@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: 2025

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

खाई

"लघुकथा" : दिनेशराय द्विवेदी

शहर में हुई ताज़ा बड़ी रैली के बाद, हवा का स्वाद बदल सा गया था. चाय की दुकान पर आवाज़ें ऊँची थीं, और व्हाट्सएप ग्रुप्स नोटिफिकेशन की बौछार से भरे हुए थे. रैली शांतिपूर्ण रही थी, पर उसके बाद मोहल्ले में एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे किसी आने वाली आंधी या तूफान की सूचना दे रहा हो.

अनन्या और ज़रीना हमेशा की तरह उस शाम छत पर बैठी थीं, इस साल उन्हें सैकण्डरी बोर्ड की परीक्षा देनी थी. बोर्ड के नाम का बड़ा आतंक था. उन्हें चिन्ता थी कि वे इस रेखा को ठीक से पार कर पाएंगी या नहीं. सात साल की दोस्ती उनकी आवाज़ों में, उनकी हँसी में रच-बस गई थी.

"कल से तेरे घर पढ़ना पड़ेगी" ज़रीना ने कहा, "मेरी अम्मी बीमार हैं."

"ठीक है," अनन्या ने इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया.

रात के खाने की मेज पर भाई विक्रम का चेहरा उत्तेजना से चमक रहा था. "आज तो लोगों की आँखें खुल गई होंगी! हमें अपने लोगों की सुरक्षा खुद करनी होगी." पिताजी मौन सिर हिला रहे थे.

तभी विक्रम का ध्यान अनन्या पर गया. "सुन, कल से उस ज़रीना को घर मत बुलाना."

"क्यों भैया? हमें साथ पढ़ना है," अनन्या हैरानी से बोली.

"उनकी संस्कृति अलग है, अनन्या. हम नहीं जानते उनके मन में क्या चल रहा है."

अनन्या को उसकी आवाज़ में एक नई, कठोर निश्चय की ध्वनि सुनाई दी. सुन कर अनन्या का गला सूख गया. "पर... वह तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है."

पिताजी ने आवाज़ दबाकर कहा, "बेटे, विक्रम की बात मान लो. तुझे कुछ हो गया तो? हमारी इज्ज़त का क्या होगा? उनसे दूर ही रहना ठीक है."

इज्ज़त शब्द हवा में झूल गया, जैसे कोई भारी पत्थर है और कभी भी उसके सिर पर गिर पड़ेगा.

अगले दिन जब ज़रीना किताबें लेकर आई, तो अनन्या ने दरवाज़ा आधा खोला. "ज़री... आज मैं ठीक नहीं हूँ. सिर दर्द है. तू चली जा."

ज़रीना की मासूम आँखों में चिंता तैर गई. "अच्छा? ठीक है... दवा ले लेना. पढ़ नहीं पाई तो परीक्षा कैसे देगी." उसने अपने बैग से चॉकलेट की एक पट्टी निकाली और अनन्या के हाथ में थमा दी, फिर चली गई.

दरवाज़ा बंद करते हुए अनन्या के हाथ काँप रहे थे. वह जो सिर्फ ज़रीना थी. उसकी हँसी, उसकी शैतानियाँ, उसके रहस्य, अचानक सब 'संभावित खतरा' बन गए थे. वह उसका चेहरा भूल रही थी, पर भैया के शब्द, "उनके मन में क्या चल रहा हैं," उसके कानों में गूँज रहे थे. पहली बार, उसने अपनी ही सहेली से तनिक भय महसूस किया. उसके सारे शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी. फिर एक लंबी सांस अपने अंदर खींच कर उसने अपने विश्वास को मजबूत किया कि प्यारी सी ज़रीना उसके लिए खतरे का बायस कैसे बन सकती है.

एक हफ़्ते तक बहानेबाजी करती रही. फिर एक दिन, स्कूल गेट पर, ज़रीना ने उसका रास्ता रोक लिया.
"तू मुझसे नाराज़ है क्या? मैंने कुछ गलत कहा?"

"नहीं... बस... अब हम बड़े हो गए हैं. अलग-अलग रहना चाहिए."

ज़रीना स्तब्ध रह गई. उसकी आँखों की चमक धूमिल पड़ गई. "क्या मतलब? 'अलग' क्यों?"

एक क्षण के लिए स्तब्धता ने उसे रोका. फिर उसने धीरे से सवाल कर ही लिया, "क्योंकि मैं मुस्लिम हूँ?"

अनन्या मौन रह गयी. लेकिन उसके इस मौन ने उसे बहुत कुछ कह दिया था.

ज़रीना के चेहरे पर आघात, और फिर एक ठंडी, दुखद समझदारी उभरी.

"समझ गई. तेरे भैया ने कहा होगा न? मैंने सुना है उसका भाषण." वह एक कदम पीछे हटी, जैसे कोई अदृश्य रेखा खींच रही हो. "ठीक है. तू सुरक्षित रह."

और फिर सब कुछ थम गया.

अब अनन्या अपनी खिड़की से कभी-कभी ज़रीना के घर की ओर देखती है, जहाँ वह अपनी छत पर अकेली बैठी रहती है. पहले जहाँ दोनों के बीच एक खुला आंगन था, साझी हँसी थी, अब दो घरों के बीच की सड़क, अब सड़क नहीं रह गयी थी. वहाँ रातों रात एक गहरी खाई बन गयी थी, एक अदृश्य खाई. उसे लगता कि वह कभी इस खाई के पार न जा सकेगी. बहुत सारे लोगों को यह खाई कभी नहीं दिखी. वे इस पार से उस पार आते जाते रहे. पर यह खाई हर पल अनन्या के ज़ेहन में मौजूद थी.

एक शाम, अपना बैग खंगालते हुए अनन्या को चॉकलेट की पट्टी हाथ लगी. इसे ज़रीना ने उसे दिया था और वह बैग में डाल कर भूल गयी थी. उस पर ज़रीना ने ख़ुश ख़त में लिखा था, "हमेशा तेरी दोस्त."

जैसे ही अनन्या के हाथ ने उस चॉकलेट की पट्टी को छुआ, वैसे ही उसके अंतर से 'कुछ हो जाने' का डर पता नहीं काफूर हो गया. डर केवल उसे दिखाया गया था, वह कभी आया ही नहीं. कोई अनहोनी नहीं हुई. उलटा, कुछ और ही 'हो गया' था. उसकी दुनिया सिमट गई थी. उसके मन की कोमल पंखुड़ियों के बीच संदेह के काँटे उग आए थे. उसकी सबसे कीमती चीज़, निश्छल और बिना शर्त दोस्ती टूटकर बिखर गई थी.

उस रात अनन्या जब अपने कमरे में बिलकुल अकेली रह गयी, बहुत कुछ सोचती रही. फिर अचानक वह उठी, पानी के अधभरे गिलास में अपनी उंगली डुबोई और अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर उँगली से एक शब्द लिखा: "क्यों?"

उस रात उसका पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगा. वह ठीक से सो भी नहीं सकी. जैसे ही सुबह की रोशनी ने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया. उनींदी सी वह उठी और उसने खिड़की खोल दी. उसे चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दी. सामने की छत पर ज़रीना टहल रही थी. उसके मन ने बस चाहा कि ज़रीना उसे देखे. तभी ज़रीना ने उसकी खिड़की की और देखा. दोनों की निगाहें मिलीं. उसने ज़रीना की ओर अपना हाथ हिलाया. ज़रीना ने भी अपना हाथ हिला कर जवाब दिया. दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी. अनन्या ने महसूस किया कि उनके बीच की सड़क पर कभी कोई खाई थी ही नहीं.

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

साँस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
मैंने साँस अन्दर खींची, जितनी हवा मैं अपने फेफड़ों में भर सकता था भर ली. जो फेफड़ों में भरी गयी थी, वह सिर्फ हवा नहीं थी. उसके साथ एक कठोर नियम था, पिताजी का वह वाक्य "लड़के रोते नहीं". वह मेरे फेफड़ों में भरी गयी हवा के निकल जाने के बाद भी अंदर रह गया था. पहले मेरे फेफड़ों में और फिर मेरे खून में घुल कर मेरी रग-रग में समा गया. बारह साल की उम्र तक आते-आते, जब भी जरूरत होती मुझे मेरे अंदर से सुनाई देने लगता.

प्रिया, मेरी बहन तब चौदह की थी. उसने साइकिल चलानी सीखनी चाही. हमारे छोटे से शहर की उस सड़क पर, जहाँ मैं और मेरे दोस्त बिना किसी डर के पूरे दिन साइकिलों पर उड़ान भरते थे, लड़कियाँ कभी साइकिल चलाते नहीं दिखीं. वे सीखते हुए दिखतीं, फिर कुछ दिनों बाद उनकी साइकिल गायब हो जातीं.प्रिया के लिए पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति प्राप्त कर लेना एक संघर्ष था.

"लड़कियाँ इतनी दूर साइकिल पर नहीं जातीं," माँ ने कहा, आँखें नीची किए. "लोग क्या कहेंगे?" 'लोग'... हमारे घर की चौथी दीवार थे, जिसमें उन लोगों के कान और आँखें चिपकी थीं, जो कभी नहीं दिखते थे पर हर वक्त, हर जगह मौजूद रहते थे.

पिताजी ने एक वाक्य में फैसला सुना दिया: "ज़रूरत नहीं है।"

प्रिया की आँखों में वह चमक, जो सवाल पूछते वक्त होती थी, धुंधली पड़ गई। मैंने देखा. पर मैं चुप रहा. मेरे अंदर का लड़का जिसने रोने पर जीत हासिल कर ली थी, वह मुझे यही सिखाता था, चुप रहो. यह तुम्हारी लड़ाई नहीं है.

फिर मैं सोलह का हो गया. स्कूल की बास्केटबॉल टूर्नामेंट की फाइनल मैच. पूरे हफ़्ते की प्रैक्टिस, पसीना, और एक जुनून था जो मेरे अंदर भर गया था। आखिरी सेकंड. स्कोर बराबर. मैंने शॉट लगाया. गेंद रिम पर घूमी... और बाहर गिर गई. मेरी टीम जीत नहीं सकी, मैच बराबरी पर छूटा.

सुनसान जिम में, मेरे साथियों के झुंड के बीच, एक अजीब सी जलन मेरी आँखों के पीछे उभरी. मेरा गला रुंधने लगा. मैंने तुरंत सिर झुका लिया. लड़के रोते नहीं. मेरे अंदर का लड़का कहीं टूटने को था.

लेकिन फिर एक हाथ मेरे कंधे पर पड़ा. हमारी टीम के कप्तान राहुल का, जो ग्यारहवीं में था और जिसे मैं एक देवता की तरह देखता था. उसकी आवाज़ सामान्य से कुछ कोमल थी.

"कोई बात नहीं, विशाल। तुमने बहुत अच्छा खेला."

और तभी मैंने देखा, राहुल की आँखें भी चमकीली थीं। लेकिन नम. वह भी... महसूस कर रहा था? उसके अंदर के लड़का भी टूट रहा था. उस की टूटन ने मेरे भीतर के लड़के को हिला कर रख दिया.

उस शाम, मैं घर लौटा, तब प्रिया रसोई में माँ की मदद कर रही थी. उसने पूछा, "कैसा रहा मैच?"
मैंने सिर्फ सिर हिलाया। फिर अचानक बोल पड़ा, "हारे नहीं, पर जीत भी नहीं सके. बुरा लग रहा है."

मेरा यह वाक्य हवा में तैरता रह गया. प्रिया हैरान थी. मैंने कभी नहीं कहा था, 'बुरा लग रहा है.'

उस रात, पिताजी ने मेरे चेहरे पर उदासी देखी और पूछा, तो मैंने फिर से वही कहा: "हार का बुरा लग रहा है, पापा।"

पिताजी चुप रहे। शायद उन्होंने मेरे लड़के के कवच में पड़ी उस दरार को देख लिया था. उनकी आवाज़ सख्त नहीं थी, बस थकी हुई थी, बोले "कोई बात नहीं. अगली बार जीत लेना."

यह एक तसल्ली नहीं थी, पर डाँट भी नहीं थी. यह क्या था? मुझे समझ नहीं आया. क्या उनका भी कवच दरक रहा था?

कुछ दिन बाद, जब प्रिया ने फिर, बहुत ही धीमे स्वर में, कहा, "मैं साइकिल सीखना चाहती हूँ ताकि ट्यूशन समय से पहुँच सकूँ," तो मैंने, अचानक अपने कवच की दरार से बाहर निकल आया. जा कर पिताजी से कहा, “अब प्रिया को साइकिल सीखने की जरूरत है, “उसे मैं सिखा देता हूँ पापा. शाम को सड़क खाली रहती है.”

यह कोई विद्रोह नहीं था, नारेबाजी भी नहीं थी. सिर्फ एक प्रस्ताव था. एक साँस, जो बहुत पहले मैंने खींच कर अपने फेफड़ों में भर ली थी. जो मेरी रग-रग में दौड़ रही थी. अब बाहर निकलने को छटपटा रही थी.

पिताजी ने मेरी ओर देखा. फिर प्रिया की ओर, जिसकी आँखों में चमक लौट आई थी. चमक, जो सवाल नहीं, उम्मीद पूछ रही थी.

"ठीक है," उन्होंने कहा, बिना किसी जोश के. "पर शाम सात बजे से पहले. और खाली सड़क पर ही."

यह जीत नहीं थी. यह सिर्फ एक मोड़ था. उस दिन, जब मैंने प्रिया को साइकिल का हैंडल पकड़ाना सिखाया, तो मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर का कभी न रोने वाला लड़का पिघल रहा है. हर साँस जो अब मैं बाहर छोड़ता हूँ, उसके साथ वह लड़का थोड़ा सा मेरा साथ छोड़ देता है और कमजोर पड़ता जाता है. शायद एक दिन, मैं उससे मुक्त हो जाऊंगा. और तब... शायद तब मैं एक इंसान बन सकूँगा."

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

एकता

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

मदुरा नगर निगम के एयरकंडीशंड बैठक कक्ष की शीतलता और बाहर की चिपचिपी गर्मी के बीच, पंखे की आवाज़ के सिवा कोई आवाज़ नहीं थी. आयुक्त श्रीवास्तव ने निविदा के कागजात पर नज़र दौड़ाई. "मिलाप तेवटिया, तुम्हारी दर राज्य की न्यूनतम मजदूरी दर से भी पाँच प्रतिशत कम है. यह कैसे?"

मिलाप तेवटिया, जिसकी आँखों में तीस साल के अनुभव की चालाकी थी, मुस्कुराया. "सर, मैनेजमेंट है. हम स्मार्ट तरीके से काम करेंगे."

मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. चौधरी ने चश्मा सहलाते हुए कहा, "यह धार्मिक नगर है, तेवटिया. तीर्थयात्री देश-विदेश से आते हैं. सफाई पर कोई समझौता नहीं."

"डॉक्टर साहब," तेवटिया आगे झुका, "आप लोग बस अपना कमीशन समय पर पहुँचने की चिंता करें. बाकी मैं संभाल लूँगा. पर व्यापार में दिल नहीं, दिमाग चलता है, सर!"


आयुक्त और डॉक्टर की नज़रें मिलीं. साल भर के लिए नगर की सफाई का ठेका मिलाप तेवटिया को मिल गया.

अगले सोमवार सुबह, मधुवन रोड के कूड़ा संग्रहण केंद्र पर पचास मजदूर इकट्ठे थे. तेवटिया ने ऊँची आवाज़ में कहा, " वेतन मिलेगा, रोज दो सौ, जो काम बताया जाए उसे करना होगा, चाहे चार घंटे में करो या छह घंटे में या आठ घंटे में. जो माने ठीक, जो नहीं माने, आज ही जाए."

रामलाल, जिसकी बेटी बुखार से तप रही थी, आगे बढ़ा. "साहब, आधे दिन की मजदूरी में..."

"तुझे पता है बाहर कितने लोग बेरोजगार हैं?" तेवटिया ने उसे घूरकर देखा. रामलाल पीछे हट गया. दो सौ रुपये में दवाई तो मिल जाएगी.

दो महीने बाद, मदुरा की गलियों में यत्र-तत्र कूड़े के ढेर दिखने लगे. आराम घाट पर बदबू, मंदिर के सामने उड़ता प्लास्टिक. शिकायतें पार्षद शर्मा तक पहुँचीं.

"तेवटिया, मेरे वार्ड में शिकायतें हैं."

"चिंता मत कीजिए, साहब." तेवटिया ने लिफाफा आगे बढ़ाया. "यह इस महीने का. और आपके भतीजे की नौकरी लग गई है."

शर्मा ने लिफाफा ड्रॉयर में रख लिया. "पर सफाई का ध्यान रखना. चुनाव दूर नहीं."

रामलाल और साथियों की हालत खराब हो रही थी. एक दिन, जब तेवटिया ने डाँटा, तो रामलाल ने हिम्मत करके कहा, "साहब, पूरा काम करेंगे, पर पूरी मजदूरी चाहिए."

"कल से तेरी जरूरत नहीं." तेवटिया बोला.

उस शाम, बीस मजदूर नगर निगम के सामने धरने पर बैठ गए. मोहन ने रामलाल से कहा, "मेरे बाप का ऑपरेशन टल गया इस कम मजदूरी में."

"मेरी बेटी की दवाई..." रामलाल ने जवाब दिया.

स्थानीय अखबार ने खबर छापी: "पवित्र नगर में अशुद्ध व्यवहार."

मोहन ने सुझाव दिया, "चलो स्थायी कर्मचारियों की यूनियन से मिलते हैं."

नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह ने उनकी बात सुनकर कहा, "तुम ठेकेदार के गुलाम बन गए हो. हमें एक साथ लड़ना होगा."

जब तेवटिया ने माँगें नहीं मानीं, तो सभी ने हड़ताल कर दी.

तीन दिन में मदुरा की स्थिति भयावह हो गई. जैसे पवित्र नगर ने अपनी पवित्रता उतार फेंकी हो.

नागरिक समूहों की आपात बैठक में समाजसेवी डॉ. मेहता, जो पहले भी श्रमिक हकों के लिए लड़ चुके थे, बोले, "यह मजदूरों के शोषण और नागरिकों से लगातार किए जा रहे छल की समस्या है. वे मजदूरों के शोषण के साथ साथ हम नागरिकों से जुटाए गए कोष का भी दुरुपयोग कर रहे हैं. हमें एकजुट होना होगा."

नगर निगम बोर्ड की आपात बैठक में, जब महापौर ने तेवटिया का ठेका रद्द करने का प्रस्ताव रखा, तो पार्षद शर्मा भड़क गए.

तभी सुरेंद्र सिंह ने कक्ष में प्रवेश किया, हाथ में दस्तावेज.

"महोदय, यह रजिस्टर है जिसमें कमीशन का हिसाब है: आयुक्त साहब को पचास हज़ार, डॉ. चौधरी को तीस हज़ार, पार्षदों को दस-दस हज़ार."

कमरा सन्नाटे में डूब गया.

अगले दिन, कलेक्ट्रेट के सामने पांच हज़ार नागरिक और सभी मजदूर इकट्ठे हुए. रामलाल ने माइक पकड़ा.

"हम मदुरा को स्वच्छ रखना चाहते हैं. पर हमें इंसान की तरह जीने का अधिकार चाहिए."

डॉ. मेहता बोले, "यह संघर्ष हर मदुरावासी का है."

समाचार राजधानी तक पहुँचा. मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश आया: नगर निगम बोर्ड भंग, तेवटिया का ठेका रद्द, आयुक्त और स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित, नई निविदा प्रक्रिया शुरु होगी तब तक मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन पर नगर निगम काम कराएगा.

मजदूरों ने विजय जलूस निकाला. जलूस के बाद सुरेंद्र सिंह ने मजदूरों से बात की, "साथियों, आज हमने एक लड़ाई जीती है. पर असली लड़ाई अब शुरू होगी. नया ठेकेदार आएगा, वह भी शोषण से नहीं चूकेगा."

रामलाल ने पूछा, "तो फिर हमने क्या जीता?"

"हमने एकता सीखी," सुरेंद्र ने कहा. "और याद रहे, जब मजदूर और नागरिक एक साथ खड़े हों, तो एकता से ज्यादा मजबूत कुछ नहीं होता. यह एकता... यही इस संघर्ष की असली कमाई है."

रामलाल ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी बेटी अब ठीक थी - न सिर्फ बुखार से, बल्कि उस डर से भी जो तेवटिया की आवाज़ में था. और आज, उसे लगा कि नगर की स्वच्छता का रास्ता न केवल गलियों की सफाई से, बल्कि इस एकता से भी गुज़रता है.

रविवार, 28 दिसंबर 2025

घिरनियाँ

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

तीन साल की कोचिंग, दो बार ड्रॉप, और अंततः आईआईटी दिल्ली का ऐतिहासिक गेट. कौशिक के कदम भारी थे – न सिर्फ बैग के बोझ से, बल्कि उस अदृश्य उम्मीद से भी जो पूरे मोहल्ले, स्कूल और कोचिंग के दोस्तों ने उस पर लाद दी थी. उम्र बीस साल, मन पचास साल का अनुभवी, और डर सत्रह साल के नए बैचमेट जैसा. उसका रूममेट राजीव अभी सत्रह का ही था – गाँव से आया हुआ, चेहरे पर एक निश्चल उत्सुकता, जैसे किसी नई दुनिया को टटोल रहा हो.

पहली मैकेनिकल लैब. प्रोफेसर ने एक सरल गियर सिस्टम टेबल पर रखा. और नए छात्रों से पूछा, “बताओ, यह कैसे काम करता है?”

कौशिक की नज़रें तुरंत ब्लैकबोर्ड पर टिक गईं. उसके दिमाग में फ़ॉर्मूले की लाइनें दौड़ने लगीं – वेलोसिटी रेशियो, टॉर्क ट्रांसमिशन, मेकेनिकल एडवांटेज… सब कुछ याद था, सब याद था. उसने सूत्र लिखने के लिए कलम उठाई.

तभी राजीव ने आगे बढ़कर गियर के एक पहिये को हल्के से छुआ. फिर घूम कर मुस्कराया. “सर, यह तो हमारे गाँव के कुएँ की घिरनी जैसा है. वहाँ कुएँ की जगत पर एक बड़ी घिरनी होती है जो कुएँ की ओर झुकी होती है, जिस पर रस्सी चलती है. जब हम रस्सी के एक सिरे को खींचते हैं, तो दूसरे सिरे पर बँधी बाल्टी, ऊपर आती है. यह गियर भी वैसा ही है – एक पहिया घूमता है, तो दूसरा उसकी गति और दिशा के हिसाब से चलता है. बस यहाँ लकड़ी की घिरनी की जगह धातु के पहिये पर दाँत हैं, जो दूसरे दाँत वाले पहिए को गति देते हैं.”

प्रोफेसर की आँखों में एक चमक आ गई. “ठीक कहा, राजीव. तुमने सिद्धांत को छूकर भौतिक रूप से महसूस किया. तुम्हारे लिए सिद्धांत केवल विचार नहीं रहा, बल्कि वह भौतिक यथार्थ से निकला. सारे विचार ऐसे ही भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं.”

कौशिक अवाक रह गया. उसने सोचा था कि उसके पास तीन साल का अतिरिक्त ज्ञान है, पर राजीव के पास तो सत्रह साल का वास्तविक जीवन का अनुभव था – वास्तविक दुनिया का अनुभव, जहाँ सिद्धांत सिर्फ किताबों में नहीं होते, खेतों, कुओं और घिरनियों से जन्म लेते हैं.

शाम को कमरे में, कौशिक ने पूछा, “तुमने इतनी स्पष्ट तुलना कैसे की? क्या तुमने कोई खास किताब पढ़ी है?”

राजीव ने अपना साधारण सा सूटकेस खोला. उसमें कोई किताब नहीं थी, बस कुछ पुराने टूल्स थे – एक छोटा सा स्क्रूड्राइवर, दो-तीन तरह के प्लायर्स, और एक लोहे का छल्ला. “मेरे पिता कारीगर हैं, सर. मैं बचपन से मशीनों के बीच बड़ा हुआ हूँ. मैंने पढ़ा ही नहीं, पर खुद देखा है. और जो देखा, उस पर विश्वास किया.”

वह सोचने लगा, जब भी खाली समय में वह घर के बाहर जाना चाहता तभी उसके मम्मी-पापा उससे कहते –फालतू समय मत व्यर्थ करो. तुम्हें आईआईटियन बनना है. समय व्यर्थ करने के बजाय किताबों में मन लगाओ. तुम्हारा अध्ययन ही तुम्हें वैसा बना सकता है. अब उसकी समझ में आया कि मम्मी-पापा पूरी तरह सही नहीं थे. अध्ययन केवल किताबों और सिद्धान्तों में नहीं होता बल्कि वह व्यवहारिक दुनिया से प्रत्यक्ष होता है.

अगले दिन, कौशिक अकेला लैब में लौटा. उसने प्रोफेसर से वही गियर सिस्टम माँगा. इस बार उसने कॉपी-पेन नहीं उठाया. उसने धीरे से गियर के दाँतों को अपनी उँगलियों से छुआ. एक पहिये को घुमाया, दूसरा अपने आप चल पड़ा.

उसकी आँखों के सामने कोचिंग के वो बोर्ड नहीं, बल्कि राजीव के गाँव का कुआँ घूम गया – रस्सी, घिरनी, पानी की बाल्टी, और एक साधारण सिद्धांत जो पीढ़ियों से चला आ रहा था.

प्रोफेसर ने पूछा, “क्या तुम्हें अब समझ आया?”

कौशिक ने सिर उठाया. “नहीं सर… अभी महसूस किया है.”

...और उस पल कौशिक ने जाना कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का रास्ता नहीं है – यह उस रास्ते पर चलने का साहस है जहाँ किताबें और प्रत्यक्ष ज्ञान साथ जलते हैं. और सच्ची समझ की शुरुआत होती है. उसने पहली बार महसूस किया कि ज्ञान की सब से बड़ी घिरनी – विचार और अनुभव का संगम – अब घूम चुकी थी.

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

कच्ची ईंटें

'लघुकथा'

- दिनेशराय द्विवेदी
सूरज के उगने से पहले ही रामलाल के हाथ चिपचिपी मिट्टी में डूबे थे. हर ईंट को साँचे में ढालते हुए उसकी उँगलियों के छाले पुराने पड़ चुके थे, पर मन अब भी कोमल था. एक ईंट रखते हुए अचानक मुन्नी का चेहरा आँखों में तैर गया—कल ही उसने टूटी स्लेट पर कोयले से लिखा था, “बाबूजी, देख लेना, एक दिन मैं भी बड़ी मास्टरनी बनूँगी.”

उसका सपना रामलाल की रगों में खून बनकर दौड़ता, तभी भट्ठा मालिक की आवाज़ कोड़े सी बरसी -
“ऐ रामलाल! हाथ चला, दिमाग नहीं. कल भट्ठा लगाना है.”

रामलाल ने गर्दन झुका ली. ज़बान खोलने की कीमत मज़दूरी कटने से चुकानी पड़ती थी.

एक तपती दोपहरी में अचानक धड़ाम की आवाज़ हुई. ईंटों की कच्ची दीवार ढह गई थी, और रामलाल उसके नीचे दबा था. उसे बाहर निकाला गया तो पैर लहूलुहान था. मालिक ने आकर घड़ी देखी और चिल्लाया-
“मरा तो नहीं! काम रुकना नहीं चाहिए.”

उस रात रामलाल की झुग्गी में दर्द से ज्यादा एक दबी हुई आग धधक रही थी. डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ाया था और आराम करने को कहा था. पर जब मुन्नी ने पूछा, “बाबूजी, फिर स्कूल कब जाऊँगी?” तो रामलाल को लगा जैसे उसकी चुप्पी ही उस स्लेट को हमेशा के लिए तोड़ देगी.

देर रात, जब भट्ठे का धुआँ आसमान को काला कर रहा था, रामलाल लंगड़ाता हुआ सुक्खू, गफूर और चंदर के पास पहुँचा.

“मित्रो,” उसकी आवाज़ में दर्द से ज्यादा आग थी, “आज मेरा पैर दबा, कल किसी का सपना दबेगा. क्या हमारे बच्चे भी इसी भट्ठे में ईंट बनकर पकेंगे?”

सुक्खू डरा हुआ था, “बोलेंगे तो भूखे मरेंगे.”

रामलाल की आँखों में बिजली कौंधी, “साथ बोलेंगे तो मालिक का गुरूर मरेगा. ये ईंटें हमारे पसीने से पकती हैं. हमें जीने लायक मज़दूरी चाहिए.”

त हवा से फैली. अगले कई दिनों तक, रामलाल के पैर से प्लास्टर कटने तक, अंधेरी रातों में मजदूर उसकी झोंपड़ी में जुटते रहे. उन्हें समझ आने लगा—उनकी आपबीती एक ही दास्तान है.

जिस दिन रामलाल काम पर लौटा, उस रात उसने कोयले से एक फटे बोरे पर लिखा: 'मजदूर यूनियन'. अगली शाम, काम खत्म होते ही सभी मजदूर शिव मंदिर के लॉन में इकट्ठे हुए. रामलाल ने कहा, “हम एक होकर लड़ेंगे. पहला कदम—यूनियन बनाएँगे. जो शामिल नहीं होना चाहते, वे हाथ ऊपर उठाएँ.”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया. केवल भट्ठे की चिमनी से उठता काला धुआँ हवा में लहरा रहा था, मानो स्वयं आकाश सुन रहा हो. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

रामलाल की आवाज़ गूँजी, “इंकलाब जिन्दाबाद!”

नारे से हवा काँप उठी. और उसी क्षण मुन्नी ने, जो एक कोने में खड़ी सब देख रही थी, अपनी टूटी स्लेट पर फिर से कोयले से कुछ लिखना शुरू किया—शायद अपना नाम, शायद एक नई शुरुआत.

भट्ठे से उठता धुआँ अब केवल कालिख नहीं, एक संकल्प बनकर फैल रहा था. कच्ची ईंटें अब सिर्फ दीवारें नहीं, एक नई नींव की पहली परत थीं.

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बेनकाब उजाले

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
महानगर की उमस भरी नसों में आज एक अजीब सी बेचैनी थी। एक तरफ कई सौ एकड़ में फैला वह महलनुमा आवास था, जो आज पूरी दुनिया की चकाचौंध को खुद में समेटे हुए था। अरबपति के बेटे की शादी थी। सड़कों पर गाड़ियों का हुजूम नहीं, बल्कि सत्ता और संपत्ति का प्रदर्शन रेंग रहा था।

महल के भीतर बने आधुनिक ऑडिटोरियम में संगीत की थाप तेज हुई। नर्तकियां मंच पर थीं। दर्शक दीर्घा में देश के सबसे रसूखदार चेहरे बैठे थे। जैसे-जैसे नर्तकियों के बदन से कपड़े कम हो रहे थे, हॉल में तालियों का शोर और सिगार का धुआँ घना होता जा रहा था। जब मुख्य नर्तकी के साथ केवल उसकी दो सहायिकाएँ रह गईं, तो एक रईस ने जाम छलकाते हुए कहा, "यही तो असली विकास है, जहाँ मर्यादा की बेड़ियाँ टूट रही हैं।"


उसी जगमगाते महल की ऊँची दीवारों के साये में 'नील गगन' झुग्गी बस्ती थी, जहाँ नाम के उलट आसमान भी काला और धुएँ भरा था।

श्यामू रिक्शा चालक अपनी फटी हुई बनियान से पसीना पोंछते हुए बैठा था। उसका छोटा बेटा सुबक रहा था, "पापा, वहाँ से हलवे की खुशबू आ रही है। क्या हम जा सकते हैं?"

श्यामू की पत्नी राधिका ने पास पड़े खाली मटके को पटकते हुए कहा, "वहाँ जाने की कीमत हमारी जान से ज्यादा है बेटा। वहाँ पहरे नहीं, लोहे की दीवारें हैं। सुना है आज पी.एम. साहब भी आए हैं आशीर्वाद देने। हमारी भूख उनके कैमरों के फ्लैश में कहीं खो गई है।"


ऑडिटोरियम में अब केवल मुख्य नर्तकी बची थी। रोशनी मद्धम हुई और उसके बदन से एक और वस्त्र सरक गया।

"शानदार!" एक अफसर ने फुसफुसाया। तभी कोने में खड़े एक पत्रकार ने अपनी डायरी में लिखा— 'उतरते हुए वस्त्र केवल नग्नता नहीं, इस लोकतंत्र की उतरती हुई खाल हैं। व्यवस्था आज स्टेज पर नंगी नाच रही है और रक्षक तालियाँ बजा रहे हैं।'

अचानक, आसमान में एक जोरदार धमाका हुआ। आतिशबाजी का एक बड़ा गोला फटा और उसकी रंगीन रोशनी ने झुग्गियों के अंधेरे को एक पल के लिए चीर दिया।

श्यामू चौंक कर खड़ा हो गया। उसे लगा जैसे आसमान से आग के गोले गिर रहे हों। उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा, "देख राधिका! ये रोशनी नहीं है। ये हमारी बेबसी का जश्न है। वो आसमान में बारूद नहीं, हमारे हिस्से की रोटियाँ जला रहे हैं।"


मंच पर अब अंतिम दृश्य था। मुख्य नर्तकी ने अपना अंतिम वस्त्र भी त्याग दिया। संगीत रुक गया, रोशनी मद्धम होकर शून्य हो गई। मदहोश दर्शकों के गले से एक सामूहिक चीख निकली—उत्साह की या हवस की, यह तय करना मुश्किल था।

तभी पी.एम. की आवाज गूँजी, "आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में हमारा नाम है। यह नया भारत है, यह नग्न सत्य है!"

पत्रकार ने अपनी कलम बंद की और बुदबुदाया, "हाँ, नग्न और बेनकाब। सत्य भी और सत्ता भी।"


झुग्गी में अंधेरा फिर लौट आया था। बिजली का बिल न भर पाने की वजह से कटा कनेक्शन अब एक स्थायी सन्नाटा बन चुका था।

बच्चा फिर रोया, "पापा, दूध..."

श्यामू ने आतिशबाजी से चमकते उस महल की ओर देखा और मुट्ठियाँ भींच लीं। उसने अपने पास पड़े खाली पीपे को जोर से लात मारी। आवाज़ गूँजी और बस्ती के दूसरे घरों से भी सिसकियों की जगह अब गुस्से की सुगबुगाहट आने लगी।

"हमें तुम्हारी ये झूठी रोशनी नहीं चाहिए साहब," बस्ती के कोने से एक बुजुर्ग की आवाज आई, "हमें तो बस हाथ को काम और पेट को रोटी चाहिए।"

आसमान में आखिरी पटाखा फटा और उसकी राख धीरे से श्यामू के खाली हाथ पर आकर गिरी। वह रोशनी नहीं, ठंडी पड़ चुकी एक चिंगारी थी।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

उम्मीद

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

मॉल रोशनियों से नहाया हुआ था. लाल-सुनहरी गेंदें और टिमटिमाते सितारे हर किसी को अपनी ओर खींच रहे थे. बाहर लॉन में हजारों बल्बों से सजा क्रिसमस ट्री किसी सजीली दुल्हन की तरह मुस्करा रहा था. सड़क पार फुटपाथ पर राघव सुबह से अपने ठेले पर बच्चों के लिए सांताक्लॉज की लाल ड्रेसें बेच रहा था. उसकी अधिकांश ड्रेसें बिक चुकी थीं. बस चार-पाँच बची थीं. वह सोच रहा था कि ये भी बिक जाएँ तो सुकून से घर जाए; दो ड्रेसें तो वह अपने बच्चों, श्याम और सरिता के लिए ले ही जाएगा.

तभी एक स्कूटर वाला आकर रुका और ड्रेसें देखने लगा. राघव उम्मीद से बोला, “देख क्या रहे हैं बाबूजी, ले लीजिए. बस यही पाँच-छह बची हैं, आधी दर पर दे दूंगा.”

राघव आगे कुछ बोल पाता, तभी एक आटो रिक्शा उसके सामने आकर धीमा हुआ और ड्राइवर चिल्लाया— “सामान समेटो और भागो राघव! गुंडों की फौज आ रही है!”

राघव ने मुड़कर देखा, पंद्रह-बीस लोगों का हुजूम लाठी-डंडे लिए चीखता-चिल्लाता चला आ रहा था. ये वही लोग थे जो अक्सर त्यौहारों का उल्लास बिगाड़ने को ही अपना धर्म समझते थे. राघव ने फुर्ती से सांताक्लॉज की ड्रेसें चादर में लपेटकर गठरी बाँधी और ठेले को गली में धकेल दिया. स्तब्ध खड़ा स्कूटर वाला भी अपनी गाड़ी स्टार्ट कर राघव के पीछे उसी गली में घुस गया.

गली के सुरक्षित कोने से उन्होंने देखा—भीड़ मॉल में घुस चुकी थी. उन्होंने सजावटी ट्री को पीट-पीटकर गिरा दिया और उसमें आग लगा दी. गार्ड्स, जो सांता की ड्रेस में थे, उनके कपड़े फाड़ दिए गए. दस मिनट के तांडव में मॉल के शीशे चकनाचूर हो गए. कुछ लोग हाथों में कीमती सामान दबाए बाहर निकले और शोर मचाते हुए आगे बढ़ गए.
सन्नाटा छाने पर ग्राहक ने पूछा, “ये ड्रेसें कितने में दे रहे हो?” राघव की आवाज काँप रही थी, “सौ की एक है बाबूजी, आप जो दे दें. अब बस घर जाना चाहता हूँ.” “सौ में दो दोगे? मेरे पास पैसे कम हैं, बाकी से बच्चों के लिए कुछ मीठा लेना है,” ग्राहक ने मोल भाव किया. राघव ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “ले जाइए बाबूजी, कम से कम आपके बच्चे तो खुश होंगे.”

राघव ने नोट जेब में रखा और खाली सड़क को देखा. ग्राहक बोला, “मॉल में बहुत नुकसान कर गए ये लोग.” राघव ने लंबी सांस ली, “ये हर त्यौहार पर यही करते हैं. पुलिस भी सब बरबाद होने के बाद जमीन पर लाठियाँ बजाने आती है.”

राघव ठेला लुढ़काते हुए अपनी बस्ती की ओर चला, जो चर्च के पीछे नाले के किनारे थी. चर्च के पास पहुँचते ही उसके पैर ठिठक गए. तीन दिन से जगमगाती रोशनियाँ बुझ चुकी थीं. चर्च के एक कोने से धुआँ उठ रहा था. पता चला कि भीड़ ने पादरी जॉन साहब पर हमला किया, उनका सिर फट गया है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. राघव की रूह काँप उठी— "क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि उसे बचाने के लिए खुशियों का कत्ल करना जरूरी है?"

बस्ती पहुँचा तो देखा, अनीता की झुग्गी राख के ढेर में बदल चुकी थी. अनीता एक पुराने बक्से पर बैठी शून्य में ताक रही थी. उसका पति और बेटा पहले ही एक हादसे में गुजर चुके थे. पादरी  जॉन साहब की मदद से वह फिर से खड़ी हो सकी। उनकी सहृदयता को देख उसने ईसाई धर्म अपनाया था, और आज शायद इसी की कीमत उसने अपना आशियाना खोकर चुकाई थी. सलीम उसके पास खड़ा उसे ढाढ़स बँधा रहा था.

सलीम ने राघव को देखते ही बुझी हुई आवाज में कहा, "वाह! धर्म बच गया! किसी का सिर झुकाकर, किसी की छत छीनकर और किसी के दिल में नफरत भरकर... उन्होंने अपने भगवानों को खुश कर दिया." सलीम की आँखों में आक्रोश से ज्यादा शर्मिंदगी थी.

राघव ने आगे बढ़कर अनीता के सिर पर हाथ रखा और पूरी दृढ़ता से बोला, “अनीता बहन! घर लकड़ी और ईंटों का था, जो टूट गया. पर हम जो साथ खड़े हैं, वह 'विश्वास' है, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता. हम सिर्फ ईंटें नहीं जोड़ेंगे, हम टूटे हुए भरोसे को भी जोड़ेंगे. अदालत से लेकर सड़क तक, तुम अकेली नहीं हो. यह देश नफरत की आग में जलने के लिए नहीं बना है.”

अनीता ने सिर उठाकर दोनों भाइयों को देखा और खड़ी होकर बोली, “उन्होंने नफरत को धर्म मान लिया है, पर तुम दोनों ने प्यार का धर्म नहीं छोड़ा. वे कितना भी तोड़ें, मैं अपना विश्वास नहीं खोऊँगी.”

सलीम और राघव ने अनीता को सहारा दिया. जलते हुए चर्च की लपटें अब शांत हो रही थीं, लेकिन उस ढहे हुए घर के पास तीन दिलों की धड़कनें एक सुर में थीं. वहां न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न ईसाई—वहां सिर्फ तीन 'इंसान' थे, जो एक नए सवेरे की नींव रख रहे थे.

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

दीवार

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
गाँव के चौक में बड़ी हलचल थी. गाँव की बहू, सत्या, ने राज्य स्तर पर अवॉर्ड जीता था. पंचायत भवन में उसके सम्मान में एक समारोह रखा गया था. लोग इकट्ठा हुए थे, ढोल-नगाड़े बज रहे थे.

सत्या मंच पर पहुँची. सिर पर घूंघट था. साथ में उसकी ननद राधा भी थी.
 
सत्या को घूंघट में देख कर भीड़ में खुसर-फुसर होने लगी. तभी एक नौजवान ने जोर से कह दिया ...
“देखो, इतनी पढ़-लिख कर भी घूंघट में आई है!”

“चुप्प¡ तुम्हें तमीज भी नहीं, भरी सभा में चिल्ला रहे हो. यही तो असली संस्कार है. बड़े पद पर है, अवार्ड जीता है, फिर भी घमंड नहीं. अपनी परंपरा को कैसे अच्छे से निबाह रही है.” पास ही बैठे बुजुर्ग ने नौजवान को डाँट पिलाई. कुछ लोग ताली बजाने लगे तो कुछ हँस पड़े.

तभी पास खड़ी सत्या की ननद राधा, जो कॉलेज में पढ़ रही थी, आगे बढ़ कर माइक पर आ गयी और सहज स्वर में बोली...
“इसे मेरी गुस्ताखी कहें कि मैं बिना बुलाए भाभी के साथ मंच पर आई और यहाँ अपनी बात कह रही हूं. आप खुद देखें यह संस्कार है? या बाध्यता? अगर सच में हमारी शिक्षा ने आज़ादी दी होती, तो सत्या भाभी को घूंघट की ज़रूरत ही न पड़ती. कोई स्त्री घूंघट में नहीं रहना चाहती. आप लोग समझ ही नहीं सकते कि यह घूंघट एक स्त्री को कैसी कैसी तकलीफें देता है.”

उसकी बात सुनकर बुज़ुर्गों में खुसर-फुसर शुरू हो गई. एक बुजुर्ग ने जोर से कहा...
“लड़कियाँ अब बहुत बोलने लगी हैं. “ये सब पढ़ाई का असर है. अंग्रेजी पढ़ाई बदतमीजी सिखाती है.”

अचानक मंच पर खड़ी सत्या ने अपनी ननद राधा को एक ओर किया और माइक पर खुद बोलने लगी. उसका स्वर धीमा था, लेकिन शब्दों में आग थी...
“आप कहते हैं कि घूंघट संस्कार है. लेकिन जब कोई पुरुष किसी स्त्री का घूंघट उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक स्थान पर हटाने की कोशिश करता है, तब वह किस तरह का संस्कार है?
आप कहते हैं कि हम पढ़-लिख कर भी आगे नहीं बढ़ पाए. लेकिन सच यह है कि शिक्षा का दरवाज़ा ही आधा खुला रखा गया है.
और जब हम बड़े पद पर पहुँचते हैं, तब भी आप हमें घूंघट में देखना चाहते हैं, ताकि आपके गर्व का झूठा आईना चमकता रहे.”

सभा में सन्नाटा छा गया. किसी नौजवान ने सन्नाटे को चीर कर जोर से कहा हिप हिप हुर्रे. कुछ लड़के लड़कियों ने उसके जवाब में फिर से हिप हिप हुर्रे को दोहराया.

तभी, सत्या ने आहिस्ता से घूंघट हटाया. उसकी आँखों में डर नहीं था, बल्कि दृढ़ता थी. वह फिर बोलने लगी...
“बदलाव की शुरुआत पुरुषों से होनी चाहिए. जब आप हमें सहजता और सम्मान देंगे, तब हम बिना डर के चल पाएंगी. और अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो कम से कम हमसे सवाल करने का अधिकार मत छीनिए.”

भीड़ में खामोशी थी. कुछ चेहरों पर शर्म थी, कुछ पर सोच.

राधा ने ताली बजाई. धीरे-धीरे और लोग भी ताली बजाने लगे. भीड़ में उपस्थित अनेक स्त्रियों ने जो घूंघट किए हुए थीं, अपना-अपना घूंघट हटाना शुरू किया. एक- एक कर पर्दों में कैद सभी चेहरे आजाद हो गए

गाँव में घूंघट की दीवार टूट चुकी थी.

ट्रेन में बहस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
यह कोई 45-47 साल पहले का वाक़या है। मुझे अपने नगर से कोटा आना था. जनरल क्लास का कोच खचाखच भरा था, खिड़की के पास बैठा यात्री मेरा परिचित था वह उतरने वाला था. उसने मेरा बैग ले कर अपनी जगह रख दिया. मैं जैसे तैसे उस जगह जा कर बैठा. एक सफेद झक्क कुर्ता पायजामा पहने गोल टोपी लगाए गोरे सज्जन ठीक मेरे सामने वाली सीट पर खिड़की से दूसरे स्थान पर बैठे थे. अपने लिबास से वे सबसे अलग ही दिखाई दे रहे थे.
मैंने उन सफेदपोश सज्जन से पूछ लिया, “ जनाब कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं?”

“यहीं से बैठा हूँ.”

"जनाब, सफ़र कहाँ तक है?"

“फिलहाल तो ट्रेन कोटा तक ही है, वैसे लखनऊ जाना है? उन्होंने बताया. आगे बातचीत से पता लगा वे मुफ्ती हैं. उन दिनों मोबाइल तो हुआ नहीं करते थे. ट्रेन में आसपास के यात्रियों से बातचीत या कोई किताब हो तो उसे पढ़ते जाना ही यात्रा का वक्त बिताने के तरीके हुआ करते थे. मैंने इसीलिए मुफ्ती साहब को छेड़ा...

“मुफ्ती साहब आप तो धार्मिक इंसान हैं, और आपने मजहबी तालीम भी हासिल की है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या कोई ईश्वर है?”

"बिलकुल है. जो कुछ भी इस कायनात में है, उसका बनाने वाला ख़ुदा ही है."

सुन कर मैं मुस्कराने से खुद को रोक नहीं सका. मैंने बात आगे बढ़ाई...

“लेकिन जनाब, कायनात मतलब पूरा यूनिवर्स है. अभी तक तो हमें यह भी नहीं पता कि यह कायनात कितनी विशाल है. अरबों खरबों तारे, उनके गिर्द चक्कर काटते ग्रह, उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, पुच्छल तारे वगैरा-वगैरा. अरबों खरबों तारों बनी अरबों खरबों गैलेक्सियाँ. यह यूनिवर्स तो बहुत विशाल है. अभी तक जितनी इंसान जितनी क्षमता की दूरबीनें बना सका है उनसे यूनिवर्स का केवल हमारी धरती के गिर्द वाला हिस्सा ही हम ऑब्जर्व कर पाते हैं. उसके अलावा उसका कितना हिस्सा शेष है, उसका विस्तार कहाँ तक है, हम नहीं जान पाए हैं. हम जितना ऑब्ज़र्व कर सकते हैं, उतना ही देख पाते हैं. तो इतना बड़ा यूनिवर्स किसी ख़ुदा ने बनाया है.”

“यक़ीनन उसी ने बनाया है. आखिर हम देखते हैं कि बिना बनाए कुछ नहीं बनता है, तो जो बना बनाया है उसे ख़ुदा ने ही बनाया है. उन तमाम चीजों का होना ही तो ख़ुदा के होने का सबूत है.” मुफ्ती साहब बोले. अब वे मंद-मंद मुस्करा रहे थे.


“यानी ख़ुदा का होना यक़ीनन है?”

“जी बिलकुल यक़ीनन है.” मुफ्ती साहब ने फिर से ख़ुदा के होने की ताईद की.

“ग़र ख़ुदा है तो फिर उसको बनाने वाला भी होना चाहिए?” मैंने अपना नया सवाल दागा.

“देखिए ख़ुदा ऑब्जर्वेबल नहीं है, इसलिए हम कहते हैं कि वह खुद-ब-खुद है. वह खुद-ब-खुद है इसीलिए ख़ुदा है.”

“यानी पहले हम यह मानें कि इस यूनिवर्स को बनाने वाला कोई है, फिर यह मानें कि वह अनऑब्जर्वेबल है. इसके बाद यह मानें कि वह खुद-ब-खुद बना है. बड़ा झंझट है. हमें तीन-तीन चीजें मानें तब ख़ुदा सिद्ध हो. आपका ये ख़ुदा तो तीन-तीन बातों पर डिपेंडेबल है. इससे बेहतर तो यह है कि हम इस यूनिवर्स को ही ख़ुदा मान लें. कम से कम वह ऑब्जर्वेबल तो है और सिर्फ एक बात मानने पर डेपेंडेबल है कि आखिर कोई चीज तो है जो खुद-ब-खुद है.”

मेरा तर्क सुन कर मुफ्ती साहब की भौंहें चढ़ गईं. कहने लगे...
“यह यूनिवर्स ख़ुदा कैसे हो सकता है? यह तो ऑब्जर्वेबल है.”

“फिर तो ख़ुदा को मानने वालों और न मानने वालों में यही फर्क रहा कि ख़ुदा मानने वालों को तीन चीजें माननी पड़ेंगी. जब कि न मानने वालों को एक ही चीज माननी पड़ेगी.” यात्री अब तक मुस्करा रहे थे अब उनमें से किसी की हँसी भी फूट पड़ी और मुफ्ती साहब की भौंहें और चढ़ गयीं. मैंने अपना कहना जारी रखा...

“तो फिर बेहतर तो वह हुआ न जो एक ही चीज को मान लेता है.” इससे ख़ुदा का होना भी उसने मान लिया. बस वह मानता है कि यह यूनिवर्स ही ख़ुदा है. कोई ईश्वर, अल्लाह, गॉड वगैरा नहीं जो अक्सर ख़ुदाई किताबों में होना बताया जाता है.”

“नहीं जनाब, यह फेयर प्ले नहीं है. हमने जब बात शुरू की तो पहले ही कह दिया था कि जो ऑब्जर्वेबल नहीं है वह ख़ुदा है. चूंकि यूनिवर्स पूरा नहीं थोड़ा ही सही पर ऑब्जर्वेबल है, इसलिए ख़ुदा नहीं हो सकता.” मुफ्ती साहब ने अपनी आपत्ति पेश की.

“यह बात तो आपने कही थी, हमने मानी थोड़े ही थी. ये तो वही हुआ कि खुद ही नियम तय कर लें और खुद ही जीत की घोषणा कर दें. यह तो कोई बात नहीं हुई. मतलब तर्क का खात्मा और आस्था की शुरूआत.”

तब तक अगला स्टेशन आ चुका था. कोच में उतरने चढ़ने वालों में हलचल मच चुकी थी. वह बहस वहीं खत्म हो गयी. ट्रेन दुबारा चली तो बातचीत के दूसरे मुद्दे उठ गए.

रविवार, 21 दिसंबर 2025

तमगे की चमक

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

शहर की सड़कों पर सफ़ाई का शोर अखबारों के जरीए देश ही नहीं समूची दुनिया तक पहुँच चुका था। स्वच्छता सर्वेक्षण में वह देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया था। शहर के हर चौक पर होर्डिंग चमक रहे थे -
“स्वच्छता में अव्वल! हमारा शहर, हमारा गर्व।”

होटल से कैफ़े की ओर पैदल जा रही दो विदेशी महिला क्रिकेटर भी उस चमक को देख मुस्कुरा रही थीं।

“देखो, कितना साफ़ है यहाँ,” पहली ने कहा।

दूसरी ने सिर हिलाया, “हाँ, जैसे किसी किताब का पन्ना।”

तभी अचानक एक बाइक सवार युवक पास से गुज़रा। उसकी हरकत ने उनकी मुस्कान को भय में बदल दिया। पहली खिलाड़ी का चेहरा पीला पड़ गया। उसे लग रहा था जैसे उसकी समूची देह उस स्पर्श और दबाव से गंदगी में सन चुकी थी, ऐसी गंदगी जो शरीर से तो चली जाएगी लेकिन उसके मन से कभी नहीं। वह मन की दीवार पर हमेशा के लिए छप गयी थी। उसने अपने भीतर उठते डर को दबाने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में असुरक्षा साफ़ झलक रही थी।

दूसरी ने तुरंत मोबाइल से एसओएस दबाया। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, मानो यह काँपना सिर्फ़ डर का नहीं, बल्कि अपमान का भी था।

कुछ ही मिनटों में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती पहुँची। युवक गिरफ्तार हुआ।

खिलाड़ियों के मन में जो दरार पड़ चुकी थी, उसे कोई गिरफ्तारी भर नहीं भर सकती थी। कैफ़े के बाहर खड़े लोग सन्न रह गए।

एक बुज़ुर्ग ने धीमे स्वर में कहा, “सड़कें चाहे जितनी चमकदार हों, शहर भले ही देश का सबसे स्वच्छ शहर बन गया हो, लेकिन अगर मन गंदा है तो तमगे का क्या मतलब?”

अगले दिन अख़बारों में सुर्ख़ी थी, “स्वच्छता में अव्वल शहर का कारनामा!”

क्रिकेट बोर्ड के सचिव ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और सुरक्षा बढ़ाने का वादा किया।

लेकिन शहर के नागरिकों के मन में सवाल गूंजता रहा, “क्या असली स्वच्छता केवल कचरे के डिब्बे खाली करने से आती है, या फिर नागरिकता और आचरण की सफ़ाई से?”

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

‘निकाह मंजिल’

लघुकथा 
दिनेशराय द्विवेदी

‘निकाह मंजिल’ पुराने शहर के बीचों बीच खड़ी एक सदियों पुरानी इमारत थी, इसके सब ओर रास्ते गुजरते थे. पुरानी होने के बावजूद उसका रखरखाव ऐसा था कि अनेक आधुनिक इमारतें उसके सामने पुरानी लगतीं. इमारत बाहर से औरत-मर्द के बीच के करार का घर लगती थी, लेकिन उसकी भीतरी दीवारें काजियों के फतवों से सजी थीं.

शबनम संवेदनशील, अपनी जिन्दगी में बराबरी की तलाशती एक आधुनिक और आजाद औरत, एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी. आरिफ एक दूसरी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर. वे एक मीटिंग में मिले. दोनों को दोनों की कंपनियों के साझा प्रोजेक्ट पर काम करना था. प्रोजेक्ट चार माह में पूरा हो गया. दोनों के बीच लगाव पनपा. शबनम को आरिफ एक प्रगतिशील नजरिये वाला प्रतीत हुआ, उसे लगा कि दोनों के रिश्ते में बराबरी रहेगी.

आखिर दोनों ने अपने परिवारों को भी सहमत किया. दोनों का निकाह तय हो गया. वकील शबनम के पास आरिफ का इजाब लाया और शबनम ने उस पर हाँ कर कर अपनी मुहर लगा दी, गवाहों ने कहा इजाब क़बूल हुआ, मेहर तय हो गया, शादी मुकम्मल हुई. क़ाजी ने निकाहनामा लिख कर उन दोनों के तथा मौजूद गवाहों के दस्तखत करवाए और अपने दस्तखत करने के बाद दोनों को एक-एक कापी दे कर कहा यह तुम दोनों के बीच शादी का करार है. शबनम ने मुस्कुराकर सोचा, "करार में बराबरी होती है." दोनों बहुत खुश थे, दोनों को अपना मनपसंद हमराह मिल गया था.

विवाह के पहले विचारों से प्रगतिशील लगने वाले आरिफ अपनी जिन्दगी में जरा भी नहीं उतार सका था. मर्द औरत की बराबरी की बात जरूर करता, लेकिन रिश्ते में आने के बाद से ही उसके व्यवहार ने शबनम को समझा दिया कि वह उस पर नियंत्रण चाहता है. पर अपनी चाहतों को हमेशा उसकी चाहतों पर तरजीह देता. दोनों के बीच बहस होती और आखिर शबनम को ही झुकना पड़ता. वह झुकना नहीं चाहती थी, पर उसे लगता कि दोनों के बीच का अमन टूट जाएगा, उसका सुकून छिन जाएगा. निकाह की पहली सालगिरह तक शबनम को इस रिश्ते में घुटन महसूस होने लगी.

दिन बीतते गए. निकाह मंजिल की दीवारें अब उसकी हर आवाज को आरिफ के रंग में रंग कर फतवे में बदल जाती. आखिर एक दिन शबनम ने आरिफ को कह दिया, “हमारी जिन्दगी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, घुटन महसूस होती है. हमें अलग हो जाना चाहिए.” आरिफ चुप्पी खींच गया.

एक रात जब शबनम गहरी नींद में थी, आरिफ ने कहा, “शबनम, यहाँ निकाह मंजिल में बड़ा दरवाजा है, इसे तलाक कहते हैं और उससे मैं बाहर जा सकता हूँ, मुझे किसी वजह की जरूरत नहीं. तुम्हें इससे बाहर निकलने की इजाजत नहीं.”

शबनम ने कहा, “अगर मैं बाहर जाना चाहूँ?”

आरिफ ने छोटे दरवाजे की और इशारा करते हुए कहा, “तुम उस खुला दरवाजे से, बाहर जा सकती हो लेकिन उसके लिए भी तुम्हें मेरी मंजूरी की जरूरत है. और अगर मेरी मंजूरी न हो तो तुम्हारे लिए यह दरवाजा फस्ख होगा, तुम्हें खास वजह बतानी होंगी और अदालत में उसे साबित भी करना होगा.”

“मैं तो जानती थी कि निकाह एक करार है जिसमें दोनों पक्ष बराबर होते हैं.” शबनम ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी. तभी दीवारें बोलने लगीं. “निकाह कोई करार नहीं बल्कि फतवा है. यहाँ बराबरी की चाबी भी खाविंद के पास होती है, बीवी के पास नहीं.”

शबनम दीवार के पास गयी और उस पर लिख दिया, “करार तब तक करार नहीं होता जब तक कि उसमें दोनों पक्ष बराबर न होते हों, मैं लड़ूंगी और इस निकाह मंजिल से बाहर निकलूंगी.”

शबनम ने अगले दिन ही अदालत में खुला (फस्ख) के लिए दरख्वास्त पेश कर दी. उसने अदालत के सामने साबित किया कि उसके पास ‘निकाह मंजिल’ से बाहर जाने की वजहें हैं. अदालत ने उसकी दलीलों को मंजूर करते हुए “निकाह मंजिल” से बाहर जाने की इजाजत के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी. शबनम फिर से आजाद औरत थी।

"बेटियाँ"

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी 
गाँव का चौधरी अपनी बेटी को मार कर खेत के किनारे नाले में फेंक आया था.

लोगों ने कहा, “ठीक किया, बेटी बेजात के साथ भाग कर अपनी मर्जी से शादी करना चाहती थी.”

बेटी के इस अन्त से दुःख में डूबी हुई आंगन के एक कोने में राख से बर्तन माँजती चौधराहन ने दबे स्वर में चौधरी से कहा,

“कुछ भी हो मेरी बेटी हीरा थी. हमने उसे खो दिया. वह भाग कर शादी कर लेती तो उसे गाँव में न आने देते. पर यह सोच कर कि वह कहीं किसी के साथ खुश खुश अपना जीवन जी रही है, हम अपना जीवन गुजार लेते. अब तुम खुद बेटी के हत्यारे हो.”

चौधरी ने क्रोध से पत्नी की ओर देखा और फिर अपना सिर ऊँचा करके कहा, “अपनी ही इज्ज़त खोकर जिन्दा रहना भी कोई जीवन है. मैं तो जीते जी ही मर जाता. लोग मुझ पर और पूरे खानदान के लोगों पर उंगलियाँ उठा कर कहते कि, इस चौधरी को देखो¡ इसकी बेटी बेजात के साथ भाग गई और यह सिर ऊँचा कर के चल रहा है. इसे तो चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए था. मैंने अपनी ही नहीं पूरे खानदान की इज्जत बचा ली.”

“वैसे भी अब तुम हत्यारे कहलाओगे, तब तुम्हारी क्या इज्जत रह जाएगी? और पुलिस ने पकड़ लिया और सजा हो गयी तो जिन्दगी जेल में गुजरेगी.” इस बार चौधराहन की आवाज कुछ तल्ख और ऊंची थी.”

“जेल में गुजरेगी तो गुजर जाएगी. लोग नाम तो इज्जत से लेंगे. अब तू बड़बड़ाना छोड़ और चाय बना कर दे मुझे.” इतना कह कर चौधरी ने अपनी पगड़ी उतार कर आँगन में पड़े पलंग के कोने में रखी और लेट गया.

चौधराहन उठ कर रसोई की ओर चल दी.

उसी रात, गाँव के हैंडपम्प पर स्त्रियाँ फुसफुसा रही थीं,
“चौधरी की इज्ज़त बची या इंसानियत मर गई?”

“इज्ज़त तो चौधरी की बची, पर हमारी बेटियाँ तो अब और डर गईं.” एक स्त्री ने जवाब में कहा.

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

स्त्रियाँ देवियाँ नहीं

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
आशा अचानक अपने दो साल के बेटे को लेकर मायके पहुँची. उसे आए देख वहाँ सभी चौंके. जब उसने बताया कि कैसे क्या हुआ था तो मम्मी-पापा ने कहा, “यह गलत है, दामाद जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. तुमने ठीक किया, यहाँ चली आयी, अब सब कुछ खुद करना पड़ेगा तो अपने आप पता लग जाएगा.”
भाई ने कहा, “यहाँ क्यों आएंगे, वहीं चल कर बात करते हैं. उन्हीं के हाथ चलते हैं क्या? हमने कौन सी चूड़ियाँ पहन रखी हैं.”

हुआ यह था कि उस दिन दफ्तर से लौटते हुए नरेश अपने साथ एक अंग्रेजी की बोतल ले आया था, आते ही आशा से कहा था कि उसका दोस्त पवन आएगा, दो गिलास और तले हुए पापड़ बोतल के साथ बैठक में टी टेबल पर रख दे. वह फ्रेश हो कर बैठक में गया और आराम कुर्सी पर ऊंघने लगा. आशा ने उसकी हिदायत के अनुसार टी-टेबल सजा दी. वह शाम के भोजन की तैयारी के लिए रसोई में घुस गयी. कुछ देर बाद पवन आया तो आशा ने उसे बताया कि बैठक में आप का ही इन्तजार कर रहे हैं. पवन के बैठक में जाने के तुरन्त बाद कांच की वस्तु गिरने और टूटने की आवाज आयी तो सब्जी साफ करती हुई आशा वैसे ही बैठक की ओर तेजी आयी. वहाँ बोतल टूट कर गिरी पड़ी थी, अंग्रेजी फर्श पर फैल गयी थी, बोतल के काँच के टुकड़े बैठक में बिखर गए थे, नरेश और पवन दोनों स्तब्ध खड़े थे.

वह तुरन्त लौटी और झाडू लेकर वापस गयी फर्श साफ करने लगी. पवन से पूछा, "भाई साहब¡ कैसे गिर गयी बोतल?"

कुछ उत्तर मिलता उससे पहले उसके गाल पर चाँटा पड़ा, “तुम्हें टेबुल सजाने का तो शऊर नहीं है और कहती हो बोतल कैसे गिर गयी.”

आशा ने कुछ नहीं कहा, बस उसे रुलाई आ गयी। उसने स्वर भी नहीं निकाला चुपचाप रोने लगी. नरेश और पवन दोनों घर से बाहर चले गए. उसने शाम का भोजन तैयार किया, सास ससुर को खिलाया, नरेश के लिए रख दिया. वह जानती थी कि अब बाहर से पीकर आएंगे और उन्हें खाना चाहिएगा. नरेश आया और खुद भोजन लेकर खाया, फिर वहीं बैठक में सो गया. आशा रात भर कमरे में सुबकती रही उसने रात को ही अपने व बेटे के कपड़े और जरूरी सामान अपनी अटैची में जमा लिए. सुबह नरेश नाश्ता कर टिफिन ले कर दफ्तर के लिए निकला. आशा ने अपने सास ससुर को शाम की घटना बताई और उन्हें कहा कि वह बेटे के साथ मायके जा रही है, इन्हें जब अक्ल आ जाए, तब लेने आ जाएंगे.

एक सप्ताह में ही नरेश को पता लग गया कि आशा के शऊर कैसे हैं. वह तो केवल अपने दफ्तर जाता, घर के कामों में उसका योगदान बिलकुल नहीं था. यहाँ तक कि बाजार से घर जरूरत का सामान तक वही खरीदती. वह तो सब्जी तक ठीक से नहीं ला सकता था. माता-पिता और बेटे को भी वही संभालती, वह चार प्राणियों की देखरेख करती, कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. खैर, उसे आशा का महत्व पता लग चुका था, इस हिसाब से वह देवी थी. उसने नवें दिन ही अपने ससुर को फोन कर दिया था कि वह आशा को लेने आ रहा है. कुछ देर बाद ही साले का फोन आ गया कि जीजाजी अकेले मत आना, किसी रिश्तेदार को या दोस्त को साथ लेकर आना.

नरेश रिश्तेदारों तक बात को नहीं पहुँचाना चाहता था. लेकिन वह पवन को साथ ले कर ससुराल पहुँचा. सास-ससुर प्रेम से बोले, कहने लगे रात रुकना पड़ेगा. कल सुबह आप आशा को ले जा सकते हैं, यदि वह जाना चाहे. साले ने आवभगत तो की लेकिन बात बिलकुल नहीं की.

शाम को ससुर के कुछ मित्र कुछ रिश्तेदार वहाँ पहुँचे उनके साथ स्त्रियाँ भी थीं. रिश्तेदारों को देख नरेश को बहुत संकोच हुआ, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था. वह जानता था कि आशा के बिना उसका सारा संसार बिखर जाएगा. वह चुप रहा.

चाय नाश्ता पूरा हो जाने पर आशा को भी बैठक में बुला लिया. उसके आने पर एक रिश्तेदार जो सबसे अधिक बुजुर्ग था बोला, “नरेश जी आपने आशा के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, उसकी तो कोई गलती भी नहीं थी, फिर भी आपने उस पर हाथ छोड़ दिया. ऐसा कैसे चलेगा. हमें तो अपनी बिटिया की सुरक्षा ही खतरे में लगने लगी है.” 
उसके बाद ही तुरन्त दूसरा बोलने लगा. लेकिन नरेश चुप ही रहा.

आखिर में, बुजुर्ग ने नरेश से पूछा, “आप का क्या कहना है.”

अब तक नरेश भी अंदर तक भर चुका था, उसकी आँख से आँसू निकल पड़े, गला भर्रा गया. बोला, "मैं क्या कहूँ, आप सब के पैर पड़ कर माफी मांग सकता हूँ. मुझे आप माफ करें, न करें आपकी मर्जी. मैं तो दस दिनों में ही समझ गया हूँ कि मैं किसी काम का इंसान नहीं हूँ. मैंने आशा की सारी खूबियों को देख कर भी अनदेखा किया. मैं मूर्ख था. पर उसी ने मेरी आँखें खोल दी हैं. वह एक देवी है, मुझे उसकी पूजा करनी चाहिए थी, पर मैं नालायक इसे समझ ही नहीं सका. मैं तो आपकी और इस देवी की शरण में हूँ. यदि इस ने मेरा साथ नहीं दिया तो मेरे माता-पिता तो बिना देखरेख के ही मर जाएंगे. मेरा न जाने क्या होगा.” इतना कह कर वह सुबक पड़ा."

तभी आशा खड़ी हो गयी. बोली,"इस सब की जरूरत नहीं है. न मैं देवी हूँ, न कोई स्त्री देवी है. न ही हम किसी भी स्थिति में केवल स्त्री होने के नाते किसी भी रूप में दण्ड की अधिकारी हैं. जब मैं घर संभालती हूँ, खर्च बचाती हूँ, माता-पिता की सेवा करती हूँ, तो मुझे देवी कहा जाता है. पर जब गलती हो जाए या परिस्थिति बिगड़ जाए, तो वही लोग मुझे राक्षसी कहकर मारपीट करने लगते हैं. हमारे साथ यह दोहरा व्यवहार क्यों? हम स्त्रियाँ हैं, एक मनुष्य मात्र, यदि पुरुष समाज हमें भी खुद की तरह इंसान समझे और स्त्रियों के साथ समानता का व्यवहार करे. हम इसके सिवा कुछ नहीं चाहतीं।“

बैठक में सन्नाटा छा गया. नरेश की आँखें झुकी हुई थीं. वह काँपती आवाज़ में बोला, “आशा, मैं गलत हूँ, लेकिन यह समझ गया हूँ कि तुम मेरे घर की धुरी हो. मैं वादा करता हूँ कि अब तुम्हें देवी या राक्षसी नहीं, सिर्फ़ मनुष्य और साथी मानूँगा.”

बुजुर्ग ने सिर हिलाया, “आशा बिटिया, आज हमने भी यह सबक लिया है कि स्त्री को पूजा या दुत्कार की नहीं, मानवीय व्यवहार की ज़रूरत है. सम्मान ही उसका अधिकार है.”

घर में एकत्र स्त्रियों की आँखें चमक उठीं.

जैसे पहली बार किसी ने उनके मन की बात पंचायत में कह दी हो.

सेवाद का सफ़र

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी



रात गहराई हुई थी. तानाशाही की दीवारें ऊँची और ऊँची होती जाती थीं, पहरेदारों की आँखें चौकस थीं, अब तो बहुत से तकनीकी पहरेदार थे जो बिना दिखे चौकसी कर रहे थे. लोगों का हर कदम डर का रूप ले लेता. वे थके हुए थे, लेकिन रुकना किसी के लिए विकल्प नहीं था.

एक बुज़ुर्ग ने धीमी आवाज़ में कहा-

“रात जो गहराई है, तो सहर भी होगी.”

उसकी आवाज़ अंधकार में मशाल की तरह गूँज गई.



काफ़िला आगे बढ़ रहा था. रास्ता कठिन, लेकिन हर यात्री जान रहा था कि यह यात्रा केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए है.

यहीं पर अदृश्य साथी सेवाद प्रकट हुआ. वह किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं था, बल्कि सबके भीतर था, एक ताकत की तरह.

जब कोई बच्चे को गोद में उठाता, जब कोई बुज़ुर्ग का हाथ थामता, जब कोई अपने हिस्से का बोझ दूसरों के लिए छोड़ देता, वहीं सेवाद जीवित हो उठता.

शुरू में नौजवान पस्त दिख रहे थे. थकान उनके कंधों पर बोझ की तरह थी.

लेकिन जैसे ही बुज़ुर्ग की आवाज़ गूँजी और सेवाद की अदृश्य पुकार हर एक के भीतर से उठी-

“तुम्हारा हर कदम जनसेवा है. तुम्हारा हर त्याग जनतंत्र की ओर बढ़ता है. मत रुको.”

अचानक ऊर्जा भर आई. वे सजग होकर चलने लगे, गति भी बढ़ गई. उनकी आँखों में अब डर नहीं था, बल्कि जनतंत्र का सवेरा देखने की तमन्ना थी.



“काफ़िला निकल पड़ा है, जीत सर भी होगी!” एक नौजवान ने जवाब में पुकारा.

सेवाद ने उस पुकार को और ऊँचा कर दिया. उसकी अदृश्य उपस्थिति सब को याद दिलाने लगी, यह सफ़र केवल मंज़िल तक पहुँचने का नहीं, बल्कि तानाशाही की रात को तोड़ने का है.




वे चलते रहे, चलते रहे, फिर क्षितिज पर पहली किरण दिखाई दी, तो सबने देखा, “अंधकार सचमुच सिमट रहा था.

सवेरा केवल उजाले का नहीं था, बल्कि जनतंत्र का था.


नोट : "सेवाद" शब्द संस्कृत के "सेवा" से निकला है, और इसका प्रयोग हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में सामूहिक सेवा, त्याग और जनहित के भाव को व्यक्त करने के लिए किया जाता है.

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

कोहरे और धुंध की क़ैद

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

देश की राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की सुबह अब उजाले से नहीं, धुएँ और धूल से शुरू होती है. हवा में घुला ज़हर हर साँस को बोझिल बना देता है. अस्पतालों की ओपीडी में भीड़ बढ़ती जा रही है- जिधर देखो उधर खाँसते, हाँफते, थके हुए चेहरे दिखाई देते हैं.

अस्पताल के ओपीडी में एक स्त्री दाखिल हुई, चेहरे पर थकान, आँखों में व्याकुलता और साँसों में घरघराहट. वह डाक्टर मल्होत्रा के कक्ष के सामने रुकी. अंदर झाँक कर देखा, वहाँ दो ही मरीज थे. एक को डॉक्टर देख रही थी, दूसरा प्रतीक्षा में था. बाहर पूरी एक लाइन लगी थी. जिनमें से कुछ बीच-बीच में खाँस लेते थे. वह भी कतार में सबसे पीछे लग गयी. डॉ. मल्होत्रा उसे अच्छी तरह पहचानती थी. पिछले सत्र तक उनकी बेटी उसी स्कूल में पढ़ती थी जिसमें वह वाइस प्रिंसिपल थी. पीटी मीटिंग में वे अक्सर मिल जाती थीं. वह सीधे अंदर घुस कर उसके सामने जा कर खड़ी हो जाती तो वे उसे पहले देख लेतीं. लेकिन लाइन तोड़ना उसे गवारा नहीं था. खास तौर पर एक शिक्षिका के तौर पर. उसे खुद रोज अपने छात्रों को लाइन में लगाना पड़ता था. उन्हें लाइन का महत्व समझाना पड़ता था.
तभी उस स्त्री को खाँसी आने लगी. उसे लगा एक दो टुकड़े खाँस लेने से यह रुक जाएगी. लेकिन खाँसी शुरू हुई तो बन्द नहीं हुई. वह खाँसती चली गयी, यहाँ तक कि उसके आगे पीछे लाइन में लगे लोग उसे सहारा देने लगे.
 
इस लंबी खाँसी की आवाज डॉ. मल्होत्रा को भी सुनाई दी. उन्होंने अपनी परिचारिका को कहा, “कौन ऐसा खाँस रहा है उसे फौरन अंदर लाओ.”

परिचारिका तुरन्त बाहर गयी और खाँसती स्त्री को पकड़ कर सहारा देते हुए अंदर डॉक्टर मल्होत्रा के पास ले आई और सीधे डॉक्टर के सामने मरीज के बैठने के स्टूल पर बिठा दिया. डाक्टर उस स्त्री को तुरन्त पहचान गयी.

“अरे संध्या तुम¡ तुमने अपना ये क्या हाल कर रखा है? ये खाँसी कब से चल रही है? तुम पहले क्यों नहीं आईं?” डॉक्टर ने लगभग डाँटते हुए कहा.

"डॉक्टर, मुझे लगता है मैं अब पढ़ा नहीं पाऊँगी, मुझे यह काम छोड़ना पड़ेगा." संध्या ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा.

डाक्टर ने तुरन्त स्टेथ से उसकी जाँच की और कुछ जाँचें लिख दीं. जाँचों में कोई पुराना रोग नहीं मिला। लगता था जैसे उसकी साँसें किसी अदृश्य जाल में फँस गई हों। एक्स-रे से पता लगा, संध्या के दोनों तरफ के साइनस सूजे हुए हैं, और ब्रोंकियल ट्यूब भी प्रभावित है.
 
"यह बीमारी नहीं, यह वातावरण का प्रभाव है," डॉक्टर ने रिपोर्टों को देख कर गंभीर स्वर में कहा.

संध्या चुप रही, उसे याद आया, हर सुबह बस पकड़ने के लिए व्यस्त सड़कों पर दौड़ना, हर शाम धुएँ से भरी सड़कों से गुजरते हुए आटो रिक्शा से घर लौटना। यही उनकी बीमारी का असली कारण था. हलकी खाँसी से शुरुआत हुई. जैसे जैसे दिन बीतते वह बढ़ती रही। सूखी खाँसी के दौरे, साँस लेने में तकलीफ़, और बच्चों के सामने पढ़ाते समय अचानक रुक जाना.

"मैम, आप क्यों बार-बार रुक जाती हैं?" छात्रों का मासूम सवाल उनके भीतर गहरी चोट करता.

खाँसी का दौरा… एक मिनट… साँस अटकी… पीठ अकड़ी… आँखें नम.

यह सिर्फ़ बीमारी नहीं, बल्कि प्रदूषण का अदृश्य हमला था.

डॉ. अरोड़ा ने उसे नेज़ल-स्प्रे, नेबुलाइज़र और एंटीबायोटिक्स दीं। धीरे-धीरे राहत मिली, लेकिन पूरी तरह ठीक होने में महीना भर लग गया.

संध्या ने महसूस किया, यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है, हर दिन लाखों लोग इसी ज़हर को साँसों में उतार रहे हैं.

एक शाम, जब वह स्कूल से लौट रही थी, उसने सड़क किनारे बच्चों को देखा. वे मास्क लगाए खेल रहे थे. खेलते-खेलते वे मास्क उतारते, फिर हँसते हुए दोबारा पहन लेते. मानो मास्क उनका नया खिलौना हो. संध्या की आँखों में धुंध नहीं, आँसू भर आए.

आखिर इस जनघातक मुसीबत से शहर को कब निजात मिलेगी. पिछली सरकार ने कुछ उपाय किए थे. जिससे शहर में वाहनों का संचालन कम हो, निर्माण कार्यों पर रोक लगाई थी. लेकिन वे कारखाने जो लगातार धुआँ उगलते हुए पूंजीपतियों के लिए मुनाफा बना रहे थे उन्हें धुआँ उगलने से रोकना बस का नहीं था. शहर के नजदीक ही खड़े किए गए कचरे के पहाड़ों में लगी हुई आग जो लगातार धुआँ उगलती थी. नयी सरकार जिस पार्टी की बनी वह पुरानी सरकार की आलोचना करती थी. लेकिन उसने पुराने उपायों को भी धता बता दी थी. बल्कि प्रदूषण को नापने वाले केन्द्रों के आस पास पानी का छिड़काव करने वाले वाहनों से निरन्तर छिड़काव करवाना शुरू कर दिया था. जिससे केन्द्र प्रदूषण का माप कम बता सकें.
 
संध्या के मन में यह सोच कर गहरी निराशा भरती जा रही थी. उसकी कहानी सिर्फ़ उसकी अपनी नहीं रह गयी थी, बल्कि हर उस नागरिक की थी जो इस धुंध में जी रहा था. वायु प्रदूषण अब कोई आँकड़ा नहीं रह गया था, बल्कि एक जनघातक यथार्थ में बदल चुका था. जो रोज-रोज न जाने कितनी जानें लील रहा था, न जाने कितने लोगों की उम्र को ग्रहण लगा रहा था.

एक सवाल हवा में तैरता रह गया था-

"क्या हम आने वाली पीढ़ी को हवा नहीं, सिर्फ़ धुंध और कोहरे ही सौंपेंगे?"

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

अब नहीं लौटना

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

महानगर की ऊँची गगनचुम्बी इमारतों के बीच यदि झुग्गियों का दरिया न बह रह रहा हो तो शायद महानगर की अबाध गति यकायक थम जाए. लाखों लोगों की सेवा करने वाले और जीवन के लिए कम दामों में वस्तुएँ उपलब्ध कराने वाले लोगों से ले कर शहर से कचरा बीनने वाले लोग यहीं से तो आते हैं. ऐसी ही झुग्गियों के बीच की तंग गलियों में रीमा का बचपन बीता. उस रात जब माई ने उसे मामा की लड़की को छोड़कर आने को कहा, तब वह बुखार और चक्कर से जूझ रही थी. लौटते समय सड़क किनारे बैठ जाना उसकी मजबूरी थी, लेकिन घर पहुँचने में हुई देरी उसके लिए अभिशाप बन गई.

घर पहुँचते ही माई चीखी-
"कहाँ मर गई थी? एक घंटा लग गया! सच बता, कहाँ से आ रही है?"
"गलत काम में उलझ जाती है, तभी देर करती है." बाप ने माई के सुर में सुर मिलाया.
और फिर गालियाँ और मारपीट शुरू हो गई.
घर का माहौल पहले से ही जहरीला था. माँ-बाप दोनों आपस में झगड़ते रहते. बाप को जरा भी कसर पड़ती तो वह माँ को रण्डी कहने और उसकी खाल खिंचाई में बिलकुल नहीं झिझकता. माई भी उस पर जो दिखता फेंकने लगती. उसने माँ के न जाने कितने यार घोषित कर रखे थे. वे फिर लड़ने लगे-
माँ चीख कर बाप से बोली, "तेरी वजह से यह सब बर्बाद हुआ है."
"तू ही बच्चों को बिगाड़ रही है." बाप क्या कम था, उसे जवाब देना जरूरी था.
रीमा जो बुखार में तप रही थी, उसकी किसी को फिक्र नहीं थी.

उन दोनों की लड़ाई का अंत हमेशा बच्चों पर होता. बरसों से बच्चों को माँ-बाप का प्यार नसीब नहीं हुआ था. लोग कुत्ता पालते हैं तो उससे भी दुलार जताते हैं, लेकिन रीमा तो उस दुलार से भी महरूम थी. माँ-बाप काम पर जाते तो उसे राहत मिलती. माँ बाप की लड़ाई के बीच छठी कक्षा तक ही वह पढ़ पायी थी. फिर दिन में वह वहीं झुग्गियों के बीच एक लिफाफे बनाने वाली वर्कशॉप में काम करने लगी, जहाँ उसकी तरह अधिकांश नाबालिग काम किया करते थे. वहीं वह जीतू से मिली, दोनों दोस्त बने. एक दूसरे के दर्द साझा करने लगे.

रीमा तीन दिन तक घर में बुखार से तपती रही. कमजोर थी तो चौथे दिन भी काम पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकी. पाँचवें दिन काम पर पहुँची तो जीतू ने पूछा-
“चार दिन किधर रही.”
“बुखार से तपती रही. पर तुझे क्या? तूने तो खबर तक नहीं ली.”
“खबर कैसे लेता? तूने ही तो तेरी झुग्गी के आसपास नहीं दिखने का आर्डर दे रखा है.”
“तो क्या करूँ, बिना किसी के साथ देखे भी माई चमड़ी उधेड़ लेती है. तेरे साथ किसी दिन देख लेगी तो मार ही डालेगी.”
"मैं जानता हूँ, तेरे घर में क्या होता है. पर तू अकेली नहीं है, मैं हूँ न तेरे साथ. तू हिम्मत तो कर. छोड़ माई बाप को मेरे साथ निकल ले."

जीतू उसकी आँखों में का दर्द पढ़ लेता था जो उसके माई-बाप कभी नहीं देख पाए. लड़की ने पहली बार सोचा—जीतू के साथ निकल लेना ही शायद मुक्ति है. वह जीतू के साथ निकल ली.
दो नाबालिगों पर संदेह हुआ तो पुलिस ने रेल में बैठते बैठते दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने दोनों की कहानी सुनी. दोनों को चेतावनी मिली कि बालिग होने तक ऐसे नहीं भागना. रीमा को फिर से उसके माई-बाप को थाने बुला कर लौटा दिया. बोले अपनी लड़की का काबू में रखो. उस रात माई बाप ने कुछ नहीं कहा. लेकिन अगले दिन से फिर से पहले वाला सिलसिला शुरू हो गया.

चार महीने नहीं हुए थे कि माई ने लिफाफा फैक्ट्री के बाहर रीमा को जीतू के हाथ में हाथ पकड़े देख लिया. इस बार माई और बाप दोनों ने उसकी खाल खिंचाई की. चार दिन तक झुग्गी में बन्द रखा. पर जहाँ खाने के लाले पड़े हों वहाँ जवान होती बेटी को कितने दिन ताले में रखते. रीमा को छोड़ा और काम पर जाने को बोला.
इन चार दिनों में रीमा के भीतर एक टीस लगातार बढ़ती रही, वह सोचती रही कि, “क्या यही जीवन है? जहाँ माई-बाप अपनी ही बेटी को संदेह और हिंसा से देखते हैं, उसके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करने लगते हैं. रोटी कपड़े की लड़ाई ने ही उसके माई बाप को संवेदनाहीन बना दिया कि, वे अपने ही रक्त-मांस को दुश्मन समझने लगते हैं.

इस बार उसने ठान लिया-अब लौटना नहीं. तीन महीने चुपचाप रहेगी. कारखाने में काम के वक्त के अलावा कहीं बाहर किसी लड़के के साथ नहीं दिखेगी. तब तक वह अठारह की हो जाएगी. फिर न पुलिस उसे पकड़ सकेगी और न उसे माई बाप के पास लौटा सकेगी.
 
चौथे महीने एक दिन रीमा वापस अपनी माई बाप की झुग्गी में वापस नहीं लौटी. माई-बाप उसे तलाश करते करते थक गए. वे समझ गये कि अब लड़की उन्हें नहीं मिलेगी. और मिलेगी भी तो वे उसका कुछ नहीं कर सकते. दोनों को अब उसके साथ किया गया अमानवीय व्यवहार याद आता तो खुद की आँखों से पानी निकलने लगता.
 
वह पगार का दिन था. रीमा और जीतू ने अपनी सारी पगार ली और कारखाने से निकल गए. रीमा तो खाली हाथ थी. दोनों जीतू की झुग्गी पहुँचे. जीतू ने अपना सामान लिया और दोनों रेलवे स्टेशन पहुँचे. पहली लंबी दूरी वाली ट्रेन में चढ गए. ट्रेन का आखिरी स्टेशन एक दूसरा महानगर था. वहाँ उन्होंने शादी कर ली. यह शादी उसके लिए केवल प्रेम नहीं थी, बल्कि अपने अस्तित्व की घोषणा थी.

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

पेंशन का सौदा

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी
रामकिशोर  नगर परिषद का एक साधारण कर्मचारी था. मेहनती, ईमानदार, और अपने काम से संतुष्ट. उसे प्रमोशन मिला, लेकिन वेतन वही पुराना रहा. उसे नए पद का वेतनमान नहीं दिया गया. उसने सोचा, “न्याय अवश्य मिलेगा.” और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया.

मुकदमा दाख़िल हुआ. अदालत में पहले से ही मुकदमों का पहाड़ था. तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही. अफसरों ने भी अपनी चालें चलीं, कभी काग़ज़ अधूरा, कभी वकील अनुपस्थित. इस तरह 22 साल बीत गए.

आख़िरकार अदालत का फैसला आया, “रामकिशोर का वेतन फिक्स करो और सारा बकाया दो.”

नगर निगम के आयुक्त का का चेहरा उतर गया. लाखों रुपये देने पड़ेंगे. उसने तुरंत हाईकोर्ट में अपील पेश करवायी.

वकील ने आयुक्त को समझाया, “अपील खारिज होगी. लेकिन मैं इसे पाँच-दस साल खींच दूँगा.”

आयुक्त को राहत मिली, पर डर भी था कि कहीं उनके कार्यकाल में ही फैसला न आ जाए.

रामकिशोर की रिटायरमेंट में बस एक साल बचा था. आयुक्त ने नई चाल चली.
उसने अपने अधीनस्थ अफसर को कहा, “इसने अदालत को गुमराह किया है. फर्जी दस्तावेज़ दिए हैं. इसे चार्जशीट दो.”

रामकिशोर को चार्जशीट मिली, उसने दस्तावेज मांगे, कई दिन तक नहीं दिए गए. फिर उसने स्मरण पत्र दिया. लेकिन उसे जवाब मिला कि उसे दस्तावेज नहीं दिए जा सकते.

आयुक्त की योजना साफ़ थी—

• जांच चलते-चलते रामकिशोर रिटायर हो जाएगा.
• उसकी पेंशन रुक जाएगी.
• तब मजबूरी में वह खुद लिख देगा, “मैं प्रमोशन के मुकदमे के लाभ छोड़ता हूँ.”
• और तभी उसकी पेंशन चालू होगी.


फिर एक दिन उसे अचानक सूचना मिली कि वह जाँच में हाजिर हो.

रामकिशोर समझ गया कि यह लड़ाई अब सिर्फ़ वेतन की नहीं रही. यह उसकी गरिमा, उसकी ज़िंदगी, और उसके अधिकार की लड़ाई है.

वह सोचता रह गया, “क्या न्याय पाने की कोशिश ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी?”

रविवार, 14 दिसंबर 2025

ट्रेन मिल गयी

लघुकथा :


दिनेशराय द्विवेदी
ह सात दिनों से मुम्बई में था. आज यहाँ उसका आख़िरी दिन था. रात नौ बजे की ट्रेन मुंबई सेंट्रल से थी. सुबह उसने मेज़बान से पूछा,

“आज का पूरा दिन खाली है, क्या किया जाए?”

मेज़बान ने मुस्कराकर कहा,

“एलिफेंटा केव्ज चले जाइए. समुद्र के बीच हैं, गेटवे ऑफ इंडिया से नाव मिल जाएगी.”

वह लोकल पकड़कर विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पहुँचा और पैदल गेटवे ऑफ इण्डिया तक चला गया. टिकट लिया और थोड़ी देर बाद नाव में बैठ गया. नाव तट से दूर हुई तो समुद्र की लहरें और तेज़ हवाएँ उसे रोमांचित करने लगीं. बाल हवा में उड़ रहे थे. नाव में दस-पंद्रह किशोर भी थे, जो पिकनिक के लिए एलिफेंटा जा रहे थे. नाव में ही उन से परिचय हुआ. नाव एलीफेंटा पहुँचती तब तक किशोरों से उसकी दोस्ती भी हो चुकी थी.

वह सीमित समय में पूरा द्वीप घूमना चाहता था. पर उसकी जेब गाइड के लिए पैसे खर्च करने को तैयार नहीं थी. किशोरों ने कहा,



“आप हमारे साथ घूमिए, हम सब दिखा देंगे हमसे बेहतर गाइड कौन होगा.

दिन भर वह किशोरों के साथ ही सब साथ घूमते रहे. गुफाओं की भव्यता, द्वीप की सुंदरता और किशोरों की चहल-पहल ने उसे आनंदित कर दिया.

शाम ढलने लगी. पाँच बजने को थे. जब वे तट पर लौटे तो टिकट खिड़की पर लंबी कतार देखकर उसका चेहरा उतर गया. मन में हिसाब लगाया,

“कम से कम एक घंटा लाइन में लगेगा, सात बजे तक नाव मिलेगी. आधे घंटे में गेटवे पहुँचा भी तो अंधेरी पहुँचते-पहुँचते साढ़े आठ बजेंगे. सामान लेकर ट्रेन छूटने के पहले सेंट्रल पहुँचना असंभव था. ट्रेन छूटना तय था.”

उसके चेहरे पर उदासी देख एक किशोर ने पूछा,

“अंकल, आप इतने परेशान क्यों हैं?”

उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“रात नौ बजे ट्रेन है. अगर टिकट लेने में देर हो गई तो ट्रेन छूट जाएगी.”

किशोर ने तुरंत साथियों को बताया. उनमें से एक बोला,

“घबराइए मत अंकल, आपको अगली नाव में बिठा देंगे.”

एक किशोर उससे पैसे लेकर टिकट खिड़की तक गया. वहाँ लगी कतार में खिड़की से चौथी जगह पर टिकट लेने को खड़ी महिला से उसने विनती की,

“आंटी, मदद कर दीजिए. ये अंकल राजस्थान से आए हैं. रात नौ बजे ट्रेन है. लाइन में लगेंगे तो ट्रेन छूट जाएगी. आप इनके लिए टिकट ले लीजिए.”

महिला ने बिना झिझक टिकट लिया और किशोर को थमा दिया. उसकी चिंता मिट गई. अगली नाव में बैठकर वह गेटवे पहुँचा. वहाँ से दौड़ते हुए लोकल पकड़ी, फिर बस. अंधेरी पहुँचा तो मेज़बान ने कहा,

“खाना तैयार है, खा लो.”

उसने घबराकर कहा,

“ट्रेन छूट जाएगी.”

मेज़बान हँसकर बोले,

“नहीं छूटेगी. ट्रेन बोरीवली भी रुकती है. वहाँ से साढ़े दस बजे चलेगी. हम साथ खाना खाएँगे, फिर मैं कार से आपको बोरीवली छोड़ दूँगा.”

उसकी साँस में साँस आई. खाना खाकर वे निकले. मेज़बान ने उसे बोरीवली स्टेशन ट्रेन आने के पंद्रह मिनट पहले पहुँचा दिया. उसे ट्रेन मिल गई.