Tuesday, August 18, 2009

'गीत' बीच में ये जवानी कहाँ आ गई ...

अनवरत पर अब तक आप ने पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ की ग़ज़लें पढ़ी हैं।  ‘यक़ीन’ साहब ने सैंकड़ों ग़ज़लों के साथ गीत और नज्में भी कम नहीं लिखी हैं। यहाँ प्रस्तुत है उन का एक मासूम गीत ..............

'गीत'

बीच में ये जवानी कहाँ आ गई ...
  • पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’

रोज़ मिलते थे हम
साथ रहते थे हम
बीच में ये जवानी कहाँ आ गई ....


बात करते थे
घुट-घुट के पहरों कभी
ये बला कौन-सी दर्मियाँ आ गई .....

दिन वो गुड़ियों के, वो बेतकल्लुफ़ जहाँ
मिलना खुल के वो और हँसना-गाना कहाँ

हाय बेफ़िक्र भोले ज़माने गए
इक झिझक बेक़दम, बेज़ुबाँ आ गई ...
ये बला कौन-सी दर्मियाँ आ गई .....

बस ज़रा बात पर कट्टी कर लेना फिर
चट्टी उँगली भिड़ा बाथ भर लेना फिर

रूठने के मनाने के दिन खो गए
सामने उम्र की हद अयाँ आ गई ...
ये बला कौन-सी दर्मियाँ आ गई .....

रोज़ मिलते थे हम
साथ रहते थे हम
बीच में ये जवानी कहाँ आ गई .....

बात करते थे
घुट-घुट के पहरों कभी
ये बला कौन-सी दर्मियाँ आ गई .....


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