Thursday, August 5, 2010

गोल बनाओ फिर से जाओ

गोल बनाओ फिर से जाओ
  •  दिनेशराय द्विवेदी

जेठ तपी
धरती पर
बरखा की ये
पहली बूंदें

गिरें धरा पर
छन् छन् बोलें
और हवा में
घुलती जाएँ


टुकड़े टुकड़े
मेघा आएँ,
प्यास धरा की
बुझा न पाएँ


मेघा छितराए
डोलें नभ में
कैसे बिगड़ी
बात बनाएँ

 
मानें जो सरदार
की सब तो
बन सकती है
बात अभी भी

मिलकर पहले
मेघा सारे
गोल बनाओ
फिर से जाओ

बहुत तपी है
प्रिया तुम्हारी
और तनिक भी
मत तरसाओ


खूब झमाझम
जा कर बरसो
वसुंधरा का
तन-मन सरसो

 
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