Saturday, July 24, 2010

"श्रम का निर्वासन"यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का द्वादश सर्ग


यादवचंद्र पाण्डेय के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के ग्यारह सर्ग पढ़ आप अनवरत के पिछले कुछ अंकों में पढ़ चुके हैं। इस तरह उन के इस काव्य के प्रथम खंड का समापन हो चुका है। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही यादवचंद्र जी के काव्य का रूप भी परिवर्तित होता जाता है।  इसे  आप इस नए सर्ग को पढ़ते हुए स्वयं अनुभव करेंगे। आज इस काव्य का द्वादश सर्ग "श्रम का निर्वासन" प्रस्तुत है ................ 
* यादवचंद्र *

द्वादश सर्ग

श्रम का निर्वासन

इतिहास नया वे गढ़ते हैं
भूगोल नया वे पढ़ते हैं
पहने जो सदा लंगोटी हैं
छीनते सिन्धु से मोती हैं
पड़ जाते उन के जहाँ कदम
बन जाते हैं   जै रू से ल म 

काफिला न दम वह लेता है
सागर को चीरे देता है
युग भी रुकते थर्राता है
पथ छोड़ आल्प्स हट जाता है
विस्तृत दुनिया का हर कोना
उन चरणों का जादू - टोना

यूरप के निर्जन सुप्त भाग
दर्शन कर उन के रहे जाग
अफ्रीका बलाएँ लेता है
अमरिका सलामी देता है
न्यूजी का फाटक खुलता है 
वेरिंग का चामर डुलता है
रूढ़ियाँ खड़ी अकुलाती हैं
सीमाएँ सिकुड़ी जाती हैं

कडि़याँ खुल रही दिशाओं की
द्वीपों - देशों - दरियाओं की
सागर - उपकुल - गुफाओं की 
पश्चिम की हवा, बहावों की
शापित बेड़े लहराते हैं
आगे जो बढ़ते जाते हैं
ज्वारों में अलख जगाते हैं
झंझा से आँखें लड़ाते हैं
प्लावन उन को नहलाते हैं
सूरज आरती सजाते हैं
चांदनी पावड़े बिछाती है
जल परियाँ गीत सुनाती हैं
युग-परिवर्तन भीषण यह है
चौपड़ का एक नया सह है
पर अन्तिम बात न भूलूंगा
तेरा सच तुझ से कह दूंगा



?
जब मातृ भूमि लंजिका बनी
मुझ पर युग की तलवार तनी
तब भूमि विदेशी अपनी बन
पय पिला किया मेरा पोषण
कहता जो धरा विभाजित है
वह माँ-घाती है, नास्तिक है


जो राष्ट्र !राष्ट्र ! चिल्लाता है
वह अपना स्वार्थ जुगाता है
मानव की कोख लजाता है
हिंसा को ठोक जगाता है
भू के सम्पूर्ण कलषु कुत्सित
इस राष्ट्र प्रेम में हैं संचित
यह सब बनिकों की माया है
शोषक की छलना, छाया है
यह प्रकृति-सनातन धर्म नहीं 
यह मनुज-सहज-कृत कर्म नहीं
यह राष्ट्र-व्यष्टि का पाप सघन
सबलों की पूजा, स्तुति वंदन
निर्बल का पी कर खून पला
यह राष्ट्र-घिनौना कोढ़ गला



मानवता मूढ़. अपंग बनी
जब कभी युद्ध की आग जली
फासिस्तवाद हूँकार उठा
जब राष्ट्र खींच, तलवार उठा
बलि चढ़ने लगी जवानों की 
बूढ़ों-बच्चों-नादानों की 
गाँवों-खेतों-खलिहानों की
आँचल में बँधे फसानों की
सबलों का वर्ग बढ़ा आगे
निर्बल घर छोड़ सदा भागे
संस्कृति-सभ्यता-कला-चिन्तन
सिर पर रख तृण मांगे जीवन

यह राष्ट्र मनुज का भक्षक है
यह इंद्रपुरी का तक्षक है
यतह गोरखधंधा, त्राटक है
यह एक घिनौना नाटक है
साम्राजी अघ की टट्टी है
कमजोर ईंट की भट्टी है
यूरप में बढ़ी तिजारत जो 
उस से उठ गई इमारत जो
उस में पुतलियाँ झमकती  जो
रेशम की डोर चमकती जो
सुन लो, क्या कह चिल्लाती है
किस की वह टेर बुलाती है
'उत्पादन तेज करो, दौड़ो
मारो औ मरो-बढ़ो, दौड़ो
उत्कर्ष चतुर्दिक होता है'
कुनबे में कर्मकर रोता है
बनियों का दशादर्श जगा
घर छोड़ श्रमिक परदेश भगा


X  X  X  X  X  X  X  X  

परदेशी का कोई 
राष्ट्र नहीं होता है प्यारे 
श्रम उन्नायक सारी 
धरती का नेता है प्यारे
वह जो छू दे माटी
सोना बन जाती है प्यारे
उस की एक फूँक से 
अलका घबड़ाती है प्यारे
विजन अमरिका कल ही
नन्दन बन जाएगा
बात दूसरी, उस को
वह भोग नहीं पाएगा

किन्तु उसे क्या गम है
चिनगारी जहाँ उड़े
जले फ्रांस और जर्मन
जारों से लपक भिड़े
सन सत्तावन की लौ
भभके औ भभक पड़े
गिरे चीन पर बिजली
कुमितांगो शीश जड़े
जान बचा कर अपनी 
हटे पूर्व-पश्चिम से
मिहनतकश का दुश्मन
उत्तर से दक्षिण से

श्रमिक वर्ग का एका
जिन्दाबाद रहेगा
बँटे धरा पर वह तो
ध्रुव अविभाज्य रहेगा
राष्ट्रवाद का घेरा धरा-गगन क्या बांधे
क्षुद्र स्वार्थ का साधक महा साध्य क्या साधे

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यादवचंद्र पाण्डेय

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