@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

सोमवार, 19 मई 2008

अटक जाती है सुई, चूड़ी-बाजे की तरह

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शायद नए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि डीवीडी के पहले सीडी और उस से भी पहले कैसेट, और उस से भी पहले म्युजिक रिकॉर्ड करने के लिए एक साधन हुआ करता था ग्रामोफोन। इस में एक थाली के आकार की प्लेट पर ध्वनि वलयों के रुप में अंकित होती थी। इसी कारण ग्रामोफोन को "चूड़ी-बाजा" भी कहते थे।इस प्लेट को ग्रामोफोन रिकॉर्ड कहा जाता था, इस के मध्य में एक सूराख होता था। ग्रामोफोन की डिस्क जिस के मध्य में एक कील सी होती थी। इस डिस्क पर ग्रामोफोन रिकार्ड को उस के मध्य के सूराख को कील में फंसा कर चढ़ा दिया जाता था। फिर यांत्रिक चाबी के जरिए उस डिस्क को घुमाया जाता था, जिस से रिकॉर्ड भी घूमते हुए नाचने लगता था। इस के घूमना शुरु करने के बाद ग्रामोफोन पर लगे एक हाथनुमा छड़ को जिस के एक सिरे पर एक सुई लगी होती थी सुई के सहारे रिकॉर्ड के बाहरी सिरे पर रख दिया जाता था। नाचते हुए रिकार्ड पर सुई सरकती हुई मध्य में कील की तरफ सरकते हुए रिकॉर्ड पर दर्ज ध्वन्यांकन को पढ़ती थी जिसे बाद में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से स्पीकर तक पहुंचा कर मधुर संगीत का आनन्द लिया जाता था।

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कभी कभी सुई सरकने के स्थान पर एक ही वलय पर अटक जाती थी और उस एक वलय पर अंकित ध्वनि ही दोहराई जाती रहती थी। जैसे - वहाँ अगर "मैं जाऊं" अंकित होता तो ग्रामोफोन "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" ही दोहराता रहता था जब तक कि उसे मैनुअली ठीक नहीं किया जाता था।

अब आप कहेंगे। मैं इस पुराण को क्यों बाँच रहा हूँ तो इस की वजह यह है कि इस सीडी डीवीडी के जमाने में न्यूज चैनलों की सुई रोज किसी न किसी वलय पर अटक जाती है। बाकी का रिकॉर्ड बजता ही नहीं है। सिर्फ एक वलय ही बजता रहता है।

मार्के की बात यह कि यह सुई मैनुअली भी तब तक नहीं हटती है। जब तक कि रिकार्ड टूट न जाए। रिकार्ड का श्रवण तक अधूरा रह जाता है।

एक टूटते ही चैनल वाले फिर दूसरा रिक़ार्ड चढा देते हैं, वह चलता रहता है टूटने तक। ये चैनल वाले अपनी सुई क्यों नहीं बदल देते जो हर बार अटकती रहती है, बार-बार अटकती है। कोई रिकार्ड पूरा बजने ही नहीं देती।

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शुक्रवार, 16 मई 2008

छिपा आतंकवाद, खुला आतंकवाद

जयपुर धमाकों ने अनेक जानें ले लीं। अनेक घायल हुए, उन में अनेक ऐसे होंगे जो अब कभी भी सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पायेंगे। अनेक ऐसे भी होंगे जो कदमों की दूरी से इन हादसों के दर्शक रहे होंगे, और उन के दिलों-दिमागों पर इन घटनाओं ने जो असर छोड़ा होगा वह शायद जीवन भर न जाए। हफ्तों, महीनों और बरसों तक उन के मस्तिष्क में वे धमाके गूँजते रहेंगे। शवों के परखच्चे दिखाई देते रहेंगे। अनेक होंगे जो हादसों की जगह जाने से न जाने कितने दिनों तक कतराते रहेंगे, और आने जाने के लिए लम्बे रास्ते चुनते रहेंगे। न जाने कितनी माँएँ होंगी जो अपने बच्चों को महिनों तक भीड़ भरे मंदिरों तक जाने से रोकती रहेंगी और मुहल्ले की हदों से आगे न जाने की हिदायत देती रहेंगी। बमों से निकले छर्रों का विश्लेषण पुलिस और फोरेंसिक विशेषज्ञ कर लेंगे। लेकिन इन हादसों से निकल कर दहशत के जो छर्रे अनेक लोगों के दिलों-दिमागों में जा जमे हैं, न तो उन का कोई विश्लेषण करेगा और न ही उन छर्रों से घायल मानुषों की कोई चिकित्सा हो पाएगी। इन घायलों को न कोई मुआवजा मिलेगा और न कोई सहानुभूति ही। वे दर्द के उन दरियाओं में बह निकलेंगे, जो न जाने कितने बरसों से मानुषों की बस्तिय़ों के बीच से गुजरते हैं। वे जगह बदल लेते हैं, गहरे और उथले हो जाते हैं, पर लगातार बह रहे हैं।

दर्द का एक दरिया उस घर में भी बह रहा होगा जिसे चलाने वाला ही हादसे के साथ चला गया है। मंदिर के सामने फूल-माला, प्रसाद और पूजा बेचने वाले की जगह खाली रहेगी, यही कोई तेरह दिन। इन तेरह दिनों में से किसी दिन उस दुकान (?) को खुलाने की रस्म पूरी होगी। पर क्य़ा दुकान खुल पाएगी? कौन बैठेगा उस पर? कोई महिला जो चूल्हे की जिम्मेदारियों को छोड़, घर चलाने की जिम्मेदारी उठाएगी। या कोई  नाबालिग किशोर जिसे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी। जिस पर अपनी माँ के सिवा अपने भाई, बहनों और बूढ़े दादा-दादी की रोटी का भी भार  आ पड़ा है। या कोई नहीं आएगा उस परिवार से वहाँ, या कोई और उस जगह को खरीद लेगा, अपना परिवार चलाने के लिए। धमाके की गूँज रोटी की जरूरत के नीचे दब जाएगी।

ऐसे में कोई मदद बाँट कर अपनी फोटो अखबार में छपवा रहा होगा। इधर दूसरे ही दिन से रक्तदान के कैम्प सजने लगे हैं। लोग माला पहन, तिलक लगवा कर टेण्ट हाउस के बिस्तरों पर लेट फोटो खिंचवा रहै हैं। दो चार दिन यह सब चलेगा।  कुछ दिनों के लिए रक्त बैंकों के सामने लगे 'रक्त चाहिए' के होर्डिंगों पर से ब्लड ग्रुप गायब हो जाएंगे। लेकिन कुछ दिनों बाद सभी वापस दिखने लगेंगे।

हादसे की रात ही शहर बंद का ऐलान आ गया। दूसरे दिन सुबह के अखबारों में छपा भी। शहर शोक में बंद रहा या आतंक की छाया में? उत्तर सब जानते हैं, मगर कोई नहीं जानता। सुबह ही लोग पीले-केसरिया पटके कांधो पर सजाए टोलियों में निकले। जो दुकान खुली मिली उसी पर कहर बरपा गए। शहर पूरा बंद रहा। बंद स्वैच्छिक था? अखबारों में बंद की तस्वीरें हैं और खबरें भी। जयपुर के एक अखबार में हवामहल समेत सामने की वीरान सड़क का रंगीन छाया चित्र छपा है, बिना किसी चिड़िया और पिल्ले के। कैप्शन है "बंद के दौरान जयपुर"। इधर खबर यह भी छपी है कि इस इलाके में कर्फ्यू था, जो कुछ घण्टों की छूट के अलावा अब भी जारी है।

कोटा के बंद की खबरें यहाँ के सब अखबारों में हैं। आप खुद इस खबर का जायजा लें....................

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पढ़ ली, खबर? ये है, आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का चेहरा। छिपे आतंकवाद के सामने खुले आतंकवाद का प्रदर्शन। आप पकड़िये आतंकवाद को। यही लोग पैरवी कर रहे हैं, फिर से पोटा जैसा कानून लाने की। किस के खिलाफ उपयोग करेंगे इस कानून का। जो इन के बंद में दुकान खोलने की जुर्रत करेगा? या खुले आतंकवाद का सामना करने के लिए सामने आएगा? 

गुरुवार, 15 मई 2008

उन्हें भी अपनी रोटी का जुगाड़ करना है

कल शाम जब से जयपुर बम विस्फोट का समाचार मिला है मन एक अजीब से अवसाद में है। आखिर इस समाज और राज्य को क्या हो गया है? जिस में आतंकवाद की कायराना हरकतों को अंजाम देने वाले लोगों को पनाह मिल जाती है। लोग उन के औजार बनने को तैयार हो जाते हैं। वे अपना काम कर के साफ निकल जाते हैं।

लगता है कि न समाज है और न ही राज्य। ये नाम अपना अर्थ खो चुके हैं। पहले से चेतावनी है, लेकिन उस से बचाव के साधन भोंथरे सिद्ध हो जाते हैं। समाज को कोई चिन्ता नहीं है, उस ने अपने अस्तित्व को कहाँ विलीन कर दिया है? कुछ पता नहीं। जैसे ही घटना की सूचना मिलती है। चैनल उस पर टूट पड़ते हैं जैसे कोई शिकार हाथ लग गया हो और एक प्रतिद्वंदिता उछल कर सामनें आती है। कहीं कोई दूसरा उस से अधिक मांस न नोच ले। चित्र दिखाए जाते हैं, इस चेतावनी के साथ कि ये आप को विचलित कर सकते हैं। लोग इन्हें ब्लॉग तक ले आते हैं। विभत्सता प्रदर्शन, कमाई और नाम पाने का साधन बन जाती है। कुछ चैनल अपने को शरलक होम्स और जेम्स बॉण्ड साबित करने पर उतर आते हैं।

मंत्रियों की बयानबाजी आरम्भ हो जाती है। मुख्यमंत्री को तुरन्त प्रतिक्रिया करने में परेशानी है। जैसे यह देश और प्रान्त में पहली बार हो रहा है। वे पहले जायजा (सोचेंगी और राय करेंगी कि किस में उन का हित है, जनता और देश जाए भाड़ में) लेंगी फिर बोलेंगी। प्रान्त के सब से बड़े अस्पताल का अधीक्षक गर्व से कहता है उन पर सब व्यवस्था है, कितने ही घायल आ जाएं। पर व्यवस्था आधे घंटे में ही नाकाफी हो जाती है। रक्त कम पड़ने लगता है। रक्तदान की अपीलें शुरू हो जाती हैं। अपील सुन कर इतने लोग आते हैं कि रक्त लेने के साधन अत्यल्प पड़ जाते हैं। घायलों को जो पहली अपील के बाद सीधे बड़े अस्पताल पहुँचते हैं उन्हें दूसरे अस्पतालों को भेजा जा रहा है। पहले ही पास के अस्पताल पहुंचने की अपील करने का ख्याल नहीं आया।

मुख्यमंत्री जानती हैं कि उन पर दायित्व आने वाला है। आखिर आंतरिक सुरक्षा राज्यों की जिम्मेदारी है. केन्द्र की नहीं तो वे फिर से पोटा या उस जैसा कानून लागू नहीं करने के लिए केन्द्र को कोसना प्रांऱभ कर देती हैं। यह उन के दल का ऐजेण्डा है और केन्द्रीय नेता उस पर बयान दे चुके हैं।

अगले दिन राज्य भर में राजकीय शोक की घोषणा कर दी जाती है। स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर और अदालतें बन्द रहती हैं। एक दल को बन्द की याद आती है। वह बन्द की घोषणा कर देते हैं। (सब से आसान है, तोड़फोड़ के आतंक से लोग दुकानें, व्यवसाय बन्द करते ही हैं) बस कुछ रंगीन पटके ही तो गले में डाल कर घूमना है। बन्द रामबाण इलाज है हर मर्ज का। बाजार बन्द कर दो। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। एक आतंक की शिकार जनता के सामने दूसरा आतंक परोस दो। पहले वाले की तीव्रता कुछ तो कम होगी। वकीलों ने शोक सभा करनी है, शोक के राजकीय अवकाश से बन्द अदालतों के कारण संभव नहीं हुआ। अब अगले दिन शोक-सभा होगी, फिर अदालतों का काम बन्द। इस के अलावा कोई चारा भी नहीं, काम के बोझ से कमर तुड़ाती अदालतें दो दिन का काम करेंगी तो पेशियाँ बदलने के सिवा क्या कर सकती हैं? वैसे भी हर रोज 80% काम तो वे ऐसे ही निपटाती हैं।

वे साजिश रचते हैं, कामयाब होते हैं। आप अभी सूत्र तलाश कर रहे होते हैं। तक वे अपनी कामयाबी के मेक की वीडियो चैनलों को मेल कर देते हैं। चैनल चीखने लगते हैं, उन्हीं का स्वर। उन के  हाथ बटेर लग गई है। अखबारों में शोक संदेशों की 'क्यू'लगी है। अमरीका के झाड़ बाबा से ले कर राष्ट्रीय पार्टी के जातीय प्रकोष्ठ की मुहल्ला कमेटी के मंत्री तक के बयान आए जा रहे हैं। संपादक देख रहा है उसे कौन, कैसे नवाजता है? किस से कितना बिजनेस मिलता है और मिल सकता है? किस का शोक छापना है किस का नहीं?

सायकिल और बैग बेचने वाले नहीं जानते उन से माल किस ने खरीदा, या उन्हों ने किस को बेच दिया। उन को केवल सेल्स से मतलब है। वे बता देते हैं उन्हों ने बच्चों और महिलाओं को बेचे हैं। कफन बेचने वाले को पता नहीं कफन किस के लिए खरीदा जा रहा है? जीवित के लिए या मृत के लिए, या कि कल बेचा हुआ कफन कल उसी के लिए तो काम नहीं लिया जाएगा?

अचानक इस्पाती समाज भंगुर दिखाई देने लगता है। न जाने कब इस की भंगुरता टूटेगी? टूटेगी भी या नहीं। या ऐसे ही यह विलुप्त हो जाएगा। एक से एक-एक में, कई एकों में। वह बूढ़ा याद आता है जो मरने के पहले अपने बेटों से अकेली लकड़ियाँ तुड़वा रहा था और गट्ठर किसी से न टूटा अब गट्ठर भी टूट रहा है। बस पहले उसे बाँधने वाली रस्सी की गाँठ खोल लो, फिर एक एक लकड़ी.......

और ......... यह हम भारत के लोगों द्वारा रचा गया गणराज्य? अब गण की उपेक्षा करता हुआ। विदेशी साम्राज्य को विदा कर अस्तित्व में आया और अब कह रहा है हम विश्व अर्थव्यवस्था से अछूते नहीं रह सकते, और विश्व आतंकवाद से भी।

आज आज और रहेगा याद यह आतंकवाद। कल भुलाएंगे और परसों से कोई और ब्रेकिंग न्यूज होगी चैनलों पर। फिर से बयानों की क्यू होगी। बधाई या शोक संदेश? कुछ भी। आज भोंचक्के लोग परसों फिर रोटी की जुगाड़ में होंगे, और चैनल भी, उन्हें भी अपनी रोटी का जुगाड़ करना है।

रविवार, 11 मई 2008

माँ

मातृ दिवस पर प्रस्तुत है कवि महेन्द्र 'नेह' की कविता "माँ"

माँ

*महेन्द्र नेह*

जब भी मैं सोचता हूँ कि

कैसे घूमती होगी पृथ्वी

अहर्निश अपनी धुरी पर, और

सूर्य के भी चारों ओर

परिक्रमा करती हुई

मेरी चेतना में तुम होती हो माँ।

सबह सुबह जब उषा

अंधेरे को बुहारी लगाती हुई

जगाती है सोते हुए प्राणियों को

दोपहर की तपन को चुनौती देती हुई

कोई बच्ची दौड़ रही होती है

सड़क पर नंगे पाँव

या फिर शाम के धुंधलके में

कोई नारी आकृति

अपने सिर पर लकड़ियों का गट्ठर लिए

उतर रही होती है जंगल की पहाड़ी से

मुझे तुम याद आती हो माँ।

यकीन ही नहीं होता कि

अभावों से जूझते हुए एक छोटे से कमरे में

किस तरह पले बढ़े

अपना वर्तमान और भविष्य संवारने

आते रहे ना जाने कितने छोर

तुम्हारी निश्छल किन्तु दृढ़ आस्थाओं की

छाँह में पनपे न जाने कितने बिरवे

और बने छतनार वृक्ष।

याचना के लिए कभी नहीं फैले

तुम्हारे हाथ और

नहीं झुका माथा कभी

कथित सामर्थ्यवानों के आगे।

फिर भी तुम्हारी रसोई

बनी रही द्रोपदी की हाँडी।

तुम थीं

प्रकृति का कोई वरदान

या फिर स्वयं थीं प्रकृति

अपनी ही धुरी पर घूमती

सूर्य का परिभ्रमण करती

तुम थीं, मेरी माँ।

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अच्छी खबर यह है कि महेन्द्र 'नेह' का पैर प्लास्टर से बाहर आए महीना हो चुका है, और वे अब अपने दुपहिया से शहर में आने जाने लगे हैं। हाँ चलने में अभी तकलीफ है। लेकिन फीजियो से व्यायाम करवा रहे हैं। यह कसर भी शीघ्र ही दूर होगी।

शनिवार, 10 मई 2008

प्रोफेशनलिज्म क्या है?

मैं ने, अपनी 28 अप्रेल 2008 की पोस्ट में सवाल किया था कि "क्या चिट्ठाकारों को प्रोफेशनल नहीं होना चाहिए?" इस पोस्ट पर आई 12 टिप्पणियों में से 10 की राय थी कि चिट्ठाकार को प्रोफेशनल होना चाहिए। एक साथी जवाब का इन्तजार के इन्तजार में थे। एक राय यह भी थी कि बेतरतीबी से लगने वाले विज्ञापन चिट्ठों को विज्ञापनों के होर्डिंगों से पाट दिए जाने से असुन्दर हुए नगरों की भांति असुन्दर बना रहे हैं। जिन्हों ने चिट्ठाकार को प्रोफेशनल होने की राय दी थी मुझे लगा कि उन्हों ने भी 'प्रोफेशनलिज्म' को भिन्न भिन्न तरीके से समझा है।
प्रोफेशनलिज्म पर दुनियाँ भर के विद्वानों ने अपने अध्ययन और शोध के आधार पर कुछ मानदण्ड स्थापित करने का यत्न किया है और कुछ सर्वमान्य बिन्दुओं को तलाशा गया है। ग्लासगो विश्वविद्यालय के नैतिक दर्शन में प्रोफेसर रॉबिन डॉनी ने प्रोफेशनलिज्म पर विस्तार से आवश्यक प्रकृति के मौजूदा प्रोफेशनों का अध्ययन कर एक प्रोफेशनल की जरूरी विशेषताओं को छह बिन्दुओं में समेटने का प्रयत्न किया है। उन के द्वारा परिभाषित विशेषताओं का सार संक्षेप इस प्रकार हैं-
  1. प्रोफेशनल को व्यापक ज्ञान पर आधारित दक्षता से सम्पन्न और अपने प्रोफेशन के विषय के कार्यों का विशेषज्ञ होना चाहिए।

  2. प्रत्येक प्रोफेशनल द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं का आधार उस के उपभोक्ताओं से उस का विशेष संबंध है, जिस में जन-कल्याण का संतुलित व अखंडित दृष्टिकोण सन्निहित हो, और जिस में निष्पक्षता व ईमानदारी के साथ-साथ उस की प्रोफेशनल संस्था और आम जनता द्वारा अपेक्षित अधिकार और कर्तव्य सम्मिलित हों।

  3. प्रोफेशनल के कामों का परिणाम हो कि जन कल्याण की नीतियों और न्याय जैसे सामाजिक मामलों पर राय रखने की उस की अधिकारिता को उस के विशिष्ठ सेवार्थियों के साथ-साथ आम जनता भी मान्यता देने लगे।

  4. अपने प्रोफेशनल दायित्वों को निभाते हुए प्रोफेशनल सरकार और वाणिज्य के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रहे।

  5. प्रोफेशनल प्रशिक्षित नहीं अपितु शिक्षित हो, जिस का अर्थ है एक व्यापक और विस्तृत परिप्रेक्ष्य में स्वयं को और अपनी दक्षता को देखने की क्षमता, और मानवीय मूल्यों की सीमा में अपने ज्ञान और कौशल को विकसित करते हुए अपनी इस क्षमता को लगातार निखारना।

  6. एक प्रोफेशनल का अपने काम पर सक्षम अधिकार हो। आम जनता की दृष्टि में विश्वसनीय प्रोफेशनल्स का अपना संगठन हो जो अपने सदस्यों के ज्ञानाधार को विकसित करते रहने और सदस्यों के शिक्षण के लिए सक्रिय रहे और प्रोफेशनल उस के स्वतंत्र और अनुशासित सदस्य के रूप में प्रतिष्ठित हो। इन मानदण्ड़ों पर खरा प्रोफेशनल नैतिकता के उच्च मूल्यों से संम्पन्न होगा और निश्चय ही समाज उसे सम्मान के साथ सुनेगा।

उक्त विशेषताओं को आप चिट्टाकारों की पंचायत के सामने रखते हुए पुनः उसी प्रश्न को दोहरा रहा हूँ, "क्या चिट्ठाकारों को प्रोफेशनल नहीं होना चाहिए?"
........(जारी)

मंगलवार, 6 मई 2008

साँड, मई दिवस और स्त्रियाँ

ज्ञान दत्त पाण्डेय के आलेख "मुन्सीपाल्टी का साँड" पर एक टिप्पणी।

बड़े भाई। आप का कोई वाहन नहीं, आप सफर करते हैं गाड़ी में, और आप के सामने आ गया वाहन। भोलेशंकर समझदार थे उन्हों ने उसे वाहन बनाया था, जिस से वह छुट्टा न घूमे। उन्हें क्या पता था दिन में लोग पांच बार उन्हें जल जरुर चढ़ा देंगे, 24 घंटों जलेरी में रखेंगे, जिस से वे गरम नहीं हों, पर वाहन के मामले में उन का अनुसरण नहीं करेंगे।
सीधे बैठने की हिम्मत न हुई तो उसे गाड़ी में जोत दिया। सदियों तक जोतते रहे। लेकिन वह पिछड़ गया गति में। न गाड़ी में जोता जाता है और न ही हल में। अब वह जाए तो कहाँ जाए। अब इन्सान को मादा की तो जरुरत है, लेकिन नर की नहीं, है भी तो केवल वंश वृद्धि के लिए। कितनों की? जितने मुन्सीपैल्टी दाग देती थी। बाकी का क्या। आप ने सारे रास्ते चौबीस देखे। इस से अधिक तो यहाँ कोटा के शास्त्रीनगर दादाबाड़ी में मिल जाएंगे। कभी कभी तो एक साथ 15 से 20 कतार में एक के पीछे एक, जैसे उन की नस्ल बदल गई , साँड नहीं, मैंढे हो गए हों। अब तो जंगल भी नही जहाँ ये रह सकते हों। गौशालाएँ गउओं के लिए भी कम पड़ती हैं।
मई दिवस तो शहादत का दिन है। लेकिन अक्सर शहादतों को पीछे से दलालों ने भुनाया है। वे भुनाएंगे। क्यो कि शोषण का चक्र जारी है। शोषक को दलाल की जरूरत है। शोषितों की मुक्ति के हर प्रतीक को वे बदनाम कर देना चाहते हैं, जिस से कोई इन शहादतों से प्रेरणा नहीं ले सके। लेकिन मुक्ति तो मानव का अन्तिम लक्ष्य है। कितनी ही कोशिशें क्यों न कर ली जाएं, मानव को मुक्त तो होना ही है। एक प्रतीक टूटेगा तो नया बनेगा। मानव को इस जाल से मुक्ति नहीं मिलेगी, तो सम्पूर्ण मानवता ही नष्ट हो लेगी।
घरों में बन्द स्त्रियाँ बाहर आ रही हैं, तेजी से पुरुषों के सभी काम खुद सम्भालने को तत्पर हैं। अभी भी अनेक पुरुष पी-कर, खा-कर सिर्फ जुगाली करते हैं। धीरे धीरे इन की संख्या भी बढ़ रही है। विज्ञान संकेत दे रहा है कि प्रजनन के लिए भी पुरुषों की जरुरत नहीं। कहीं ये छुट्टे घूमते साँड मानव पुरुषों के भविष्य का दर्शन तो नहीं हैं।