Thursday, January 27, 2011

सोनवणे की शहादत अपना मोल वसूल कर सकती है

तिरिक्त कलेक्टर यशवंत सोनवणे को तेल माफिया द्वारा जिंदा जलाकर मारने के विरोध में महाराष्ट्र के 18 लाख सरकारी कर्मचारी आज हड़ताल पर रहे। कर्मचारियों के इस दबाव में महाराष्ट्र सरकार को मजबूर कर दिया कि वह तेल माफिया के खिलाफ दिखाई देने वाली कार्यवाही करे। आज ही महाराष्ट्र में करीब 200 जगहों पर तेल में मिलावट करने वालों पर छापा डाला गया है। और इस कार्रवाई में अब तक 180 लोगों को गिरफ्तार करने की सूचना है। पुलिस ने इस हत्याकांड के 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन महाराष्ट्र में यह आम चर्चा है कि तेल माफियाओं की कमान प्रदेश के राजनेताओं के हाथों में है, कहीं कहीं दबी जुबान से इस बात को मीडिया ने भी कहा है।उधर नई दिल्ली में भी केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने आपात बैठक बुलाई है जिस में तेल कंपनियों के अधिकारी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भाग ले रहे हैं। इस बैठक का दिखता हुआ  उद्देश्य देश भर में पेट्रोल में चल रहे मिलावट के गोरखधंधे पर लगाम लगाने के लिए योजना बनाना है।
प्रश्न सामने हैं कि महाराष्ट्र सरकार, उस की पुलिस और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय यह सब कार्यवाही करने के लिए अब तक क्या यशवंत सोनवणे की हत्या किए जाने की प्रतीक्षा कर रहा था? यह सब कार्यवाही पहले क्यों नहीं की जा सकती थी? क्या ये सब कार्यवाहियाँ लगातार नहीं चलती रहनी चाहिए थीं? वास्तविकता यह है कि यशवंत सोनवणे की हत्या से महाराष्ट्र सरकार, उस की पुलिस और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये सब उसी मशीनरी के हिस्से हैं जो इस माफिया को पनपाता है। इस व्यापार में इन सब की भी कहीं न कहीं भागीदारी है। फिर भी महाराष्ट्र सरकार, उस की पुलिस और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को कार्यवाही इसलिए करनी पड़ रही है कि इस घटना ने महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों, तेल उपभोक्ताओं और आम जनता को उद्वेलित किया है। उद्वेलित जनता कुछ भी कर सकती है। उसी के भय से इन्हें यह सब करना पड़ रहा है। हमारा अनुभव है कि समय गुजरने के साथ ये सब कार्यवाहियाँ दिखावा या आत्मरक्षा के लिए की गई फौरी कार्यवाहियाँ साबित होती हैं।
न 18 लाख सरकारी कर्मचारियों में, जो आज हड़ताल पर रहे हैं अधिकांश ईमानदार हैं। वे अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते हैं  और उन्हें जो कुछ वेतन के रूप में मिलता है उसी से अपना जीवन यापन करते हैं या फिर कुछ कमी हो तो उस के लिए नौकरी के बाद कुछ न कुछ काम करते हैं। वे श्रमजीवी हैं, वे ही हैं जो सारी मार झेलते हैं, चाहे वह महंगाई हो, या फिर मिलावट कर के फैलाया जा रहा ज़हर हो। ये ही वे लोग हैं जो चाहें तो दुनिया को पलट सकते हैं। कमी है तो इस बात की है कि उन्हें अपनी इस शक्ति का बोध नहीं है। उस के इस्तेमाल के लिए वे उस तरह से संगठित भी नहीं हैं जैसे उन्हें होना चाहिए था। यह ही वह शक्ति है जो केवल दिनों में नहीं घंटों में भ्रष्टाचार से निपट सकती है, उसे क़ब्र में दफ़्न कर सकती है। केवल एक चेतना और एक साथ कार्यवाही करने की क्षमता इन में उत्पन्न हो जाए तो यह बात कोई स्वप्न नहीं है, यह हो सकता है और एक दिन हो कर रहेगा। ये सभी कर्मचारी केवल इतना संकल्प कर लें कि वे सरकारी मशीनरी में कोई भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और न होने देंगे। जो भी भ्रष्ट आचरण करेगा उस के विरुद्ध समूहबद्ध हो कर खड़े हो जाएंगे और तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक कि भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त नहीं हो जाए। निश्चित रूप से महंगाई, भ्रष्टाचार, मिलावट के ज़हर से सताई हुई जनता भी इन्हीं के साथ खड़ी होगी। यह वक्त है जब वे यह संकल्प कर सकते हैं और उस पर चल सकते हैं। यही वह रास्ता है जिस से यशवंत सोनवणे की शहादत अपना मोल वसूल कर सकती है।
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