Friday, February 1, 2008

पुस्तक मेला लगाने पर रोक

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सूचना के अधिकार को गंभीर चुनौती

कोलकाता पुस्तक मेला के उद्धाटन के एक दिन पहले कोलकाता उच्च न्यायालय की एक खंड पीठ ने उस पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि इस से पर्यावरण को खतरा उत्पन्न हो सकता है तथा आसपास रहने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा। साथ ही प्रदूषण एक्ट, पर्यावरण सुरक्षा एक्ट तथा ध्वनि प्रदूषण एक्ट का भी उल्लंघन हो सकता है। यह निर्णय दरगाह रोड सिटीजंस कमेटी समेत कुछ संस्थाओं द्वारा दायर की गई एक याचिका पर दिया गया है।

29 जनवरी को मेले का उद्घाटन होना था। जोरशोर से स्टालों का निर्माण कार्य चल रहा था। हाईकोर्ट के इस फैसले से मेले के आयोजन पर प्रश्न चिह्न लग गया। निर्देश आने के तुरंत बाद बांस-बल्लियों को खोलने का काम शुरू कर दिया गया। पिछले दो साल से कोलकाता पुस्तक मेला आयोजन स्थल को लेकर विवादों से घिरा रहा है। पिछले वर्ष साल्टलेक स्टेडियम में मेला लगा था लेकिन पहले की तरह भीड़ नहीं जुटी। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है।

इस पोस्ट के उक्त दोनों चरण जागरण की खबर के आधार पर हैं। हालांकि मुझे यह सूचना भाई शिवकुमार मिश्र के ब्लॉग से लगी थी। यह एक गंभीर बात है। एक ऐसे पुस्तक मेले पर ठीक एक दिन पूर्व रोक लगा दिये जाने से मेला आयोजकों एवं उसमें भाग लेने वाली संस्थाओं को बड़ी आर्थिक हानि होगी जो कि किसी भी प्रकार से इस उद्योग कि कठिनाइयों को देखते हुए बड़ा झटका है। कोई भी पुस्तक मेला मानव समाज के ज्ञान में वृद्धि ही करता है। उस से प्रदूषण फैलने पर रोक को प्रोत्साहन ही प्राप्त होता न कि उसे बढ़ाने को। इस से वे लाखों लोग ज्ञान को विस्तार देने से वंचित हो जाऐंगे जो इस पुस्तक मेले में शिरकत करते। इस से इन के सूचना के अधिकार का हनन होता।

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले में उच्च न्यायालय से कोई गंभीर गलती हुई है। इस तरह तो कोई भी जनता के भले के कार्यक्रम को रोका जा सकता है और मानव समाज की प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध किया जा सकता है। इस मामले में यह भी अन्वेषण किया जाना चाहिए कि दरगाह रोड सिटीजंस कमेटी कितने और किस किस्म के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार तो कोई थोड़े से लोग समाज के विकास में न्यायालयों का सहारा ले कर बाधा बन खड़े होंगे।

इस मसले पर कानूनी लड़ाई को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मजबूती से लड़ा जाना चाहिए ही। इस तरह के निर्णयों के विरुद्ध आवाज भी उठानी चाहिए। लेखकों, प्रकाशकों, पाठकों और सभी पुस्तक प्रेमियों को सामूहिक आवाज उठानी चाहिए। आखिर भारत जैसे जनतंत्र में पर्यावरण के बहाने से बुक फेयर को रोका जाना एक गंभीर घटना है। आगे जा कर इसी तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित किया जा सकता है। उंगली उठते ही रोक देनी चाहिए। अन्यथा कल से हाथ उठेगा।

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