@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: गलती करो तो भुगत लो, पर गाँठ जरूर बांध लो

शनिवार, 31 मार्च 2012

गलती करो तो भुगत लो, पर गाँठ जरूर बांध लो


यूँ तो मुझे सब लोग कहते हैं कि मैं बहुत सुस्त वकील हूँ। पर मैं जानता हूँ कि जल्दबाजी का नतीजा अच्छा नहीं होता। अभी कुछ दिन पहले एक मुकदमे में सफलता हासिल हुई। मुवक्किल बहुत प्रसन्न थे। मिठाइयों के डब्बे और कोटा की मशहूर कचौड़ियाँ ले कर अदालत पहुँचे। उन्हों ने मुझे ही नहीं, मेरे सभी सहयोगियों, क्लर्कों और अदालत के चाय क्लब के दोस्तों को नवाजा। वे इतना लाए थे कि सब का मन भरपूर हो गया। मिठाइयों और कचौड़ियों का स्वाद ले कर कॉफी की चुस्कियाँ ली गईं। फिर वे हमें पान की दुकान तक ले चले। रास्ते में मैं ने उन्हें कहा कि लोग मुझे बहुत सुस्त वकील कहते हैं। तो उन की प्रतिक्रिया थी कि वे सही कहते हैं। लेकिन मैं उस के साथ एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि आप मनचाहा परिणाम भी लेते हैं जो अधिक महत्वपूर्ण है।  सही है कि जब हम कोई काम पूरा जाँच परख कर करेंगे तो उस का मनचाहा परिणाम भी मिलेगा और इस सब में समय लगना तो स्वाभाविक है। लेकिन कभी कभी मेरे जैसा व्यक्ति भी गलती कर ही बैठता है।

ह गलती तब होती है जब आप खुद पर जरूरत से अधिक विश्वास कर बैठते हैं। कई बार सुरक्षा को ताक पर रख देते हैं। पिछले शनिवार मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। रात के कोई सवा बारह बजे होंगे। घड़ियाँ और कलेंडर तारीख बदल चुके थे। मैं भी अपने काम का समापन कर सोने के लिए जा ही रहा था। कंप्यूटर बन्द करने के पहले आदतन मेल बॉक्स देखने लगा तो वहाँ एक मेल बेटे की आईडी से आई हुई थी। मैं ने सोचा जरूर कुछ महत्वपूर्ण संदेश होगा। मेल को खोला तो वहाँ केवल एक लिंक मिला। तुरंत उस पर चटका लगा दिया। एक जाल पृष्ठ खुला। वहाँ कोई सोफ्टवेयर डाउनलोड करने की सुविधा थी।  आनन फानन में मैने उसे डाउनलोड भी कर डाला और जैसा कि अक्सर होता है एक एक्जीक्यूटेबल फाइल हमारे कंप्यूटर में सुरक्षित हो गई। इतना करने के बीच में एक बार यह चेतावनी भी मिली कि यह कोई मेलवेयर भी हो सकता है। मैं ने उस की भी अनदेखी कर डाली।  इस बात का विश्वास था कि बेटे ने भेजा है तो कोई असुरक्षित वस्तु हो ही नहीं सकती। फिर इस तरह के मेलवेयर की चेतावनी पिछले दिनों मुझे मेरी ही वेबसाइट के बारे में इतनी बार मिली है कि मैं उस का आदी हो चुका था। खैर!

तना करने में केवल दस मिनट खर्च हुए। मैंने उसे तुरंत ही एक्जीक्यूट कर दिया और वह जो भी सोफ्टवेयर था वह इंस्टॉल हो गया। जैसे ही वह इंस्टाल हुआ उस ने कंप्यूटर को स्केन कर डाला और कुछ ही मिनटों में एक सौ से अधिक मेलवेयर फाइलें तलाश कर दीं। फिर कहने लगा इन फाइलों को हटाने और दुरुस्त करने के लिए मुझे उस के निर्माता से पूरा पैकेज खरीदना चाहिए जिस की कीमत थी 98 डालर। यह तो  मेरे बस में न था कि कंप्यूटर की सुरक्षा के लिए पाँच हजार रुपए खर्च किए जाएँ। । मुझे संदेह होने लगा कि यह सब बेटे की नहीं बल्कि बेटे के नाम से किसी और की करतूत है। मैं ने उस सोफ्टवेयर को अनइंस्टॉल करना चाहा। लेकिन यह संभव नहीं था। मैं ने सोचा सुबह यह सब बेटे से ही पूछा जाएगा। मैं ने कंप्यूटर बंद किया और जा कर सो गया। 
सुबह उठा कंप्यूटर संभाला। आदतन सब से पहले मेल जाँचने के लिए ब्राउजर खोला तो वह पहली मेल देखते देखते क्रेश हो गया। वह बार बार ऐसा ही करने लगा। एक मेल पढना भी संभव नहीं रहा। दूसरे दो ब्राउजर्स के साथ कोशिश की तो उन का भी वही हाल हुआ। हर बार वही रात को इंस्टॉल किया हुआ सोफ्टवेयर सर पर बंदूक तान कर कह रहा था निकाल पाँच हजार मैं तेरे कंप्यूटर को ठीक कर दूंगा। मैं सोच रहा था यह कौन आफत आ पड़ी? एक तो ठीक से चल रहा कंप्यूटर का इस ने कबाड़ा कर दिया और अब ब्लेक मेल कर रहा है। मेरा बस होता तो इसे घर में घुसने ही न देता। पर मैं बेटे के नाम से आए व्यक्ति को कम से कम ड्राइंगरूम तक तो आने से भी कैसे रोकता?

तने में बेटी सो कर उठी। मैं ने उसे अपना हाल बताया तो कहने लगी- यह मेल तो मुझे भी मिली थी, लेकिन मैं ने तो भैया को रात ही फोन कर के पूछ लिया था। उस की मेल आईडी हैक हो गई है और उस से यह मेल कई लोगों को भेजी गई है। मैं ने और बेटी ने दो घंटे तक प्रयत्न किया कि घर में इस तरह छद्म तरीके से घुस बैठे राक्षस को निकाल फैंका जाए। पर वह निकलने को तैयार न था और दूसरे काम भी न करने दे रहा था। मैं ने बेटे से संपर्क किया तो उस की सलाह थी कि यह ऐसे न निकलेगा। कंप्यूटर ही फॉर्मेट करना पड़ेगा। आखिर मैं ने मोर्चा संभाला। ऑपरेटिंग सिस्टम वाले ड्राइव से सभी जरूरी फाइलें हटा कर दूसरे ड्राइव मे डाली और ड्राइव को फॉरमेट कर फिर से आपरेटिंग सिस्टम डालना आरंभ किया। आपरेटिंग सिस्टम काम करने लगा तो दूसरे ए्प्लीकेशन चालू किए। इस बीच सिस्टम ने मॉनीटर निचले दाय़ें कोने पर झंडी टांग दी कि विंडो की यह प्रति असली नहीं है। मुझे तो यह झंडी दो मिनट के लिए भी बर्दाश्त न थी। बेटे से जानकारी ली गई। माइक्रोसोफ्ट से प्रति की जाँच कराई गई। जाँच के बाद उस ने प्रति को असली पाया। फिर अपडेटस् और सर्विस पैक्स आने लगे। माइक्रोसोफ्ट ने अपना वायरस प्रतिरोधक (माइक्रोसोफ्ट सीक्योरिटी असेंशियल) मुफ्त भेंट किया। हम निहाल हो गए। हमारा कंप्यूटर अब दौड़ रहा है।

मैं अपने बेटे पर कैसे अविश्वास कर सकता था? लेकिन मुझे बेटे के नाम से मिली वस्तु पर जरूर अविश्वास करना चाहिए था। क्यों कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ घोर विश्वास होता है। उस वस्तु के बारे में मिली चेतावनी को अनदेखा नहीं करना चाहिए था।  सब से बढ़ कर तो यह कि किसी भी काम को बहुत देख-परख कर सोच समझ कर काम करने की आदत किसी भी विश्वास के तहत कभी त्यागनी नहीं चाहिए।

20 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

देर आयद दुरुस्त आयद. :)

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सीख मिली - बहुत अच्छी.मैं भी ग़लत चीजों का विश्वास कर बैठती हूँ ,फिर बेटे की सलाह काम आती है !

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सजग रहना ज़रूरी है..... कई बार मैं ऐसा ही कर बैठती हूँ.....

Udan Tashtari ने कहा…

मैं ने उन्हें कहा कि लोग मुझे बहुत चु्स्त वकील कहते हैं-


इसे भी सुस्त कर लें प्रभु- तो तारतम्य बैठ जायेगा बात का... :)

M VERMA ने कहा…

विश्वासघात वहीं होता है जहाँ घोर विश्वास होता है
हर घटना कुछ न कुछ सीख दे ही जाती है

Arvind Mishra ने कहा…

कल या परसों में मैं आपका ब्लॉग पढने के लिए जैसे खोलता मेरा गूगल क्रोम बाउजर चिल्ला पड़ता -मालवेयर मालवेयर ...
बंगलौर से भी एक ब्लॉगर की पोस्ट में यही हो रहा था ..थक हारकर मैंने उन पोस्ट को पढ़ा ही नहीं ...आप भी बड़े अधीर आदमी हैं ,आयी मीन एक अनुभवी वकील होते हुए भी :)

Rahul Singh ने कहा…

बच्‍चों पर विश्‍वास और तकनीक पर संदेह बना रहना चाहिए.

Gyan Darpan ने कहा…

ऐसी समस्या आने पर फोर्मेट करने के बजाय आप अपने कंप्यूटर को एक दिन पहले की स्थिति में ले जाने के लिए रिस्टोर कर सकते थे जिससे आपका समय भी बचता और आप उस घुसपैठिये से भी निजात पा जाते|

सिस्टम री-स्टोर : कंप्यूटर को पीछे की स्थिति में ले जाना

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जल्दबाजी सदा ही घातक होती है, कई बार हम भी फँस चुके हैं।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

हा हा हा ! १२ बजे के बाद कप्यूटर पर बैठोगे तो यही होगा . हालाँकि इससे पहले की भी कोई गारंटी नहीं .
वास्तव में बहुत सतर्क रहने की ज़रुरत है .अच्छा सचेत किया है .

BS Pabla ने कहा…

अंत भला तो सब भला :-)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
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अन्तर्राष्ट्रीय मूर्खता दिवस की अग्रिम बधायी स्वीकार करें!

Shah Nawaz ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन पर जानिये ब्लॉगर पर गायब होती टिप्पणियों का राज़ और साथ ही साथ आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है आज के बुलेटिन में.

मनोज कुमार ने कहा…

सही कहा, ओवर कन्फ़ि्डेन्स में ही सब गड़बड़ हो जाता है।

Khushdeep Sehgal ने कहा…

मक्खन पूछ रहा है...​
​​
​अगर कभी गांठ खोलना चाहें, खुल तो जाएगी न...​
​​
​जय हिंद...

Satish Saxena ने कहा…

आपकी इस पोस्ट से फायदा हुआ है , माइक्रोसोफ्ट सीक्योरिटी असेंशियल हमने भी इंस्टाल कर लिया है ! बढ़िया पोस्ट के लिए आभार आपका !

Unknown ने कहा…

गुरुवर जी, आपने सही कहा है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ घोर विश्वास होता है. नीचे दिया लिंक जरुर देखे -http://www.delhi.gov.in/wps/wcm/connect/doit_dsec/Delhi+State+Election+Commission/Our+Services/Affidavit+2012/South+Delhi/Ward+128-+Binda+pur/ और http://kaimra.blogspot.in/ के साथ ही http://www.facebook.com/kaimara200
http://www.facebook.com/groups/Bindapur/
http://www.facebook.com/pages/Bindapur-Ward/119194294871511

Unknown ने कहा…

http://kaimra.blogspot.in/

Neeraj Rohilla ने कहा…

आपके कमप्यूटर वाला हाल कल हमारे लैपटाप का हो गया है। फ़ार्मेट करने का आप्शन नहीं है, है कोई गजब का एंटीवायरेस जो हमारी मदद कर सके?

विष्णु बैरागी ने कहा…

आपका यह अनुभव कइ लोगों के काम आएगा।

इस पोस्‍ट से एक सूत्र वाक्‍य मिला -

विश्वासघात वहीं होता है जहाँ घोर विश्वास होता है।

सुन्‍दर।