Sunday, October 25, 2009

राष्ट्रीय संगोष्टी : हिन्दी ब्लागिरी के इतिहास का सब से बड़ा आयोजन

          *                                      चित्र मसिजीवी जी से साभार

आखिर तीन दिनों से चल रहा भ्रम दूर हो गया कि इलाहाबाद में हिन्दी ब्लागरों का कोई राष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा था।  बहुत लोगों के पेट में बहुत कुछ उबल रहा था। लगता है वह उबाल अब थम गया होगा। यदि नहीं थमा हो तो इस पोस्ट को पढ़ने के बाद थम ही जाएगा। हालांकि पहले भी यह सब को पता था, लेकिन शायद इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। यह कोई हिन्दी ब्लागर सम्मेलन नहीं था। यह महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा 'हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया' परआयोजित राष्ट्रीय संगोष्टी थी। जिसे विश्वविद्यालय ने बुलाया चला गया। उस की जैसी सेवा हुई, हो गई। जिन्हें पहले से आमंत्रण दे कर नहीं बुलाया गया था उन्हें चिट्ठे पर छपा आमंत्रण वहाँ खींच ले गया। उन की भी सेवा हो ली।  
जब विश्वविद्यालय एक संगोष्टी आयोजित करता है तो उस में कौन लोग बुलाए जाएँ ? और कौन लोग नहीं बुलाए जाएँ? इन का निर्णय भी विश्वविद्यालय ही करेगा, उस ने वह किया भी। जिन को नहीं बुलाया गया उन्हें हलकान होने और बुरा मानने की जरूरत नहीं है। पहला सत्र उद्घाटन सत्र के साथ ही पुस्तक विमोचन सत्र था। मुख्य अतिथि नामवर सिंह रहे। मैं समझता हूँ कि ब्लागरी को अभी साहित्य के लिए एक नया माध्यम  ही माना जा रहा है। शायद इसी कारण से नामवर जी उस के मुख्य अतिथि थे। उन्हों ने भी उसे ऐसा ही समझा और वैसा ही अपना भाषण कर दिया। इस के बाद के सत्रों में विमर्श आरंभ हुआ।  ब्लाग पर होने वाले विमर्श में और प्रत्यक्ष होने वाले विमर्श में फर्क होना चाहिए था। आखिर एक में ब्लागर पोस्ट लिख कर छोड़ देता है। उस पर नामी-बेनामी टिप्पणियाँ आती रहती हैं। ब्लागर को समझ आया तो उस ने बीच में दखल दिया तो दिया। नहीं तो अगली पोस्ट के लिए छोड़ दिया। प्रत्यक्ष विमर्श का आनंद और ही होता है।  वहाँ कोई बेनामी नहीं होता।  
अब प्रत्यक्ष सम्मेलन में बेनामी पर चर्चा होना स्वाभाविक था, जो कुछ अधिक हो गई। बेनामी लेखक छापे में भी बहुत हुए हैं तो ब्लागरी में क्यों न हुए। जिस बड़े लेखक ने पत्रिका निकाली उसे चलाने के लिए उसे बहुत सी रचनाएँ खुद दूसरों के नाम से लिखनी पड़ीं और यदा-कदा उन पर प्रतिक्रियाएँ भी छद्म नाम से लिखीं। बहुत से अखबारों में भी यह होता रहा है और होता रहेगा।  बेनामियों का योगदान छापे में महत्वपूर्ण रहा है तो फिर ब्लागरी में क्यों नहीं? यहाँ भी वे महत्वपूर्ण हैं और बने रहेंगे।  चिंता की जानी चाहिए थी उन बेनामी चीजों पर जो सामान्य शिष्टता से परे चली जाती हैं। उन पर नियंत्रण जरूरी है। ऐसी टिप्पणियों को मोडरेशन के माध्यम से रोका जा सकता है, जो किया भी गया है। हाँ बेनामी चिट्ठों को नहीं रोका जा सकता। उन के लिए यह नीति अपनाई जा सकती है कि उन चिट्ठों पर टिप्पणियाँ नहीं की जाएँ। यदि विरोध ही दर्ज करना हो तो दूसरे चिट्ठों पर पोस्ट लिख कर किया जा सकता है।  
ब्लागरी केवल साहित्य नहीं है। वह उस के परे बहुत कुछ है। वह ज्ञान की सरिता है। जिस में बरसात की हर बूंद को आकर बहने का अधिकार है।  यह जरूर है कि हिन्दी ब्लागरी के विकास में साहित्य और साहित्यकारों का योगदान रहा है। मैं नेट पर साहित्य तलाशने गया था और उस ने मुझे ब्लागरी से परिचित कराया। वहाँ कुछ टिपियाने के बाद मुझे ब्लागिरी में शामिल होने का न्यौता मिला तो मेरी सोच यह थी कि मैं कानून संबंधी अपनी जानकारियों को लोगों से साझा करूँ। इस तरह 'तीसरा खंबा' का जन्म हुआ।  इस ब्लाग में कोई साहित्य नहीं है, वह कानून की जानकारियों और न्याय व्यवस्था से संबंधित ब्लाग है।  एक साल से वह सामान्य लोगों को कानूनी जानकारी की सहायता उपलब्ध करा रहा है और आज स्थिति यह है कि कानूनी सलाह प्राप्त करने के लिए बहुत से प्रश्न तीसरा खंबा के पास कतार में उपलब्ध रहते हैं।  बहुत लोगों की समस्याओं को ब्लाग पर न ला कर सीधे सलाह दे कर उन का जवाब दिया जा रहा है।  कुछ ब्लाग समाचारों पर आधारित हैं। कुछ ब्लाग तकनीकी जानकारियों पर आधारित हैं। अजित जी का ब्लाग  'शब्दों का सफर' केवल भाषा और शब्दों पर आधारित है। शब्द केवल साहित्य के लिए उपयोगी नहीं हैं वे प्रत्येक प्रकार के संप्रेषण के लिए उपयोगी हैं। ब्लागरी में साहित्य प्रचुर मात्रा में आया है। उस की बदौलत बहुत से लोगों ने लिखना आरंभ किया है। इस कारण से ब्लागिरी में साहित्य तो है लेकिन साहित्य ब्लागिरी नहीं है। वह 'ज्ञान सरिता' ही है।  
कैसी भी हुई यह राष्ट्रीय संगोष्टी हिन्दी ब्लाग जगत के लिए एक उपलब्धि है। एक विश्वविद्यालय ने ब्लागरी से संबंधित आयोजन किया यह बड़ी बात है। बहुत से हिन्दी ब्लागरों को उस में  विशेष रुप से आमंत्रित किया और शेष को उन की इच्छानुसार आने के लिए भी निमंत्रित किया। जो लोग वहाँ पहुँचे उन का असम्मान नहीं हुआ। इस संगोष्टी ने बहुत से हिंदी ब्लागरों को पहली बार आपस में मिलने का अवसर दिया। उन का एक दूसरे के साथ प्रत्यक्ष होना बड़ी बात थी। कुछ ब्लागर अपनी बात वहाँ रख पाए यह भी बड़ी बात है। कुछ नहीं रख पाए, वह कोई बात नहीं है। उन के पास अपना स्वयं का माध्यम है वे अपने ब्लाग पर उसे रख सकते हैं। हिन्दी में ब्लागरों की संख्या आज की तारीख में चिट्ठाजगत के अनुसार 10895 हिन्दी ब्लाग हैं जिन में से दो हजार से ऊपर सक्रिय हैं। सब को तो वहाँ एकत्र नहीं किया जा सकता था और न ही जो पहुँचे उन सब को बोलने का अवसर दिया जा सकता था।
चलते-चलते एक बात और कि मेरे हिसाब से ब्लाग को चिट्ठा नाम देना ही गलत है। ब्लाग वेब-लॉग से मिल कर बना है। इस में वेब शब्द का 'ब' अत्यंत महत्वपूर्ण है चिट्ठा शब्द में उस का संकेत तक नहीं है। इस कारण से उसे चिट्ठा कहना मेरी निगाह में उचित नहीं है, उसे ब्लाग ही कहना ही उचित है।  ब्लाग एक संज्ञा है और मेरे विचार में किसी भी भाषा के संज्ञा शब्द को ज्यों का त्यों दूसरी भाषा में आत्मसात किया जा सकता है। जो कर भी लिया गया है। हाँ, मुझे ब्लागिंग शब्द पर जरूर ऐतराज है। क्यों कि इस का 'इंग' हर दम अंग्रेजी की याद दिलाता रहता है। किसी संज्ञा को एक बार अपनी भाषा में आत्मसात कर लेने के उपरांत उस से संबंधित अन्य शब्द अपनी भाषा के नियमानुसार बनाए जा सकते हैं। इस लिए मैं ब्लागिंग के स्थान पर ब्लागरी या ब्लागिरी शब्द का प्रयोग करता हूँ। मुझे लगता है कुछ ब्लागर इस का अनुसरण और करें तो यह भी आत्मसात कर लिया जाएगा।
कुल मिला कर 'हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया' पर महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा की गई राष्ट्रीय संगोष्टी ब्लागरी के इतिहास की बड़ी घटना है, जिस ने इतने सारे ब्लागरों को एक साथ मिलने और प्रत्यक्ष चर्चा करने का अवसर प्रदान किया। इस घटना को बड़ी घटना की तरह स्मरण किया जाएगा और यह घटना तब तक बड़ी बनी रहेगी जब तक इस से बड़ी लकीर कोई नहीं खिंच जाती है।


41 comments:

Dr. Smt. ajit gupta said...

व़स्‍तुपरक जानकारी। यह सत्‍य है कि किसी भी समारोह में सभी को बुलाना असम्‍भव है इसलिए यह आक्षेप अनावश्‍यक है। वहाँ एक पुस्‍तक का भी विमोचन हुआ, किसी ने उस पर अपनी टिप्‍पणी नहीं लिखी कि वह कैसी थी और उसमें कितने ब्‍लागर छपे?

शरद कोकास said...

द्विवेदी जी सबसे पहले तो इस बात के लिये धन्यवाद कि इस संगोष्ठी को आपने ब्लागर सम्मेलन के भारत्व से मुक्त कर दिया ।एक बात इस आयोजन के विषय में मैं विशेष रूप से यह कहना चाहता हूँ कि आयोजन के उपरांत जितनी प्रतिक्रियाएँ आईं,कार्यक्रम के दौरान जितनी रुचि वहाँ उपस्थित और हम जैसे अनुपस्थित लोगों ने ली ( इस भावबोध से मुक्त होकर कि हमे क्यों नही बुलाया गया ), कार्यक्रम का जैसा लाइव प्रस्तुतिकरण ब्लॉग्स पर हुआ ,जितनी तस्वीरें हम लोगों ने देखीं , मित्रों से फोन पर और एस एम एस के माध्यम से सम्वाद हुआ , कार्यक्रम के चलते चैट और टाक से जानकारी का आदान-प्रदान हुआ, भोजन आवास के बारे मे चर्चा हुई, मुद्दों पर सीधे सुझाव दिये गये और सम्बन्धित लोगो तक प्रतिक्रियाएँ पहुंचाई गई यह मैने आज तक किसी साहित्यिक,संस्थागत या राजनीतिक कार्यक्रम के आयोजन मे नही देखा । अखबारों मे तीन कालम की खबर और टीवी पर दो मिनट की क्लिपिंग से ज़्यादा आज तक किसी कार्यक्रम को तवज़्ज़ो नही मिली । आयोजन मे मिलने वाले न सिर्फ पहले से परिचित हैं बल्कि उनमे रोज ही सम्वाद होता है । यह सिर्फ और सिर्फ इस ब्लॉगर परिवार के आपसी सम्बन्ध की वज़ह से है और इसे कोई भी महान साहित्यकार ,पत्रकार ,राजनेता या प्रशासनिक अधिकारी नही समझ सकता । मै एक लेखक /कवि हूँ और विगत 30 वर्षों से ऐसे आयोजन कार्यक्रम अटेंड कर रहा हूँ । यहाँ जुडे भी एक उल्लेखनीय समय तो हो चुका है इसलिये मै कह सकता हूँ कि यह एक ऐसा समाज है जिसने यह सब अपने श्रम और ज्ञान तथा निरंतरता से अर्जित किया है इसलिये इसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती । यह् बहुत ज़्यादा निराश भी नहीं होता न बहुत ज़्यादा उत्साहित । इसका संतुलन ही इसकी विशेषता है ।
इस पोस्ट मे आपके द्वारा दो और मुद्दों पर बातचीत है , ब्लागीरी या ब्लागरी शब्द की मान्यता ,तथा ब्लागीरी ( या ब्लागिरी या ब्लॉगिरी ) में साहित्य की उपस्थिति । इन मुद्दों पर निश्चित ही चर्चा होनी चाहिये । आशा है यह आगे चलकर सम्भव होगा । पुन: अनवरत में इस चिंतन के लिये धन्यवाद ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

जो भी हो ... लगा कि ब्लागारों के बिना यह सम्मेलन यूं भी सफल नहीं ही होता

P.N. Subramanian said...

चलिए आपने कन्फ्युशन दूर कर बड़ा उपकार किया.आयोजन के लिए पहले आपने हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का उल्लेख किया था और अंतिम पंक्तियों में इलाहबाद विश्वविद्यालय का नाम लिया है. कृपया पुष्टि करें,

प्रेमलता पांडे said...

अच्छा लेख है तार्किक है।
पर...

''इस तरह 'तीसरा खंबा' का जन्म हुआ। इस ब्लाग में कोई साहित्य नहीं है, वह कानून की जानकारियों और न्याय व्यवस्था से संबंधित ब्लाग है। ''
यह विधि और न्याय संबंधी साहित्य है। साहित्य के प्रकार विषयों के आधार पर भी हैं।
वरना भक्ति-साहित्य क्या है!


चिट्ठा शब्द देशज है, ’पोस्ट’ शब्द से प्रभावित होकर बना लगता है। अपनापन लिए है।

महेन्द्र मिश्र said...

आपके विचारो से शतप्रतिशत सहमत हूँ ....

Nirmla Kapila said...

दिवेदी जी इस मुद्दे पर चर्चा के लोये कई दिग्गज हैं मैं तो आपसे एक शिकायत कर रही हूम्म कि आखिर आपने ब्लाग के लिये पुरुशवाचक नाम ही रहने दिया न? ये तो सरासर गलत है जी कोई स्त्रीलिंग नाम रखिये या कोई बीच का रास्ता निकालिये। कल एक पोस्ट लिखना चाह रही थी उसमे ये समझ नहीं आ रहा था कि जिस ब्लाग से मुझे इतना प्यार है वो मेरा बेटा है या बेटी। बस इसी समय आपकी ये पोस्ट पढी हैन मुश्किल तो कोई और नाम ढूँडे।ाब ये मुकदमा आपकी अदालत मे है। इन बलागडियों को भी इन्साफ चाहिये । शुभकामनायें या अजित वाडनेगर की सलाह लें वो शब्दों के पुरोधा हैं । शुभकामनायें

Pramod Tambat said...

बुलाने ना बुलाने को लेकर तो इस देश में असंतोष एक आम भाव है, ब्लॉगिंग साहित्य के आगामी विकास को लेकर क्या संगोष्ठी में सार्थक चर्चा हुई क्या कार्यक्रम लिए गए यह जानने की उत्कंठा है। पुस्तक जो प्रकाशित हुई है उसमें कौन कौन से ब्लॉगों का हवाला है कोई बताएगा क्या ?

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

द्विवेदी जी इस तरह की पोस्ट लिखने के लिए साधुवाद...मुझे भी थोड़ा रोष था, खासकर सूचना तक ना दिए जाने को लेकर ..पर आपकी बातों से सर्वथा सहमत हूँ..सकारात्मक हो सोंचूं तो निश्चित ही इस सम्मलेन का एक महत्व तो बनता ही है..अबसे मै ब्लागरी शब्द इस्तेमाल करने की कोशिश करूँगा....शरद जी के बातों से भी स्वयं को सहमत पा रहा हूँ...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

@P.N. Subramanian
इलाहाबाद विश्वविद्यालय गलती से टाइप हो गया था। अब ठीक कर दिया गया है।

@प्रेमलता पांडे
हाँ, यह सही है पोस्ट के लिए चिट्ठा या चिट्ठी शब्द सही है, उन्मुक्त जी पोस्ट को चिट्ठी ही कहते हैं। लेकिन ब्लाग को ब्लाग ही कहा जाए तो क्या बुरा है? आखिर हम बहुत सी चीजों को अंग्रेजी नामों से पुकारते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

@Nirmla Kapila
आप की बात भी वाजिब भी है और गैर वाजिब भी। अब देखिए पोस्ट के लिए उन्मुक्त जी ने चिट्ठी शब्द दिया है। स्त्रीलिंग शब्द है मुझे कोई आपत्ति नहीं। आप को ब्लाउज, पेटीकोट, जम्पर, कुरता, सलवार आदि पुर्लिंग शब्दों से और मुझे कमीज, शर्ट, पेंट, बनियान, चड्डी, धोती आदि से परहेज नहीं है। फिर ब्लाग को ब्लाग ही रहने दें और पोस्ट को चिट्ठी कहें तो शायद किसी को तकलीफ नहीं होगी।
यूँ तो इस दुनिया में अमीबा जैसे अलिंगी और केंचुए जैसे द्विलिंगी प्राणी थे पर बिना नोंक-झोंक की दुनिया प्रकृति को भी पसंद नहीं थी इसलिए उस ने नोंक-झोंक के लिए लिंग पैदा किए। देखिए प्रकृति की इस जरा सी शरारत ने उसे कितना सुंदर और हसीन बना दिया है?

अविनाश वाचस्पति said...

एक राज की बात

जो महसूस किया

वो टिपियाया नहीं जा सकता।

cmpershad said...

इस संगोष्ठी को गुटबाज़ी से अलग करके आपने एक स्तुतीय लेख लिखा है। आशा है कि सभी के संशय दूर हो गए होंगे। जिन्हें अभी भी कुछ गुमान हों, वे आपकी अदालत में पेश हों:)

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी बहुत अच्छा लगा आप का लेख पढ कर, मै कल से लोगो की टांग खिचाई भी पढ रहा हुं, साथ मे परेशान भी, क्या यही है हमारी पहचान अगर मुझे नही बुलाया तो लग जाओ बदनाम करने के लिये, लेकिन कोई यह नही सोचता जिस ने भी ऎसे आयोजन का बंदोवस्त किया, हमे उसे हिम्मत देनी चाहिये ना कि टांग खिचनी चाहिये, हमारे घर मै जब पहली पार्टी हुयी थी तो करीब ६०,७० लोग आये थे, ओर हमे ज्यादा पता भी नही था, लेकिन तब सभी लोगो ने हमे मदद की, हमारी गलतियो को नजर अंदाज किया, ओर उसी दिन हमारा डिस वासर भी रुक गया, तो सभी महिलऒ ने मिल कर सारा काम निपटाया, ओर हमे खुब शावसी दी, ओर हमारी हिम्मत बढ गई,अगर पहली ही पार्टी मे लोग हमारी टांग खिचते तो ....ब्लागरी मै अभी भी लोगो को समय लगेगा इस बात को समझने मै, वरना कोई भी सम्मेलन करने से पहले हजार वार सोचेगा.
आप ने बहुत अच्छे ढंग से समझाया,
धन्यवाद

प्रेमलता पांडे said...

द्विवेदीजी उत्तर देने के लिए धन्यवाद!
’लेकिन ब्लाग को ब्लाग ही कहा जाए तो क्या बुरा है? आखिर हम बहुत सी चीजों को अंग्रेजी नामों से पुकारते हैं।”
- बिल्कुल भी बुरा नहीं है। किसी भी भाषा का कोई भी शब्द संग्रहणीय है। पूजनीय है।
पर बात तो हिंदी को बढ़ाव देने की है, हिंदी तो वैसे ही अपने बहुत से शब्द खो रही है अगर किसी शब्द ke प्रयोग के आसार बनते हैं तो हमें लेलेना चाहिए और प्रयोग की शक्ति से उस प्रचलित करना चाहिए ऐसा मेरा मानना है।
ब्लॉगगीरी की जगह चिट्ठागीरी भी आसान ही है। बाकी तो भाषा संप्रेषण का माध्यम है बस कथन समझ आना चाहिए। शब्द कोई भी हों।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

@ प्रेमलता पांडे
प्रेमलता जी, मुझे चिट्ठा शब्द से कोई ऐतराज नहीं है। पर चिट्ठा शब्द अन्य अनेक चीजों को भी इंगित करता है। जब कि ब्लाग शब्द में प्रथमाक्षर बी वेब का प्रतिनिधित्व करता है जो उस शब्द को महत्वपूर्ण बनाता है। जब कि चिट्ठा शब्द में ऐसा नहीं है। ब्लाग से अन्य शब्दों का निर्माण हम अपनी भाषा के अनुरूप कर सकते हैं। फिर शब्दों को हम निर्णय कर के स्वीकार या अस्वीकार नहीं करते। लोगों की बहुसंख्या प्रयोग से यह करती है। फिर हिन्दी में शब्दों की संख्या बहुत कम है। हम ऐसा कर के उस के शब्द भंडार की वृद्धि ही कर रहे हैं। उस में से कुछ घटा थोड़े ही रहे हैं।

अभय तिवारी said...

बहुत ही तरल और सरल लेख लिखा है, दिनेश भाई!

Nirmla Kapila said...

देवेदी जी ये तो नारी के साथ सदा होता आया है उसे ममतामयी त्यागमयी पता नहीं कौन कौन सा झुनझुना दे कर मनाते रहे हैं ऐसे ही आपने भी बातों मे हमे टरका दिया। अब हम तो हडताल करने वाले हैं कल ही अपने ब्लाग से ऐलान ्रते हैं आखिर हम भी बराबर के हिस्से की हकदार हैं । लगता है कोई महिला ब्लागर को वकील करना पडेगा हा हा हा चलो रात भर यही कैम्पेन करते हैं। वैसे आप कुछ नरम पडते भी नज़र आ रहे हैं ये ब्लागिरी या बेबे ब्लागिरी भी सही हैअखिर हिन्दोस्तानी तो लगता हैआप अजित जी से पूछें दीपक भारतिय जी के ब्लोग पर भी ब्लाग नाम पर चर्चा है-- देख लें लेकिन नारी शक्ति का जरूर ध्यान रखें धन्यवाद्
http://dpkraj.blogspot.com/2009/10/meaning-in-hindi-of-blog-word.html

ताऊ रामपुरिया said...

आपका यह आलेख अनेक दृष्टियों से स्वागत योग्य है. प्रथम तो तथाकथित खिच खिच से जो माहोल बना है उससे शायद निजात मिले. ऐसे मे कुछ भी लिखने से, टिप्पणि करने से पहले सोचना पडता है. ऐसे लगता है जैसे १९७५ का आपातकाल लगा हो और कुछ भी बोलने से पहले तोलना जरुरी होगया..स्वतंत्रता खत्म सी लगने लगी है. खैर...

दूसरे ब्लाग और चिठ्ठा शब्द मे हम आपके साथ हैं...चिठठा हमको भी अटपटा सा लगता है.

अब ब्लाग, ब्लागर और पोस्ट..हम तो ये तीन शब्द ही प्रयोग करेंगे...आखिर अंग्रेजी के असंख्य शब्द हैं हमारे पास तो इनसे ही इतनी एलर्जी क्यूं?

रामराम.

ab inconvenienti said...

असल में आज हिंदी ब्लॉग जगत कुँए में टर्राते मेढकों का छोटा सा समूह मात्र है. इसीलिए इस तरह के चोंचले होते हैं. जब हिंदी के सक्रिय ब्लोगों की संख्या भी पच्चीस तीस हज़ार पहुँच जाएगी तो ऐसी फालतू बातों के बारे में कोई सोच भी नहीं सकेगा.

ब्लॉग की पहली अवधारणा ही यही है की ऐसा वैकल्पिक माध्यम जिसमें घोर अराजकता की हद तक अभिव्यक्ति की आज़ादी हो. दूसरी अवधारणा है की हर इंसान की खुद की एक वेबसाईट जिसमे वह इच्छित माध्यम (दृश्य-श्रव्य-लेख) से खुद को अभिव्यक्त कर सके.

ऐसे में किस किस को बुलाओगे? क्या आज अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश भाषा के ब्लोगरों की संघोष्ठी हो सकती है? इनमे से हर भाषा में लाखों विषयों पर करोड़ों लोग लिखते हैं.

ऊपर से नामवर सिंह धमका कर चला गया की खुद सुधर जाओ वर्ना तुम्हे सरकार अच्छे से सुधर देगी.

बी एस पाबला said...

विवादित मुद्दों पर एक संतुलित पोस्ट

बी एस पाबला

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आदरणीय द्विवेदी जी,

कल कार्यक्रम की समाप्ति पर बाहरी मेहमानों को विदा करने के बाद जबसे घर आया तबसे इस संगोष्ठी के बारे में ब्लॉगजगत की अनेकानेक प्रतिक्रियाओं को पढ़- पढ़कर सोच में पड़ गया था। ऐसी स्थिति बन गयी कि कहीं भी अपनी टिप्पणी देने से अरुचि हो गयी। कार्यक्रम के आयोजन से जुड़े होने के कारण मुझे कुछ आक्षेप आहत करने वाले भी लगे थे लेकिन इस माध्यम की प्रकृति से परिचित होने के कारण मैने इसे सहज ही यूँ स्वीकार कर लिया है कि एक डगमग तराजू के पलड़े पर जिन्दा मेढ़कों को तौलने की कोशिश इससे ज्यादा कामयाब नहीं हो सकती थी।

आपने यह सकारात्मक समीक्षा लिखकर मेरे मन का बोझ काफी हल्का कर दिया, इसलिए आपको हार्दिक धन्यवाद देना अपना कर्तव्य समझता हूँ।

मैं यहाँ पुस्तक के बारे में कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ:

१. जिस पुस्तक का विमोचन हुआ वह मेरे ब्लॉग ‘सत्यार्थमित्र’ की पोस्टों का संकलन है जो अगस्त माह में ही मुद्रित होकर आ गयी थी। विभूति नारायण राय जी से पहली बार तब मैं इस पुस्तक को भेंट करने के लिए ही मिला था और उसी समय उनके मस्तिष्क में ऐसे आयोजन की दागबेल पड़ी थी। उन्होंने तत्क्षण मुझे ब्लॉग पर एक बड़ा सम्मेलन करने का प्रस्ताव रख दिया था। अपने तरह की कदाचित्‌ पहली पुस्तक होने के कारण इसका विमोचन भी इसी कार्यक्रम में कराने का वादा उन्होंने तभी कर दिया था। फिर मैं क्या करता?

इससे पहले आठ मई को इलाहाबाद में जो ब्लॉगिंग (क्षमा करें- ब्लॉगरी)की कार्यशाला आयोजित करने का उत्साहजनक अनुभव मुझे था उसी के दम पर मैने यह चुनौती स्वीकार कर ली थी। देखिए न ‘राय साहब’ से वह मेरी पहली भेंट थी, और विद्यार्थी जीवन से लेकर सरकारी नौकरी के दौरान मैने किसी वाम या दक्षिण पन्थ के साथ अपने को जुड़ा नहीं पाया है, फिर भी उन्होंने मेरी पृष्ठभूमि जाने बिना ही केवल एक ब्लॉगर समझकर इतना बड़ा सम्मान दे दिया। ऐसे में क्या मुझे इन प्रतिक्रिया देने वाले विचित्र लोगों से पूछकर उन्हें ‘हाँ’ या ‘ना’ का उत्तर देना चाहिए था?

मैने तो इसे अपने लिए और ब्लॉगजगत के लिए भी एक अभूतपूर्व अवसर जानकर उसे तत्काल लपक लिया था ताकि पारम्परिक साहित्य से जुड़े लोगों की इस आधुनिक माध्यम से आवाजाही की प्रक्रिया कुछ तेज हो सके। इसमें हम ब्लॉगरों का नुकसान ही क्या था?

लेकिन अफसोस है कि हमारे कुछ भाई उधर के लोगों की इस धारणा को ही पुष्ट करने में लगे हुए हैं कि यह ब्लॉग की दुनिया घोर अराजक, उश्रृंखल, गैरजिम्मेदार, छिछले, अतार्किक, कुंठित, हास्यास्पद, मनमौजी, विघ्नसंतोषी और ‘खाये-पिए-अघाए’ तत्वों से भरी पड़ी है।

इस अद्वितीय आयोजन में कितनी तो अच्छी बातें हुईं लेकिन इसका ब्यौरा कम ही लोगों ने दिया है, परन्तु इसमें कितने छेद रह गये इसको गिनाने के लिए कुछ बड़े और अनुभवी लोग ‘माइक्रोस्कोप’ लेकर और बाकी दूर-दराज वाले लोग ‘टेलीस्कोप’ लेकर पिल पड़े हैं।

मेरी योजना इस अवसर पर हिन्दी ब्लॉगजगत के सौ चुनिन्दा ब्लॉगों से लेकर सौ उत्कृष्ट पोस्टों का संकलन पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की थी, लेकिन समय की कमी के कारण मुझे यह टालना पड़ा। अब सोच रहा हूँ कि यह अच्छा ही हुआ, नहीं तो भाई लोग उन सौ पोस्टों के चुनाव पर भी जूतम पैजार पर उतर चुके होते। यह बात अलग है कि दो-दो बार खुले आमन्त्रण की तिथि आगे बढ़ाये जाने पर भी पर्याप्त संख्या में प्रविष्टियाँ नहीं आ पायीं। अब यदि व्यक्तिगत मेल से कुछ चुनिन्दा ब्लॉगरों से प्रविष्टियाँ माँगी जाएंगी तो ये ही लोग पारदर्शिता की मांग में हल्ला करेंगे। अब तो मुझे और हिन्दुस्तानी एकेडेमी को “ब्लॉगपोस्ट” पुस्तक के प्रकाशन से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा।

बातें और भी बहुत सी हैं जो इस अन्धेरे और अन्धेरगर्दी को दूर करने में सक्षम हैं लेकिन अभी इतना ही कहकर आपको पुनः साधुवाद ज्ञापित करता हूँ। सादर।

(सिद्धार्थ)

Arvind Mishra said...

अच्छा लिखा है आपने दिनेश जी -चिंतन परक ! मैं ब्लागरी का पक्षधर हूँ ! अब ये चलने पर भी निर्भर करेगा !

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

हम तो अब तक यही समझ नहीं पा रहे थे कि ये कैसा ब्लागर सम्मेलन/संगोष्ठी हुई...जिसमें सम्मिलित होने वाला भी दुखी ओर जो सम्मिलित नहीं हो पाए या नहीं किए गए..वो भी दुखी!! प्रत्येक व्यक्ति असंतुष्ट् दिखाई दे रहा है,किन्तु वहाँ जिन मुद्दों पर चर्चा की गई,इस संगोष्ठी का क्या निष्कर्ष निकला ?..उसके बारे में कोई भी कुछ नहीं लिख रहा ।
लेकिन आपके इस समीक्षात्मक आलेख ने बहुत हद तक हमारी जिज्ञासा का तो शमन कर ही दिया...
धन्यवाद्!

गौतम राजरिशी said...

पूरे प्रकरण और एक प्रशंसनीय आयोजन पर पहला सारगर्भित और लौजिकल आलेख...

बहुत खूब द्विवेदी जी। आशा है, लोग कम-से-कम इससे तो कुछ सीख लें और व्यर्थ के विवादों से अपने ब्लौग-जगत को परे रखें, जिसका कोई औचित्य नहीं जरा भी। पता नहीं, हम सब क्यों इतने निगेटिव एप्रोच लिये हुये बनते जा रहे हैं हर छोटी-छोटी बातों के प्रति। ऐसे में आपका ये आलेख देखकर वाकई प्रसन्नता होती है।

Pankaj Upadhyay said...

सबसे लाजिकल जानकारी और सबसे लाजिकल ऎनेलिसिस है... ऐसे ही आर्शीवाद बनाये रखे॥ आपसे अच्छे और ईमानदार लेखन की प्रेरणा मिलती है..

Swapnil said...

संतुलित, निस्पक्ष तथा व्यर्थ विवादों से परे प्रभावी रिपोर्ताज। जैसा कि राज भाटिया जी न कहा कि प्रोत्साहन मुख्य है। यहाँ कुछ लोग लालायित बैठे रहते हैं कि कब टांग खींची जाये। समय का दुरुपयोग है और कुछ नहीं।

किसने क्या लिखा, कैसे रोक लगे उसकी ज्यादा चिन्ता है, खुद कैसे बहेतर लिखा जाये उसकी कम।

यहां भारत से बाहर रहते हुये विषेश नजर थी कि क्या कुछ हो रहा है, कुछ महानुभावों मे रोपोर्ट की जगह अपनी राम कहानी और दुखडा रोने के लिये बचकने ''चिठ्ठे' लिख दिये। मन आहत हुया कि अपरिपक्वता की भी सीमा होती है। खैर बुलबुलों की उम्र अधिक नही होती। इस रिपोर्ताज को पढ कर मन मे सकून हुआ कि अयोजन के श्रम को कुछ तो आदर मिला। बच्चे ने चलना ही शुरू किया और 'दिग्गज' लोग 'टिन्गडी' लगाने लगे। हर्ष की बात है कि हिन्दी ब्लागिरी यहाँ तक आ गयी है -- श्रेय आप तथा अन्य परिपक्व ब्लागीरों‌ का।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी, आयोजन हेतु बहुत् बहुत बधाईयाँ!
स्वप्निल भारतीय
कल्किआन समूह

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

श्री दीनेश भाई जी ,
आपका आलेख अच्छा लगा
स स्नेह,
- लावण्या

Anil Pusadkar said...

वकील साब,हम तो ऐसे सम्मेलनो के पक्षधर हैं,अब मतभेद तो होते ही हैं और फ़िर घर की शादी से हर कोई संतुष्ट नही जाता तो ये तो अंजान लोगो को एक दूसरे से मिलाने का शानदार प्रयास था।सच कहे तो हम लोग सोचते ही रह गये और इलाहाबाद के लोगो न सम्मेलन करके बाज़ी मार ली।विवादो से हम डरते नही है और ये होते ही रहते हैं।इसके बावज़ूद हमारी कोशिश होगी कि रायपुर मे एक सम्मेलन हो और उसके बाद कंही और हो और फ़िर कंही और। ऐसे ही धीरे-धीरे फ़ुल प्रूफ़ काम होगा।अच्छा लगा आपको पढकर वर्ना मन खट्टा ही हो रहा था।किसी भी आयोजन की यादे खट्टी मीठी होनी चाहिये।आपको आदरणीय यूंही नही कहते वकील साब्।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आपसे सहमत हूं
पर मुझे इस पूरे आयोजन मे सेटिंग की बू साफ़ आ रही थी।
यह सच है कि ब्लागिंग केवल साहित्य नहीं…पर जैसा रिवाज़ रहा है यहां भी साहित्य, ख़ासतौर पर इसकी ब्राह्मण विधा कविता का वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।

खुशदीप सहगल said...

द्विवेदी सर,
कनॉट प्लेस का नया नाम राजीव गांधी चौक है...कितने लोग इस नए नाम को आत्मसात कर पाए हैं...ब्लॉग और चिट्ठा में भी यही फर्क मुझे नज़र आता है...

हमने देखी है ब्लॉग में महकती खुशबू,
सिर्फ एहसास है, एहसास ही रहने दो...

ब्लॉग को ब्ल़ॉग ही रहने दो
इसे कोई नया नाम न दो...


जय हिंद...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आयाजन कोई भी हो सभी को संतुष्ट करना संभव नहीं होता, विशेषकर जब कोई पहला सम्मेलन आयोजित किया जा रहा हो। निश्चय ही यह ब्लॉग जगत का एक ऐतिहासिक सम्मेलन था, और जब तक इससे बडी रेखा नहीं खींची जाती, जो एक न एक दिन खिंचनी ही है, तब तक तो यह अब तक का सबसे बडा सम्मेलन है ही।
और अन्तिम बात, सम्मेलन में मौजूद न रहते हुए भी आपने तार्किक रूप से इसकी समीक्षा की है, देखकर अच्छा लगा।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

10895 हिन्दी ब्लाग में २००० सक्रिय !!!!!!!!
...लोग ब्लोगिंग की चिंता छोड़ अपने अपने ब्लॉग की चिंता करें.
"चिट्ठा" पर तो अपने मेरे मुँह की बात छीन ली. ये शब्द मुझे भी अटपटा सा लगता है. उसे ब्लोगिंग ही रहने देने में किसी का क्या जाता है ??

अभिषेक ओझा said...

गिने चुने और कभी कभार पोस्ट लिखने का मेरा अनुभव रहा है कि वो पोस्ट लोग ज्यादा पसंद करते हैं जो डायरी कि तरह होती है. और मेरे जैसे ब्लोग्गर बस आस पास कुछ दिखा उसे पोस्ट बनाकर लिख देता है. फंडे देना चालु किया नहीं की लोग पढना बंद करते हैं. ये साहित्य नहीं है (वैसे मुझे नहीं पता साहित्य होता क्या है ;)
अंग्रेजी में भी इतने लोग ब्लॉग लिखते हैं ऐसी झंझट मैंने उधर देखि नहीं ! जो पेशे से ना मीडिया में है ना साहित्यकार है मुझे तो वही 'असली' ब्लोग्गर लगते हैं. बाकी पेशे वाले क्या बता पायेंगे जी इसके बारे में ?
सारे ब्लोगों को एक साथ जोड़ना या विषय और पोस्ट के आधार पर ५-१० वर्ग में विभाजित करना क्या संभव है?
और अनामी वाली बात के किस्से मुझे ज्यादा पता तो नहीं है पर मुझे इसमें कोई समस्या नहीं दिखती. क्या अनामी होकर कोई अच्छी टिपण्णी नहीं कर सकता? कई बार ना चाहते हुए भी अनामी होना पड़ता है. हाल ही में मैंने अपने स्टुडेंट की पोस्ट पर अनोनिमस टिपण्णी की और उसे बाद में बताया की टिपण्णी मेरी है. मैंने उसे ये भी बताया कि मैं अपने स्टुडेंटस के बीच अपने ब्लॉग का प्रचार नहीं करना चाहता इसलिए मैंने अपने नाम से टिपण्णी नहीं की. अगर आपको पसंद नहीं तो अनामी टिपण्णी डिलीट कर दीजिये.
मैंने ताऊ के साक्षात्कार में कहा था मुझ पर लेखक होने का आरोप मत लगाइए मैं ब्लोग्गर हूँ. अब तो ब्लोग्गर कहने से पहले भी सोचना पड़ेगा :)

रचना said...

जब विश्वविद्यालय एक संगोष्टी आयोजित करता है तो उस में कौन लोग बुलाए जाएँ ? और कौन लोग नहीं बुलाए जाएँ? इन का निर्णय भी विश्वविद्यालय ही करेगा, उस ने वह किया भी।


जो लोग विश्विद्यालय और अनुदान इत्यादि प्रक्रिया से जुडे हैं वो आप को बता सकते हैं की अनुदान मिलने के बाद वक्ता का चयन होता हैं और
निमंत्रण किसको जाए इसका फैसला आयोजक पर होता हैं नाकि विश्विद्यालय पर , आप का व्यक्तव्य एक भ्रांती हैं और मेरी बात की सत्यता के लिये विश्विद्यालय के सम्बंधित विभाग से पता किया जा सकता हैं

पहला सत्र उद्घाटन सत्र के साथ ही पुस्तक विमोचन सत्र था।

पुस्तक जिसकी थी वो पता लगा हैं
जिस संस्थान से पुस्तक छपने के
लिये अनुदान मिला हैं यानी हिंदी अकादेमी , उसके कोषाध्यक्ष हैं . किताब उनकी निज की हैं और उसका विमोचन भी निजी तौर पर होता तो क्या बात थी पर उनको अनुदान मिल गया छपने के लिये भी और विमोचन के लिये भी
यानी अँधा बांटे रेवाडी फिर फिर अपनों को दे

मुख्य अतिथि नामवर सिंह रहे। मैं समझता हूँ कि ब्लागरी को अभी साहित्य के लिए एक नया माध्यम ही माना जा रहा है। शायद इसी कारण से नामवर जी उस के मुख्य अतिथि थे।


मुख्य अथित्ति की बात विश्विद्यालय को बतानी होती हैं अनुदान लेनी से पहले और जो लोग विश्विद्यालय मे ऊँचे पदों पर आसीन हैं उनको बुलाया जाता हैं ताकि बदले मे आप को वहां बुलाया जाए और वो काम दिये जाए जिनका पैसा मिलता हैं जैसे phd ki examinarship ityadi

बहुत से तथ्य केवल सुने सुनाये होते हैं . और उनपर बिना जाने लिख देना आप के लिये क्या सही हैं . लेकिन ब्लॉग माध्यम हैं अपनी अभिव्यक्ति का इसलिये आप को पूरा अधिकार हैं
लिख कर उनसे सहमत होने का जिनसे आप का मन मिलता हैं क्युकी
हिंदी ब्लोगिंग अभी केवल मिलने और मिलाने के लिये ही हो रही हैं

PD said...

आपके इस पोस्ट पर छोटा सा कमेंट से काम नहीं चलने वाला है.. इस पर तो पूरा पोस्ट बनता है.. :)

Suman said...

हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा की गई राष्ट्रीय संगोष्टी ब्लागरी के इतिहास की बड़ी घटना है.sahi hai.nice.

Sanjeet Tripathi said...

is sare mudde par ab tak ki sabse spashht post.

shukriya, kai bhrantiyan thi jo door ho gai

Raviratlami said...

जाने कैसे ये पोस्ट छूट गई थी...
बहरहाल, आपका शुक्रिया.

सिद्धार्थ जी का कहना :

"इस अद्वितीय आयोजन में कितनी तो अच्छी बातें हुईं लेकिन इसका ब्यौरा कम ही लोगों ने दिया है, परन्तु इसमें कितने छेद रह गये इसको गिनाने के लिए कुछ बड़े और अनुभवी लोग ‘माइक्रोस्कोप’ लेकर और बाकी दूर-दराज वाले लोग ‘टेलीस्कोप’ लेकर पिल पड़े हैं।"

यह तो प्रकट है!

आभा said...

आलेख अच्छा लगा ,कुछ नया मिला बहुत अच्छे से समझा दिया आमने , आभार

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

दुर्भाग्य से इस आयोजन में मैं शामिल नहीं हो सका, लेकिन यह सही है कि इससे ब्लॉगिंग पर एकेडमिक चर्चा की शुरुआत हो गई है. अब वह वक़्त बहुत दूर नहीं है जब ब्लॉगिंग को गम्भीरली लिया जाने लगेगा.