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रविवार, 19 सितंबर 2010

"मुक्ति पर्व" यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का सत्रहवाँ सर्ग भाग-2


यादवचंद्र पाण्डे
यादवचंद्र पाण्डेय के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के  सोलह सर्ग आप अनवरत के पिछले कुछ अंकों में पढ़ चुके हैं।  प्रत्येक सर्ग एक युग विशेष को अभिव्यक्त करता है। उस युग के चरित्र की तरह ही यादवचंद्र के काव्य का शिर्प भी बदलता है। इस काव्य के अंतिम  तीन सर्ग  वर्तमान से संबंधित हैं और रोचक बन पड़े हैं, लेकिन आकार में बड़े हैं। इस कारण उन्हें यहाँ एक साथ प्रस्तुत किया जाना संभव नहीं है। सत्रहवें सर्ग "मुक्ति पर्व" का द्वितीय भाग यहाँ प्रस्तुत है,  मुक्ति पर्व में आ कर काव्य मुक्त छंद का रूप धारण कर रहा है ................
* यादवचंद्र *

सत्रहवाँ सर्ग


मुक्ति पर्व
भाग द्वितीय


पिछली कड़ी में आप ने पढ़ा .....

या फिर 
मुझे फुसलाते हो
कि मैं 
अपनी बिरादरी से 
गद्दारी करूँ
अपने गिरोह में 
खुफियागिरी करूँ
अपने परिवार पर 
झूठा इलजाम गढ़ूँ
और उन के हिस्से का 
दो फाइल खाना
तुम मुझे दोगे
मैं खाऊँगा
औ तुम्हारे धर्म
उसे भाग्य का 
अटूट नियम बता कर
मेरे कुकृत्यों पर 
पर्दा डालेंगे !
लेकिन मैं ?
मैं तुम्हारे चेहरे पर थूक दूंगा
आ ----- थू !
आक् ----- थू !
आक्  थू -- ह !
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
अब आगे पढ़ें .......
तुम कौन हो ? 
मेरे सिर पर 
यह प्यार भरा हाथ
क्यों फेर रहे हो ?
......      ........     ........
हाथों का यह स्पर्श 
......      ........     ........
उफ, याद नहीं आता.....  !
हाँ,
बचपन में 
जेलर के चुपके
एक दिन 
मेरी माँ ने भी
ऐसा ही
ऐसा ही था वह स्पर्ष  !
जब कि 
जेलर ने
माँ से 
मुझे छीन लिया
और मैं
साइबेरिया
अण्डमान
मडागास्कर
भेज दिया गया
काठ के लम्बे - चौड़े
बक्सों में बन्द कर 
मुझे समुद्र की 
लहरों में फेंक दिया गया
और मेरी माँ
.....     .....     .....     .....
कुछ याद नहीं आता
.....     .....     .....     .....
कौन हो तुम
ओ घनी दाढ़ी वाले
महाकाय, निर्भय पुरुष  !
तुम कौन  हो  ?
तुम भीगी - भीगी आँखों से 
मुझे क्यों देख रहे हो  ?
अपने विशाल वक्ष में
चिपका कर 
मुझे क्यों भींच रहे हो
ओ दिव्यचेता  !


तुम चाहते क्या हो  ?
मेरे पाँवों में पैकर
और हाथों में
बेड़ियाँ हैं,
मैं तुम्हारा 
क्या स्वागत करूँ  ?
मेरी हर साँस 
मेरे लिए 
नागन बन गई है,
सूरज - चांद - तारे भी
खुफिया बन कर 
मेरी हर हरकत पर
नजर रखते हैं
मैं तुम्हारी क्या सुनूँ ?
मेरे जीवन का 
हर चरण, छन्द
हर ध्वनि, अर्थ
हर राग - विराग
मेरा उल्टा बिम्ब है
मेरी हर इकाई को ले कर 
चाहे जितने फार्म बन जाएँ
लेकिन उन में 
मेरा अपना कुछ नहीं,
जेलर का अपना है
मेरा सपना 
जेलर का सपना है
तुम्हारा स्नेह - स्पर्श
शीतल हो कर भी
मेरे शब्द - ज्ञान द्वारा
मुझे जला रहा है
ओ अमृत पुरुष  !
तुम्हारे चरक - सुश्रुत
की हर खुराक
मेरे व्याधि अनल में
तेल ही डालेगी
मेरे सिर से
अपने हाथ हटा लो
ओ युगाधार  !
इस यज्ञ में
अब और घृत मत डालो
मेरे खून से तर
फटे - चिटे वस्त्रों को 
सूलियों के नीचे से
ला - ला कर 
यहाँ अम्बार 
क्यों लगाते हो  ?
महाबाहो  !
आखिर तुम 
चाहते क्या हो  ?
मुक्ति  ?
लेकिन किस की  ?
उस वर श्रेष्ठ की 
जो हमारे 
दुश्मन की कारा में
आज
चार हजार वर्षों से 
कैद है
और जिस के बिना 
कवि की कविता 
आज तक 
अनब्याही है  ?
लेकिन 
तुम नहीं जानते
अब वह वेश्या है  !
मुझ से छीन कर 
फिरदौसी ने
उसे जेलर की 
कोठरी में नचाया
कालिदास, बाणभट्ट
भवभूति ने 
उसे नंगा नचा कर 
जेलर से पैसे कमाए
उस के शास्त्रों में
नाम कमाया,
होमर
और उस के ईलियड से पूछो
उस के सामने 
मुझ पर हंटर बरसाये जा रहे थे
मेरी चमड़ी उधेड़ी जा रही थी
और वह 
मुझ से आँख चुराये
अपना श्रंगार कर रही थी
शास्त्रों के मंगलाचरण 
और भरत वाक्य पढ़ कर देख लो
वह हँस - हँस कर 
मुझे शान्त रहने का
आदेश दे रही थी,
कभी जेलर के साथ
कभी उस के भगवान के साथ
(पता नहीं
भगवान क्या था
कैसा था
मैं ने उसे 
नहीं देखा
लेकिन, हर सुबह - शाम
मैं जेलर की 
कोठरी के सामने
बने एक विशिष्ट मकान में
लाया जाता था 
और मुझे 
समझा कर
भय - त्रास दिखा कर 
उस भगवान पर 
यकीन कराया जाता था)
रंगरेलियाँ मनाती रही,
मुझे छोड़ कर 
वह 
हर शख्स के साथ जाती रही
जो मुझे मारता था
मेरा खून बहाता था
मुझे खाना नहीं देता था
मुझे रोने नहीं देता था
या मेरी बेड़ियों को 
मजबूर हो कर देखता था
और मेरे घर की 
औरतों को
सामान कह कर बेच देता था 
और यह कविता ---
वेश्या है  !


...............................कविता अगले अंक में जारी रहेगी

सूचना - 
मित्रों ! कुछ कारणों से एक-दो दिन या कुछ अधिक अंतर्जाल संबंध विच्छेद रहेगा। आप को अनवरत के अगले अंक की प्रतीक्षा करने के लिए कष्ट उठाना पड़ेगा।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

"मुक्ति पर्व" यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का सत्रहवाँ सर्ग भाग-1

यादवचंद्र पाण्डे
यादवचंद्र पाण्डेय के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के  सोलह सर्ग आप अनवरत के पिछले कुछ अंकों में पढ़ चुके हैं।  प्रत्येक सर्ग एक युग विशेष को अभिव्यक्त करता है। उस युग के चरित्र की तरह ही यादवचंद्र के काव्य का शिर्प भी बदलता है। इस काव्य के अंतिम  तीन सर्ग  वर्तमान से संबंधित हैं और रोचक बन पड़े हैं, लेकिन आकार में बड़े हैं। इस कारण उन्हें यहाँ एक साथ प्रस्तुत किया जाना संभव नहीं है। सत्रहवें सर्ग "मुक्ति पर्व" का प्रथम भाग यहाँ प्रस्तुत है,  मुक्ति पर्व में आ कर काव्य मुक्त छंद का रूप धारण कर रहा है ................
* यादवचंद्र *

सत्रहवाँ सर्ग


मुक्ति पर्व
भाग प्रथम


तुम्हारी सभ्यता के 
हजारों वर्षों में
मेरी कविता
 
अनब्याही रही,
क्यों कि
उस का मंगेतर
जो धरती की
सभ्यता, संस्कृति
सुख, सौष्ठव
ज्ञान, विज्ञान
औ समृद्धि का
हकदार था
तुम्हारी कारा का
कैदी है

बचपन में
तुम ने उसे
बहलाया - फुसलाया
पूतना की तरह
दूध पिलाया
और चण्डाशोक की तरह
उस के गोत्र के
हर औरत-मर्द को
कत्ल किया
औऱ जो भाग निकले ?
उन पर
इतिहास - भूगोल
दर्शन - ज्ञान
विज्ञान - धर्म
साहित्य - विधि
कानून - नीति
औ संविधान के
हथियार बंद पहरे बिठाये

तुम ने 
जिन पर रियायतें की
उन को
लम्बी सजाएँ सुनाई -
कि चार हजार वर्ष
सश्रम कारावास के बाद
उन्हें जेल के
बाहरी हाते में
घूमने - फिरने की
छूट मिलेगी
उन्हें
उन के श्रम का
एक हिस्सा भी मिलेगा
हाँ, 
यह सब
संगीनों की
छाँव में होगा
मैं गवाह हूँ
इन बातों का
गवाह है -
मेरी पीठ का
हर काला निशान
गवाह है -
मेरी भूख 
गुर्बत
जहालत और फटेहाली की
दम तोड़ती
उखड़ी - उखड़ी चलती
मेरी हर साँस
गवाह है -
तुम्हारी नपुंसक मुसकान
जो झूठी सभ्यता
औ संस्कृति का 
लबादा ओढ़े,
हिजड़ों - बौनों
औ कुबड़ों की
अपनी महफिल में 
रामगुप्त की तरह
जिन्दा होने का
स्वांग भर रही है
गवाह हैं
उस धरती के 
चार अरब लोग
जिन का जन्म 
तुम्हारी कारा में हुआ
और आज वे 
बालिग हो गए हैं
वे आज भी
तुम्हारी दरी बुनते हैं
बोझ उठाते हैं
जूते, बॉक्स 
औ पर्स बनाते हैं
सामने के हाते में
आलू - गोभी
टमाटर उगाते हैं
रस भरे गन्ने
औ छीमियों की  
कतार सजाते हैं
पानी पटाते
गुलाब में
जो तुम्हारे बटन होल
या जेलर ऑफिस -
की मेज पर 
जीवन के
अनुराग की तरह
दमक रहे हैं।
मतलब कि 
दरी से -
पेन्सिलिन और रॉकेट तक,
टमाटर से -
मसाला और कॉफी तक,
जिन्हें बेच कर 
अरबों - खरबों की 
तुम रकम कमाते हो
(लूट लाते हो)

तुम अपनी अदालत में
हम से
वही कबूल कराते हो
जो तुम 
कहना चाहते हो। 
हमें भूखा मार कर 
अपने स्कूल कॉलेजों में
बयान तहरीरी रटवाते हो
मण्डन मिश्र के 
तोते की तरह

या फिर 
मुझे फुसलाते हो
कि मैं 
अपनी बिरादरी से 
गद्दारी करूँ
अपने गिरोह में 
खुफियागिरी करूँ
अपने परिवार पर 
झूठा इलजाम गढ़ूँ
और उन के हिस्से का 
दो फाइल खाना
तुम मुझे दोगे
मैं खाऊँगा
औ तुम्हारे धर्म
उसे भाग्य का 
अटूट नियम बता कर
मेरे कुकृत्यों पर 
पर्दा डालेंगे !

लेकिन मैं ?
मैं तुम्हारे चेहरे पर थूक दूंगा
आ ----- थू !
आक् ----- थू !
आक्  थू ---- ह !

**************
अगले अंक में जारी..........

बुधवार, 15 सितंबर 2010

हिन्दी की विशेषताएँ एवं शक्ति

हिन्दी के बारे में स्वयं हिन्दी भाषियों में बहुत से भ्रम स्थापित हैं। जरा निम्न तथ्यों पर गौर कीजिए। शायद आप के कुछ भ्रम दूर हो जाएँ, जैसे मेरे हुए।


१. संसार की उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है,
२. वह सबसे अधिक सरल भाषा है,
३. वह सबसे अधिक लचीली भाषा है,
४, वह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके अधिकतर नियम अपवादविहीन हैं।
५. वह सच्चे अर्थों में विश्व भाषा बनने की पूर्ण अधिकारी है।
६. हिन्दी लिखने के लिये प्रयुक्त देवनागरी लिपि अत्यन्त वैज्ञानिक है।
७. हिन्दी को संस्कृत शब्दसंपदा एवं नवीन शब्दरचनासमार्थ्य विरासत में मिली है। वह देशी भाषाओं एवं अपनी बोलियों आदि से शब्द लेने में संकोच नहीं करती। अंग्रेजी के मूल शब्द लगभग १०,००० हैं, जबकि हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है।
८. हिन्दी बोलने एवं समझने वाली जनता पचास करोड़ से भी अधिक है।
९. हिन्दी का साहित्य सभी दृष्टियों से समृद्ध है।
१०. हिन्दी आम जनता से जुड़ी भाषा है तथा आम जनता हिन्दी से जुड़ी हुई है। हिन्दी कभी राजाश्रय की मुहताज नहीं रही।
११. हिन्दी भारत के स्वतंत्रता-संग्राम की वाहिका और वर्तमान में देशप्रेम का अमूर्त-वाहन है।
१२. हिन्दी भारत की सम्पर्क भाषा है।
१३. हिन्दी भारत की राजभाषा है।


  • यह पोस्ट पूरी तरह से विकिपीडिया से उड़ाई गई सामग्री पर आधारित है।  

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिन्दी मेरे लिए दुनिया की सब से अच्छी भाषा है, वह मुझे कभी ओछी नहीं पड़ती

म हिन्दी भाषी हैं, हमें हिन्दी से अनुराग है और स्वयं को इस भाषा में सब से अच्छी तरह से अभिव्यक्त कर सकते हैं। हम में से अनेक हैं जो अंग्रेजी और दूसरी अन्य भाषाओं को जानते हैं और बहुत से उन भाषाओं में पारंगत है। कोई कोई तो इतने अधिक पारंगत हैं कि उन्हें हिन्दी ओछी पड़ने लगती है। वे समझते हैं कि वे स्वयं को हिन्दी से भी अच्छी तरह से अंग्रेजी या दूसरी भाषा में अभिव्यक्त कर सकते हैं। फिर वे अंग्रेजी की वकालत और हिन्दी के ओछे पन की बातें करते हैं। कभी वे कहते हैं कि हिन्दी में तकनीकी काम कर पाना संभव नहीं है, अदालतों का काम हिन्दी में संभव नहीं है, एक अच्छे उपन्यास का अच्छा अनुवाद हिन्दी में संभव नहीं है आदि आदि......
मुझे हिन्दी कभी ओछी नहीं पड़ती। मैं हिन्दी में कुछ भी कह सकता हूँ। यह भी हो सकता है मैं किसी दूसरी भाषा में पारंगत नहीं हो सकने के कारण ऐसा समझता होऊँ। लेकिन यदि ऐसा है तो फिर मैं चाहूँगा कि मैं कभी भी किसी अन्य भाषा में पारंगत नहीं होऊँ। यदि हो भी गया तब भी मैं जानता हूँ कि मैं स्वयं को कभी भी अपनी भाषा के मुकाबले किसी भी अन्य भाषा में सहज रूप से अभिव्यक्त नहीं कर सकता।
मैं वकील हूँ। अदालत में हिन्दी भाषा का प्रयोग करता हूँ। मुझे हिन्दी का उपयोग करने में कभी भी परेशानी नहीं आई। चाहे कानून  की किताबें अंग्रेजी में हैं। कभी मुझे अंग्रेजी के कुछ खास शब्दों के पारिभाषिक हिन्दी शब्द नहीं मिलते। लेकिन मैं अधिक परेशान नहीं होता। वहाँ अंग्रेजी के शब्दों से काम चला लेता हूँ। यदि में कुछ सौ शब्द अंग्रेजी के उपयोग में लेता हूँ तो इस से मेरी भाषा अंग्रेजी नहीं हो जाती और न ही मेरी हिन्दी भ्रष्ट हो जाती है। मेरा मूल उद्देश्य यह होता है कि मैं अपनी बात को कैसे बेहतरीन तरीके से कह सकता हूँ। मुझे इस बात से भी कोई परेशानी नहीं है कि मेरी हिन्दी में कुछ शब्द अरबी, फारसी या किसी और मूल के हैं। मैं यह जानता हूँ कि मेरी भाषा हिन्दी है। मैं न्यायाधीश महोदय को जज साहब बोलता हूँ तो मेरी भाषा अंग्रेजी नहीं हो जाती वह हिन्दी ही रहती है।
कुछ लोग अंग्रेजी का साहित्य पढ़ते हैं बहुत आनंदित होते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसी किताब हिन्दी में नहीं लिखी जा सकती या उस खास किताब का अनुवाद हिन्दी में नहीं किया जा सकता, यदि किया भी जाए तो वह उतना अच्छा नहीं हो सकता जैसा कि मूल है। लेकिन यह तो उन की सोच है। एक व्यक्ति अंग्रेजी नहीं जानता या कम जानता है। वह उस पुस्तक को या तो पढ़ नहीं सकता। पढ़े तो भी उतना आनंदित शायद न हो जितना वे सज्जन खुद हुए हैं। लेकिन इस से क्या फर्क पड़ता है? दुनिया में किसी के आनंदित होने के लिए और भी बहुत सी पुस्तकें और दूसरी चीजें हैं। यदि वह पुस्तक कुछ अनुभव या ज्ञान बांटती है तो एक हिन्दी भाषी को उस का खराब अनुवाद भी आनंदित करेगा। यह भी हो सकता है कि उस पुस्तक का खराब अनुवाद किसी अच्छे अनुवादक को अच्छा अनुवाद करने को प्रेरित कर दे। यह भी हो सकता है कि अनुवादक एक मूल पुस्तक को उस से भी अच्छे तरीके से अनुवाद में प्रस्तुत कर दे।
हिन्दी मेरे लिए दुनिया की सब से अच्छी भाषा है। मैं उसे सब से अच्छे तरीके से बोल, पढ़, लिख और समझ सकता हूँ, स्वयं को उस के माध्यम से सब से अच्छे तरीके से अभिव्यक्त कर सकता हूँ। मुझे गुड़ पसंद है, चीनी नहीं। मुझे आप श्रेष्ठतम चीनी ला कर खिला भी देंगे तो भी मुझे गुड़ ही अच्छा लगेगा।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

लालच में कैद सोच !!!

निवार की सुबह जयपुर निकलना था। सुबह छह बजे महेश जी टैक्सी समेत आ गए। बरसात के कारण सड़क खराब थी। आम तौर पर जो मार्ग साढ़े तीन-चार घंटों में तय हो जाता है उस में साढ़े पाँच घंटे लग गए। हमें कई स्थानों पर जाना था। टैक्सी ड्राइवर टैक्सी को बाहर खड़ा रखता। हर बार जब भी हम काम से निपट कर टैक्सी पर लौटे ड्राइवर टैक्सी पर तैयार मिला। जयपुर से वापसी में हमें रात के साढ़े आठ बज गए। हम दोनों टैक्सी की पिछली सीट पर ही रहे थे। ड्राइवर से अधिक बात करने का अवसर नहीं मिला। लेकिन जैसे ही हम जयपुर से कुछ दूर गए होंगे। महेश जी ने लघुशंका के लिए कार रुकवाई और मुझे आगे बैठने को कहा, शायद उन्हें नींद आ रही थी। मैं आगे की सीट पर ड्राइवर के साथ आ गया।
मैं ने ड्राइवर से बातचीत आरंभ की। वह चूरू का रहने वाला था और कोटा में नौकरी कर रहा था। उस की उम्र यही कोई 20-25 वर्ष के बीच रही होगी। मुझे आश्चर्य हुआ कि वह घर से बहुत दूर नौकरी करता है। उसी ने बताया कि उसे चार हजार रुपए मिलते हैं और वह कोटा में टैक्सी मालिक के साथ ही रहता है, उस का भोजन भी वहीं बनता है। बात ही बात में वह बताने लगा कि जब टैक्सी ले कर काम पर निकलता है तो मालिक उसे पैसा नहीं देता। उसे सवारी से ही लेना पड़ता है चाहे टैक्सी के लिए डी़जल डलवाना हो या उस के अपने खर्चे के लिए हो। मालिक तो उसे खाने के पैसे भी नहीं देता और नाइट के पैसे भी नहीं देता। जब कि पैसेन्जर से वह नाइट के अलग पैसे चार्ज करता है। उस का कहना था कि खाने का जुगाड़ भी पैसेंजर के साथ ही करना होता है या फिर अपनी जेब से देना होता है।
मैं ने उस से पूछा कितने घंटे गाड़ी चलानी पड़ती है। बताने लगा, मैं 72 घंटे तक लगातार गाड़ी चला चुका हूँ। रात को दो बजे गाड़ी ले कर लौटा था। फिर चार बजे उठना पड़ा। अब आप के साथ हूँ। सुबह फिर पाँच बजे अगली बुकिंग पर जाना है। मैं ने कहा तुम बीच में विश्राम नहीं करते? उस का उत्तर था कि जब गाड़ी कहीं खड़ी होती है तो नींद निकाल लेता हूँ।  रात को बारह बजे के कुछ देर पहले गाड़ी मिडवे पर एक रेस्टोरेंट पर उस ने खड़ी की। दिन में उसने हमारे साथ ही भोजन किया था। मुझे लगा कि उसे भूख लगने लगी होगी। मैं ने ड्राइवर से पूछा तो कहने लगा वह चाय पिएगा। खाना खाएगा तो शायद नींद आने लगे। मुझे भय लगने लगा, हो सकता है थकान के कारण वह रास्ते में झपकी ले ले। मैं ने महेश जी को जगाया। पूछा कुछ खाना-पीना हो तो खा-पी लो।
हेश जी उतर कर आए तो कहने लगे दाल-रोटी खाएंगे। मैं ने ड्राइवर से फिर पूछा तो कहने लगा - मैं भी खा ही लेता हूँ। रात को दो बज जाएंगे वहाँ खाना मिलेगा नहीं। तीनों के लिए दाल-रोटी आ गई। हम आधे  घंटे में वापस गाड़ी में थे। रोटी खा लेने का असर ये हुआ कि मुझे झपकी लगने लगी। मैं जबरन अपनी नींद को रोकता रहा। ड्राइवर से बात करता रहा। उस ने बताया कि वह तीन-चार माह इस गाड़ी पर काम कर लेता है। फिर दो माह के लिए वापस गाँव चला जाता है। दूसरे ड्राइवर तो एक माह से अधिक काम नहीं कर पाते। मैं ने उसे कहा -तुम बीच में अपने मालिक से आराम का समय देने को नहीं कहते। वह बोला -अभी एक सप्ताह पहले कहा था तो मालिक कहने लगा मैं दूसरे ड्राइवर को बुला लेता हूँ, तुम सुबह हिसाब कर जाना। अब मुझे एक माह ही हुआ है वापस लौटे। बस दो माह और काम करूंगा, फिर गाँव जाऊंगा। हो सकता है इस बार इस मालिक के यहाँ काम पर न लौटूँ। रात ढाई बजे गाड़ी मेरे घर पर थी। मैं सोच रहा था -टैक्सी ऑपरेटर कमाने के चक्कर में न केवल ड्राइवरों का शोषण करते हैं बल्कि ड्राइवरों को आराम का पर्याप्त समय न दे कर वे सवारियों की जान के साथ भी खेलते हैं। सही है पैसा कमाने का जुनून और लालच ने लोगों की सोच को ही बंदी बना लिया है।

रविवार, 12 सितंबर 2010

अखबारों में खबरें अधूरी क्यों होती हैं?

दैनिक भास्कर के कोटा संस्करण ने स्थानीय नगर निगम के बारे में खबर प्रकाशित की है, " तंगी में भी बदहाली" । यह किसी घटना से उपजा समाचार नहीं, अपितु नगर निगम कोटा की कार्य प्रणाली से संबद्ध कुछ सूचनाओँ से उत्पन्न की गई एक रिपोर्ट है। जिस का निष्कर्ष यह है कि नगर निगम के पास अपने कामों के लिए पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। उसे बहुत सारे कर्मचारियों को ठेकेदारों के माध्यम से नियोजित करना पड़ता है। ठेकेदार दो तरह के हैं एक तो वे जिन्हें नगर निगम द्वारा निविदा के माध्यम से ठेका दिया गया है। दूसरी बहुद्देशीय सहकारी समितियाँ हैं जिन्हें बिना निविदा आमंत्रित किए काम दिया जा सकता है। समाचार कहता है कि निविदा ठेकेदारों को प्रत्येक कर्मचारी के लिए नगर निगम को 100 से 115 रुपए प्रतिदिन मजदूरी देनी होती है, जब कि बहुद्देशीय सहकारी समितियों के माध्यम से नियोजित 132 कर्मचारियों के निए नगर निगम को 172 से 178 रुपए प्रति कर्मचारी प्रतिदिन भुगतान करना पड़ता है। इस से नगर निगम को 29 लाख रुपए वार्षिक चूना लग रहा है। यह हालात तब हैं जब नगर निगम आर्थिक तंगी से गुजर रहा है। समाचार एक तरह से यह कह रहा है कि नगर निगम बहुद्देशीय सहकारी समितियों के माध्यम से कर्मचारी जुटा कर गलती कर रहा है और उसे यह काम भी निविदा के माध्यम से ठेकेदारों को देना चाहिए। इस समाचार में गलती से एक पंक्ति यह भी अंकित हो गई है कि " निगम में कार्यरत सफाई ठेका कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी 100 रुपए रोजाना हासिल करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।"
स समाचार का शीर्षक ही भ्रामक है, जिस मे तंगी और दरियादिली शब्दों का उल्लेख किया गया है, समाचार की जमीनी हकीकत बिलकुल भिन्न है। आज से पचास वर्ष पहले नगरपालिका में एक भी ठेका कर्मचारी या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हुआ करता था। केवल स्थाई या मासिक रुप से वेतन प्राप्त करने वाले कर्मचारी होते थे। सफाई व्यवस्था आज के मुकाबले  बहुत अच्छी हुआ करती थी। गलियोँ और बाजारों की नालियों को साफ करने के लिए भिश्ती और झाड़ू वाला आया करता था। अन्य कामों  में भी इसी तरह के कर्मचारी नियुक्त थे। जनता पर टैक्सों की इतनी भरमार भी नहीं थी। नगर निगम के पास धन की कमी भी होती थी तो उस का प्रदर्शन नहीं किया जाता था अपितु पार्षद उस का मार्ग तलाश करते थे। लेकिन अब स्थिति बिलकुल बदल गई है। सफाई दिखाने भर की नजर आती है। नगरपालिकाएँ स्थाई कर्मचारियों की भर्ती नहीं करती हैं। वे इन्हें ठेकेदारों से प्राप्त करती है। ठेकेदार का काम सिर्फ कर्मचारी उपलब्ध कराना और उन्हें मजदूरी देना होता है। उन से काम लेना और उन पर नियंत्रण रखना नगरपालिकाओं का काम है। व्यवस्था में यह परिवर्तन क्यों आया यह एक बड़ा प्रश्न है। 
वास्तविकता यह है कि तब पार्षद और नगरपालिकाएँ नगर के प्रति अपना दायित्व समझती थीं। आज वह स्थिति नहीं है। आज जिस तरह चुनाव होते हैं उन में चुने जाने के लिए उम्मीदवारों को अत्य़धिक धन खर्च करना होता है। जिस पद के लिए वे चुने जाते हैं उसी के प्रभाव से वे उस धन से कई गुना धन की वसूली करते हैं।  वस्तुतः चुनाव में धन खर्च करना एक तरह का निवेश हो गया है जो सर्वाधिक लाभप्रद है। जो उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं। उन में से एक ही जीतता है बाकी हार जाते हैं। हारने वाले उम्मीदवारों का धन व्यर्थ चला जाता है। ठीक जुए की मेज की तरह जहाँ बैठने वाले जुआरियों में से एक सब का धन समेट कर चल देता है। दूसरे दिन भिर जुए की मेज लग जाती है। वस्तुतः चुनाव लड़ने का धन्धा दुनिया का सब से बड़ा जुआ बन गया है और यह वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की देन है।
जदूरी के बारे में हम यह पढ़ते हैं कि यह अनेक प्रकार की होती है। एक न्यूनतम मजदूरी होती है जिसे सरकार यह मान कर चलती है कि यह व्यक्ति के जीवन निर्वाह के लिए केवल न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। अनेक बीच के स्तरों को पार करते हुए एक उचित मजदूरी होती है जो कि कर्मचारी को जीवन निर्वाह के सभी साधन उपलब्ध कराती है और उन के भविष्य का ख्याल भी रखती है। एक सरकारी या सार्वजनिक संस्था को अपने सभी कर्मचारियों को उचित मजदूरी देनी चाहिए। लेकिन हुआ यह है कि इन संस्थाओं के लिए काम करने वाले मजदूरों को उचित वेतन तो क्या न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। हो यह रहा है कि कर्मचारी उपलब्ध कराने के लिए ठेके उठा दिए जाते हैं जिन का मूल्य न्यूनतम मजदूरी के बराबर या उस से कुछ अधिक होता है। उन दरों को देखें तो पता लगेगा कि ठेकेदार अपनी जेब से कुछ पैसा लगा कर मजदूर उपलब्ध करवा रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जितने मजदूर कागजों पर उपलब्ध कराए जाते हैं उन से आधे ही वास्तव में काम कर रहे होते हैं। वास्तव में उपलब्ध न कराए जाने वाले मजदूरों के लिए जो पैसा नगरपालिकाओं से उठाया जाता है उस में ठेकेदारों, पार्षदों, नगरपालिकाओं के अधिकारियों और पदाधिकारियों का हिस्सा शामिल होता है। 
सी व्यवस्था से देश चल रहा है। नगरपालिकाएँ तो उन का नमूना मात्र हैं, पंचायतें, राज्य और केंद्र सरकारें इसी तरह चल रही हैं। सारा देश और जनता इस बात को जानती है। लेकिन मौन रहती है। पर कब तक वह मौन रह सकेगी? शायद पाप का घड़ा फूटने तक या फिर पानी सर से गुजर जाने तक? मेरा मकसद यहाँ जनतंत्र के चौथे खंबे के काम की ओर ध्यान दिलाना था। यह समाचार लिखने वाले पत्रकार का क्या यह कर्तव्य नहीं था क्या कि वह ठेकेदारों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले कर्मचारियों की वास्तविक संख्या का भी पता लगाता और पार्षदों, ठेकेदारों, पदाधिकारियों और अफसरों के अंतर्सबंधों की खोज  करता औऱ उस के परिणामों को अपनी कलम के माध्यम से सब के सामने रखता। वह रखना भी चाहता तो शायद ऐसा नहीं कर सकता था। क्यों कि अखबार विज्ञापनों से चलते हैं। विज्ञापन इन्हीं ठेकेदारों, अफसरों, पदाधिकारियों और पार्षदों के माध्यम  से प्राप्त होते हैं और अखबार का मालिक इसी कारण से अपने पत्रकारों को इस से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दे सकता। एक प्रश्न यह हो सकता है कि ये खबरें छापी ही क्यों जाती हैं? अब ठेकेदारों को ज्यादा काम चाहिए वे चाहते हैं कि सहकारी समितियों के माध्यम से काम कर रहे लोगों के बजाय उन्हें काम मिले। तो इस तरह की खबरें बनती हैं, बनवाई और बनाई जाती हैं। 

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

"मृगतृष्णा" (बुर्जुआ जनतंत्र) यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का सोलहवाँ सर्ग भाग-2

यादवचंद्र पाण्डेय
यादवचंद्र पाण्डेय के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के  पंद्रह सर्ग आप अनवरत के पिछले कुछ अंकों में पढ़ चुके हैं।  इस काव्य के अंतिम  तीन सर्ग  वर्तमान से संबंधित हैं और रोचक बन पड़े हैं, लेकिन आकार में बड़े हैं। इस कारण उन्हें यहाँ एक साथ प्रस्तुत किया जाना संभव नहीं है। इस काव्य के सोलहवें सर्ग "मृगतृष्णा (बुर्जुआ जनतंत्र)" का प्रथम भाग आप पढ़ चुके हैं यहां द्वितीय भाग प्रस्तुत है ................
* यादवचंद्र *

सोलहवाँ सर्ग
मृगतृष्णा (बुर्जुआ जनतंत्र)
भाग द्वितीय
 
जब तक यह जंतर-तंतर है, बुढ़िया डायन का मन्तर है
मन्तर का रक्षक है विधान, उस के पहरे पर लश्कर है
 
इन्साफ धर्म की गद्दी पर 
ईश्वर है और महीश्वर है
तब तक न सुरक्षित है पूंजी
जब  तक विषधर का गव्हर है
 
गव्हर में कैद करो अहि को, फन को तोड़ो, जनता को टेरो
यन्त्रों को चाहिए जन बल, मत सोचो, बस, समता को टेरो
तुम वट विशाल की छाँव तले बिरवा रोपोगे-क्या होगा ?
पील पड़ कर मर जाएगा, माथा ठोकोगे-क्या होगा ?
 
धुंधुँआती ज्वाला को मारो
दो  फूँक, जगा दो - मत सोचो
तूफान उठा जो उसे बुला कर 
राह दिखा दो - मत सोचो
 
उखड़ेंगे नभचुम्बी पादप, तुम तो बौने हो - मत सोचो
सोचे जो लिए बुढ़ापा है, तुम तो छौने हो - मत सोचो 
 
अधिकार हीन जो इतर वर्ग, उस में तुम भी हो, ख्याल रहे
उत्पादन यन्त्रों के मालिक अब तो तुम ही हो, ख्याल रहे
यन्त्रों की मुट्ठी में जन बल है
 
और तन्त्र यह-ख्याल रहे
इस प्रजातंत्र के माने तुम हो
महामान्य यह, ख्याल रहे
 
बाजार गरम रखने को संचय करो कोयला, जन बल का
अब मिल के भीतर-बाहर जग में बजे नगाड़ा जय-जय का
रुढ़िग्रस्त यह फटा-पुराना महल खड़ा जो, उसे ढाह दो
अपने दुश्मन के प्रतिपक्षी-जनता को तुम उठो, बाँह दो
मात्र आज के तुम विकल्प हो
 
मत जाने दो वृथा आह को
विष का थोड़ा अंश मिले
शिव बन, कर लो कण्ठस्थ दाह को
 
करवालो सिंहासन खाली पहले, फिर लिक्खो विधान को
अपने वेद-पुराण-शास्त्र को, धारा में विज्ञान-ज्ञान को

विश्वासों के मोती बिखरे बनो रेशमी धागा
आज लोक की आशा में आगे बढ़ कर 'हाँ' कर दो
किरण बनो, फैलो विकास के नये क्षितिज बन, उभरो

हतभागों के भाग्योदय का उचरो बन तुम कागा
नव मूल्यों के प्रति उदार तुम करो न पीछा आगा

चरण-धूलि ले शीश चढ़ाओ,  जनता की जय बोलो
मान नये, उपमान नये, इतिहास नये तुम खोलो

कोटि-कोटि जन जड़वत अधरों पर हास-राग है जागा
 
प्रजातंत्र जीने की पद्धति है, तुम को है जीना
तार-तार जो कोटि हृदय हैं, आज तुम्हें सीना है
घर को छोड़ चले उन को भी खाना है, पीना है
सोना चांदी क्या है ? है माथे का तरल पसीना

जीवन लेन-देन का सौदा कड़ा करो अब सीना
बनिक तुला पर जैरूसेलम, काशी नपे मदीना
 
बेड़ियाँ टूटीं प्रभञ्जन वेग से 
सिद्धियों के द्वार खट-खट खुल गये
जिन्दगी के मान जो बिलकुल नये
भर कुलाचें मञ्च पर हैं आ रहे

खोलते मुट्ठी बरसता अन्न है
सप्त रंगे वस्त्र का अम्बार है
हुक्म भर की देर है इस दैत्य को
दुष्प्राप्य क्या ? हर वस्तु इस को लभ्य
 
यन्त्र  चालित तन्त्र पढ़ते मन्त्र हैं
चरचरा कर ब्रह्म गँवई गिर पड़े
आग खा कर जो उगलते धुआँ
दैत्य करते रव-विजन में है खड़े

नापते भूगोल डग से घड़ी में
चीरते हैं सिन्धु ज्यो कच्चा घड़ा-
डोर दे कर पड़ित खच्-सा काटता,
फाड़ते हैं गगन कदली - वीर -  सा

दैत्य की यह शक्ति हो बसवर्तिनी
किस तरह, किस की, यही दो प्रश्न हैं
जो इसे बस में करे, उस के लिए
अर्थ, धर्म, कामादि सब कुछ देय
 
अर्थ का दे नाम युग - मन्थन करो
अमिय घट निश्चित निकलना जान लो
सर्वहारा को थमा दो काल - मुख
स्वयं पकड़ो पूँछ वैतरणी तरो

पाँत में बैठो, बिठाओ दलित को
पर बचाओ अमिय-भक्षण से उसे
प्रश्न भावी युद्ध का ध्रुव है, अभी
सत्व, शासन पर उभय पद की नजर

दैत्य युग के हैं खड़े सम भाव से
बन्द कर दो त्वरित उन को बैंक में
और जो सामन्त तुम से क्रुद्ध हैं
्ब हिले उन दाँत को पोटाश दो

शक्ति जो सन्मुख तुम्हारे जुड़ रही
केन्द्र उन के गाँव हैं, औ गाँव को
गाँव में ही बन्द कर लो, डोर दे
ढहे सामन्ती घरों को मदद दो

वे सहारा खोजता आधार वह
है यही मौका, न चूको, खींच लो
स्वार्थ उस का अब न रक्षित है कहीं
अहम् उस का मर गया, तर्पण करो

कहो, उट्ठे, चाकरी तेरी करे
टिम-टिमाए, विभा तुम से कर्ज ले
पढ़े तेरे विधि-विधानों को, समझ,
देख ले, जो छूट है उस को मिली

वह कटा विज्ञान युग से, नहीं तो
आज का भूगोल लख मर जायगा
खैर, गित को मैं पढ़ूंगा, वह रहे
खाता-कमाता मदद में मेरी खड़ा

पूर्ववर्ती शक्ति है वह, इसलिए
छूट उस को दे रहा हूँ, नहीं तो
अमरिका की भाँति सारे विश्व से
एक क्षण में मैं उसे देता मिटा

दिखा देता यन्त्र की जादूगरी
अर्थ के दो हाथ मैं देता बता
अलग से व्यापारियों का तन्त्र क्या?
प्रजातन्त्री खोज में ही वह खड़ा

राजतन्त्री खोल पर मैं ने लिखा
प्रजातन्त्री बोल को इंगलेंड में
राष्ट्रवादी 'सोसलिज्म खेल' को 
जर्मनी में अजी मैं ने ही रचा
 
शुद्धतम राष्ट्रीयता की बन लहर
दुश्मनों पर कहर बन मैं टूटता
किन्तु, अपने विश्व में बिखरे हुए
बान्धवों लड़ी प्रतिपल जोड़ता

जोड़ने की युक्ति ही है सभ्यता
तोड़ने की कला ही कानून है
प्रश्न सीधा और उलटा का नहीं
पुष्टि में मेरे, वही मजमून है

दुश्मनों से जो लड़े मेरे लिए
धर्म है, साहित्य है, आदर्श है
जो मिलाए हाथ मेरे शत्रु से
घोषित हमारे मूल्य का वह शत्रु

'प्रज्ञा' मेरे कोष का वह शब्द है
व्याप्ति जिस की मात्र मेरे लोग से
और उस का तन्त्र ? जिस की राह पर
सिर्फ मेरे स्वार्थ की दूकान हो

'प्रजा द्वारा, प्रजा का, जो प्रजा हित
तन्त्र - उस के मन्त्र का गुर है यही
अर्थ इस के परे के सब व्यर्थ हैं
अर्थ सच्चा, जो खरा व्यवहार में

'प्रजा' मेरी कत्ल करती है उसे
जो प्रजा का अर्थ बहुमत मानते
और पूंजीवादियों को बाद दे
तन्त्र रचते दलित, शापित वर्ग का
 
या कि मेरी ही तरह संसार के
सभी शापित को पिरो कर सूत्र में
अलग अपने विधि-विधानों को बना
बात करना चाहते  हम से अलग
सापेक्ष राजा का प्रजा है शब्द
पर गनीमत, श्रमिक को जो मान्य,
मान्य जो उस को, उसी के शब्द में
भुक्खड़ों की आग को कर के नियन्त्रित
मिलों की इन
लपलपाती
भट्टियों में झोंक दो
ढक्कन गिरा दो
और इन की
चाल को
दूनी बढ़ा दो
गेट पर 
पहरे बिठा दो
भूत इन के
गर,
उपद्रव करें तो
फौजें बुला लो
कामगारों 
को बता दो
'न्याय- 
शासन दण्ड की अभिव्यक्ति है'
हाँ, आज मेरे यन्त्र में ही 
प्रजा की सब शक्ति है।
 
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