Saturday, April 18, 2009

पुरानी कार पाँच साला सर्विस के लिए बरक्शॉ में : जनतन्तर कथा (15)

हे, पाठक!
जैसे हरि अनंता, हरि कथा अनंता! वैसे ही जनतन्तर अनंता और जनतन्तर कथा अनंता!  सकल परथी के भिन्न-भिन्न  खंडों पर  भाँत-भाँत के रूप,आकार और रंगों के कीट दृष्टिगोचर होते हैं, उन की जीवन शैली भी भाँत-भाँत की है।  वैसे ही जनतन्तर भी देस-देस में भाँत-भाँत का होता है।  जब भरतखंड के एक खंड को भारतवर्ष कहा गया तो उसे गणतन्तर भी घोषित कर दिया।  सब कहते हैं कि गणतन्तर भरतखंड की प्राचीन परंपरा है।  पर जानते कितने हैं?    एक पाठक ने प्रश्न किया गणतन्तर और जनतन्तर में क्या भेद है?

हे, पाठक!
अब हम गणतन्तर और जनतन्तर  भेद लिखते हैं।  पहले के जमाने में देस में एक राजा हुआ करता था जो देस पर राज करता था।  राज करना एक कला भी थी और सामर्थ्य भी, कला से ज्यादा सामर्थ्य थी। राजा को अपने देस पर और परजा पर  नियंत्रण बना कर रखना पड़ता था। यह सब काम वह किसम किसम के लोगों के जरीए करता था। जिनमें मतरी, जागीरदार वगैरा हुआ करते थे।  देस बड़ा हुआ तो सूबे भी होते थे और सूबेदार भी।  राजा को हटाने का तरीका यही था कि देस में बगावत हो जाए, या दूसरा कोई राजा लड़ाई कर देस पर कब्जा कर ले। आम तौर पर राजा का बेटा ही अगला राजा हुआ करता था।  इसी को राजतन्तर कहते थे।  पुराने जमाने में भरतखंड के बहुत से देसों में गणतन्तर होते थे।  यानी परिवारों के मुखियाओं की पंचायत, पंचायत के मुखियाओं से कबीलों की पंचायत, कबीलों के मुखिया सरदार और सरदारों की पंचायत देस की पंचायत, देस की पंचायत का मुखिया राजा।  विद्वानों ने गणतन्तर को इस तरह कहा, कि जो राजतन्तर न हो और जिस में बंस परंपरा से बनने वाले राजा शासन न हो।  बल्कि किसी भी और तरीके से जनता या जनता का कोई हिस्सा राज करने वालों की पंचायत को चुनता हो।

हे, पाठक!
भारतवर्ष गणतन्तर बना तो साथ ही यह भी घोषणा हो गई कि यह जनतन्तर होगा और देस के हर एक बालिग को वोट देने का अधिकार होगा।  देस का राज  महापंचायत करेगी, जिस के लिए हर खेत के बालिग अपना एक गण चुनेंगे।  इन गणों के बहुमत का नेता महापंचायत का परधान होगा।  हमने भारतवर्ष को गणतन्तर भी बना लिया और जनतंतर भी बना लिया।  पर इस में भी भीतर ही भीतर वो सबी तन्तर पलते रह गए जिन को परदेसी के साथ ही सिधार जाना था। परदेसी चले गए, । देस में उन का राज चलाने वाले सब यहीं रह गए।  परदेसी के जाने की हवा बनते ही उन ने कहना शुरू कर दिया था कि राज तो वे ही चलाएँगे, जो चलाना जानते हैं।  उन को चुना न गया तो सुराज फेल हो जाना है।  लोग झाँसे में आ गए, लोगों ने उन को ही चुनना शुरू कर दिया।

हे, पाठक!
इस तरह गणतन्तर में पुराने सब तन्तर जिन्दा रहे ।  वैसे ही, जैसे कंपनी ने पुरानी कार को चमका-चमकू के शो-रूम में खड़ी कर दी हो, और खरीद के नया रजिस्ट्रेशन नंबर ले कर इतरा रहे हों कि नए कार के मालिक हैं।  बरस भर बाद जब अंदर के घिसे पुरजे जवाब देना शुरू करें तो पता लगे कि नयी कार नयी होती है और पुरानी पुरानी।  पर करें तो क्या करें?  जब तक नयी कार न लेंगे पुरानी से ही काम चलाना होगा।  भारतवासी तीन-बीसी से पुरानी कार घसीट रहे हैं।  नयी कार कब आएगी? यह भविष्य के गर्भ में है।  कार की हर पाँच साल में सर्विस जरूरी है।  पुरानी है तो बीच में जब भी झटके खाने लगती है तभी बरक्शॉ में खड़ी हो जाती है।  इस बार कुछ ऐहतियात से चलाई गई तो झटके कम लगे, एक जोर का आया तो था पर वो साइकिल वाले की मदद से झेल लिया गया। फिलहाल पुरानी कार पाँच साला सर्विस के लिए बरक्शॉ में है।

आगे की कथा में पढि़ए क्या हो रहा है वहाँ पुरानी कार के संग।
बोलो! हरे नमः, गोविन्द, माधव, हरे मुरारी .
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