Monday, November 21, 2016

सिकुड़न

कविता



____________ दिनेशराय द्विवेदी





अहा!
वह सिकुड़ने लगा

लोग उसे आश्चर्य से देख रहे हैं
वे भी जो अब तक
उसे सिर पर उठाए हुए थे

कुछ लोग तलाश रहे हैं
कहाँ से पंक्चर हुआ है
वे पकड़ कर
उसे तालाब के पानी में
डूबोना चाहते हैं
देख सकें कि हवा
निकल कहाँ से रही है

वह तालाब में घुस ही नहीं रहा है
सारे लोगों की ताकत कम पड़ गई है
बस सिकुड़ता जा रहा है

उन्हों ने उसे तालाब मे घुसेड़ने
की कोशिश छोड़ दी है

आखिर सिकुड़ते सिकुड़ते एक दिन
हो ही जाएगा पिचका हुआ गुब्बारा
तब बच्चे फुलाएंगे उस की छोटी छोटी चिकोटियाँ
और फिर
मुक्का मार कर फोड़ देंगे

अहा!
वह सिकुड़ने लगा है।

Post a Comment