Sunday, July 13, 2008

तम्बाकू छोड़ दो, बाकी सब दुरूस्त है।

ये बरसात का सुहाना मौसम, सब ओर हरियाली छाई है। इधर बरसात भी मेहरबान है। घर के सामने वाले सत्यम उद्यान में रौनक है। लोग नगर छोड़ कर बाहर भाग रहे हैं। नदी-नालों-तालाबो-झरनों के किनारे रौनक है, और इतनी है कि जगह की कमी पड़ गई है। नए-नए गड्ढे तलाशे जा रहें हैं, जिन के किनारे पड़ाव डाले जा सकें। गोबर के उपलों का जगरा लगा कर दाल-बाफले-कत्त बनाए जा सकें। पकौड़ियाँ तली जा सकें, विजया की घोटम-घोंट के लिए बढिया सी चट्टान नजदीक हो। बस मौज ही मौज है।

पर 50 से ऊपर वालों पर चेतावनियाँ लटकी हैं। उधर चार दिन पहले प्रयाग में गंगा किनारे ज्ञानदत्त जी को गर्दन खिंचवा कर सही करानी पड़ी, तो इधर हम अलग ही चक्कर में पड़ गए। इस मौज-मस्ती में कुछ खाने का हिसाब गड़बड़ा गया। खाए हुए का अपशिष्ट बाहर निकलने के बजाय शरीर में ही कब्जा जमाए बैठ गया। वेसै ही जैसे चुनाव के दिनों में बहुत से लोग खाली जमीनों पर कब्जा कर बैठते हैं और फिर जिन्दगी भर हटते नहीं। हट भी जाते हैं तो कब्जा किसी दूसरे को संभला जाते हैं।

कब्ज के इसी दौर में शादियाँ आ धमकीं। शुक्रवार रात शादी में गए और वहाँ पकवान्न देख रहा नहीं गया। नहीं-नहीं कर के भी इतना खा गए कि दो-तीन दिन की कब्ज का इंतजाम हो गया। वहाँ से लौट कर पंचसकार की खुराक भी ले ली। पर कब्जाए लोग कहाँ नगरपालिका और नगर न्यास की परवाह करते हैं जो हमारी आहार नाल पंचसकार की परवाह करती। शनिवार सुबह दो तीन बार कोशिश की, लेकिन कब्जा न हटना था तो नहीं हटा। दिन में हलका खाया। तीन घंटे नीन्द निकाली। रात को फिर मामूली ही खाया। काम भी मामूली किया।

रात को तारीख बदलने के बाद सोने गए तो निद्रा रानी रूठ गई। कब्जाए लोग हल्ला कर रहे थे। कभी पेट के इस कोने में, तो कभी उस कोने में। कभी ऊपर सरक कर दिल के नीचे से धक्का मारते, तो दिल और जिगर दोनों हिल जाते। पीठ की एक पुरानी पेशी कभी टूट कर जुड़ी थी, बस वहीं निगाह बनी रहती। लगता जोड़ अब खुला, तब खुला।

पिछले साल एक दिन अदालत में चक्कर खा गए थे। शाम को डाक्टर को दिखाया तो पता लगा। रक्त का दबाव कुछ बढा हुआ है। हम ने उछल-कूद कर, वजन घटा कर, (राउल्फिया सर्पैन्टाईना)  का होमेयोपैथी मातृद्रव ले कर यह दबाव तो सामान्य कर लिया। लेकिन उछल-कूद में कहीं साएटिका नामक तंत्रिका को परेशानी होने लगी तो उछलकूद बंद। वजन फिर बढ़ने लगा। हम ने घी दिया जलाने, और शक्कर वार-त्योहार को समर्पित कर, इसे कुछ नियंत्रित किया। लेकिन शक का कोई इलाज नहीं।

रात एक बजे तक नीन्द नहीं आई। दर्द शरीर में इधर-उधर भटक रहे थे। नीन्द नहीं आती, तब खयालात बहुत आते हैं और सब बुरे-बुरे। लोगों के किस्से याद आते रहे। जिन्हों ने दिल के दर्द को पेट की वात का दर्द समझा, ज्यादातर हकीम साहब तक पहुँचने के पहले ही अल्लाह को प्यारे हो गए, जो पहुँचे थे उनमें से कुछ ईसीजी मशीन पर शहीद हुए और कुछ आईसीयू में। इक्का-दुक्का जो बचे वे डाक्टर साहब की डाक्टरी चलाने के लिए जरूरी शोहरत के लिए नाकाफी नहीं थे।

हमने सोई हुई संगिनी को जगाया। पेट की वात बहुत तंग कर रही है। उस ने तुरंत ऐसाफिडिटा का तनुकरण आधा पानी प्याले में घोल कर पिलाया, ऊपर से बोली नाभि में हींग लगाई जाए। पर नौबत न आई। हमारी हालत देख कब्जा जमाए लोगों में से कुछ को ब्रह्महत्या के भय ने सताया होगा, तो भागने को दरवाजा भड़भड़ाने लगे। हमने भी शौचालय जाकर उन्हें अलविदा कहा। थोड़े बहुत जो जमे बैठे रह गए उन्हें सुबह के लिए छोड़ दिया। रात को ही संगिनी ने कसम दिलायी कि सुबह डाक्टर के यहाँ जरूर चलना है।

सुबह नहा-धोकर, चंदन-टीका किया ही था कि डाक्टर के यहाँ ठेल दिए गए। पचास रुपए में प्रवेश पत्र बना। चिकित्सक को दिखाया। उस ने विद्युतहृदमापक बोले तो ईसीजी और शुगर जाँच कराने को लिखा। तीन-सौ-सत्तर और जमा कराए। कुल हुए चार-सौ-बीस। ईसीजी हो गया। शुगर के लिए तो सुबह खाली पेट और खाने के दो घंटे बाद बुलाया गया, जो आज संभव ही नहीं था। उस के लिए कल की पेशी पड़ गई। फिर दिल का नक्शा जो कागज पर छाप कर दिया गया था, ले कर चिकित्सक के पास पहुँचे तो उस ने सब देख कर पूछा-धुम्रपान करते हो?

हमने कहा- तीस-पेंतीस साल पहले ट्राई किया था, पर स्वाद जमा नहीं।

तम्बाकू खाते हैं?

हम बोले- हाँ।

तो फिर पूछा- कितना खाते हो?

हमने कहा- कोई नाप थोड़े ही है।

चिकित्सक बोला- जाओ तम्बाकू छोड़ दो, बाकी सब दुरूस्त है। कुछ नहीं हुआ।

मैं मन ही मन भुन कर रह गया। वे चार-सौ-बीस जो मेरे टूटे, उन का क्या? डाक्टर को थोड़ा बहुत मनोविज्ञान भी आता था। एमबीबीएस या एमडी करते वक्त जरूर पढ़ाया गया होगा। हमारी मुखाकृति पढ़ कर भांप गया। उसने पर्ची वापस ली एक गोली सुबह-शाम भोजन के पहले, पाँच दिन तक। दवा वाले ने पूरे पैंतालीस रूपए झाड़े और बताया कि अम्लता की दवा है।

आज की सुबह पड़ी चार-सौ-पैंसठ की।

17 comments:

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

तम्बाकू खाते हैं? आदरणीय बडे भाई, सचमुच में सोंचना पडेगा । अभी अभी मेरे घर में भी इस पर गृहमंत्रालयीन बहस हुई है । हम तो अंडर वेट हैं जम के दौडते हैं पर ये मुआ तम्बाकू ? का करें ।

Advocate Rashmi saurana said...

bhut achha likha hai. jari rhe.

bavaal said...

Aadarniya Dineshjee,
Aalekh achha laga. Tambaakoo buri lagi.
Man ko prafullta mili. Tambaakoo pe krodh aaya.
Lamblekh naya mila. Raag puraanaa ghisa pita hee sahi par karnpriy laga.
Amltaa mahsoos kee. Tipiyaane ke baad goli lene ko mujhe bhee jana padega.

---Magar bandook kee. Karan ye ki is baar rishtedaaron kee shaadiyon main sara stock khatam ho gaya. You know, Self-Protection zindabaad.

सतीश पंचम said...

राउल्फिया सर्पैन्टाईना - ये नाम तो किसी जर्मन महिला का लगता है by the way वकील साहब- पेट पर हाथ रख कसम खाईये कि जो कुछ खायेंगे सच खायेंगे, सच के सिवा कुछ नहीं खायेंगे.... :D

bavaal said...

Neeche vali line likhne ke pahile hee button dab gayee aur adhoora comment prakashit ho gaya. Sorry jee !
---Aage ye aur padhain.
Sada aapkee isi prakaar kee shaandaar poston ke intzaar main.
-Aapka apna Bavaal

प्रभाकर पाण्डेय said...

सादर नमस्कार। आपके सभी लेख सटीक और यथार्थ तो होते ही हैं पर उनमें पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करने की एक खास मिठास होती है। सुंदरतम लेख।

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनूप शुक्ला to me 7:05 PM

लगता है सारे साइटिका महाराज अपने ब्लाग पर टिप्पणी करने नहीं देते। सो
मेल से टिपियाया जा रहा है। तम्बाकू डाक्टर कह है तो छोड़ दीजिये न! इसके
बाद तम्बाकू छोड़ दी मैंने लेख लिखिये। अब तो आप उस उम्र के बाहर हो लिये
लेकिन कल कहीं मिलेटरी में भर्ती के लिये उन अभ्यर्थियों को बाहर कर
दिया गया जो पान,मसाला,गुटका खाते थे। कल को माननीय अदालतें भी ये रुख
अख्तियार न कर लें। :)

Udan Tashtari said...

तम्बाखू खाने की आदत-कितना सरल होता है कहना कि छोड़ दो. कितना कठिन छोड़ देना-हमसे पूछे कोई तो बतायें हम!! :)

arvind mishra said...

स्वास्थ्य के आगे रूपये पैसे की क्या कीमत है -आप स्वस्थ हैं अच्छा लगा .टेक केयर !

लोकेश said...

अरे, हमारे एक मित्र तो कहते हैं कि तम्बाकू छोड़ना बहुत आसान है, वे स्वयं सैकड़ो बार छोड़ चुके हैं!

शब्द चित्र अच्छा है।

राज भाटिय़ा said...

भगवान का शुकर, अजी हम ने तो आप से मिलने का प्रोगराम बना रखा हे, तो भाई दिनेश जी हमारे लिये ही इस कम्बखत तम्बाकू को छोड दो,धीरे धीरे ... नही, अजी एक दम से तभी छुटे गा.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

हा हा हा! हम तो तम्बाकू खाता नहीं, पीता हूँ. नरभस होने की कौनो बातिया तो नहीं न है?

...और फोटोइया बड़ा जानदार लगा दिए हैं द्विवेदी जू, देख कर तबीयत परसन्न हुई गयी. हा हा हा!

डा० अमर कुमार said...

कभी देखता अनवरत का बदला कलेवर
कभी भटकाता आपके फोटो का फ़्लेवर

डाक्टर को बोले नहीं कि क्यों दिखाते तेवर
मरीज़ों को धूल फँकाते और खुद खाते घेवर

वैसे..पोस्ट अच्छी बन पड़ी है, बड़े दिनों बाद मुकालात हो रही आपसे
इतनी अच्छी कास्मेटिक सर्ज़री कहाँ से करवायी, हमें भी जरा बताइये तो

अभिषेक ओझा said...

ब्लॉग जगत लगता है बिमारियों का प्रकोप जारी है... यहाँ तो हम बारिश देख के पकौडी खाने के लिए मचल जाते हैं, घर जाने की फुर्सत नहीं और बाहर का खाने की हिमात नहीं होती... घर फिर बदल लिया किचेन सेट नहीं हो पाया है :(

फोटो तो बहुत अच्छी आई है... स्वस्थ का ध्यान रखिये... मैं क्या उपदेश दूँ लेकिन तम्बाकू छोड़ ही दीजिये... दृढ़ निश्चय कर लीजिये एक बार फिर कुछ मुश्किल नहीं.

siddharth said...

वकील साहब, लगता है कब्जेदारों से मुकदमा हार रहे हैं। थोड़ा और जोर लगाइये। वैसे आज-कल के मौसम में इनकी सक्रियता थोड़ी बढ़ ही जाती है। अन्दर तो आएंगे स्वादिष्ट निवाले में बैठकर लेकिन बाहर जाने में तमाम ना-नुकुर शुरू कर देंगे। धूम-धड़ाके की नौबत आ जाती है, फिर गोलियाँ चलानी पड़ जाती हैं। तब कहीं टकसते हैं। वैसे इनको अन्दर पैठने ही न दिया जाय तो ही बेहतर है। ज़रा सा मुँह से लगाइए नहीं कि हावी (heavy) होने लगते हैं। इनको तो दूर से ही नमस्ते कर लेना चाहिए।
अच्छी और प्रासंगिक पोस्ट… साधुवाद।

anitakumar said...

बहुत ही सुन्दर शब्द चित्रण, फ़ोटो भी सुंदर आयी है। अपनी कल्पना में आप के व्यक्तित्व के साथ तंबाकू नहीं जोड़ा था, ख्याल ही नहीं आया, हमें पूरी उम्मीद है धर्म पत्नी जी अब तंबाकू हटाओ अभियान छेड़ देगीं और सफ़ल भी होगीं

Nitin Bagla said...

ब्लैक एण्ड व्हाइट फोटो और रंगीन फोटो में बहुत अंतर है...उसे ही लगा रहने देते :)
उम्मीद है तबियत ठीक हुई होगी...जरदा तो छोड ही दीजिये।
नितिन बागला

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