Tuesday, May 11, 2010

तथ्यों की पर्याप्तता और सत्यता


पाठकों और मित्रों !

नवरत की यह 500वीं प्रस्तुति है।  जब मैं ने अपना पहला ब्लाग 'तीसरा खंबा' आरंभ किया था तो मैं ने  सोचा भी न था कि मैं कोई दूसरा ब्लाग जल्दी ही आरंभ कर दूंगा। लेकिन यहाँ बातचीत का जो माहौल था,  उस ने मुझे प्रेरित किया कि मैं कानूनी विषयों के अतिरिक्त भी कुछ लिखूँ। तीसरा खंबा में उसे लिखा जाना उपयुक्त नहीं लगा। और अनवरत का जन्म हुआ।
जैसा कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ होता है। वह पैदा होते ही कुछ सीखना आरंभ करता है और जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। बोलना आरंभ करने के साथ ही वह कहना सीखता है। जो कुछ वह देखता है, अनुभव करता है, पढ़ता है उसे विद्यमान परिस्थितियों पर लागू करता है। तब उस के पास कुछ कहने को होता है, वही सब कुछ वह किसी न किसी माध्यम से अभिव्यक्त करता है। मैं ने भी अनवरत पर जो कुछ लिखा है वह सब यह अभिव्यक्ति है। अपनी स्वयं की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त मैं ने जो  कुछ मुझे पसंद था वह भी प्रस्तुत किया। इस में कुछ मित्रों की रचनाएँ थीं। लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो मैं ने पढ़ा है और जिस ने मुझे प्रभावित किया है, जिस से मैं ने कुछ सीखा है।  मैं चाहता था कि वह सब भी हिन्दी अंतर्जाल के पाठकों को उपलब्ध हो। मैं ने इस के लिए भी प्रयत्न किया और लगातार करता रहूँगा। मुझे जिन चीजों ने प्रभावित किया है उन में से एक कार्ल मार्क्स का दर्शन भी है। जिसे आजकल मार्क्सवाद, या मार्क्सवाद-लेनिनवाद, या फिर माओवाद के माध्यम से जाना-पहचाना जाता है वह मार्क्स के दर्शन का विस्तार है। उसे जाँचने , परखने और उस पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है।  
मेरी नजर में मार्क्स का दर्शन, जिसे द्वंदात्मक भौतिकवाद भी कहा जाता है, जैसा कि मैं ने उसे जाना है और समझा है, वस्तुतः वह पद्यति है जिस से दुनिया चल रही है। मुझे वह इस भौतिक जगत के तमाम व्यवहारों को समझने का आज तक का सब से  बेहतर तरीका प्रतीत होता है। इस पद्यति का निर्माण स्वयं मार्क्स ने नहीं किया। यह तो वह पद्यति है जिस से दुनिया चल रही है, मार्क्स ने तो उसे सिर्फ खोज निकाला है। मार्क्स की खोज निकाली हुई इस पद्यति को किसी भी रुप में आज तक कोई चुनौती मिली हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। सारे विवाद उस पद्यति का प्रयोग करते हुए दुनिया के बदलने के उपायों के संबंध में है। जो भी  व्यक्ति या व्यक्ति समूह इस पद्यति को समझ लेता है वह अपने अनुसार दुनिया के व्यवहारों का मूल्यांकन करता है और दुनिया की परिवर्तन में अपने तरीके से योगदान करना चाहता है। यहीं वे त्रुटियाँ होती हैं जो आलोचना का कारण बनती हैं। दुनिया के व्यवहारों का मूल्यांकन करते समय  उन के बारे में जुटाए गए तथ्यों की पर्याप्तता और सत्यता सदैव ही निष्कर्षों को प्रभावित करती है। यदि तथ्य पर्याप्त और सही नहीं हैं तो निष्कर्ष कभी भी सही नहीं हो सकते। आम तौर पर जो गलती होती है वह यहीं होती है। भारत में तो इस से आगे एक और बात है कि जो इस दर्शन को समझ कर यह सोच लेता है कि केवल दर्शन से दुनिया को बदला जा सकता है, वह तथ्यों को जुटाने पर कम से कम श्रम करता है और दर्शन की मदद से उन की कल्पना करने लगता है। फिर इन कल्पित तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालता है। अब आप अनुमान कर सकते हैं कि कल्पित तथ्यों के आधार पर काम करने वाला क्या कर सकता है?
सलन किसी वैज्ञानिक प्रयोग में आप को किसी खास तापमान पर कोई अभिक्रिया आरंभ करनी है, उस से कम या अधिक तापमान पर नहीं। आप तापमान का अनुमान कर अभिक्रिया आरंभ कर देते हैं और तापमान कम  या अधिक हुआ तो दोनों ही स्थितियों में इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते। आप अपने सारे प्रयोग और उस के लिए जुटाई गई सामग्री को नष्ट कर देते हैं और साथ ही समय भी नष्ट करते हैं। 
खैर! वह सब विवाद का विषय है। आप समाज या दुनिया को बदलने न भी जाएँ तब भी मार्क्स का यह दर्शन किसी भी व्यक्ति के जीवन में रोजमर्रा के व्यवहारों को समझने और निर्णय लेने में सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होता है। क्यों कि इस के कारण आप सही सही तरह से यह जान पाते हैं कि आप के आस पास जो घटनाएँ और परिघटनाएँ घट रही हैं वे क्यों घट रही हैं और वे आगे क्या रूप ले सकती हैं। आप को अपने निर्णय लेने में बहुत सुविधा होती है। हालांकि यहाँ भी परिणाम इसी बात पर निर्भर करते हैं कि आप ने मूल्यांकन के लिए पर्याप्त और सही तथ्यों को जुटाया है अथवा नहीं। 

स समय अनवरत पर मैं एंगेल्स की पुस्तिका "वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका" प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे समाप्त होने में दो सप्ताह लग सकते हैं। इस के साथ ही यहाँ यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य " परंपरा और विद्रोह" का एक एक सर्ग भी प्रस्तुत किया जा रहा है। दोनों ही बहुमूल्य निधियाँ हैं। पूरा हो जाने के उपरांत इन्हें ई-बुक के रूप में अंतर्जाल पर सहेजने की योजना है। जिस से हिन्दी के इच्छुक पाठकों को इस का लाभ मिल सके। इस से निश्चय ही अंतर्जाल पर स्थाई रूप से उपलब्ध हिन्दी सामग्री की वृद्धि में मेरा भी कुछ योगदान हो सकेगा।
मुझे विश्वास है कि आप इस ब्लाग पर आते रहेंगे।
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