Saturday, September 5, 2009

अध्यापक जी का न्याय, शिक्षक दिवस पर एक नमन !

प्राइमरी स्कूल था। सुबह प्रार्थना होती थी। सभी विद्यार्थी स्कूल के बीच के मैदान में एकत्र होते। हर कक्षा की एक पंक्ति थी। पंक्ति का मुख मंच की ओर होता। प्रार्थना के बाद दिन भर के लिए हिदायतें मिलती थीं। उस दिन स्कूल के एक अध्यापक जी ने प्रार्थना के बाद सब विद्यार्थियों को अपने अपने स्थान पर बैठने को कहा। सब बैठ गए।
ध्यापक जी ने अपनी बुलंद आवाज में कहा। मैं आप सब से एक प्रश्न पूछता हूँ, सब विद्यार्थियों को जोर से जवाब देना है।
ध्यापक जी ने पूछा -क्या चोरी करना अच्छी बात है?
ब विद्यार्थी बोले -नहीं ईईईईई.......।
ध्यापक जी -चोरी करने वाले को सजा मिलनी चाहिए या नहीं? 
विद्यार्थी  -मिलनी चाहिए एएएएएए....।
ध्यापक जी  -और यदि चोर खुद ही पश्चाताप करे और अपनी गलती स्वीकार करते हुए आगे गलती न करने को कहे तो क्या उसे माफ कर देना चाहिए?
ब विद्यार्थी बोले -नहीं ईईईई ........।
ध्यापक जी  -तो उसे सजा तो कम मिलनी चाहिए?
ब विद्यार्थी बोले -हाँ आँआँआँआँ .......।
ध्यापक जी फिर बोले -तो सुनिए यहाँ बैठे विद्यार्थियों में से एकने कल अपने पिताजी की जेब में से रुपए चुराए हैं। यदि वह विद्यार्थी पश्चाताप करेगा और यहाँ सब के सामने आ कर अपनी गलती स्वीकार कर लेगा तो हम उसे कम सजा भी नहीं देंगे, और माफ कर देंगे। 
विद्यार्थियों में सन्नाटा छा गया। बच्चे सब एक दूसरे की ओर देखने लगे। आखिर उन मे कौन ऐसा है? दो मिनट निकल गए लेकिन कोई विद्यार्थी सामने न आया। 
अध्यापक जी फिर बोले -देखिए दो मिनट हो चुके हैं मैं दो मिनट और देता हूँ, वह विद्यार्थी सामने आ जाए। 
लेकिन फिर भी कोई सामने नहीं आया। दो मिनट और निकल गए। अब विद्यार्थी खुसर-फुसर करने लगे थे।
अध्यापक जी फिर बोले -देखिए  अतिरिक्त दो मिनट भी निकल गए हैं। अब पश्चाताप का समय निकल चुका है लेकिन मैं उस विद्यार्थी को एक मिनट और देता हूँ, यदि अब भी विद्यार्थी सामने नहीं आया तो उसे सजा ही देनी होगी। वह विद्यार्थी सामने आ जाए।
पूरे पाँच मिनट का समय निकल जाने पर भी वह विद्यार्थी सामने न आया। अध्यापक जी ने समय पूरा होने की घोषणा की और मंच से उतर कर नीचे मैदान में आए और एक पंक्ति में से एक विद्यार्थी को उठाया और पकड़ कर मंच पर ले चले। मंच पर उसे विद्यार्थियों के सामने खड़ा कर दिया। फिर बोलने लगे -इस विद्यार्थी ने अपने पिता की जेब से कल पचास रुपए चुराए हैं। पहली सजा तो इसे मिल चुकी है कि अब सब लोग जान गए हैं कि यह विद्यार्थी कैसा है। लेकिन सजा इतनी ही नहीं है। इसे यहाँ पहले घंटे तक मुर्गा बने रहना पड़ेगा। हाँ, यदि यहाँ यह कान पकड़ कर स्वयं स्वीकार कर ले कि उसने रुपए चुराए थे और उन रुपयों का क्या किया? तो इसे मुर्गा नहीं बनना पड़ेगा।
विद्यार्थी अब तक रुआँसा हो चुका था। उस ने रुआँसे स्वर में स्वीकार किया कि उस ने पचास रुपए चुराए थे जिस में से कुछ खर्च कर दिए हैं और कुछ उस के पास हैं। जो वह यहाँ निकाल कर दे रहा है। वह प्रतिज्ञा करता है कि वह जीवन में कभी भी चोरी  नहीं करेगा। किसी दूसरे की किसी वस्तु को हाथ भी न लगाएगा। उस ने वे रुपए निकाल कर अध्यापक जी को दिए। 
अध्यापक जी ने कहा -अभी सजा पूरी नहीं हुई। अभी तुम्हें कान पकड़ कर दस बैठकें यहाँ सब के सामने लगानी होंगी। विद्यार्थी ने दस बैठकें सब के सामने लगाईं। अध्यापक जी ने कहा -इस विद्यार्थी ने अपनी गलती स्वीकार ली है और उस का दंड भी भुगत लिया है। अब इसे कोई चोर न कहेगा। यदि किसी विद्यार्थी ने इसे चोर कहा और उस की शिकायत आई तो उसे भी दंड मिलेगा। 
सुबह की प्रार्थना सभा समाप्त हुई। विद्यार्थी ही नहीं, विद्यालय के सब शिक्षक और कर्मचारी भी इस न्याय पर हैरान थे। सब जानते थे कि सजा पाने वाला विद्यार्थी स्वयं उन अध्यापक जी का पुत्र है।
मुझे उन अध्यापक जी का नाम स्मरण नहीं आ रहा है। लेकिन आज शिक्षक दिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए नमन करता हूँ।
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