Thursday, February 10, 2011

रक्षा न करने के अपराधी

स दिन मेरे निर्माणाधीन मकान में आरसीसी छत में कंक्रीट डाली जानी थी। मैं पहुँचा, तो  मजदूर आ चुके थे। वे सभी मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भील आदिवासी थे। हमारे यहाँ उन्हें मामा कहते हैं और स्त्रियों को मामी। उन के बच्चे भी साथ थे। एक मामी ने एक बल्ली उठाई और पास में खड़े खंबे से तिरछा कर के बांध दिया। फिर उस बल्ली पर रस्सी का एक झूला बनाया और कपड़े से झोली डाल दी। उधर रेत में कपड़ा बिछा कर एक गोद का बच्चा लिटाया हुआ था। मामी ने उसे उठाया और झूले के पास बैठ कर उसे अपना दूध पिलाया और झोली में लिटा कर झुलाने लगी। कुछ ही मिनटों में वह सो गया। मामी उठ कर काम पर लग गई। दिन में काम करते हुए बीच-बीच में वह बच्चे को संभालती रही। ये वे लोग थे जिन की जरूरतें अधिक नहीं बढ़ी थीं। बस कुछ काम चलाने लायक कपड़े। सुबह शाम भोजन चाहिए था उन्हें कुछ वे बचा कर भी रखते थे, बुरे दिनों के लिए या फिर देस में जा कर खेती को कुछ सुधारने या घर को ठीक करने के लिए। वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, शायद इतना कि वक्त आने पर अपने बच्चों के प्राणों की रक्षा के लिए शायद अपनी जान भी दे दें। यहाँ तक कि कभी तो औरों की रक्षा के लिए प्राण देते भी लोगों को देखा है। कम से कम उन के पास होते तो बच्चे को बाल भी बाकां न होने दें। 
कुत्ता मनुष्य के साथ रहने वाला प्राणी है। कुतिया चार-पाँच बच्चे एक साथ देती है। जब तक बच्चे खुद जीने लायक नहीं होते उन्हें अपने संरक्षण में रखती है, उन के पास किसी को फटकने तक नहीं देती। यहाँ तक कि उन कुत्तों को भी जिनमें शायद कोई उन बच्चों का पिता भी हो। धीरे-धीरे बच्चे खुद जीने लायक हो जाते हैं। इस बीच यदि उस के बच्चों पर कोई मुसीबत आए तो उस मुसीबत पर खुद मुसीबत बन कर टूट पड़ती है। उस हालत में गली के कुत्ते तो क्या इंसान भी उस कुतिया से खौफ खाने लगते हैं। उस से दूर हो कर निकलते हैं। लेकिन मनुष्य ... ?
जैसे-जैसे उस ने जीने के लिए साधन बनाना आरंभ किया, वैसे-वैसे शायद वह खुदगर्ज होता गया। आज इंसान अपने लिए जीता है। कमाता है, समाज में अपना मान बढ़ाता है, फिर उस मान की रक्षा करने में जुट जाता है। इस मान के लिए वह अपने ही बच्चों का कत्ल तक करने से नहीं चूकता। हम हर साल बहुत सारी मान-हत्याओं को अपने आस-पास होते देखते हैं। वह पिता जिस ने अपनी संतान को पाला-पोसा और बड़ा किया, वह माँ जिसने उसे गर्भ में नौ माह तक अपने खून से सींचा, प्रसव की पीड़ा सही, फिर अपना दूध पिलाया, उस के बाद उसे मनुष्यों की तरह जीना सिखाया वे ही इस मान के लिए अपनी संतान के शत्रु हो गए, उन्हें खुद ही मौत की नींद सुलाने को एकदम तैयार। आखिर यह मान इत्ती बड़ी चीज है क्या?
ब आरूषी की हत्या हुई तो कई दिनों तक मैं ने भी औरों की तरह टी.वी. देखने और अखबारों को पढ़ने में बहुत समय जाया किया।  पहले तीन दिनों की टीवी रिपोर्टें देखने के बाद मैं ने सवाल भी उठाया था कि क्या आरुषि के हत्यारों को सजा होगी?  मैं ने कहा था, "हो सकता है कि अपराधी के विरुद्ध अभियोजन भी हो। लेकिन सबूत इस कदर नष्ट किए जा चुके हैं कि उसे किसी भी अदालत में सजा दिया जाना अभी से असंभव प्रतीत होता है।" अब तो सब को पता है सबूत नष्ट किए जा चुके हैं, अब सीबीआई के मुताबिक शक की सुई खुद आरुषी के माता-पिता की और जाती है लेकिन पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने तो पहले ही तलवार को गिरफ्तार कर लिया था, चाहे सबूत उन के पास भी न हों।
म मान लेते हैं कि तलवार दंपति ने आरुषी और हेमराज का खून नहीं किया। लेकिन क्या फिर वे दूध के धुले हैं? मैं और बातों में नहीं जाता। मैं सोचता हूँ, ये कैसे माँ बाप हैं। जिन के बगल के कमरे में इकलौती बेटी की हत्या हो गई, नौकर मारा गया, नौकर की लाश छत पर पहुँच गई और वे सोते पड़े रहे। यहाँ तक कि इस बीच इंटरनेट ऑपरेट भी हुआ। क्या दोनों नशे में मदहोश पड़े थे? ऐसे लोगों को क्या बच्चे पैदा करने का हक भी है। उन्हों ने मातृत्व और पितृत्व दोनों को कलंकित किया। हक न होते हुए भी संतान पैदा की। संतान को पालते रहे, लेकिन एक मूल्यवान वस्तु की तरह, सर पर लगी मान की कलगी की तरह। जिसे गंदी होते ही किसी कूडे़ दान में फैंक दिया जाता है। वे बच्चे की हत्या के अपराधी भले ही न हों लेकिन वे अपनी ही संतान की रक्षा न कर पाने के अपराधी तो हैं हीं। उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए।
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