Saturday, March 6, 2010

दुर्घटना के मुकदमों में दावेदारों की वकालत का विकास

पनी वकालत का यह बत्तीसवाँ साल चल रहा है। वकालत के पहले दस-बारह वर्षों में यदा-कदा मोटर दुर्घटना में घायल होने या मृत्यु हो जाने के मुकदमे सहज रूप से आया करते थे। इसी तरह कामगार क्षतिपूर्ति के मुकदमे सहज रूप से आते ही थे। हम अपने सेवार्थी से मुकदमे का खर्च लेते थे और जो भी फीस तय होती थी उस का आधा पहले लेते थे और शेष आधी फीस मुकदमे में बहस होने के पहले तक सेवार्थी अपनी सुविधा से जमा कर देता था। फीस की राशि निश्चित होती थी और उस का संबंध सेवार्थी को मिलने वाली राशि पर निर्भर नहीं होता था। 
1980 आते-आते स्थिति यह हो गई कि सेवार्थी जिद करने लगे कि वे मुकदमे का खर्च तो देंगे, लेकिन फीस नहीं देंगे। मुकदमे से मिलने वाली क्षतिपूर्ति का निर्धारित प्रतिशत वे क्षतिपूर्ति राशि मिलने पर देंगे। आरंभ में सेवार्थी से हम अपनी शर्त मनवाने के लिए जिद करते थे। लेकिन वकीलों में ही कुछ लोग इन शर्तों को मानने को तैयार हो गए तो हम ने भी इस शर्त को स्वीकार कर लिया। तब फीस का प्रतिशत मिलने वाली क्षतिपूर्ति की राशि का पाँच से आठ प्रतिशत तक हुआ करता था। इस से वकीलों को मिलने वाली फीस की राशि में पर्याप्त वृद्धि होती थी। क्षतिपूर्ति का भुगतान बीमा कंपनी करती थी और यह राशि मिलने पर सेवार्थी फीस वकील को दे दिया करते थे। कोई कोई सेवार्थी ऐसा होता था जो फीस देने में बेईमानी भी कर लेता था। हम लोग उसे भुगत लेते थे या फिर किसी तरह से उस से फीस वसूल कर लेते थे। 
फीस बढ़ने से इस ओर सभी वकीलों का आकर्षण बढ़ा। अब वकीलों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गई। वकीलों ने यह कर दिया कि वे खर्चा भी नहीं लेने लगे लेकिन फीस बढ़ कर दस प्रतिशत तक पहुँच गयी। यह 1990 के आसपास की बात है। इस बीच 1984 में भोपाल में गैस दुर्घटना हुई। क्षतिपूर्ति के मुकदमे करने के लिए अमरीका के वकीलों ने मुवक्किलों से संपर्क किया और मुकदमा करने के लिए दावेदारों को क्षतिपूर्ति की राशि अग्रिम देने का प्रस्ताव किया। इस से देश के उन वकीलों ने सीखा  जो इस व्यवसाय में पूंजी का नियोजन  कर सकते थे उन्हों ने दुर्घटना के मुकदमे हासिल करने के लिए दावेदारों को अपने पास से अग्रिम राशि देने की पेशकश करना आरंभ कर दिया।
काम हासिल करने का यह तरीका उन वकीलों को रास आया जो वकालत के लिए पूंजी का नियोजन कर सकते थे। धीरे-धीरे काफी वकील इस क्षेत्र में आ गए उन्हों ने पूंजी नियोजित न कर सकने वाले और करने की इच्छा न रखने वाले वकीलों को इस क्षेत्र से विस्थापित कर दिया। अब इस क्षेत्र में केवल वे ही अकेले रह गए। लेकिन पूंजी नियोजित करने वालों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ती रही। अब उन के बीच भी प्रतिस्पर्धा होने लगी। लोग समाचारों पर निगाह रखने लगे कि कहाँ दुर्घटनाएँ हो रही हैं। वकील दुर्घटना में मृत्यु होने वाले परिवारों से घर जा कर संपर्क करने लगे। इस प्रतिस्पर्धा की स्थिति यह हो गई कि वकील दुर्घटना में मृतक की अंत्येष्टि पर पंहुचने लगे। घायलों से अस्पतालों में ही संपर्क करने लगे। अब तो स्थिति यह है कि मृतक का पोस्टमार्टम जहाँ हो रहा हो वहाँ भी पहुंचने लगे हैं। 
दुर्घटना स्थल पर सब से पहले पुलिस पहुँचती है। पुलिस ने भी जब वकीलों का यह रवैया देखा तो अन्वेषण करने वाले पुलिस अफसरों ने इसे अपनी आय का जरिया बना लिया। अब अन्वेषण अधिकारी पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल आते ही सब से पहले उस वकील को सूचना देता है जिस से उसे कुछ कमीशन मिलने वाला होता है और यह बताता है कि यहाँ मृतक के रिश्तेदार मौजूद हैं, वह आ कर मुकदमा हासिल कर ले। वकीलों की सेवाएँ अब यहाँ तक पहुँच गई हैं कि वे दावे के लिए न केवल तमाम दस्तावेजात जुटाते हैं बल्कि दावेदारों को पच्चीस-तीस हजार तक धन राशि स्वयं अपने पास से अग्रिम दे देते हैं जिसे वे मुकदमे में अंतरिम क्षतिपूर्ति राशि मिलने के समय वापस वसूल कर लेते हैं। 
ज हमारे सामने ऐसा ही एक वाकया आया। एक वकील साहब हमारे साथ चाय पी रहे थे कि उन के पास पुलिस अफसर का फोन आया कि वे दुर्घटना में मृतक का पोस्टमार्टम करवा रहे हैं, मृतक के रिश्तेदार आ गए हैं आप बात कर लें। यह कह कर पुलिस अफसर ने फोन मृतक के रिश्तेदार को पकड़ा दिया। मृतक के रिश्तेदार ने फोन पर केवल यह कहा कि वकील साहब आप अग्रिम क्या दे रहे हैं? यहाँ एक वकील साहब पहले से आए हुए हैं और बीस हजार देने को तैयार हैं। वकील साहब का नाम पूछा तो पता लगा कि वह दूसरे जिले का वकील है और मुकदमा हासिल करने के लिए यहाँ तक आ गया है।
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