा स्नान के समय बूंद बूंद मिल कर जलधाराओं का निर्माण कर रही हों। बस की खिड़की से बाहर एक बार जो देख लेता,  उस की निगाहें वहीं ठहरी रह जातीं, बस की गति के साथ ही वन प्रान्तर का दृश्य लगातार परिवर्तित होता हुआ नए नए रूप दिखा रहा था। मेरे पास खिड़की के समीप बैठे सहयात्री अभिभाषक दिनेश रावल इन दृश्यों में इतने डूब गए कि मैं ने  उन की तस्वीर ले कर उन्हें दिखाई तो कहने लगे, इस में तो मैं कोई विचारक जैसा लग रहा हूँ। 

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