@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: शाह ईरान द्वारा वृक्षारोपण का मुहूर्त

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

शाह ईरान द्वारा वृक्षारोपण का मुहूर्त

रान के बादशाह का किस्सा जिसे फ्रेंक्विस बर्नियर ने अपनी किताब में जगह दी, मैं अपने वायदे के मुताबिक कल आप के पेश-ए-नजर नहीं कर सका था। लेकिन आज कोई बाधा नहीं है। तो देर किस बात की? शुरू करते हैं ....

रान के प्रसिद्ध बादशाह शाह अब्बास ने कहीं अपने महल मेंबगीचा लगाने की आज्ञा दी थी और इस काम के लिए एक दिन भी नियत कर चुका था। बादशाही बागवान भी मेवे के कुछ वृक्षों के लिए एक उचित स्थान चुन चुका था। परन्तु बादशाही ज्योतिषी ने नाक-भौं चढ़ा कर कह दिया कि यदि सायत निकाले बिना वृक्ष लगा दिए जाएंगे तो कदापि नहीं फूलेंगे-फलेंगे। बादशाह शाह अब्बास ने नजूमी की बात मान कर सायत निकालने को कहा तोउस ने पाँसा आदि डाला और अपनी पुस्तक के पृष्ठ उलट-पलट कर हिसाब लगाया और कहा कि नक्षत्रों के अमुक अमुक स्थानों में होने के कारण जान पड़ता है कि दूसरी घड़ी के बीतने के पहले ही वृक्ष लगा दिए जाएँ।

बादशाही बागवान जो नजूमियों तथा ज्योतिषियों से कुछ पूछना व्यर्थ समझता था इस समय उपस्थित नहीं था। अतः इस के बिना ही कि उस के आने की प्रतीक्षा की जाए, गड्ढे खुदवाए गए और बादशाह ने अपने हाथों से वृक्षों को स्थान स्थान में लगा दिया।  ताकि पूर्व स्मृति की रीति पर कहा जाए कि ये वृक्ष स्वयं शाह अब्बास ने अपने हाथों लगाए थे। इधर बागवान जो अपने समय पर तीसरे पहर आया तो वृक्षों को लगा हुआ पा कर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। और यह विचार कर के कि वे उस क्रम से नहीं लगाए गए हैं जैसे उस ने विचारा था, जिस से उसे उन के पोषण में सुभीता रहता। उस ने सभी पौधों को उखाड़ कर उन की जगह मिट्टी डाल कर रख दिया। रात भर वृक्ष इसी तरह रखे रहे। 


ज्योतिषी से किसी ने जा कर यह बात कह दी। इस का परिणाम यह हुआ कि वह बादशाह के पास जा कर बागवान की इस कार्यवाही के लिए बुरा-भला कहने लगा। अपराधी बागवान को उसी समय बुलाया गया। बादशाह ने उस से अत्य़न्त क्रोध के साथ उस से कहा - "तू ने यह क्या हरकत की कि जिन दरख्तों को हम ने नेक सायत निकलवा कर अपने हाथ से लगाया था उन को ही उखाड़ डाला। अब क्या उम्मीद है कि इस बाग का कोई दरख्त फल लाएगा, क्यों कि जो नेक सायत थी वह तो गुजर गई और फिर नहीं आ सकती।"


बागवान एक स्पष्टवादी गँवार मुसलमान था। नजूमी की ओर तिरछी दृष्टि डाल कर बोला -"अरे! कमबख्त बदशकुनी,जरा ख्याल तो कर कि यही तेरा नजूम है कि जो दरख्त तेरे कहने से दोपहर को लगाए गए थे वे शाम से पहले ही उखड़ गए?" शाह अब्बास आकस्मिक रूप से मजेदार बात सुन कर एकदम हँस पड़ा। और ज्योतिषी की तऱफ पीठ कर के वहाँ से चला गया।

19 टिप्‍पणियां:

Ashish Shrivastava ने कहा…

कल की पोष्ट मे यह कहानी इसलिये नही आयी क्योंकि सही मूहुर्त नही था। आज मुहुर्त बन गया और कहानी आ गयी !

:-D

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

उखाड़ने के बाद वही पुनः लगाने का आदेश भी मिला होगा...फलने फूलने के लिये...

Gyan Darpan ने कहा…

बागवान की बात में दम था :)

Shah Nawaz ने कहा…

बागवान ने एकदम सही कहा... बल्कि यहाँ तो बागवान ही अक्लमंद है...

ghughutibasuti ने कहा…

रोचक किस्सा है.
घुघूतीबासूती

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

मजेदार किस्सा :)

Satish Saxena ने कहा…

बहुत मनोरंजक भाई जी ...
ऐसे दुर्लभ किस्सों का इंतज़ार रहेगा !

Asha Joglekar ने कहा…

बागवान की सूझ बूझ तो सहाी है पर उन वृक्षों का क्या हुआ..........................

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Shah Nawaz ने कहा…

कई महत्त्वपूर्ण 'तकनिकी जानकारियों' सहेजे आज के ब्लॉग बुलेटिन पर आपकी इस पोस्ट को भी लिंक किया गया है, आपसे अनुरोध है कि आप ब्लॉग बुलेटिन पर आए और ब्लॉग जगत पर हमारे प्रयास का विश्लेषण करें...

आज के दौर में जानकारी ही बचाव है - ब्लॉग बुलेटिन

लोकेन्द्र सिंह ने कहा…

मजेदार किस्सा

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

अरे! कमबख्त बदशकुनी,जरा ख्याल तो कर कि यही तेरा नजूम है कि जो दरख्त तेरे कहने से दोपहर को लगाए गए थे वे शाम से पहले ही उखड़ गए?
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वाह! क्या सिम्पल लॉजिक है!

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

सुन्दर ...

विष्णु बैरागी ने कहा…

श्रम से उपजे जीवन के समृध्‍द अनुभव किसी भी नजूमी की बडी से बडी भविष्‍यवाणी से अधिक सच होती हैं।
बोध कथा ने आनन्‍द ला दिया।

Satish Saxena ने कहा…

शुभकामनायें होली की भाई जी !

Unknown ने कहा…

रोचक!!

होली की अनंत शुभकामनाएं!!

RDS ने कहा…

वाह !! काश ऐसे बागवान हमारे मुल्क में भी फूले फले ताकि नजूमियों, ज्योतिषियों के बखेड़ों से रियाया आज़ाद हो !!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

रोचक किस्सा और विचारणीय भी

Sunil Deepak ने कहा…

अन्धविश्वासों के पीछे यही किस्से होते हैं लेकिन देख कर भी न देखने वालों को कौन समझाये!