Friday, January 2, 2009

विराम चिन्हों पर फिर से एक विचार

अनवरत के आलेख अर्धविराम (;), अल्पविराम (,), प्रश्नवाचक चिन्ह(?) और संबोधन चिन्ह (!) कैसे लगाएँ? पर अनेक टिप्पणियाँ हुई।  एक अन्य ब्लाग पर एक आलेख में इस पर एक स्नेहासिक्त छेड़ छाड़ भी पढ़ने को मिली। वहाँ जो बात लपेट कर कही गई थी, उस पर मैं उतने ही आदर के साथ टिपिया कर आ गया हूँ।

बैरागी जी, इस मामले को यहीं न छोड़ने के लिए आदेश दिया था।  इसलिए फिर से एक संक्षिप्त बात यहाँ कर रहा हूँ।

मैं ने उस आलेख में जो भी कुछ लिखा था,  वह न तो व्याकरण से संबंध रखता था और न ही भाषा से। उस का संबंध विराम चिन्हों से भी नहीं था।  सभी भाषा को अपने हिसाब से सीखते हैं और अपने हिसाब से लिखते हैं। जो भी लिखता है उस का संबंध अपने लिखे से होता है।  लेखक का लेखन एक तरह से लेखक के व्यक्तित्व के एक पक्ष को सामने लाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आजादी है कि वह किस तरह से स्वयं को और अपने विचारों को प्रकट करना चाहता है।  मेरे आलेख का आशय कतई यह नहीं था कि मैं किसी की अपनी आजादी में दखल देना चाहता हूँ,   या किसी की गलती की ओर उस का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। 

मेरा उस आलेख का मंतव्य मात्र इतना ही था कि विराम चिन्ह इस तरह लगें कि पूर्ण विराम वाक्य के अंत में इस तरह लगे कि उस का एक अभिन्न भाग बना रहे।  उस से अगले वाक्य का भाग न लगे। विशेष रुप से ऐसा तो कभी न हो कि वाक्य एक पंक्ति में समाप्त हो जाए और पूर्ण विराम अगली पंक्ति के आरंभ में लगा हो और अगला वाक्य वहाँ से आरंभ हो रहा हो।

कंप्यूटर पर आरंभ में जब मैं टाइपिस्ट से टाइप कराने लगा तभी यह समस्या सामने आई थी और तब हम ने उस का हल यही खोज निकाला था कि वाक्य के अंतिम शब्द और पूर्ण विराम के बीच कोई रिक्ती (स्पेस) न छोड़ी जाए।   हमने देखा कि बिना कोई स्पेस छोडे़ पूर्ण विराम लगाने के उपरांत एक रिक्ति (स्पेस) छोड़ कर अगला वाक्य प्रारंभ करने पर भी पूर्ण विराम बीच में मध्यस्थ की भांति खड़ा नजर आता है।  तो हमने पूर्ण विराम के उपरांत दो रिक्तियाँ (डबल स्पेस) छोड़ना आरंभ कर दिया।  इस से टाइपिंग की सुंदरता बढ़ गई और अपरूपता समाप्त हो गई। 

बाद में जब मैं ने कम्प्यूटर लिया और खुद टाइपिंग की जरूरत पड़ी तो मैं बाजार से टाइपिंग सिखाने वाली पुस्तक खरीद कर लाया, जो मनोज प्रकाशन मंदिर, 31/8, जागृति विहार, मेरठ द्वारा प्रकाशित है।  इस पुस्तक के टंकण गति प्राप्त करने के नियमों में पहला नियम यही है कि, "प्रत्येक विद्यार्थी को हिन्दी तथा अंग्रेजी टंकण में पूर्ण विराम, प्रश्नवाचक चिन्ह, विस्मय बोधक चिन्ह को शब्द के तुरंत बाद लगा कर दो स्पेस छोड़ना चाहिए, अन्यथा आधी गलती मानी जाएगी।"

मैं ने उक्त नियम का पालन किया, और कर रहा हूँ।  इस से सुन्दरता बढ़ी है और गति भी।   इस पुस्तक में और भी नियम दिए हैं. वे कभी बाद में, आज इतना ही बहुत है।  हाँ बेंगाणी जी ने कहा है कि वे पूर्ण विराम के स्थान पर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले बिंदु का प्रयोग करते हैं।  वह भी सही है क्यों कि कोई चालीस वर्ष पहले यह तय हुआ था कि विराम चिन्ह और अंक अंग्रेजी वाले ही प्रयोग किये जाएँ जिस से सभी भाषाओं में एक रूपता बनी रहे।  इस बहुत से प्रकाशनों ने अपनाया।  करीब चालीस वर्ष से तो टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशनों में सभी में इन का प्रयोग होता चला आ रहा है।  मुझे देवनागरी लिखते समय जिस में सभी अक्षर समान लंबाई के होते हैं पूर्ण विराम के स्थान बिंदु लगाना सौंदर्य की दृष्टि से ठीक नहीं लगा और मैं ने छोड़ दी गई खड़ी पाई को फिर से अपना लिया।  कम से कम वह बिना मात्रा के अक्षर के बराबर तो होती है। बिंदु तो नीचे की तरफ वाहन के टायर के नीचे लगाए गए ओट के पत्थर की तरह लगता है।  यह मेरी स्वयं की सौंदर्य दृष्टि के कारण ही है।  हालांकि मैं भी मानता हूँ कि बेंगाणी जी का सुझाव अधिक उत्तम है।  यदि देवनागरी लिखने वाले अधिकांश लेखक बिंदु को पूर्ण विराम की खड़ी पाई के स्थान पर अपना लें तो लिखने पढ़ने वालों की सौंदर्यदृष्टि भी बदलेगी और बिंदु भी सुंदर लगने लगेगा।  
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