Sunday, August 31, 2008

'भगवान' शब्द के शब्दार्थ

हिन्दुस्तानी बन्धु ने आज एक आलेख अपने ब्लॉग पर लिखा है- हमारा हिन्दुस्तान...: भगवान का शाब्दिक अर्थ यह है !! इसे पढ़ कर इन हिन्दुस्तानी बन्धु बुद्धि पर केवल और केवल तरस खाने के अलावा और कुछ नहीं किया जा सकता है? यह पाँचवीं कक्षा के किसी छात्र का भदेस और कक्षा से लम्बे निष्कासन के उपाय के रूप में दिया गया जवाब लगता है।

इन सज्जन ने अपने आलेख में जो बताया है  कि भग स्त्री जननांग को कहते हैं इस लिए स्त्री का स्वामी अर्थात उस का पति भगवान हुआ, जैसे बल का स्वामी बलवान।

  • संस्कृत में 'भगः' शब्द है, जिस के अर्थ हैं -सूर्य के बारह रूपों में से एक, चन्द्रमा, शिव का रूप, अच्छी किस्मत, प्रसन्नता, सम्पन्नता, समृद्धि, मर्यादा, श्रेष्ठता, प्रसिद्धि, कीर्ति, लावण्य, सौन्दर्य, उत्कर्ष, श्रेष्टता, प्रेम, स्नेह, सद्गुण, प्रेममय व्यवहार, आमोद-प्रमोद, नैतिकता, धर्मभावना, प्रयत्न, चेष्ठा, सांसारिक विषयों में विरति, सामर्थ्य, और मोक्ष, और ... ...  योनि भी। 
  • लेकिन,  योनि केवल स्त्री जननांग को ही नहीं, उद्गम स्थल, और जन्मस्थान को भी कहते हैं।
  • यह जगत जिस योनि से उपजा है उसे धारण करने वाले को भगवान कहते हैं। 
  • इन सज्जन के अर्थ को भी ले लें, तो भी योनि का स्वामित्व तो स्त्री का ही है। इस कारण से स्त्री ही भगवान हुई न कि उस का पति।

स्वयं को हिन्दुस्तानी कहने वाले इन महाशय जी को यह गलत और संकीर्ण अर्थ करने के पहले कम से कम इतना तो सोचना ही चाहिए था, कि वे जो हिन्दुस्तानी नाम रखे हैं  यह उस के अनुरूप भी है अथवा नहीं। भाई,क्यों अपनी चूहलबाजी के लिए इस विश्वजाल पर हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों की मर्यादा को डुबोने में लगे हैं। कम से कम भगवान का ही खयाल कर लिया होता।
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