वह व्यस्त हो गया। रोज काम के बाद इतना थक जाता कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ जाती। सुबह उठता तो महसूस होता कि अभी अभी सोया था और जाग पड़ा है, कुछ ही क्षणों में पूरी रात बीत गई। इस व्यस्तता के बीच उसे वे रूप बदलती आकृतियाँ दिखाई नहीं दीं, वह भी उन्हें भूल गया। लेकिन जैसे ही उसे कुछ फुरसत हुई वे फिर से टपक पड़ीं। इस बार भी वे एक बिंदु से आरंभ होती थीं, लेकिन इस बार बनी आकृतियों का पैरों से कोई सामंजस्य न था। अब उसे लगता कि ये आकृतियाँ पैरों के बजाय हाथों की उंगलियों के पौर बना रही हैं, फिर शनै शनै एक हाथ के पंजे में तब्दील हो रही हैं। हाथ के पंजे उसी तरह उलट-पलट हो रहे हैं कि कभी दायें हाथ का, तो कभी बाएँ हाथ का अहसास होता है। हर बार कुछ दिनों के अंतराल से ये आकृतियाँ दिखाई देतीं। धीरे-धीरे उसे मानव शरीर के सभी अंग उन बदलती हुई आकृतियों में दिखाई देने लगे। चेहरा भी बना पर यह पहचान पाना कठिन था कि वह चेहरा किसी स्त्री की तरह लगता था अथवा किसी पुरुष की तरह। वह परेशान हो गया, सोचने लगा कि यदि वह चेहरा किसी पुरुष का होता तो उस पर दाढ़ी मूँछ अवश्य होते। लेकिन अब तक जितनी भी आकृतियाँ उसे दिखाई दी थीं, उन में केश या रोमों का नामो-निशाँ तक न था। उस ने ऐसे पुरुष भी देखे थे जिन्हें बार बार रेजर फेरते भी ता-उम्र दाढ़ी-मूँछ नसीब न हुई थी। कहीं यह आकृतियाँ किसी ऐसे ही पुरुष की ओर तो इशारा नहीं कर रही थीं? उस के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। फिर वे आकृतियाँ छिन भर को भी स्थिर नहीं रहती थीं, दिखाई देतीं, लगातार बदलती रहतीं और फिर गायब हो जातीं। कभी वह सोचता कि काश वह चित्रकार होता, तो कितना अच्छा होता। वह इन आकृतियों को किसी कागज पर चित्रित करने का प्रयत्न करता।

उस ने बहुत बार ऐसा किया। फिर से उसी सपने में लौटने की कोशिश की। लेकिन ज्यादातर वह सफल नहीं हुआ। अक्सर ही टूटी हुई नींद फिर से नहीं जुड़ती। वह कुछ मिनट कोशिश करने के बाद उठ बैठता और माँ या बहिन को जोर से चिल्ला कर कहता। अब जगा दिया है, उसे नींद नहीं लग रही है लेकिन आलस भगाने को चाय चाहिए। पहले तो माँ या बहिन लड़ने लगती कि अब फिर से उस की चाय के लिए पतीली चढ़ाई जाए। पहले ही क्यों न बता दिया? लेकिन बाद में वे उस की आदत को समझने लगीं और उस के दुबारा सोने का प्रयत्न करने के समय कुछ देर इंतजार करतीं और जब वह पाँच-सात मिनट में चाय की मांग करने लगता तो पतीली चढ़ातीं। अब वे चाय चढ़ाने के समय के पंद्रह मिनट पहले ही उसे जगाने लगीं। कभी कभी नींद वापस लग भी जाती, लेकिन कोई सपना नहीं आता। कभी सपना आता तो वह कोई और ही सपना होता, वह नहीं, जिसे देखने के लिए वह फिर से नींद के आगोश में कूद पड़ा था। कभी वही सपना भी फिर से दिखाई देने लगता जिस के क्लाईमेक्स के बाद की कहानी जानने के लिए वह चादर फिर से तान लेता था। ऐसे में क्लाईमेक्स के बाद की कहानी हू-ब-हू वैसी ही होती जैसी वह सोचता जाता। कहानी पूरी हो जाती और वह उठ बैठता। फिर सोचने लगता कि उस की नींद दुबारा लगी भी थी या नहीं। या फिर वह जैसा सोचता था वैसा ही उसे दिखता जाता था। वह फिर वही कोशिश दुहरा रहा था। चाह रहा था कि वे आकृतियाँ उसे फिर से दिखने लगें और उन का संबंध किसी स्त्री से ही हो। एक खूबसूरत सी स्त्री, जो उस की सारी आकांक्षाएँ पूरी कर सके। उस की कोशिश कामयाब न होनी थी और न हुई। कोशिश करने पर भी उसे वे आकृतियाँ नहीं दिखाई दीं। उस ने कोशिश छोड़ी नहीं, बार-बार करता रहा। कई दिनों, सप्ताहों और महिनों तक। लेकिन वे आकृतियाँ उसे दिखाई नहीं दीं। उस ने एक दिन सोचा, चलो उन से पीछा छूटा। उस ने उन के बारे में सोचना बिलकुल बंद कर दिया। फिर धीरे-धीरे उन्हें भूल गया, जैसे उसे वे उसे कभी दिखाई दी ही नहीं थीं। वह अपने काम में जुट गया। अब तो फुरसत होने पर भी उसे वे दिखाई नहीं देतीं थीं।
फिर एक दिन, जब उसे अपने जीवन का अब तक का सब से बड़ा और मुश्किल लगने वाला काम करना था। वह एक प्रोफेशनल था। उसे जो काम मिला था वह बहुत महत्वपूर्ण था, जिसे उसे एक निश्चित समय पर पूरा कर के देना था। उस का कैरियर उस पर निर्भर करता था। यदि वह उस काम को निश्चित समय पर सफलता पूर्वक न कर सका तो उस का वर्तमान दाँव पर लग जाता, और कर लेता तो उसे उन ऊँचाइयों पर पहुँचा देता जिस की वह बरसों से सिर्फ कल्पना करता आ रहा था। वह उस काम को आरंभ करने की जुगत ही नहीं बैठा पा रहा था, कि उसे कहाँ से शुरु करे? ..... वे आकृतियाँ उसे फिर से दिखाई देने लगीं। वह काम को भूल गया। आकृतियों में तलाशने लगा कि आखिर उन आकृतियों में स्त्री है या पुरुष।
12 टिप्पणियां:
हम्म!! आगे जानने की जिज्ञासा बढ़ गई है..जारी रहिये.
हम भी उलझ गये इन आकृतियों में। देखते हैं अगली बार क्या होता है।
bhaai jaan akrtiyon pr risrch bhtrin chl rhi he aaj kl mulaaqaat nhin ho rhi he kyaa baat he . akhtar khan akela kota rajsthan
मुझे मजा आ गया आपकी यह कहानी पढ़ कर आगे की कड़ी का इंतज़ार रहेगा
आकृतियों को टटोलने की जिज्ञासा उन स्वप्नों के लिये खुला आमन्त्रण है।
सपनीली दुनिया अगर शीर्षक रखा जाय या फिर टूटते जुड़ते स्वप्न -यह कहानी है या आत्मकथात्मक संस्मरण !
padhte-padhte jane kahan kho gaya....
pahle khud ki akritiyon ko dhondhte
hain......
aap jari rahen ..... hum intazari me
hain......
pranam.
अब तो अगली पोस्ट पढ़े बिना चैन नहीं पड़ेगा.
हे भगवान, जल्दी लिखवा देना !
कहानी रोचक लग रही है। अगली कडी का इन्तजार। आभार
Rochak.....
Aabhar.
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पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?
फ़्रायड के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की तरह आकृतियों की कहानी की आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा है।
आभार
यह किस चीज़ का खूबसूरत आग़ाज़ है...
क्या खूब उन्मुक्त परवाज़ है...
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