Tuesday, April 19, 2011

अपने पूर्वजों के गाँव की बगीची और उस के मंदिर

ल मैं ने वादा किया था कि अगली चलेंगे बगीची में। मैं भी इस से पहले कभी इस बगीची में नहीं गया था। लेकिन वह बगीची मेरे दाहजी (दादाजी), चाचाजी और पिताजी की स्मृतियों में रची बसी थी। चाचा जी और पिताजी को गर्मी के मौसम में जब रामलीला होती तो पूरा पखवाड़ा बगीची में ही बिताना होता था। मैं चाहता था कि पिताजी जिन संत के सब से प्रिय शिष्य थे उन का यह स्थान कैसा रहा होगा और कैसा है" काका लक्ष्मीचन्द कार में आगे मेरे पास की सीट पर बैठ गए और रास्ता बताते चले। बगीची नगर के मुख्य द्वार से कोई दो सौ मीटर की दूरी पर ही आज की मुख्य सड़क से कुछ हट कर स्थित थी। बगीची के चारों ओर पत्थर की चारदिवारी थी और दक्षिण दिशा में लोहे की छड़ों से बना गेट लगा हुआ था, इस गेट से एक ट्रक तक बगीची में प्रवेश कर सकता था।

बगीची में शिव मंदिर (दक्षिण दिशा से)
गेट से प्रवेश करते ही सामने मैदान था जिस में बड़े बड़े पुराने वृक्ष खड़े थे जो बगीची की प्राचीनता के साक्षी थे। पश्चिम दिशा की ओर एक विशाल पक्के चबूतरे पर यज्ञशाला थी जिसकी छत टीन से इस तरह बनाई गई थी कि हवन का धुआँ आसानी से बाहर निकल सके। बगीची के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व के कोने में एक मंदिर समूह था जिस में सब से पहले एक बड़ा सुंदर सा मंदिर दिखाई दे रहा था। मंदिर का रख रखाव उत्तम था। शिखर और गर्भगृह को बाहर से गेरुए रंग से रंगा हुआ था। मंदिर का आधार नीले रंग से और मण्डप पर बने शिखर चूने के सफेद रंग से रंगे हुए थे। शेष मंदिर को तेल रंगों से रंगा हुआ था। मंदिर का मुख पूर्व की ओर था। मैं ने चप्पलें उतारी और मंदिर में गया। वहाँ एक बड़े आकार का काले पत्थर का सुंदर शिवलिंग स्थापित था। इस के चारों ओर मुख बने हुए थे जो शंकर की चार भिन्न-भिन्न मुद्राओं को अभिव्यक्त करते थे। यह शिवलिंग कम से कम दो-तीन सौ वर्ष पुराना प्रतीत होता था। क्यों कि इसी तरह के कुछ शिवलिंग कोटा नगर के कुछ प्राचीन शिव मंदिरों में स्थापित हैं और वे भी इतने ही प्राचीन हैं। गर्भगृह के सामने मण्डप के नीचे सफेद संगमरमर से निर्मित नन्दी विराजमान थे, जो एकदम नवीन लग रहे थे। पूछने पर पता लगा कि इन्हें अभी इसी वर्ष स्थापित किया गया है।
मंदिर में स्थापित शिवलिंग
शिवमंदिर के उत्तर में कुछ पूर्व की ओर एक इमारत बनी हुई थी। मुझे बताया गया कि इस इमारत के दक्षिण-पूर्वी कोने में  हनुमान मंदिर है। यह छोटा था लेकिन अंदर से बहुत साफ और सुंदर था। दीवारों पर ग्रेनाइट के रंगीन पत्थर लगाए हुए थे और फर्श संगमरमर का था। हनुमान प्रतिमा को देख कर लगता था कि यहाँ हनुमान जी का सिर्फ सिर ही स्थापित था या पूरी प्रतिमा थी तो वह गर्दन तक भूमि में चली गई थी। हनुमान जी को सिंदूर और चांदी के वर्क से खूबसूरती से श्रृंगारित किया हुआ था। वहाँ सफाई भी बहुत अच्छी थी। इन दोनों मंदिरों को देख कर लगा कि यहाँ के भक्त सुरुचिपूर्ण, सौंदर्यप्रेमी और सफाई पसंद हैं। मुझे नगर में भी गंदगी दिखाई न दी थी। हो सकता है यह सद्गुण महाराज चेतनदास जी से यहाँ के लोगों को मिला हो। पिताजी को भी गंदगी बिलकुल पसंद न थी। जरा सा तिनका या धूल उन्हें दिखाई देती तो उसे तुंरत हटाते थे।
हनुमान प्रतिमा
नुमान मंदिर से पूर्व में दो छतरियाँ बनी हुई थीं। जिन्हें चारों ओर से लोहे की छड़ों की जाली से सुरक्षित किया गया था। इन छतरियों में महाराज चेतन दास जी के चरणों के चिन्ह संगमरमर पर बनाए हुए थे और उन की स्मृति के रूप में यहाँ स्थापित थे।

महाराज चेतनदास जी के चरण चिन्ह


गैंता में तो मुझे महाराज चेतनदास जी के चमत्कारों के विषय में कोई चर्चा सुनने को न मिली, वहाँ उन्हें लोग अपने पथप्रदर्शक और मार्गदर्शक के रूप में ही जानते हैं। लेकिन आस पास के कस्बों और गाँवों में उन के चमत्कारी होने के बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हो गई हैं। लेकिन मुझे लगता है वे सभी काल्पनिक हैं। दाहजी और पिताजी उन के निकट कई वर्षों तक रहे। लेकिन कभी उन के मुहँ से उन के इस रूप की चर्चा न सुनी। वे जो कहते थे उस से जान पड़ता है कि महाराज बहुत गुणी थे। वे आयुर्वेद के विद्वान थे। रोगी उन के पास आते थे और स्वस्थ हो कर जाते थे। बच्चों को वे संगीत, गणित और भाषा की शिक्षा प्रदान करते थे। गरीब और कमजोर लोगों को अपने धनी शिष्यों से आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराते थे। नगर की सांस्कृतिक गतिविधियों के वे मुखिया थे। गर्मी के मौसम में जो रामलीला आयोजित करते थे उस का निर्देशन वे स्वयं करते थे। वे लोगों को और लोग उन को असीम प्यार करते थे। यही वजह थी कि लोगों ने उन्हें चमत्कारी पुरुष मान लिया था। गाँव के लोग उन की स्मृतियों और धरोहर को आज भी संजोए हुए थे। 
शिव मंदिर सामने (पूर्व दिशा से)
नुमान मंदिर में एक ओर एक व्यक्ति सस्वर रामायण पाठ कर रहा था। मंदिर के पश्चिम दिशा की ओर एक बड़ा और लंबा बरामदा बना हुआ था। इस में कुछ भक्तगण भोजन बनाने में व्यस्त थे। मैं ने काका लक्ष्मीचंद से पूछा तो उन्हों ने बताया कि गाँव के कुछ लोग नवरात्र में नौ दिन यहीँ बगीची में रहते हैं। वे नवरात्र पर नौ दिन तक रामायण का अखंड पाठ करते हैं। अपना भोजन भी सब मिल कर यहीँ बनाते हैं। हमें काफी समय हो गया था, इतना कि यदि तुरंत न चलते तो कोटा पहुँचते पहुँचते रात्रि हो जाती। मेरा मन कर रहा था कि यहीँ एक-दो दिन इन लोगों के बीच रुकूँ। लेकिन अगले दिन मुझे तो अदालत करनी थी। बच्चों को भी अवकाश न था। हम बगीची के बाहर आ गए। काका लक्ष्मीचंद ने वहीं से हम से विदा ली। हम ने अपनी कार हाँकी और कोटा के लिए रवाना हो गए। मैं रास्ते भर सोचता रहा कि मुझे यहाँ कुछ दिन आ कर गाँव में रहना चाहिए। अपना घर तो गिर कर टीला हो चुका है, पर रहने को बगीची तो है ही और उस से अच्छा हो भी क्या सकता है।
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