Monday, August 31, 2009

"आह! कहीं मैं और कहीं तू" : पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की जादू वाली दूसरी ग़ज़ल


आप ने कल पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की जादू वाली पहली ग़ज़ल "खुल कर बात करें आपस में" पढ़ी।  कुछ पाठकों ने कहा ग़ज़ल ही जादू भरी है, कुछ पाठकों ने पूछा, ये जादू का रहस्य क्या है?  जादू का रहस्य तो मैं भी तलाशता रहा।  बावज़ूद इस के कि मेरे पास जादू वाली दूसरी ग़ज़ल थी, मैं इस में सफल नहीं हो सका।  फिर से यक़ीन साहब की शरण ली गई।  वे अब भी बताने को तैयार नहीं।  कहते हैं, पाठक खुद तलाश करें तो कितना अच्छा हो।  जादू इन दोनों ग़ज़लों में छुपा है।  संकेत दिए देता हूं, जो  ग़ज़ल के नीचे छपे चित्रों में छिपा है। मैं तो अब भी तलाश कर नहीं पाया।  शायद आप तलाश लें। तलाश लें तो मुझे भी टिप्पणी में बताएँ। वर्ना अपने यक़ीन साहब तो हैं हीं, कल उन की फिर से शरण लेंगे। 
 

आह! कहीं मैं और कहीं तू
- पुरुषोत्तम 'यक़ीन' -
 

नयनों का इक ख़्वाब हसीं तू
तू आकाश है और ज़मीं तू

वो अपने मतलब के संगी
उन अपनों सा ग़ैर नहीं तू

दाग़ नहीं तेरे चहरे पर
कैसे कह दूँ माहजबीं तू

तू यह कैसे सह लेता है
आह! कहीं मैं और कहीं तू

तेरे दिल की बात न जानूँ
मेरे दिल में सिर्फ़ मकीं* तू

कुछ दिल की कुछ जग की सुन लें
आ कर मेरे बैठ क़रीं* तू

कौन 'यक़ीन' करेगा सच पर
चुप ही रहना दोस्त हसीं तू



मकीं* = निवास,   क़रीं*  = निकट
 

चित्र संकेत -
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