Wednesday, March 9, 2011

रूप बदलती आकृतियाँ

गातार रूप बदलती उन आकृतियों ने उसे बहुत परेशान कर रखा था। जब भी उस ने दिमाग को जरा भी फुरसत होती, वे सामने आने लगतीं। वे लगातार गतिमय रहती थीं और रूप बदलती रहती थीं। शुरु शुरू में उसे सिर्फ एक बिंदु दिखाई दिया था। जल्दी ही उस से एक रेखा निकल पड़ी और घूम कर वापस उसी बिंदु पर आ मिली। वह एक गोला था, पर वह गोला जैसा भी नहीं था। यूँ कहा जा सकता था कि वह किसी इंसान के पैर के अंगूठे जैसा दिखाई देता था। वह कुछ सोच पाता उस के पहले ही वह छोटा होना शुरु हो गया। लगता था जैसे वह अंगूठे के पास की उंगली हो गया हो, फिर उस के पास की उंगली, फिर उस के पास की उंगली, फिर पैर की सब से छोटी उंगली जैसा। फिर उस के जेहन में कोई और बात आ गई, सारी आकृतियाँ गायब हो गईं। कई दिन तक वे फिर नहीं दिखीं। हफ्ता भर ही निकला होगा, वह अपने दफ्तर में बैठा हुआ किसी समस्या के हल के बारे में कुछ सोच रहा था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वे आकृतियाँ दिखना फिर आरंभ हो गयी। इस बार बिंदु सीधे एक पैर की शक्ल जैसी आकृति में बदल गया था जो जल्दी-जल्दी उलटा-सीधा होता रहा। कभी लगता वह दायाँ पैर है ते कभी लगता वह बायाँ पैर है। वह उस आकृति के बारे में कुछ अधिक सोच पाता, उसे अपनी समस्या के हल का मार्ग सूझ पड़ा और वह गतिमय आकृति अचानक लुप्त हो गई, जैसे वह कोई सपना देख रहा  था और पूरा होने के पहले ही नींद टूट गई हो।
ह व्यस्त हो गया। रोज काम के बाद इतना थक जाता कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ जाती। सुबह उठता तो महसूस होता कि अभी अभी सोया था और जाग पड़ा है, कुछ ही क्षणों में पूरी रात बीत गई। इस व्यस्तता के बीच उसे वे रूप बदलती आकृतियाँ दिखाई नहीं दीं, वह भी उन्हें भूल गया। लेकिन जैसे ही उसे कुछ फुरसत हुई वे फिर से टपक पड़ीं। इस बार भी वे एक बिंदु से आरंभ होती थीं, लेकिन इस बार बनी आकृतियों का पैरों से कोई सामंजस्य न था। अब उसे लगता कि ये आकृतियाँ पैरों के बजाय हाथों की उंगलियों के पौर बना रही हैं, फिर शनै शनै एक हाथ के पंजे में तब्दील हो रही हैं। हाथ के पंजे उसी तरह उलट-पलट हो रहे हैं कि कभी दायें हाथ का, तो कभी बाएँ हाथ का अहसास होता है। हर बार कुछ दिनों के अंतराल से ये आकृतियाँ दिखाई देतीं। धीरे-धीरे उसे मानव शरीर के सभी अंग उन बदलती हुई आकृतियों में दिखाई देने लगे। चेहरा भी बना पर यह पहचान पाना कठिन था कि वह चेहरा किसी स्त्री की तरह लगता था अथवा किसी पुरुष की तरह। वह परेशान हो गया, सोचने लगा कि यदि वह चेहरा किसी पुरुष  का होता तो उस पर दाढ़ी मूँछ अवश्य होते। लेकिन अब तक जितनी भी आकृतियाँ उसे दिखाई दी थीं, उन में केश या रोमों का नामो-निशाँ तक न था। उस ने ऐसे पुरुष भी देखे  थे जिन्हें  बार बार रेजर फेरते भी ता-उम्र दाढ़ी-मूँछ नसीब न हुई थी। कहीं यह आकृतियाँ किसी ऐसे ही पुरुष की ओर तो इशारा नहीं कर रही थीं? उस के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। फिर वे आकृतियाँ छिन भर को भी स्थिर नहीं रहती थीं, दिखाई देतीं, लगातार बदलती रहतीं और फिर गायब हो जातीं। कभी वह सोचता कि  काश वह चित्रकार होता, तो कितना अच्छा होता। वह इन आकृतियों को किसी कागज पर चित्रित करने का प्रयत्न करता। 
न आकृतियों में उसे गले के नीचे, और घुटनों के ऊपर के हिस्से का अहसास आज तक नहीं हो सका था। उन में से कुछ भी यदि दिखाई दिया होता, तो वह अनुमान कर सकता था कि ये आकृतियाँ उसे क्या दिखाना चाहती हैं? वह सोचता था कि आकृतियाँ एक स्त्री से संबंधित होना चाहिए। यदि वे आकृतियाँ किसी पुरुष  से संबंधित होतीं तो अभी तक उस के पुरुष होने की पहचान उजागर हो गई होती। पर फिर वह यह भी सोचता कि वह स्वयं एक पुरुष है, और एक नैसर्गिक आकर्षण के तहत एक स्त्री के बारे में सोच रहा है। पुरुषों को तो स्वप्न में भी स्त्रियाँ ही दिखाई पड़ती हैं। शायद इस कारण भी कि वे उसे प्रिय हैं। जब कभी उस के स्वप्न में पुरुष दिखाई दिया भी तो एक प्रतिस्पर्धी के रूप में, बल्कि एक प्रतिद्वंदी के रूप में। इसी लिए उसे हमेशा किसी भी तरीके की आकृतियों में स्त्रियाँ ही पहले दिखाई देती हैं। चाहे वे बाद में पुरुष ही क्यों न निकलें। उस ने अपने सिर को झटक दिया। वह क्या सोचने लगा? ऐसा क्या है स्त्री में जो हमेशा ही उस के जेहन पर कब्जा जमाए बैठी रहती है? वह फिर इन आकृतियों में स्त्री की कल्पना करने लगा। लेकिन अंत में ये भी कहीं किसी पुरुष से संबंधित ही निकलीं तो। उस का सोचना सब बेकार ही चला जाएगा। इस वक्त वह चाहने लगा था कि उसे वे आकृतियाँ फिर से दिखाई देने लगें।  वह उन में खोजने का प्रयत्न करेगा कि वे किसी पुरुष से संबंधित हैं या स्त्री से?  कुछ  देर के लिए उस ने अपनी आँखें बंद कर लीं और देखने का प्रयत्न करने लगा कि शायद वे आकृतियाँ उसे दिखने लगें। बचपन में उस के साथ ऐसा ही होता था। वह कोई खूबसूरत हसीन सपने में खोया होता, सपने का क्लाईमेक्स चल रहा होता कि कभी माँ या बहिन या कोई और उसे जगा देता। उसे बहुत झुँझलाहट होती। आखिर उस ने इन लोगों का क्या बिगाड़ा था जो सपना भी पूरा नहीं देखने दिया। तब उसे गुस्सा आने लगता, जब उसे जगा कर पूछा जाता कि क्या उसे चाय पीनी है? अब यह भी कोई बात हुई कि किसी को जगा कर पूछा जाए कि उसे चाय पीनी है। उस की तो नींद फोकट में खराब हो गई। सपना गया, सो अलग। वह गुस्से में चाय के लिए मना कर देता, नहीं पीनी उसे चाय। चादर तान कर फिर से सोने की कोशिश करता। इस कोशिश में कि उसे फिर से नींद लग जाए और टूटा हुआ सपना फिर से दिखाई देने लगे, उसे पता लग सके कि क्लाइमेक्स के बाद क्या हुआ?
स ने बहुत बार ऐसा किया। फिर से उसी सपने में लौटने की कोशिश की। लेकिन ज्यादातर वह सफल नहीं हुआ। अक्सर ही टूटी हुई नींद फिर से नहीं जुड़ती।  वह कुछ मिनट कोशिश करने के बाद उठ बैठता और माँ या बहिन को जोर से चिल्ला कर कहता। अब जगा दिया है, उसे नींद नहीं लग रही है लेकिन आलस भगाने को चाय चाहिए। पहले तो माँ या बहिन लड़ने लगती कि अब फिर से उस की चाय के लिए पतीली चढ़ाई जाए। पहले ही क्यों न बता दिया? लेकिन बाद में वे उस की आदत को समझने लगीं और उस के दुबारा सोने का प्रयत्न करने के समय कुछ देर इंतजार करतीं और जब वह पाँच-सात मिनट में चाय की मांग करने लगता तो पतीली चढ़ातीं। अब वे चाय चढ़ाने के समय के पंद्रह मिनट पहले ही उसे जगाने लगीं। कभी कभी नींद वापस लग भी जाती, लेकिन कोई सपना नहीं आता। कभी सपना आता तो वह कोई और ही सपना होता, वह नहीं, जिसे देखने के लिए वह फिर से नींद के आगोश में कूद पड़ा था। कभी वही सपना भी फिर से दिखाई देने लगता जिस के क्लाईमेक्स के बाद की कहानी जानने के लिए वह चादर फिर से तान लेता था। ऐसे में क्लाईमेक्स के बाद की कहानी हू-ब-हू वैसी ही होती जैसी वह सोचता जाता। कहानी पूरी हो जाती और वह उठ बैठता। फिर सोचने लगता कि उस की नींद दुबारा लगी भी थी या नहीं। या फिर वह जैसा सोचता था वैसा ही उसे दिखता जाता था। वह फिर वही कोशिश दुहरा रहा था। चाह रहा था कि वे आकृतियाँ उसे फिर से दिखने लगें और उन का संबंध किसी स्त्री से ही हो। एक खूबसूरत सी स्त्री, जो उस की सारी आकांक्षाएँ पूरी कर सके। उस की कोशिश कामयाब न होनी थी और न हुई। कोशिश करने पर भी उसे वे आकृतियाँ नहीं दिखाई दीं। उस ने कोशिश छोड़ी नहीं, बार-बार करता रहा। कई दिनों, सप्ताहों और महिनों तक। लेकिन वे आकृतियाँ उसे दिखाई नहीं दीं। उस ने एक दिन सोचा, चलो उन से पीछा छूटा। उस ने उन के बारे में सोचना बिलकुल बंद कर दिया। फिर धीरे-धीरे उन्हें भूल गया, जैसे उसे वे उसे कभी दिखाई दी ही नहीं थीं। वह अपने काम में जुट गया। अब तो फुरसत होने पर भी उसे वे दिखाई नहीं देतीं थीं। 
फिर एक दिन, जब उसे अपने जीवन का अब तक का सब से बड़ा और मुश्किल लगने वाला काम करना था। वह एक प्रोफेशनल था। उसे जो काम मिला था वह बहुत महत्वपूर्ण था, जिसे उसे एक निश्चित समय  पर पूरा कर के देना था। उस का कैरियर उस पर निर्भर करता था। यदि वह उस काम को निश्चित समय पर सफलता पूर्वक न कर सका तो उस का वर्तमान दाँव पर लग जाता, और कर लेता तो उसे उन ऊँचाइयों पर पहुँचा देता जिस की वह बरसों से सिर्फ कल्पना करता आ रहा था। वह उस काम को आरंभ करने की जुगत ही नहीं बैठा पा रहा था, कि उसे कहाँ से शुरु करे? ..... वे आकृतियाँ उसे फिर से दिखाई देने लगीं। वह काम को भूल गया। आकृतियों में तलाशने लगा कि आखिर उन आकृतियों में स्त्री है या पुरुष।   

13 comments:

Udan Tashtari said...

हम्म!! आगे जानने की जिज्ञासा बढ़ गई है..जारी रहिये.

नीरज जाट जी said...

हम भी उलझ गये इन आकृतियों में। देखते हैं अगली बार क्या होता है।

akhtar khan akela said...

bhaai jaan akrtiyon pr risrch bhtrin chl rhi he aaj kl mulaaqaat nhin ho rhi he kyaa baat he . akhtar khan akela kota rajsthan

योगेन्द्र पाल said...

मुझे मजा आ गया आपकी यह कहानी पढ़ कर आगे की कड़ी का इंतज़ार रहेगा

प्रवीण पाण्डेय said...

आकृतियों को टटोलने की जिज्ञासा उन स्वप्नों के लिये खुला आमन्त्रण है।

Arvind Mishra said...

सपनीली दुनिया अगर शीर्षक रखा जाय या फिर टूटते जुड़ते स्वप्न -यह कहानी है या आत्मकथात्मक संस्मरण !

Manpreet Kaur said...

hmmmmmm bouth he aacha post hai aapka.. imp post
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सञ्जय झा said...

padhte-padhte jane kahan kho gaya....

pahle khud ki akritiyon ko dhondhte
hain......

aap jari rahen ..... hum intazari me
hain......


pranam.

प्रतिभा सक्सेना said...

अब तो अगली पोस्ट पढ़े बिना चैन नहीं पड़ेगा.
हे भगवान, जल्दी लिखवा देना !

निर्मला कपिला said...

कहानी रोचक लग रही है। अगली कडी का इन्तजार। आभार

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Rochak.....
Aabhar.
---------
पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?

ललित शर्मा said...

फ़्रायड के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की तरह आकृतियों की कहानी की आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा है।

आभार

Anonymous said...

यह किस चीज़ का खूबसूरत आग़ाज़ है...
क्या खूब उन्मुक्त परवाज़ है...