माया बहन जी की सभा से तेजी से लौट कर सूत जी अपने ठिकाने पहुँचे। चाहते थे इस प्रदेश में आए हैं तो बैक्टीरिया पार्टी के राजकुमार, महारानी या राजकुमारी किसी से तो मुलाकात हो या उन का भाषण ही सुनने को मिल जाए। तभी उन के चल-दूरवार्ता यंत्र ने आरती आरंभ कर दी, जय जगदीश हरे ........। कोई बात करना चाहता था। उन्हों ने यंत्र के दृश्य पट्ट पर दृष्टिपात किया तो क्रमांक अनजान था। फिर भी उन्हों ने बटन दबा कर उसे सुना। प्रणाम, गुरूवर! स्वर परिचित था। शिष्य, कौन हो? स्वर नहीं पहचाना। कैसे पहचानेंगे गुरूवर? स्वर सुने दिन बहुत हो गए। मैं सनत बोल रहा हूँ। मैं ने आप को बहनजी की रैली में देखा था। आप के नजदीक आना चाहता था, लेकिन तब तक आप सरक लिए। नैमिषारण्य से आपके यंत्र का क्रमांक प्राप्त किया है, आप से मिलना चाहता हूँ। सनत का स्वर पहचानते ही सूत जी के मुख पर चमक आ गई बहुत दिनों से किसी अपने वाले से न मिले थे। सनत से पूछा, तुम भी यहीं डटे हो? क्या समाचार हैं? -गुरूवर क्यूं न डटें? समाचारों की सारी सम्पन्नता यहीं तो है। पूरे चाचा खानदान की चकल्लस यहीं है, बंगले में साइकिल और लालटेन मुस्तैद हैं, माया महारानी है, राम मंदिर के सैनानी हैं, चौधरी साहब की विरासत इधर है। आप के लिए सुंदर संवाद है मेरे पास, साथ में विजया घोंट कर छानने वाला एक चेला भी है। सूत जी को लगा पिछले पूरे सप्ताह की कमी आज ही पूरी हो जानी है। सनत को बोल दिया- अविलम्ब चेले समेत आ जाओ। सूत जी को संध्या अच्छी गुजरने का विश्वास हो गया था। चेले आएँ तब तक कमर सीधी करने लेट गए।
हे, पाठक!
दो घड़ी बीतते बीतते चेले ने अपने चेले समेत दर्शन दिए। आते ही कहने लगा गुरुवर देर हो गई। लेकिन विजया वहीं पिसवा लाया हूँ। यहाँ सितारा में सिल-बट्टा मिलना नहीं था। आप तो कोई अच्छा सा शीतल रस मंगाइए जिस से छानने की कार्यवाही आगे बढ़े। खस का शरबत और आम का रस मंगाया गया। विजया छनी और बम भोले के नाम से उदरस्थ की गई। तीनों बारी बारी से टेम बना आए। फिर तीनों ने बारी बारी से स्नान किया। तब तक रंग चढ़ चुका था। भोजन तो हो लेगा, लेकिन उस से पहले तीनों को शीतल रबड़ी स्मरण हो आई। सनत ने चेले को दौड़ाया। वह आधी घड़ी में वापस लौटा। केशर और बादाम से संस्कारित शीतल रबड़ी कण्ठ से उतरते ही रंग और दुगना हो गया। सनत बोला- गुरूवर अपना जंघशीर्ष दो, एक चक्रिका सुननी है। क्या है इस में? सूत जी की जिज्ञासा बोली। -बस तिलंगों का संवाद है।
हे, पाठक!
चक्रिका को जंघशीर्ष पर चलाया गया। आवाजें आने लगी...... देखिएगा जब से भारतबर्ष बना है। चरचा है किसी दलित को पंचायत का मुखिया बनना चाहिए। इस बार तो यह अवसर चूकना मूर्खता होगी। आप लोगों का साथ मिले तो यह संभव हो सकता है। मेरे अलावा इस योग्य और कोई नहीं। -यह निकटवान का स्वर था। ........ हमने पाँच बरस तक रैलें दौड़ाई हैं, सारी दुनिया को दिखा दिया, कैसे दौड़ाई जाती हैं? मौका तो हमारे लिए भी यही है, अब कोई सारी उमर रेल थोड़े ही चलाते रहेंगे ....... बात समाप्त होती उस से पहले ही तीसरी आवाज आई........देखिए आप दोनों ने तो पाँच बरस राजसुख भोगा है। हम ही बीच में बनवासी भए। हमने तो अपने दूत को भेजा भी था कि समर्थन देने को तैयार हैं। पर घास तक डाली गई। बाद में हम ही सरकार बचाने के काम आए। दावा तो हमारा कउन सा कच्चा है। अब महारानी जाने क्यों फिर से वही पुराना नाम उछाल रही हैं।

पर तीनों की कैसे मुराद पूरी हो? इस का कोई सूत्र निकलना चाहिए। तभी निकटवान बोल पड़े -उस में कउन बरी बात है। हम तीनों को एक एक बरस बिठाय दें। फिर भी दो बरस बच रहें। उसमें महारानी किसी अउर को बिठाय के तमन्ना पूरी कर लेय। तो फिर डील पक्की रही। दोनों बोले पक्की। फिर साथ लड़ेंगे। बंगला, साइकिल, लालटेन एकता जिन्दाबाद! ... .... .... जिन्दाबाद! ....जिन्दाबाद! .....
इस के आगे चक्रिका रिक्त थी।
कैसा संवाद है? गुरूवर!
अतिसुंदर, सूत जी बोले- नैमिषारण्य में तो आनंद छा जाएगा। कथा सुन लोग झूम उट्ठेंगे। चलो अब समय हो चला है, भोजन शाला चलते हैं।
बोलो! हरे नमः, गोविन्द, माधव, हरे मुरारी .....