Friday, May 1, 2009

देर से छूटी रेलगाड़ी के मुसाफिर

बत्तीस घंटों के निजि सफर ने बहुत थकान दे दी। जयपुर जाना हुआ और लौटना भी। रेलगा़ड़ी से दोनों ओर की यात्रा की गई। जाने के लिए नियमित रेलगाड़ी और और आने के लिए विशेष रेलगाड़ी में टिकट आरक्षित करवाए गए। जाने वाली गाड़ी दस मिनट देर से छूटी और समय पर पहुँच गई। जिस काम में दिन भर लगने की संभावना थी वह एक घंटे से भी कम में हो गया। ग्यारह बजे दोपहर को काम से निपट लिए लेकिन वापसी गाड़ी रात 9.15 की थी। सोचा जयपुर में घूमा जाए, कुछ लोगों से मिल लिया जाए। लेकिन शोले बरसाती धूप और ताप ने वापस घर में धकेल दिया। दिन में सोए तो थकान निकल गई। बेटी साथ थी वह अपनी मौसी से बात करती रही। मैं उठा तो बरसों बाद कम्पूटर पर स्पाइडर सोलिटेयर का सब से कठिन खेल खेलता रहा एक घंटे में एक खेल को कोई पांच बार दोहरा कर खेलने पर हल कर पाया और पुरस्कार में आतिशबाजी देखी। तब तक गृहस्वामी आ चुके थे। दो घंटे उन से बातें की, भोजन किया फिर दोनों मेजबान हमें स्टेशन छोड़ने आए।



प्लेटफार्म पर आने पर पता लगा कि गाड़ी दो घंटे देरी से चलेगी। मेजबान हमारा एक घंटे तक साथ देते रहे। फिर हम ने उन्हें स्टेशन के बाहर टहल कर आने का बहाना कर विदा किया और एक घंटा बाहर टहलते रहे। पैर अच्छी तरह थक चुकने और एक पानी की बोतल कूड़ेदान के हवाले करने के बाद प्लेटफार्म पहुंचे तब तक गाड़ी के जाने के समय में एक घंटे के इजाफे के साथ उस का प्लेटफार्म बदल चुका था। दुनिया भर में अपनी खूबसूरती के विख्यात गुलाबी नगर के रेलवे स्टेशन की हालत ऐसी थी जैसे वह देश का सब से उपेक्षित रेलवे स्टेशन हो। गर्मियों के यात्रियों की भीड़ ढोते छोटे छोटे प्लेटफार्म, जिन के आधे से अधिक पंखे बंद, पैर रखने तक को स्थान नहीं। पटरियों की दिशा से आती बदबू के असहनीय झोंके। तलाश करने पर स्टेशन मास्टर से ले कर पूछताछ खिड़की तक कुछ भी न मिले। देरी से तय किया गया गाड़ी के समय से भी आधा घंटा ऊपर हो जाने पर गाड़ी नहीं लगी और टांगे जवाब देने लगीं तो बेटी पूछताछ खिड़की तक जाने को बोलने लगी। मैं ने कहा, प्लेटफार्म नं.1 तक जाना होगा। बोली, टांगें तो यहाँ भी टूट रही हैं, ऐसे में किसी का भेजा तो खाया जाए।

पूछताछ खिड़की तो सिरे से गायब थी ही, मुश्किल से स्टेशन मास्टर का दफ्तर मिला। अनधिकृत प्रवेश वर्जित की चेतावनी को मुँह चिढ़ाते हम दफ्तर में घुसे और सीधे प्रश्न दागा। ये मद्रास स्पेशल है भी या केवल झाँसा है। अलसाए से स्टेशन मास्टर ने बताया कि यार्ड में तकनीकी समस्या थी, गाड़ी थोड़ी देर में लगने वाली है। मैं बोला, वो ठीक है, पर आप ने तय समय निकल जाने के बाद कोई उद्घोषणा तक नहीं की है। -मैं अभी करवाता हूँ, यह कहते हुए उस ने किसी को टेलीफोन किया।  बाहर आए तब तक उदघोषणा होने लगी थी कि मद्रास स्पेशल कुछ ही देर में प्लेटफार्म नं. 3 पर लगने वाली है। हमने समय बिताने को एक एक कप आइस्क्रीम खाई। तब गाड़ी प्लेटफार्म नं. 3 पर लग चुकी थी। हम पहुँचे तो सवारियाँ असमंजस में थीं, किस डब्बे में चढ़ें? डब्बों पर चिन्ह अंकित नहीं थे। फिर कोई बता गया कि यहाँ एस-1 है और उस के बाद गिनते जाइए। खैर लोग अपने हिसाब से एक दूसरे से पूछताछ करते हुए डब्बों में बैठ गए। गाड़ी तय समय से ठीक सवा तीन घंटे देरी से रवाना हुई। उस समय जो कोटा पहुँचने के लिए तय था।

प्लेटफार्म पर भीषण गर्मी में जिस तरह यह साढ़े तीन घंटों का वक्त काटना पड़ा था, उस से सताए हुए लोग गाड़ी में चलते पंखों और गाड़ी के चलने से प्रवेश कर रही हवा के झोंकों से मिली राहत से जल्दी ही सो लिए। मेरी नींद खुली, मोबाइल का अलार्म सुन कर। यह समय था कोटा पहुँचने का लेकिन बाहर जो स्टेशन दिखाई दे रहा था वह कोटा का कतई नहीं था। मैं ने खिड़की से निगाह दौड़ाई तो स्टेशन पर कहीं उस का नाम नजर नहीं आ रहा था। पर सवाईमाधोपुर का अनुमान था। दस मिनट प्रतीक्षा करने पर भी गाड़ी न चली तो प्लेटफार्म पर उतर कर तसल्ली भी कर ली कि सवाई माधोपुर ही था। चार बजे गाड़ी वहाँ से चली मैं ने पौन घंटे बाद का अलार्म लगाया और फिर सो लिया। अब खतरा यह नजर आ रहा था कि नींद में कोटा न निकल जाए। अगला अलार्म बजा तो गाड़ी कोटा से एक स्टेशन पहले गुड़ला जंक्शन पर खड़ी थी। वहाँ पौन घंटा रुक कर गाड़ी फिर चली तो चंबल पुल के पहले रुकी फिर कोटा आऊटर पर। खैर छह बजने के कुछ मिनट बाद उस ने कोटा में उतारा। साढ़े छह बजे घर पहुँचे तो बेटी ने तो बिस्तर संभाला, मैं ने अपनी अदालत की फाइलें। आठ बजे की अदालत थी। जैसे तैसे साढ़े नौ बजे अदालत पहुँचा और अपना काम निपटा कर घर पहुँचा तो ढ़ाई बज चुके थे। खाना खा कर सोया तो शाम साढ़े छह बजे उठा तो मुझे बहुत देर बाद यह सत्य पता लगा कि मैं सुबह नहीं शाम को उठ रहा हूँ।


गाड़ी में चेन्नई जाने वाले बहुत मुसाफिर थे। मेरा सहयात्री कह रहा था, वहाँ तक पहुँचते पहुँचते तो चौबीस घंटे भी देरी हो सकती है। यह वह गाड़ी थी, जो किसी तकनीकी कारण से अपने आरंभिक स्टेशन पर ही तीन घंटों से भी अधिक देरी से चली थी। यह विशेष गाड़ी थी जिस के लिए भारतीय रेलवे ने अपने व्यस्त समय में से समय निकाला होगा, वह पूरी तरह से नष्ट हो चुका था। हर स्थान पर उस के लिए नए सिरे से समय निकालना संभव नहीं, इस लिए उस का भविष्य यही हो गया था कि जब जहाँ जैसे स्थान मिलेगा उसे वैसे ही आगे रवाना किया जाएगा। हमारे जीवन में भी जब हम किसी निश्चित समय पर अवसर चूक जाते हैं तो हमारी भी यही स्थिति हो जाती है।
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