Friday, October 31, 2008

दिवाली अवकाश के बाद पहला काम का दिन

 पाँच दिनों के अवकाश के बाद आज छठे दिन अदालतें खुलनी थीं तो भी खराब हुई आदत मुकाम पर नहीं आई।  आज उठना नहीं है क्या? पत्नी की आवाज सुन कर। सामने घड़ी पर निगाह गई तो घंटे का कांटा सात से पार जा चुका था, मिनट कौन देखता। सीधे टायलट भागे लघुशंका को, वापस लौट कर रसोई के नल से पानी भर चार-पांच गिलास पिए। तब तक कॉफी बेडरूम में हाजिर थी। जब से कार्तिक का महिना लगा है। श्रीमती शोभा कब उठती हैं और कब स्नान वगैरह कर अपना पूजा-पाठ निपटाती हैं, पता नहीं लगता। इस से पहले हम उठते थे तो कॉफी पहले से बेडरूम की टी-टेबुल पर विराजमान रहती थी। टाइम टेबुल बदला तो हम समझ गए क्या चक्कर चला है। हमने तीसरे दिन कहा। लगता है कार्तिक स्नान चल रहा है? जवाब मुस्कुराहट में मिला। (इस का राज आप तलाशते रहें।)

कॉफी सुड़कते मेल देखी, ब्लागवाणी पर नजर दौड़ाई तो रात के बाद से कोई ज्यादा ब्लाग नहीं  थे। मेल में तीसरा खंबा में कानूनी सलाह के लिए एक सवाल था। सवाल बिलकुल कानूनी नहीं निजी था। जैसे मेरे ज्योतिषी दादाजी के पास अक्सर आया करते थे, और उन के पास कोई ज्योतिषीय उत्तर नहीं हुआ करता था। मैं सोच में था कि इस का क्या जवाब दूँ? फिर दादाजी वाला रास्ता अपनाया, वैसा ही जवाब दिया और तीसरा खंबा में पोस्ट किया। फिर लगे अदालत की तैयारी में। एक दावे का प्रारूप देना था एक सेवार्थी निगम को। टाइप हो कर तैयार था। प्रिंट निकालना चाहा तो अपने इंकजेटप्रिंटर ने इन्कार कर दिया। बोला नया पेन, नयी डायरी, नया बस्ता लाए हो दिवाली के लिए। नयी कैशबुक और लेजर लाए हो। मेरे लिए एक अदद नयी इंक कार्ट्रिज नहीं ला सकते? अब भी मुझे एचपी का अमरीकन बच्चा समझते हो? पांच बरस हो गए हैं इस घर में दीवाली मनाते। मुझे नयी कार्ट्रिज चाहिये, अभी और इसी वक्त चाहिए। मांग वाजिब थी। उसे कहा तो कि मंदी चल रही है पुरानी को रीफिल कर के काम चला लो। पर उस पर कोई असर नहीं हुआ। निगम का दावा धरा रह गया। कार्ट्रिज तो बाजार से ही संभव था जो 11 के पहले नहीं खुलता।

टाइम बरबाद करने के स्थान पर सीधे बाथरूम की शरण ली। ऑफिस का सारा काम तो प्रिंटर निपटा ही चुका था। स्नान-ध्यान करते ही भोजन मिल गया। रवानगी दर्ज कर ऑफिस आए तो पता लगा मुंशी नहीं आया था। उसे फोन किया तो पता लगा वह भी आज सीएल पर है। हम ने खुद ही अपनी फाइलें संभाली। समय लगा। अदालत पहुँच कर घड़ी देखी। तुरंत बड़े भाई टाइमखोटीकार का स्मरण हो आया। लगा वे हमें ही पूछ रहे थे कि बताओ किस के बारह बजे? वहाँ भी दो सहयोगी सीएल पर थे। एक ने बताया कि आज तो अदालतों में काम सस्पेंड कर दिया गया है। मैं ने कारण पूछा तो बताया गया कि एक वकील साहब की दीपावली के अवकाश में उन के भाई की मदद करते समय पूजा कर दी गई। अखबार में खबर तो मैं ने भी पढ़ी थी, लेकिन पुलिस ने पुजारी दल में से कुछ को पकड़ भी लिया था, इस लिए बिरादरी के सम्मान का कोई अवसर नहीं था। फिर भी सम्मान किया गया तो जरूर कोई राज रहा होगा। सम्मान के कारण केवल पेशियाँ नोट करने का ही काम शेष रह गया था।

मुंशी तो था नहीं। मैं खुद ही पेशियाँ नोट करने निकला,सोचा इस बहाने लोगों से दीवाली का राम-राम भी हो लेगा। जेब में पेन नहीं था तो पहले एक पेन भी खरीदना था। अपनी जगह से उठते ही राम-राम  शुरू हो ली। पेन वाले तक पहुंचने में घंटा भर लग गया। पेन खरीदा, एक अदालत से पेशी नोट कर बाहर निकला ही था कि मोबाइल थरथरा उठा। देखा तो सहयोगियों की घंटी थी कॉफी के लिए बुला रहे थे। हम सीधे केंटीन पहुँचे। कॉफी से निपट कर अदालतों का चक्कर लगाया तो पता लगा 80%  जज कैजुअल लीव पर हैं। काम वैसे ही नहीं होना था, एक-एक जज पर पांच-पांच अदालतों की फाइलों पर ऑटोग्राफ बनाने का भार था। बार ने अपने एक वकील के सम्मान का मौका भी न छोड़ा और न्याय प्रशासन की मदद भी कर दी। यह भी आकलन हो गया कि शनिवार को भी ये जज कैजुअल पर ही होंगे और काम नहीं होगा। सोमवार को निश्चित ही दीपावली मिलन का समारोह होना है, तो काम उस दिन भी नहीं होगा।

हमें भी सकून मिला कि अवकाश पर आए बच्चों के साथ चार दिन और बिताने को मिलेंगे।
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