Friday, June 25, 2010

घमौरियों ने तोड़ा अहंकार - एक ग्रामयात्रा

भी तीन दिन पहले की बात है, हम इतरा रहे थे, कि हमें घमौरियाँ नहीं होतीं। बस आज हो गईं। हमारे अहंकार को इतनी जल्दी झटका इस से पहले कभी न लगा था। हम कहते थे कि पहले हम जब बाराँ में रहते थे तो बहुत होती थी। लेकिन जब से कोटा आए हैं घमौरियाँ विदा ले गई हैं। शायद हमारी बात घमौरियों ने सुन ली। सोचने लगीं। बहुत इतरा रहे हो जनाब! अब चखो मजा। आज घमौरियाँ हो ही गईं। पीठ में सुरसुराहट हो रही है। उस की सोचता हूँ तो झट से छाती पर सुरसुराहट होने लगती है। अब मैं किस किस की सोचूँ, मैं ने सोचना छोड़ दिया ठीक भारत सरकार की तरह। वह एंडरसन की सोचती तो अमरीका नाराज हो जाता। अमरीका की सोचती तो जनता नाराज हो जाती। बस उसने जो चाहा कर लिया, सोचना बंद कर दिया। इसी तरह हमने भी घमौरियों के बारे में सोचना बंद कर दिया।
गाँव का आसमान
ज मुझे श्रीमती जी के साथ एक गांव में जाना पड़ा। यह राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 76 पर कोटा से कोई 37 किलोमीटर बाराँ की ओर जाने के बाद उत्तर की ओर सात किलोमीटर अंदर पड़ता है। जैसे ही हम राजमार्ग से हट कर सड़क पर गए तो सड़क एक दम इकहरी हो गई। पर वह गाँव तक डामर की थी। बीच में जितने भी गाँव पड़े वहाँ डामर के स्थान पर हमें पत्थर का खुरंजा मिला। खुरंजे पर कार दूसरे या तीसरे गियर में ही चल सकती थी, अर्थात गति 20-30 किलोमीटर प्र.घं. से अधिक न हो सकती थी। फिर भी उन खुरंजों पर मिट्टी के बनाए स्पीड ब्रेकर मिले। आखिर स्पीड ब्रेकर नगरों में ही थोड़े बन सकते हैं, गाँव इन कामों में पीछे क्यूँ रहें?
गाँव में हमारे जिन रिश्तेदार के यहाँ हमें जाना था वे पिछले जून में उत्तराखंड के तीन धाम की यात्रा कर आए थे। वापस गाँव लौटे तो गणेश जी के दर्शन करने गए। पाया कि गणेश जी एक पेड़ की जड़ पर भूमि पर ही विराजमान  हैं और लगातार धूल-धूसरित होते रहते हैं। कभी कभी जब कोई मानववृन्द पास नहीं होता है तो कुकुर जैसे प्राणी भी उन्हें स्नान करा जाते हैं। ये गणेश जी पास की नदी से उन के परदादा कोई डेढ़ सौ बरस पहले उठा कर लाए थे और गांव के बाहर एक बाड़ी (बगीची) में स्थापित किया था। गाँव की प्रगति इतनी हो गई कि अब स्थापना स्थल गाँव की परिधि में आ चुका था। बगीची बिक चुकी थी, वहाँ मकान बन गए थे। बगीची की बाड़ उन की रक्षा करती थी वह नदारद हो चुकी थी। अब गणेश जी को स्थान की आवश्यकता थी। रिश्तेदार महोदय ने छोटे भाई को आदेश दिया कि गणेश जी के लिए ऊंचा चबूतरा बना दिया जाए खर्च सब भाई मिल कर भुगत लेंगे। चबूतरा बना, उस पर पक्का सिंहासन बन गया। उसी पर गणेश जी को विराजना था। पहले पूजा, हवन आदि हुए, फिर गणेश जी को नए सिंहासन पर बिठाया गया। फिर आगंतुकों और गाँव के लोगों को भोजन-प्रसादी का कार्यक्रम हुआ। 
गाँव की चौपाल पर एक बुजुर्ग
म गाँव पहुँचे तो दिन के ग्यारह बजे थे और अभी गणेश जी की पूजा आरंभ होनी थी। यानी हम कम से कम तीन-चार घंटे फालतू थे। गाँव में बिजली का दिन भर आना जाना लगा रहता है इस कारण से पंखाशऱण तो हो नहीं सकते थे। हम ने देखा पास ही एक चबूतरे पर नीम के पेड़ के नीचे तिरपाल और दरी बिछाई गई है और वहाँ लोग बैठे हैं। हम समझ गए यहीं ग्रामीणों की मेहमानों के साथ चौपाल लगनी है। हम भी वहीँ जा बैठे। पास ही शीतल जल की व्यवस्था थी। एक बीस लीटर की प्लास्टिक के आयल के खाली डिब्बे के आसपास जूट के टाट को सिल दिया गया था। टाट भीगा हुआ था जो पानी को शीतल कर रहा था। प्लास्टिक का डब्बा और जूट की टाट का टुकड़ा खेती के काम में आए वस्तुओँ का कचरा था जिस का उपयोग इस वाटरकूलर को बनाने में किया गया था। हम जैसे ही चौपाल पर बैठे एक ग्रामीण ने हम से पानी के लिए पूछा और एक लोटे में भर कर दिया। वह शीतल था। एक लोटे ने न केवल प्यास बुझाई अपितु रास्ते की थकान को भी दूर कर दिया।  
............क्रमशः

17 comments:

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी आप का लेख पढते दिल लग जाता है , पढते समय ऎसे लगता है जेसे आप साथ मे बेठे हुये बाते कर रहे है, बहुत सुंदर, यह घमॊरिया वही है ना जो गर्मियो मै पीठ पर ओर छती पर छोटे छोटे दाने हो जाते है, हमारे यहां इसे पित कहते है(पंजाबी मै)ओर घमॊरिया पेरो मै हो जाती है बरसात के दिनो मै उसे कहते है, गांव की चोपा्ल भी बहुत अच्छी लगी धन्यवाद

Udan Tashtari said...

बढ़िया चल रही है गांव यात्रा की कथा. नीम के पेड़ के नीचे छांया में थोड़ी नींद निकालने का आनन्द भी ले लेना था आपको.

महेन्द्र मिश्र said...

गाँव के बारे में बढ़िया संस्मरण ,,,धन्यवाद

Ratan Singh Shekhawat said...

उस वाटर कूलर का फोटो भी लाना चाहिए था

गिरिजेश राव said...

& कुकुर स्नान
गणेश जी का ये अपमान
नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। ;)

वाटर कूलर का फोटो लगा देना था। लेकिन लोग बैक्टीरिया, वायरस, सफाई वगैरह पर विमर्श करने लगते। थोड़े और फोटो लगाइए। राजस्थान के गाँवों के बारे में जानने की उत्सुकता है।

Arvind Mishra said...

वे बरसात की फुहारों का ही इंतज़ार कर रही थीं

विष्णु बैरागी said...

यात्रा भले ही आपने की किन्‍तु इस वर्णन ने हमें भी आपके साथ कर दिया। आपकी आप जानो, हमारी यात्रा तो आनन्‍ददायक रही।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भई,हमारी नौकरी तो हमें हर महीने गांवों की सैर कराती है तो यह किसी अपनी ही यात्रा की कहानी लगी।

प्रवीण पाण्डेय said...

घमौरियाँ तो एक महान समस्या है । जब शाहरुख खान जैसे अभिनेता सबसे छोटा एसी दिखाकर इसके निवारण में लगे हैं, तब तो इसके होने में आपको गर्व होना चाहिये ।

ali said...

अच्छा संस्मरण !

निर्मला कपिला said...

ैसी छोती छोटी यात्राओं पर सभी अक्सर जाते हैं मगर इनका विवरण इतना विस्त्रित हो सकता है ये सोचा ही नही। तभी तो आपको मेरी कहानियों एक उपन्यास की साम्ग्री नज़र आती है लेकिन मै आपकी तरह कर्मशीलौर धैर्य रख कर शायद नही लिख पाती। आपसे प्रेरणा पा कर कोशिश जरूर करूँगी। बहुत रोचक यात्रा है धन्यवाद।

नीरज जाट जी said...

घमौरियां हो गयी हैं तो खाट पर सोया करो। अब तो आप गांव में पहुंच गये हैं, खाट पास ही होगी, सो जाइये।

अन्तर सोहिल said...

बहुत अच्छा लगा आलेख
मन को प्रफुल्ल कर गया
हां जी नया यह मिला कि आपको भी घमौरियां हो गई हैं और आप गांव में गये हुये हैं
जो भी था टिपिया दिया जी

प्रणाम

सतीश सक्सेना said...

बढ़िया शब्द चित्रण ! शुभकामनायें भाई जी !

राम त्यागी said...

घमोरियां पक जाएँ ..इसका मतलब बारिश होने वाली है ..ऐसा गाँव में बोलते थे ...बढ़िया लगा, ऐसा लगा कि गाँव में पहुँच गया अपने :)

सतीश पंचम said...

राजस्थान के गाँवों का बहुत रोचक विवरण है। इसी से मिलता जुलता अपना भी गाँव है।

Mired Mirage said...

देर से आई हूँ। अभी आगे की किस्तें भी देखनी हैं। कामचलाऊ कूलर तो ठीक है परन्तु घड़ा उपयोग हुआ होता तो कुम्हार का भला भी हो गया होता।
घुघूती बासूती