Monday, April 25, 2011

कमलेश्वर महादेव (क्वाँळजी) में कुछ घंटे

क्वाँळजी शिव मंदिर
श्वरी बाबा का नौकरी का मुकदमा अभी चल रहा है। आते-आते बाबा ने पूछा उस में क्या हो रहा है? मैं ने बताया कि इस बार आप का बयान होना है, उस के लिए आना पड़ेगा। वे तारीख पूछने लगे तो मैं ने कहा मैं फोन पर बता दूंगाष बाबा ने अपने एक चेले को हमारी कार में बिठा भेजा जिस से हम से वहाँ टेक्स वसूल न किया जा सके। चेला टोल प्लाजा पर उतर गया। हम वापस लौटे, इन्द्रगढ़ को पीछे छोड़ा। कोई चार किलोमीटर चलने पर एक पुल के नीचे से रेललाइन को पार किया और सामने जंगल दिखाई पड़ने लगा। हमें कोई दस किलोमीटर और चलना था। एक वाहन चलने लायक सड़क थी। बीच-बीच में एक दो मोटरसायकिल वाले मिले। दो छोटे-छोटे गाँव भी पड़े। क्वाँळजी पहुँचने के तीन किलोमीटर पहले सवाईमाधोपुर वन्य जीव अभयारण्य आरंभ हो गया। क्वाँळजी इसी के अंदर था। 

मंदिर द्वार
दूर से ही मंदिर का शीर्ष दिखाई देने लगा था। शीर्ष पर जड़े कलात्मक पत्थर उखड़ चुके थे,अंदर ईंटों का निर्माण दिखाई दे रहा था। ठीक मंदिर से पहले एक पुल था जिस के नीचे हो कर त्रिवेणी बहती थी, जो पुरी तरह सूखी थी। पुल के पहले दाहिनी ओर एक सड़क जा रही थी जो सौ मीटर दूर जा कर समाप्त होती थी। वहीं छोटे आकार वाला बड़ा कुंड होना चाहिए था। हमने पुल पार किया। वाहन रोक दिया गया। बायीं ओर एक मैदान में पार्क करने को कहा गया। हम ने कार पार्क की तो एक सज्जन टोकन दे कर दस रुपए ले गए। बाकायदे पार्किंग की व्यवस्था थी। सड़क की दूसरी ओर चाय-पान के लिए छप्पर वाली दुकानें लगी थीं। हम सीधे मंदिर पहुँचे। मंदिर के नीचे फिर दुकानें थीं जहाँ नारियल, प्रसाद बिक रहे थे। पास ही कुछ महिलाएँ आक-धतूरे के पुष्पों की मालाएँ और विल्वपत्र भी बेच रहे थे। शोभा (पत्नी) ने नारियल, प्रसाद, मालाएँ और विल्वपत्र वह सब कुछ खरीदा जिन से शिवजी के प्रसन्न होने की संभावना बनती थी। 

द्वार का बायाँ स्तम्भ
द्वार का दायाँ स्तम्भ
मारे पास कैमरा न था, मोबाइल चार थे। जिन में से तीन में कैमरा था। सब से अच्छा वाला था बेटी पूर्वा के पास। मैं ने उस का मोबाइल थाम लिया। मंदिर की सीढ़ियों के पहले ही पुरातत्व विभाग का बोर्ड लगा था। जो सूचित करता था कि यह मंदिर उन के संरक्षण में है। मंदिर के आगे लाल पत्थरों का बना चबूतरा था, जिस पर चढ़ने के लिए पत्थरों की सीढ़ियाँ थीं। उन की घिसावट बता रही थी कि वे कम से कम सात-आठ शताब्दी पहले बनाई गई होंगी। सीढ़ियाँ धूप तप कर गर्म हो गई थीं। मैंने मंदिर के सामने से कुछ चित्र लिए, द्वार अभी सही सलामत था। मेरे हमारे पैर जलने लगे। हम ने शीघ्रता से मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया। अंदर ठंडक थी। गर्भगृह उज्जैन के महाकाल मंदिर से बड़ा था। उस की बनावट देख कर लगा कि वह उस से अधिक भव्य भी था। बीचों बीच लाल पत्थर का बना शिवलिंग स्थापित था। प्रवेश द्वार के सामने पार्वती की सफेद संगमरमर  की प्रतिमा थी। मैं पहले जब यहाँ आया तब यह स्थान रिक्त था। शायद प्राचीन प्रतिमा पहले किसी ने चोरी कर ली होगी। फर्श पर संगमरमर लगाया हुआ था। दीवारों पर भी जहाँ पुराने पत्थर हट गए थे वहाँ सिरेमिक टाइल्स लगा दी गई थीं। शिवलिंग के आसपास इतना स्थान था कि पचास-साठ भक्त एक साथ समा जाएँ। अंदर दो पुजारी और एक-दो दर्शनार्थी ही थे।  शोभा ने साथ लाई सामग्री से पूजा की और सामने हाथ जोड़ बैठ गईं।  मैं ने मंदिर का अवलोकन किया और कुछ चित्र लिए। मुझे स्मरण हो आया कि दाहजी (दादाजी) जब तक गैंता में रहे हर श्रावण मास में यहाँ आते रहे। वे पूरे श्रावण मास यहीं रह कर श्रावणी करते थे। शायद उन की ये स्मृतियाँ ही मुझे यहाँ खींच लाई थीं। हम पंद्रह मिनट गर्भगृह में रुके। बाहर आ कर परिक्रमा की कुछ चित्र वहाँ भी लिए। समय के साथ मंदिर का प्राचीन वैभव नष्ट होता जा रहा था। मंदिर के आसपास बने पुराने कमरों की छतें गायब थीं। लेकिन पास ही नए निर्माण हो चुके थे। 
पूजा कराते पुजारी

म मंदिर से नीचे उतरे तो सामने ही छोटा लेकिन आकार में बड़ा कुंड दिखाई दिया। कुंड में पानी था। मुझे आश्चर्य हुआ कि कुंड में पानी होते हुए भी त्रिवेणी सूखी क्यों है? सोतों पर ही कुंडों का निर्माण हुआ था।उन से निकल कर ही जल त्रिवेणी में बहता था। एक दुकानदार ने बताया कि कुंडों का पानी तो कार्तिक में ही समाप्त हो जाता है। उस के बाद तो कुंडों में नलकूप का पानी डाला जाता है जिस से दर्शनार्थी स्नान कर सकें। यह मनुष्यकृत समस्या थी। आसपास की पहाड़ियों पर स्थित जंगल कट चुके थे। ये पहाड़ियाँ ही तो वर्षा का जल अपने अंदर भरे रखती थीं जो इन कुंडों के सोतों में आता था। पहाड़ियाँ नंगी हुई तो उन की जल धारण क्षमता कम हो गई। अब कुंडों में पानी कहाँ से आता। शोभा कुंड में नीचे पानी तक उतर गई। पानी कुछ गंदला था। फिर भी उस ने श्रद्धावश अपने हाथ-मुहँ उस में पखारे। मैं ने भी उस का अनुसरण किया। बच्चे कुंड तक नहीं आए। बाहर आ कर मैं ने बड़े कुंड के लिए पूछा तो दुकानदार ने त्रिवेणी के पहले वाली सड़क का उल्लेख कर दिया।


नई स्थापित की गई पार्वती प्रतिमा
म पार्किंग तक पहुँचे। अब कुछ भूख भी लगने लगी थी। पार्किंग में ही कार के सभी दरवाजे खोल कर फल निकाल कर तराशे। मूंगफली के तले हुए दाने और मूंगफली की बनी हुई मिठाई निकाल ली गई। सब ने फलाहार किया।  वापस चले तो पुल पार करते ही कार को बड़े कुंड के मार्ग पर मोड़ दिया। कुंड देखते ही मन निराशा से भर गया। यह कुंड आकार में छोटा था और अपने महात्म्य के कारण ही बड़ा कहाता था। कुंड को पूरी तरह ध्वस्त कर चौड़ा कर दिया गया था। चौड़ा करने में जिस तरह का निर्माण किया गया था। उस की प्राचीनता समाप्त हो गई थी। यहाँ भी कुंड में नलकूप द्वारा डाला जा रहा पानी था। यात्री आ कर उसी में स्नान कर रहे थे।  लोग यहाँ पहुँचते ही सब से पहले इसी कुंड में स्नान करते, फिर मंदिर के पास बने बड़े कुंड में, उस के बाद मंदिर में दर्शन करने जाते। मुझे अब विचार आया कि हम ने तो सारी प्रक्रिया को ही उलट डाला था। इस पूरे स्थान को प्राचीन इमारतों का संरक्षण करने वाले सिद्धहस्त लोगों के निर्देशन में पुननिर्माण की आवश्यकता है। इसे प्रमुख दर्शनीय स्थल और पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। पर मौजूदा सरकार में ऐसी सोच होना संभव प्रतीत नहीं होता। हम वापस इंद्रगढ़ की ओर चल दिए। वहाँ अभी एक और मुवक्किल और एक वकील मित्र से मिलना था। 

सब से बायीं ओर बैठी शोभा

मंदिर के बाहर कलात्मक प्रतिमाएँ
 
मंदिर आधार पर शेष बची प्रस्तर कला


आकार में बड़ा, नाम में छोटा कुंड
(दायीं ओर नलकूप से जल लाता पाइप दिखाई दे रहा है)
नोट :  सभी चित्रों को क्लिक कर के बड़े आकार में स्पष्ट देखा जा सकता है। 


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