Saturday, June 5, 2010

'वीर भोग्या वसुन्धरा' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग


नवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के सात सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही यादवचंद्र जी के काव्य का रूप भी परिवर्तित होता जाता है।  इसे  आप इस नए सर्ग को पढ़ते हुए स्वयं अनुभव करेंगे। आज इस काव्य का अष्टम सर्ग "वीर भोग्या वसुन्धरा" प्रस्तुत है ......... 
परंपरा और विद्रोह  
* यादवचंद्र *

  अष्टम सर्ग
'वीर भोग्या वसुन्धरा'

चम-चम चम-चम् तेगा चमके
बनी रहे तेगा की शान
उत्तर–दक्षिण – पूरब–पश्चिम 
चहुँ दिशि तेगा करे पयाम
बनी दाहिने रहे भैरवी
काली मैया रहें सहाय
पूजा करूँ काल मैं तेरी
कोई खाली वार न जाय
उबुक–डुबुक कर गर्म खून में
आज मुरा का दूध नहाय
इस के लेखे जाति–गोत क्या
उत्तम खून सर्द हो जाय
मर्दानी की असल कसौटी
बीच समर नंगी तलवार
असल बाप का रक्त–कि मारे
जो बढ़ कर दो टूका वार
बादल गरजे कभी न बरसे
गरजे का कब हुआ बखान
तुझे कसम है बून्द बाप की
आजा नन्द खुले मैदान
राजपूत की माँ की कितनी
कोख बली देते हज्जाम
अरे नाम लेवा बापू का
अपने बूते तेगा थाम-
राजपूत-ब्राह्मण का अब तक
इस धरती पर था अधिकार
लेकिन अब तो चन्द्रगुप्त की
धरती को नापे तलवार
भले देवता ब्राह्मण घर के
रूठें, होंय विधाता वाम
मैं तो भक्त काल का पूजक
निज पौरुष का दोनों शाम
हो जाऊंगा जो मैं दिग्पति
धर्म-कर्म सब देंगे साथ
अगर मुरा रह गई हजामिन
तो यह सब होंगे बेहाथ
लोक बना जिसका, उसका ही
सदा बना करता परलोक
जिसका बिगड़ा लोक, धर्म का
उस पर रहा सदा से कोप
लीक पकड़ कर चले कि जिसके
चलते सधे वर्ग का स्वार्थ
वेद अगर ब्राह्मण का जन्तर
गीता रचे कृष्ण और पार्थ
युग की मांग, वर्ग जनमा दे
अपने मन लायक भगवान
शासन-दण्ड बड़ा जादूगर
पल में रच दे नया विधान-
आग पाछ सब मुरा-सुत ने
परखा और हुआ तैयार
एक जिस्त में चन्द्रहास जा
घोड़े पर हो गया सवार
दरक–दरक कर धरती दरके
तड़–तड़–तड़–तड़के आकाश
दसों दिशाएँ थर–थर काँपें
बम–बम–बम बमके पाताल
घोड़ा उड़े हवा में जैसे
सधे भील का तीर चले
भगा जाय मुराज कि जैसे
बिजली घन को चीर चले
देखे चान्द दूज का तेगा
देखे और छपित हो जाए
देख–देख कौटिल्य शुद्र का
खेला, भड़के औ घबड़ाय

X X X X X X X X X X X X X X X X

अब प्रश्न यह दुर्दांत है
द्विज वर्ण निर्बल क्लान्त है
तूफान ध्रुव है, देख लो ....
आकाश गुम–सुम शान्त है

चाणक्य सब कुछ गुन रहा
जो क्षीण–सा मस्तिष्क में
है बज रहा स्वर–सुन रहा
‘होगी अशान्ति भविष्य में’

है प्रश्न दुस्तर स्वत्व का
और , द्विजगण खार खाए
जो कि बैठे थे युगों से,
–आज दोनों हार खाए

अब शूद्र की तलवार है,
तलवार में अधिकार है
अधिकार को दे मान्यता
वह धर्म भी तैयार है

वह धर्म है समुदाय का
समुदाय उस के साथ है
अब व्यक्ति का टिकना कठिन
उस के करोड़ों हाथ हैं

विद्रोह को जो दे दिशा
अनुकूल अपने–युक्ति क्या ? .......  
समुदाय की तलवार उसके
सिर उड़ादे–सूक्ति क्या ? .....     

यह नन्द अति मतिमन्द है
दुर्बुद्ध है, स्वच्छन्द है
इस से न द्विज–विधि रक्ष्य है
यह नीच, पामर, मन्द है

बस, शेष मात्र उपाय है
वह शूद्र अपनी पाँत तसे
हट कर, तिलक ले राज का
सब विधि, विहित द्विज हाथ से
यह दण्ड मर्यादित रहा है
जो युगों से, थाम ले
मेरे किये जो था कठिन
अब यह उसे अंजाम दे

X X X X X X X X X X X X X X X X

जब व्यक्ति का ‘हम’–सोचता  चाणक्य है
लांघ जाए पारधि को तब जान लो यह
टूट कर निज वर्ण से अपवर्ग का वह
पोषण करेगा रूढ़ियों का दास बन

दासत्व का यह रूप है मोहक घना
पर शूद्र इस को मानता सौभाग्य है
जब जाति गुण से हीन होगा नीच तब
दाव मेरे विधि–विधानों का चलेगा

मसि हमारी लोक पकड़े जो चली है
खड़्ग दौड़े शूद्र की उस राह पर, तब
नन्द के निज वर्ग को आपत्ति क्या, जब
पहरुआ, चारण बने संसार उसका ?

हाँ, है भयंकर यह कि मेरे मार्ग से
कोई अलग वह पंथ जब अलग बना
नव विधानों की करे रचना अलग
सारे सुधारों को भगा, धत्ता बता

चाणक्य के रहते मगर होगा नहीं
जो सोचता भवितव्य है, संसार है
हैं गलतियाँ लाखों मगर–संसार में
अनुकूल लखों बूटियाँ हैं, युक्तियाँ


हे वीर भोग्या मेदिनी जब तक यहाँ
है धर्म शास्वत वयक्ति की बस–वीरता,
चाणक्य है समझा रहा–हे वीर ¡  तू 
है आर्य कुल का रत्न, वर्गों के परे

देखो ¡ सिकंदर का पड़ा आदर्श जो
हम्मू रवी का बाबुली इतिहास या
है थेवसो का जो अमर मिस्री खड़्ग
है चंद्र ¡ ये सब खोलते हैं राज क्या?

इनकी भुजा में शक्ति है ये आर्य हैं
भूगोल पर ये अवतरित देवांश हैं
कुल, गोत्र, वर्गों से न लेते ब्याज जो
आद्यंत अहरह जगमगाते हंस ये

हर वर्ग के प्रत्यक्ष ही हैं देवता
देवत्व की रक्षा नृपों का धर्म है
तू भोग बन कर देवता सारी मही
हे व्यक्ति के अभिमान¡ शासन–दंड ले

मैं विधि–विधानों से तुझे
सज्जित किये हूँ दे रहा

X X X X X X X X X X X X X X X X

राजतिलक पड़ गए चन्द्र के
एक हुए बाभन–हज्जाम
देको पाते तख्त–ताज के
बदल गया नाऊ खान्दान
रातों–रात फौज जा नापे
पूरब दिशा–देश बंगाल
जीते हिमालया की घाटी
पश्चिम में सारा पंजाब
सिन्ध देश पर उड़े पताका
काश्मीर, काबुल, कन्धार
नापे दूर–दूर तक उत्तर
दक्षिण में सारा पट्ठार
बजे दुन्दुभी देव लोक मे
देश–देश की परी जवान
नाचे राज सभा में झम्-झम्
जमीं छोड़ कर मस्त उतान
महफिल में गन्धर्व सुनावें
राम छतीसा दोनों शाम
सरस्वती वीणा ले संगति
करें नियम से, बिना छदाम
लक्ष्मी चवँर ढुलावें, छिटके
चन्द्रगुप्त का तेज–अंजोर
बाभन राजे मन्त्री पद पर
नाऊ रहे–वही मुहँचोर
यादवचंद्र पाण्डेय
‘झोरा–छूरा कभी न छूटा
सदा बड़ों के ताबेदार
बड़े हार कर जीते, औ हम
खाये सदा जीत कर हार  
 
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