@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: महाजनी सभ्यता
महाजनी सभ्यता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महाजनी सभ्यता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

महाजनी सभ्यता ----- मुंशी प्रेमचन्द भाग-2

मुंशी जी के जन्मदिन 31 जुलाई को मैं ने अफसोस जाहिर किया था कि मैं उस दिन उन का एक महत्वपूर्ण आलेख "महाजनी सभ्यता" को जो अंतर्जाल पर उपलब्ध नहीं है, अनवरत पर लाना चाहता था। लेकिन पुस्तक नहीं मिल सकने के कारण ऐसा नहीं कर सका। मैं प्रेमचन्द जयन्ती नहीं मना सका था। लेकिन कल अपना कार्यालय पुनर्व्यवस्थित करने के दौरान पुस्तक मुझे मिल गयी और मैं उसे अंतर्जाल पर ले आने में सफल हो गया हूँ। इस आलेख के दो भाग हैं। मैं इन्हें एक-एक कर प्रस्तुत कर रहा हूँ। कल आप ने प्रथम भाग पढ़ा आज दूसरा और अंतिम भाग प्रस्तुत है। 

महाजनी सभ्यता
  • मुंशी प्रेमचन्द
 स सभ्यता का दूसरा सिद्धांत है - 'Business is business' अर्थात व्यवसाय व्यवसाय है। उस में भावुकता के लिए गुंजाइश नहीं है। पुराने जीवन सिद्धान्त में वह लट्ठमार साफगोई नहीं है, जो निर्लज्जता कही जा सकती है और जो इस नवीन सिद्धान्त की आत्मा है। जहाँ लेन देन का सवाल है, रुपये पैसे का मामला है, वहाँ न दोस्ती का गुजर है, न मुरौवत का, न इन्सानियत का, बिजनेस में दोस्ती कैसी, जहाँ किसी ने इस सिद्धान्त की आड़ ली और आप लाजवाब हुए, फिर आप की जबान नहीं खुल सकती। एक सज्जन जरूरत से लाचार हो कर अपने किसी महाजन मित्र के पास जाते हैं और चाहते हैं कि वह कुछ मदद करे। यह भी आशा रखते हैं कि शायद दर में वह कुछ रियायत कर दे, पर जब देखते हैं कि यह सहानुभूति मेरे साथ भी वही कारोबारी बर्ताव कर रहे हैं, तो कुछ रियायत की प्रार्थना करते हैं, मित्रता और घनिष्ठता के आधार पर आँखों में आँसू भर कर बड़े करुण स्वर में कहते हैं- महाराज,  मैं इस समय बड़ा परेशान हूँ, नहीं तो आप को कष्ट नहीं देता, ईश्वर के लिए मेर हाल पर रहम कीजिये। समझ लीजिए कि एक पुराने दोस्त ..... वहीं बात काट कर आज्ञा के स्वर में फरमाया जाता है लेकिन जनाब, आप 'बिजनेस इज बिजनेस' भूल जाते हैं। उस दिन कातर प्रार्थी पर मानों बम का गोला गिरा। अब उस के पास कोई तर्क नहीं, कोई दलील नहीं। चुपके से उठ कर वह अपनी राह लेता है या फिर अपने व्यवसाय सिद्धान्त के भक्त मित्र की सारी शर्तें कबूल कर लेता है।
हाजनी सभ्यता ने दुनिया में जो नयी रीति नीतियाँ चलाई हैं, उस में सब से अधिक और रक्त पिपासु यही व्यवसाय वाला सिद्धान्त है। मियाँ-बीबी में बिजनेस; बाप-बेटे में बिजनेस; गुरू-शिष्य में बिजनेस। सारे मानवी, आध्यात्मिक और सामाजिक नेह-नाते समाप्त, आदमी-आदमी के बीच बस कोई लगाव है, तो बिजनेस का। लानत है इस बिजनेस पर !  लड़की अगर दुर्भाग्यवश क्वाँरी रह गयी और अपनी जीविका का कोई उपाय न निकाल सकी तो बाप के घर में ही लोंडी बन जाना पड़ता है। यों लड़के-लड़कियाँ सभी घरों में काम-काज करते ही हैं, पर उन्हें कोई टहलुआ नहीं समझता, पर इस महाजनी सभ्यता में लड़की एक खास उम्र के बाद लोंडी और अपने भाइयों की मजदूरनी हो जाती है। पूज्य पिताजी भी अपने पितृभक्त बेटे के टहलुए बन जाते हैं और माँ अपने सपूत की टहलुई, स्वजन-सम्बन्धी तो किसी गिनती में ही नहीं। भाई भी भाई के घर आए तो मेहमान है। अक्सर तो उसे उस मेहमानी का बिल भी चुकाना पड़ता है। इस सभ्यता की आत्मा है व्यक्तिवाद, आपस्वार्थी बनें, सब कुछ अपने लिए करें।
र यहाँ भी हम किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते। वही मान प्रतिष्ठा, वही भविष्य की चिन्ता, वही अपने बाद बीवी-बच्चों के गुजर का सवाल, वही नुमाइश और दिखावे की आवश्यकता हर एक की गरदन पर सवार है, और वह हल नहीं सकता। वह इस सभ्यता के नीति-नियमों का पालन न करे तो उस का भविष्य अन्धकारमय है।
अब तक दुनिया के लिए इस सभ्यता की रीति-नीति का अनुसरण करने के सिवा और कोई उपाय न था, उसे झक मार कर उस के आदेशों के सामने सिर झुकाना पड़ता था। महाजन अपने जोम में फूला फिरता था। सारी दुनिया उस के चरणों पर नाक रगड़ रही थी, बादशाह उस का बन्दा वजीर उस के गुलाम, सन्धि-विग्रह की कुंजी उस के हाथ में, दुनिया उस की महत्वाकांक्षाओं के सामने सिर झुकाये हुए, हर मुलक में उस का बोल बाला।
रन्तु अब नई सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम से उदय हो रहा है, जिस ने इस नारकीय महाजनवाद या पूंजीवाद की जड़ खोद कर फैंक दी है, जिस का मूल सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो अपने शरीर या दिमाग से मेहनत कर के कुछ पैदा कर सकता है, राज्य और समाज का परम सम्मानित सदस्य हो सकता है और जो केवल दूसरों की मेहनत या बाप-दादों के जोड़े हुए धन पर रईस बना फिरता है, वह पतिततम प्राणी है। उसे राज्य प्रबन्ध में राय देने का कोई हक नहीं और वह नागरिकता के अधिकारों का भी पात्र नहीं, महाजन इस नई लहर से अति उद्विग्न हो कर बौखलाया हुआ फिर रहा है और सारी दुनिया के महाजनों की शमिल आवाज इस ई सभ्यता को कोस रही है, उसे शाप दे रही है, व्यक्ति स्वातंत्र्य, धर्म-विश्वास की स्वाधीनता, अपनी अन्तरात्मा के आदेश पर चलने की आजादी-वह इन सब की घातक, गला घोंट देने वाली बताई जा रही है। उन सभी साधनों से जो पैसे वालों के लिए सुलभ हैं, काम ले कर उस के विरुद्ध प्रचार किया जा रहा है; पर सचाई जो इस सारे अंधकार को चीर कर दुनिया में य़अपनी ज्योति का उजाला फैला रही है। 
निस्सन्देह इस नई सभ्यता ने व्यक्ति स्वातंत्र्य के पंजे, नाखून  और दांत तोड़ दिए हैं। उस के राज्य में एक पूंजीपति लाखों मजदूरों का खून पी कर मोटा नहीं हो सकता। उसे अब यह आजादी नहीं कि अपने नफे के लिए साधारण आवश्यकता की वस्तुओं के दाम चढ़ा सके, दूसरे अपने माल की खपत कराने के लिए युद्ध करा दे, गोला-बारूद और युद्ध सामग्री बना कर दुर्बल राष्ट्रों का दमन कराये। अगर इस की स्वाधीनता ही स्वाधीनता है तो निस्सन्देह नई सभ्यता में स्वाधीनता नहीं पर यदि स्वाधीनता का अर्थ यह है कि जनसाधारण को हवादार मकान, पुष्टिकर भोजन, साफ-सुथरे गाँव, मनोरंजन और व्यायाम सुविधाएँ, बिजली के पंखे और रोशनी, सस्ता और सद्य सुलभ  न्याय की प्राप्ति हो तो इस समजा की व्यवस्था में जो स्वाधीनता और आजादी है, वह दुनिया की किसी सभ्यतम कहाने वाली जाति को भी सुलभ नहीं है। धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ अगर पुरोहितों, पादरियों, मुल्लाओं की मुफ्तखोरी जमात के दंभमय उपदेशों और अन्ध विश्वास-जनित रूढ़ियों का अनुसरण है तो वहाँ निस्सन्देह वहाँ पर इस स्वातंत्र्य का अभाव है। पर धर्म स्वातंत्र्य का अर्थ यदि लोक सेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनीयती, शरीर और मन की पवित्रता है तो इस सभ्यता में धर्माचरण की जो स्वाधीनता है, और देश को उस के दर्शन भी नहीं हो सकते।
हाँ धन की कमी-बेशी के आधार पर असमानता है वहाँ ईर्ष्या, जोर-जबरदस्ती, बेईमानी, झूठ, मिथ्या अभियोग-आरोप, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार और सारी दुनिया की बुराइयाँ अनिवार्य रूप से मौजूद हैं। जहाँ धन का आधिक्य नहीं, अधिकांश मनुष्य एक जैसी स्थिति में हैं, वहाँ जलन क्यों हो और जब्र क्यों हो और सतीत्व-विक्रय क्यों हो, झूठे मुकदमे क्यों चलें, और चोरी डाके की वारदातें क्यों हों। यह सारी बुराइयाँ तो दौलत की देन हैं, पैसे के प्रसाद हैं, महाजनी सभ्यता ने इन की सृष्टि की है। वही इन को पालती है और वही यह भी चाहती है कि जो दलित, पीड़ित और विजित हैं, वे इसे ईश्वरीय विधान समझ कर अपनी स्थिति से सन्तुष्ट रहें। उन की ओर से तनिक भी विरोध-विद्रोह का भाव दिखाया गया, तो उन के सिर कुचलने के लिए पुलिस है, अदालत है, कालापानी है। आप शराब पी कर उस के नशे से बच नहीं सकते। आग लगा कर चाहें लपट न उठे, असम्भव है। पैसा अपने साथ यह सारी चीजें लाता है, जिन्हों ने दुनिया को नर्क बना दिया है। इस पैसा-पूजा को मिटा दीजिए, सारी बुराइयाँ अपने आप मिट जायेंगी, जड़ खोद कर केवल फुनगी की पत्तियाँ तोड़ना बेकार है। यह नयी सभ्यता धनाड्यता को हेय, लज्जाजनक तथा घातक विष समझती है। वहाँ कोई आदमी अमीरी ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है, गहनों से लदकर कोई स्त्री सुंदर नहीं बनती, घृणा का पात्र बनती है। साधारण जनसमाज से ऊँचा रहन-सहन रखना वहाँ बेहूदगी समझी जाती है। शराब पी कर वहाँ बहका नहीं जा सकता, अधिक मद्यपान वहाँ दोष समझा जाता है, धार्मिक दृष्टि से नहीं, किन्तु शुद्ध सामाजिक दृष्टि से, क्यों कि शराबखोरी से आदमी में धैर्य और कष्ट-सहन, अध्यवसाय और श्रमशीलता का अंत हो जाता है।
हाँ, इस समाज-व्यवस्था ने व्यक्ति को यह स्वाधीनता नहीं दी है कि वह जनसाधारण को अपनी महत्वाकांक्षाओं की तृप्ति का साधन बनाए और तरह-तरह के बहानों से उन की मेहनत का फायदा उठाए या सरकारी पद प्राप्त कर के मोटी-मोटी रकमें उड़ाये और मूँछों पर ताव देता फिरे। वहाँ ऊँचे से उँचे अधिकारी की तनख्वाह भी उतनी ही है, जितनी एक कुशल कारीगर की, वह गगन-चुम्बी प्रासादों में नहीं रहता, तीन-चार कमरों में ही उसे गुजर-बसर करना पड़ता है। उस की श्रीमती जी रानी साहिबा या बेगम बनी हुई स्कूलों में ईनाम बाँटती नहीं फिरतीं, बल्कि अक्सर मेहनत-मजदूरी या किसी अखबार के दफ्तर में काम करती हैं। सरकारी पद पा कर वह अपने को लाटसाहब नहीं बल्कि जनता का सेवक समझता है। महाजनी सभ्यता का प्रेमी इस समाज व्यवस्था को क्यों पसन्द करने लगा जिस से उसे दूसरों पर हुकूमत जताने के लिए सोने-चांदी के ढेर लगाने की सुविधाएँ नहीं है ? पूंजीपति और जमींदार तो इस सभ्यता की कल्पना से ही काँप उठते हैं। उन की जूड़ी का कारण हम समझ सकते हैं पर जब वह लोग भी उस की खिल्ली उड़ाने और उस पर फब्तियाँ कसने लगते हैं तो अनजान में महाजनी सभ्यता का उल्लू सीधा कर रहे हैं, तो हमें उन की दास-मनोवृत्ति पर हँसी आती है। जिस में मनुष्यता, आध्यात्मिकता, उच्चता और सौंदर्यबोध है, वह कभी ऐसी समाज व्यवस्था की सराहना नहीं कर सकता, जिस की नींव लोभ-स्वार्थपरता और दुर्बल मनोवृत्ति पर खड़ी हो। ईश्वर ने तुम्हें विद्या और कला की सम्पत्ति दी है तो उस का सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे जन समाज की सेवा में लगाओ, यह नहीं कि उश से जन समाज पर हुकूमत चलाओ, उस का खून चूसो और उसे उल्लू बनाओ।
न्य है वह सभ्यता, जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी ही या देर से दुनिया उस का, पदानुसरण अवश्य करेगी, यह सभ्यता अमुक देश की समाज रचना अथवा धर्म-मजहब से मेल नहीं खाती या उस वातावरण के अनुकूल नहीं है, यह तर्क नितांत असंगत है। ईसाई मजहब का पौधा यरूसलम में उगा और सारी दुनिया उस के सौरभ से बस गयी, बौद्ध धर्म ने उत्तर भारत में जन्म ग्रहण किया और आधी दुनिया ने उसे गुरूदक्षिणा दी। मानव समाज अखिल विश्व में एक ही है। छोटी-मोटी बातों में अन्तर हो सकता है, पर मूल स्वरूप की दृष्टि से मानवजाति में कोई भेद नहीं। जो शासन विधान और समाज व्यवस्था एक देश के लिए कल्याणकारी है, वह दूसरे देश के लिए भी हितकारी होगी। हाँ महाजनी सभ्यता और उस के गुर्गे अपनी शक्ति भर उस का विरोध करेंगे, उस के बारे में भ्रमजनक प्रचार करेंगे, जनसाधारण को बहकायेंगे, उस की आँखों में धूल झोंकेंगे, पर जो सत्य है, एक न एक दिन उस की विजय होगी और अवश्य होगी। (समाप्त)  

महाजनी सभ्यता ----- मुंशी प्रेमचन्द भाग-1

मुंशी जी के जन्मदिन 31 जुलाई को मैं ने अफसोस जाहिर किया था कि मैं उस दिन उन का एक महत्वपूर्ण आलेख "महाजनी सभ्यता" को जो अंतर्जाल पर उपलब्ध नहीं है, अनवरत पर लाना चाहता था। लेकिन पुस्तक नहीं मिल सकने के कारण ऐसा नहीं कर सका। मैं प्रेमचन्द जयन्ती नहीं मना सका था। लेकिन कल अपना कार्यालय पुनर्व्यवस्थित करने के दौरान पुस्तक मुझे मिल गयी और मैं उसे अंतर्जाल पर ले आने में सफल हो गया हूँ। इस आलेख के दो भाग हैं। मैं इन्हें एक-एक कर प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्रथम भाग प्रस्तुत है।

महाजनी सभ्यता
  • मुंशी प्रेमचन्द
जागीरदारी सभ्यता में बलवान भुजाएँ और मजबूत कलेजा जीवन की आवश्यकताओं में परिगणित थे और साम्राज्यवाद में बुद्धि और वाणी के गुण तथा मूक आज्ञापालन उन के आवश्यक साधन थे, पर उन दोनों स्थितियों में दोषों के साथ कुछ गुण भी थे। मनुष्य के अच्छे भाव लु्प्त नहीं हुए थे। जागीरदार अगर दुश्मन के खून से प्यास बुझाता था, तो अक्सर अपने किसी मित्र या उपकारक के लिए जान की बाजी भी लगा देता था। बादशाह अगर अपने हुक्म को कानून समझता था और उस की अवज्ञा को कदापि सहन नहीं कर सकता था, तो प्रजापालन भी करता था, न्यायशील भी होता था। दूसरे के देश पर चढ़ाई या तो किसी अपमान-अपकार का बदला फेरने के लिए करता था या अपनी आन-बान, रोब-दाब कायम रखने के लिए या फिर देश विजय और राज्य विस्तार की वीरोचित महत्वाकांक्षा से प्रेरित होता था। उस की विजय का उद्देश्य प्रजा का खून चूसना कदापि न होता था। कारण यह कि राजा और सम्राट जनसाधारण को स्वार्थसाधन और धन शोषण की भट्टी का ईंधन न समझते थे, किन्तु उन के दुख-सुख में शरीक होते थे और उन के गुण की कद्र करते थे। 
गर इस महाजनी सभ्यता में सारे कामों की गरज महज पैसा होती है। किसी देश पर राज्य किया जाता है, तो इसलिए कि महाजनों-पूंजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा नफा हो। इस दृष्टि से मानो आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है। मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं। इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं, जरा भी रुरियायत नहीं। उस का अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाय। अधिक दुख की बात तो यहग है कि शासक वर्ग के विचार और सिद्धान्त शासित वर्ग के भीतर भी समा गये हैं, जिस का फल यह हुआ है कि हर आदमी अपने को शिकारी समझता है और उस का शिकार है समाज। वह खुद समाज से बिलकुल अलग है, अगर कोई संबंध है तो यह कि किसी या युक्ति से बस समाज को उल्लू बनाये और उस से जितना लाभ उठाया जा सकता हो, उठा ले।
न लोभ ने मानव भावों को पूर्ण रूप से अपने आधीन कर लिया है। कुलीनता और शराफत, गुण और कमाल की कसौटी पैसा है।  जिस के पास पैसा है, देवता स्वरूप है, उस का अंतःकरण कितना ही काला क्यों न हो। साहित्य, संगीत, कला सभी धघन की देहली पर  माथा टेकने वालों में है। यह हवा इतनी जहरीली हो गयी है कि इस में जीवित रहना कठिन होता जा रहा है। डॉक्टर और हकीम है कि वह बिना लम्बी फीस लिए बात नहीं करता। वकील और बैरिस्टर है कि वह मिनटों को अशर्फियों से तौलता है। गुण और योग्यता की सफलता उस के आर्थिक मूल्य के हिसाब से मानी जा रही है। मौलवी साहब और पण्डित जी भी पैसे वालों के बिना पैसों के गुलाम हैं, अखबार उन्हीं का राग अलापते हैं। इस पैसे ने आदमी के दिलो-दिमाग पर इतना कब्जा जमा लिया है  कि उस के राज्य पर किसी ओर से भी आक्रमण करना कठिन दिखाई देता है। वह दया और स्नेह, सचाई और सौजन्य का पुतला मनुष्य दया-ममता शून्य जड़ यन्त्र बन कर रह गया है।  इस महाजनी सभ्यता ने नये नये नीति नियम गढ़ लिए हैं जिन पर आज समाज व्यवस्था चल रही है, उन में एक यह है कि समय ही धन है, पहले समय जीवन था, उस का सर्वोत्तम उपयोग विद्या-कला का अर्जन अथवा दीन-दुखी जनों की सहायता था। अब उस का सब से बड़ा सदुपयोग पैसा कमाना है। डॉक्टर साहब हाथ मरीज की नब्ज पर रखते हैं और निगाह घड़ी की सुई पर, उन का एक-एक मिनट एक-एक अशर्फी है। रोगी ने अगर एक अशर्फी नजर की है तो वह उसे मिनट से ज्यादा वक्त नहीं दे सकते, रोगी अपनी दुखगाथा सुनाने के लिए बैचेन है, पर डॉक्टर साहब का उधर बिलकुल ध्यान नहीं, उस से उन्हें जरा भी दिलचस्पी नहीं। उन की निगाह में उस व्यक्ति का अर्थ केवल इतना ही है, कि वह उन्हें फीस देता है। वह जल्द से जल्द नुस्खा लिखेंगे औऱ दूसरे रोगी को देखने चले जाएंगे। मास्टर साहब पढ़ाने आते हैं, उन का एक घंटा वक्त बंधा है। वह घड़ी सामने रख लेते हैं। जैसे ही घंटा पूरा हुआ, वह उठ खड़े हुए। लड़के का सबक अधूरा रह गया है तो रह जाय, उन की बला से, वह घंटे से अधिक समय कैसे दे सकते हैं? क्यों कि समय रूपया है। इस धन-लोभ ने मनुष्यता और मित्रता का नाम शेष कर डाला है। पति को पत्नी या लड़कों से बात करने की फुर्सत नहीं, मित्र और सम्बन्धी किस गिनती में हैं। जितनी देर वह बात करेगा, उतनी देर में तो कुछ कमा लेगा, कुछ कमा लेना ही जीवन की सार्थकता है, शेष सब कुछ समय का नाश है। बिना खाए-सोये काम नहीं चलता, बेचारा लाचार है और इतना समय नष्ट करना पड़ता है। 
प का कोई मित्र या सम्बन्धी अपने नगर में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है, तो समझ लीजिए, उस के यहाँ आप की रसाई मुमकिन नहीं। आप को उस के दरे दौलत पर जा कर कार्ड भेजना होगा, उन महाशय को बहुत से काम होंगे, मुश्किल से आप से एक दो बातें करेंगे या साफ जवाब दे देंगे कि आज फुरसत नहीं है। अब वे पैसे के पुजारी हैं, मित्रता और शील-संकोच के नाम पर कब की तिलांजलि दे चुके हैं।
प का कोई दोस्त वकील है और आप किसी मुकदमे में फँस गए हैं, तो उस से किसी तरह की सहायता की आशा न रखिए, अगर वह मुरौवत को गंगा में न डुबो चुका है, तो आप से लेन-देन की बात शायद न करेगा, परक आप के मुकदमे की ओर तनिक भी ध्यान न देगा, इस से तो कहीं अच्छा है कि आप किसी अपरिचित के पास चले जाँय और उस की पूरी फीस अदा करें। ईश्वर न करे कि आज किसी को किसी चीज में कमाल हासिल हो जाय, फिर मनुष्यता नाम को न रह जायेगी, उस का एक-एक मिनट कीमती हो जाएगा। 
स का अर्थ यह नहीं कि व्यर्थ की गपशप में समय नष्ट किया जाय, पर यह अर्थ अवश्य है कि धन-लिप्सा को इतना बढ़ने न दिया जाय कि वह मनुष्यता-मित्रता-स्नेह-सहानुभूति सब को निकाल बाहर करे। 
र आप उस पैसे के गुलाम को बुरा नहीं कह सकते। सारी दुनिया जिस प्रवाह में बह रही है, वह भी उसी में बह रहा है, मान-प्रतिष्ठा सदा से मानवीय आकांक्षाओं का लक्ष्य रहा है। जब विद्या कला मान-प्रतिष्ठा का साधन थी, उस समय लोग इन्हीं का अभ्यास अर्जन करते थे। जब धन उस का एक मात्र उपाय है तब मनुष्य मजबूर है कि एक निष्ठ भाव से उसी की उपासना करे। वह कोई साधु-महात्मा-सन्यासी-उदासी नहीं, वह देख रहा है कि उस के तपेशे में जो सौभाग्यशाली सफळता की कठिन यात्रा पूरी कर सके हैं, वह उसी राज-मार्ग के पथिक थे, जिस पर वह खुद चल रहा है। समय धन है एक सफल व्यक्ति का, वह इस सिद्धान्त का अनुसरण करते देखता है, फिर वह भी उसी के पद चिन्हों का अनुसरण करता है, तो उस का क्या दोष? मान-प्रतिष्ठा की लालसा तो दिल से गिरायी नहीं जा सकती। वह देख रहा कि जिन के पास दौलत नहीं और जिन्हों ने वक्त को दौलत नहीं समझा, उन को कोई पूछने वाला नहीं। वह अपने पेशे में उस्ताद है फिर भी उन की कहीं पूछ नहीं। जिस आदमी में तनिक भी जीवन की आकांक्षा है, वह तो उपेक्षा की स्थिति को सहन नहीं कर सकता। उसे तो मुरौवत, दोस्ती और सौजन्य को धता बता कर लक्ष्मी की आराधना में अपने को लीन कर देना होगा, तभी इस देवी का वरदान उसे मिलेगा, और यह इच्छाकृत कार्य नहीं किन्तु सर्वथा बाध्यकारी है। उस के मन की अवस्था अपने आप कुछ इस तरह की हो गयी है कि उसे धनार्जन के सिवा और किसी कार्य से लगाव नहीं रहा। अगर उसे किसी सभा या व्याख्यान में आधा घंटा बैठना पड़े, तो समझ लो, वह कैद की घड़ी काट रहा है। उस की सारी मानसिक, भावगत और सास्कृतिक दिलचस्पियाँ इसी केन्द्र बिन्दु पर आ कर एकत्रित हो गयी हैं, और क्यों न हों? वह देख रहा है, कि पैसे के सिवा उस कोई अपना नहीं, स्नेही मित्र भी अपनी गरज ले कर ही उस के पास आते हैं, स्वजन सम्बन्धी भी उस के पैसे के ही पुजारी हैं। वह जानता है कि अगर वह निर्बल होता तो वह जो दोस्तों का जमघट लग रहा है, उस में एक के भी दर्शन न होते, इन स्वजन सम्बन्धियों में से एक भी पास न फटकता, उसे समाज में अपनी एक हैसियत बनानी है, बुढ़ापे के लिए कुछ बचाना है, लड़कों के लिए कुछ कर जाना है जिस से उन्हें दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें। इस निष्ठुर, सहानुभूति शून्य स्थिति का उसे पूरा अनुभव है। अपने लड़कों को वह उन कठिन अवस्थाओं में पड़ने नहीं देना चाहता, जो सारी आशाओं उमंगों पर पाला गिरा देती हैं, हिम्मत-हौंसले को तोड़ कर रख देती हैं। उसे वह सारी मंजिलें जो एक साथ जीवन के आवश्यक अंग हैं, खुद तय करनी होंगी और जीवन को व्यापार के सिद्धान्तों पर चलाये बिना वह इन में से एक भी मंजिल पार नहीं कर सकता।