Sunday, April 14, 2013

कन्यादान क्या ह्यूमन ट्रेफिकिंग नहीं है? ... फेसबुक पर एक संवाद



फेसबुक पर कल मैं ने एक स्टेटस लगाया था। स्टेटस और संवाद दोनों यहाँ ज्यों का त्यों प्रस्तुत है। आप पढ़िए और अपनी भी राय दीजिए ...

दिनेशराय द्विवेदी

गुरूवार





कन्यादान करने का अर्थ है स्त्री को संपत्ति समझना। एक तरह से यह ह्यूमन ट्रेफिकिंग है। फिर कन्यादान करने वाले और लेने वाले सभी लोगों के विरुद्ध ह्यूमन ट्रेफिकिंग का मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार कर के सजा क्यों नहीं दी जाती है? जरा सोचिए और कुछ कहिए!!!

    Anil Manchanda, Ravindra Ranjan, Durgaprasad Agrawal और 44 अन्य को यह पसंद है.
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    Pawan Mishra आप के पोस्ट पर टीप मारते हुये डर लग रहा है कही न्यायालय के चक्क्र न लगाने पडे अभी न समय है न पैसा...फिर भी यह कथन निहायत ही बचकाना है....

        Rajendra Singh पता चला करोड़ो लोग अंदर हो गए ..इसकी जगह कोई और शब्द इस्तेमाल होना चहिये
   
    Lalit Sharma सभी के गिरफ़्तार होते ही वकीलों की चांदी कटने लगेगी, मुकदमे ही मुकदमे हा हा हा हा
   
    Bs Pabla दान का अर्थ ही है किसी सामाजिक उन्नत्ति के लिए अपना सह्योग बिना कुछ लिए दे देना, अब वो सामाजिक उन्नत्ति क्या है इस पर तो ....

    Deepak Pandey कोई नही बचेगा. सब अंदर हा हा हा बकील भी.
   
    Raj Bhatia इस दान का मतलब बहुत गहरा हे, यह कोई बिखारी वाला दान नही, इस मे समर्पन हे, वैसे कोई भी आदमी अपने दिल के टुकडे को दान नही करता, लेकिन इस दान मे लडकी का भला होता हे.....

    Anand R. Dwivedi Customs and Usages नाम की भी कानूनी चिड़िया होती है..जिनके पर कतरना इतना आसान नहीं!!

    दिनेशराय द्विवेदी Raj Bhatia भाटिया जी, आप बहुत साफ मन के हैं, इस कारण से ऐसा कह रहे हैं। कन्यादान कन्या के माता-पिता या उन के अभाव में उस के संरक्षक करते हैं। लेकिन दान सदैव वस्तु का ही किया जाता है, न कि किसी मनुष्य का। इस कारण यह तो सही है कि जब कन्यादान किया जाता है...और देखें

    Sumant Mishra · 91 mutual friends
    अत्यंत अभद्र और अबुद्धिहीनता पूर्ण वक्तव्य। आप के तर्क से सभी हिन्दू माँ-बाप रण्ड़ी के भडुवे हैं? सोंचिये और बार-बार सोंचिये......! कानून को आप जैसे लोग ओढ़े और बिछाये किसी को ऎतराज नहीं लेकिन ६५ साल में १०० से अधिक बार संविधान संशोधित हो चुका है ऎसे कानून की दुहाई मजाक के अतिरिक्त कुछ नहीं।
    दिनेशराय द्विवेदी सुमंत जी जब तर्क का कोई उत्तर नहीं होता तभी लोग गाली गलौच पर उतर आते हैं। संविधान मनुष्य जीवन के लिए है मनुष्य संविधान के लिए नहीं। वह संशोधित भी होगा और बदला भी जाएगा।
   
    Anand R. Dwivedi इस हिसाब से तो दत्तक ग्रहण (u/r Hindu Adoption and Maintenance Act) भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अंतर्गत लाया जाना चाहिए..Vijay Manchanda And Anr. vs State Of J & K And Ors. on 8 October, 1987 में ये कहा गया है कि "the adoption is considered as a sacred gi...और देखें
   
    Misir Arun स्त्री को खरीदने बेंचने और दान में दिए जाने की वस्तु समझना प्राचीन धर्मसम्मत सभ्यता का अंग रहा है ...जो वस्तुतः एक असभ्यता ही कही जा सकती है ।

    Anand R. Dwivedi ये भी एकदम सही है कि संविधान मनुष्य के लिए है , लेकिन मनुष्य भी संविधान के लिए उतना ही उत्तरदायी है...कोई भी संविधान public at large की मान्यताओं पर तब तक हावी नहीं हो सकता जब तक उसकी अवहेलना न हो!!
   
   

दिनेशराय द्विवेदी Anand R. Dwivedi, दत्तक ग्रहण दान नहीं है। वहाँ केवल माता-पिता और संतान के अधिकारों और दायित्वों का हस्तान्तरण होता है। यदि किसी निर्णय में उसे दान बताया गया है तो गलत बताया है। न्यायाधीश भी समाज में प्रचलित विचारों से प्रभावित होते हैं और उन के निर्ण...और देखें
    न्यायाधीश और अधिवक्ताओं के पूर्वाग्रह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं।

    केरल उच्च न्यायालय की निवर्तमान न्यायाधीश के. हेमा ने उन की सेवा निवृत्ति पर आयो...और आगे देखें
   
    दिनेशराय द्विवेदी Anand R. Dwivedi, संविधान मनुष्यों का समूह ही निर्मित करता है। इस कारण उस के लिए वह उत्तरदायी है। आप का यह कहना भी सही है कि कोई भी संविधान public at large की मान्यताओं पर तब तक हावी नहीं हो सकता जब तक उसकी अवहेलना न हो!! और यह भी सही कि कन्यादान वास्त...और देखें
   
    Anand R. Dwivedi आदरणीय निश्चय ही न्यायिक निर्णय पत्थर की लकीर नहीं होते, परन्तु वास्तविकता की खोज में न्यायिक निर्णय अहम् साबित होते हैं...जिन दायित्वों के हस्तांतरण की बात अपने कही..उन्ही दायित्वों के हस्तांतरण का एक स्वरुप कन्यादान को भी माना गया है..दत्तक ग्रहण में...और देखें
   
    Anand R. Dwivedi हिन्दू पंथ में कन्यादान का विशेष स्थान है जिसमे दायित्वों के स्वस्थ और इमानदारी से निर्वहन की प्रतिज्ञा निहित है..इसे एक बंधन माना गया है जिसमे पिता अपने जीवन के अंग को दान करता है..जिसका उद्देश्य व्यवस्थित जीवन मात्र है...बुद्धिजीवी इसे कुछ भी कहें परन्तु इसके उद्देश्य को कतई नाकारा नहीं जा सकता अन्यथा विवाह नाम की संस्था ही एक अपराध हो जाएगी जो ह्यूमन ट्रैफिकिंग का सर्वोत्तम उदाहरण होगा!
   
    दिनेशराय द्विवेदी Anand R. Dwivedi, मान्यताएँ बदलती रहती हैं। कितनी मान्यताएँ वे जीवित हैं जिन्हें हम पचास वर्ष पहले मानते थे। सती प्रथा को सदियों तक गौरवान्वित किया जाता रहा। लेकिन अब सती का महिमामंडन करना अपराध हो गया है। किसी दिन ये भी हो ही जाना है।

    Baldeo Pandey " बेटियों को दान में देना, भले ही यह रिवाज़ सदियों से हिन्दू विवाह का अभिन्न और पवित्र हिस्सा माना जाता रहा हो, लेकिन ' कन्या दान ' महिला समाज के प्रति पुरुष प्रधान समाज का पुरातन, दकियानूस और अमानवीय नजरिया दर्शाता है - आमीन!"
   
    जय प्रकाश पाठक नमस्कार ! कन्यादान और अन्य बहुत से क्रित्य इसलिये कर दिये जाते हैं क्योंकि आधुनिक जीवन लायक एक पूर्ण व मान्य प्रक्रिया का अभाव है. शंकराचार्य गण नवीन प्रक्रिया पर विचार नहीं चाहते.
 
    Ram Singh Suthar श्रीमान,नमस्कार
    जिस तरीके से हमारे विचार बदल रहे है उस हिसाब से तो भारतीय संस्कृति खतम हो जायेगी। जिस दान को सर्वोतम दान समझा जाता रहा है,उसे संपति से जोड़ना सही नही है ओर न ही किसी ग्रंथ या धार्मिक पुस्तक मे इसे संपति का नाम दिया गया है जहा तक कानून क...और देखें

    रजनीश के झा
    गुरूवार को 05:35 अपराह्न बजे · पसंद
    बबीता वाधवानी सम्‍पति समझते रहे है इसलिए तो जीने का अधिकार छीनते रहे है। हर स्‍त्री को अपने इस तरीके से दान किये जाने का विरोध शुरू कर देना चाहिए । दकियानुसी विचारो ने जीने की तमन्‍ना छीनी है औरतो से।
   
    Rajendra Prasad Sharma श्रीमान -पुरानी कोई भी वस्तु या विचार हो क्षरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है - इस परंपरा का अंत देखने के लिए समय का अन्तराल कितना ...... होगा ? संभवतया कहा नहीं जा सकता .
   
    Bavaal Hindvee rahi sahi kadar aur poori ho jaye. saare mard jail me aur auratain bahar.
    
    दिनेशराय द्विवेदी Ram Singh Suthar यहाँ धर्म ग्रंथ की बात नहीं है। यहाँ बात ये है कि समाज वास्तव में क्या समझता है। क्या ये कहावत पूरे भारत में नहीं कि औरत पैर की जूती है। अब आप बताएँ कि जूती संपत्ति है कि नहीं?

    Sudha Om Dhingra दिनेशराय द्विवेदी जी मेरे पापा ने कन्यादान नहीं किया था, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरा दान हो और मेरे पति डॉ. ओम ढींगरा भी मेरे साथ सहमत थे। हालाँकि रिश्तेदारों ने एतराज़ किया था, पर कुछ देर बाद सब ठीक हो गया था।
   
    दिनेशराय द्विवेदी Sudha Om Dhingra आप को उस घटना को एक अभियान का आरंभ मान कर उसे आगे बढ़ाना था। और यह चलाया जाना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि स्त्रियों में खुद दान होने का प्रतिरोध होना चाहिए। क्यों कि अभी भी अधिकांश माएँ इस विचार से ग्रस्त हैं कि बेटी का कन्यादान करने से उन्हें पुण्य मिलेगा। वे इसे अपना अधिकाार समझती हैं और उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
   
    सुशील बाकलीवाल OMG
    प्रथा ही तो है,
    रघुुकुल रात सदा चली आई...
    लगभग एक घंटा पहले mobile के द्वारा · पसंद

    Ram Tyagi I think the comparison is not right.... Vidya daan is another daan which you can not express in terms of money..., in fact the thing you donate has no monetary value as its worth of your emotions and feelings and your love.
   
    Brijmohan Shrivastava -पुराणों में दस महादानो का वर्णन है इनमें से एक तो हुआ कन्यादान वाकी नौ है --स्वर्ण ,अश्व ,तिल , हाथी ,दासी ,रथ ,भूमी ,ग्रह और कपिला गौ /ध्यान रहे यह सब सम्पत्ति है /स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा ज...और देखें
   
    दिनेशराय द्विवेदी Brijmohan Shrivastava धन्यवाद बृजमोहन जी, मेरी व्यस्तता में आप ने पूरी तरह तर्कसंगत और तथ्य पूर्ण उत्तर दिया है।
   
    Ravindra Ranjan आप स‌ही कह रहे हैं
   
    Jitendra Choubey सनातन धर्म में बेटियां लक्ष्मी का रूप मानी जाती हैं और दामाद लक्ष्मिपति यानि भगवान् विष्णु का रूप.. दोनों के चरण छुए जाते हैं.. पिता लक्ष्मी सौंपता है उसके वर को बेचता नहीं है.. कन्या और गौ का विक्रय सनातन धर्म में अधर्म माना गया है.. द्रोपदी को दाव प...और देखें
   
    Jitendra Choubey और मेरे भाई तो बता दूं की राजा हरिश्चन्द्र, और नचिकेता कन्या नहीं थे लेकिन एक को चंडाल ने खरीदा था और दुसरे को उसके पिता ने मृत्यु को दान दे दिया था...
   
    Yadav Shambhu मेरे ख्याल में सर इसकी इतनी सरल व्याख्या नहीं हो सकती ....
   
    Ashutosh Acharya Jitendra choubey ji absolutely right ,i agree.
   
    दिनेशराय द्विवेदी जितेन्द्र चौबे जी, जो धार्मिक प्रवचन आप ने यहाँ किया है वह हमारे समाज के दिखाने के दाँत हैं। खाने के दूसरे हैं? मुझे समझ नहीं आता कि। हम कितने मूर्ख और भोले हैं। सामने की वास्तविकता हमें दिखाई नहीं देती और उसे मिथ्या सिद्ध करने के लिए अपने ग्रंथों को उठा लाते हैं। हमारे ग्रन्थों का अब यही उपयोग रह गया है। अपनी गलती छुपाने को उन की आड़ लेते हैं। वास्तविक बदलाव की जरूरत को नकारने का इस से अच्छा तरीका नहीं हो सकता।
   
    Ashutosh Acharya दिवेदी जी अब आप यहाँ कुतर्क कर रहे है , कन्यादान धर्म से जुड़ा होता है इसलिए धार्मिक प्रवचन ही देना पड़ेगा .कन्या दान हिन्दू धर्म की व्यवस्था है इसलिए इसमें हिन्दू धर्म से जुड़े साक्ष्य ही देने पड़ेगें यह दिखाने और खाने वाले दांत वाली बात नही है l
   
    Shiv Shambhu Sharma ऎसा है सर कि अंग्रेजों ने ऎसा कोई प्रावधान नही रखा था इसीलिये वर्ना यह कब का हो चुका होता ।

    Jitendra Choubey द्विवेदी जी आप मुझसे कहीं ज्यादा अनुभवी हैं..और आपकी ये बात भी सत्य है की रिश्ते की शुरुआत दहेज़ की बात से शुरू होती.. लड़की का बाप कहता है की अच्छा लड़का बताओ १० लाख तक की शादी करेंगे. लेकिन फिर भी दाल पूरी तरह से काली नहीं हुई.. ह्यूमन ट्रेफिकिंग का मामला बनने में देर लगेगी..और फिर हम उसे कन्यादान कहना बंद कर देंगे..
   
    दिनेशराय द्विवेदी आशुतोष जी, इसे मेरा कुतर्क ही समझ लीजिए। मैं तो अपनी बेटी दान नहीं कर सकता। आप शौक से कीजिए। लेकिन फिर उसे दान समझिए भी। उस से कोई रिश्ता न रखिए। उस की तरफ झाँकिए भी नहीं। आप यह कहना चाहते हैं कि दान को दान नहीं समझा जाए। दान को दान समझने में कौन सा कुतर्क है?
   
    दिनेशराय द्विवेदी यदि आप की लड़की आप की संपत्ति नहीं है तो उस का दान आप कैसे कर सकते हैं? आप को क्या अधिकार है उसे दान करने का? यदि अधिकार है तो आप उस के स्वतंत्र अस्तित्व से इंकार कर रहे हैं।

    दिनेशराय द्विवेदी जितेन्द्र जी, मैं जानता हूँ कि यह ह्यूमन ट्रेफिकिंग नहीं है। उस से भी बुरी चीज है। लेकिन उस बुरी चीज पर हमारा समाज गौरव कर रहा है जिस के लिए उसे दंडित किया जाना चाहिए, जिस पर उसे शर्मिंदा होना चाहिए। यदि इस अपराध के लिए कोई दंड निर्धारित नहीं है तो होना चाहिए।
Jitendra Choubey अद्येति.........नामाहं.........नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि - अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ......... नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पत्नीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे । वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति ।
Ashutosh Acharya दान करने का अर्थ यह नही की उससे मिलना जुलना देखना बात करना मना हो गया ,हाँ यह सही है कि उसको वापस लेना वोह गलत है l दहेजप्रथा तो गलत ही है यह तो पाप भी है और अपराध भी l वैसे दिवेदी जी में आपसे किसी भी प्रकार से तर्कों में नहीं जीत सकता क्यूंकि आप तो संविधान और कानून के महान ज्ञाता है और में एक तुच्छ अल्प ज्ञान रखने वाला .

Jitendra Choubey दिवेदी जी कानून लागू करवा भी देंगे तो भी सालों तक थाने में एक भी रिपोर्ट न होगी क्योकि यहाँ न दान होने वाला शिकायत करेगा न पाने वाला न करने वाला.. इस दान प्रक्रिया में सभी खुश रहते हैं.. लड़की विदा के बाद ८-१० दिन में घर भी आ जाती है.. तीन बार विदाई होती है.. 

Sangita Puri अर्थ का अनर्थ निकालने वाले किसी भी शब्‍द का कोई अर्थ निकाल सकते हं ... बोलने और लिखने से अधिक जरूरी है .. व्‍यवहार में पविर्तन हो .. नारी को उचित मान सम्‍मान मिले ...


   

14 comments:

कालीपद प्रसाद said...

विवाह -परिणय -पाणिग्रहण अर्थात वरऔर वधु जिन्दगी भर एक दुसरे को सुख दू:ख में साथ रहने की प्रतिज्ञा करते है। इस शुभ कार्य में वधु और वर के दोनों परिवार मिलकर उन्हें अनुमति देते हैं कि वे पति -पत्नी के रूप में जीवन यापन कर सकते हैं और संतान उत्पन्न कर सकते हैं।परिवारों की अनुमति में समाज की अनुमति भी सामिल होती है।इस आयोजन में वर वधु को वस्तुएँ उपहार (दान) में देते है।पुराने ज़माने में गाय जैसी दूध देने वाले जानवर भी दान में दिया जाता था।इसे 'गोदान 'कहते है।परिवर्तन की आधुनिक युग में बेटी को एक वस्तु मानकर वर को दान कर उसे 'कन्यादान ' कहना उचित नहीं है। कन्या कोई गाय या वस्तु नहीं है जिसे दान में वर को दिया जाय।आज जहाँ नारी पुरुष समानता का स्वर तेज हो रहा है, नारी पुरुष से कंधे से कंध मिलाकर हर क्षेत्र में आगे बढ रही है, क्या ऐसी परिस्थिति में कन्या को वर को दान में देकर उसे कन्यादान कहना नारी जाति को हेय समझना नहीं है ? यहाँ वर को दान में कन्या को क्यों नहीं दिया जाता ? इसे 'वरदान' या 'पुत्र दान' भी कहा जा सकता है। इसलिए नहीं की यह पुरुष प्रधान समाज है ? देश ने नारी को प्रधान मंत्री एवं राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार कर चुके है .फिर इसमें पीछे क्यों? हर बात में पश्चिमी देशों की नक़ल कर रहे है ,क्या वहाँ 'कन्यादान " जैसा रस्म या शब्द है ?

'कन्यादान' कहो 'वरदान' या 'पुत्रदान' , मूल में यह 'अनुमति दान'है।दोनों परिवार एवम समाज वर-वधु को साथ साथ रहने और दाम्पत्य जीवन शुरू करने की अनुमति प्रदान करता है।यही विवाह है। अत:इस परिवर्तन की युग में नारी जाति को सम्मान देते हुए इसे "अनुमति दान " कहना उचित होगा 'कन्यादान' नहीं।

कालीपद "प्रसाद "

दिनेशराय द्विवेदी said...

कालीपद जी, बात कुछ बनी नहीं। हमें आखिर दान शब्द से इतना मोह क्यों है कि उसे छोडऩा ही नहीं चाहते। फिर क्या एक वयस्क स्त्री को अपनी इच्छा से किसी वर के साथ विवाह करने का अधिकार नहीं है। फिर अनुमति का क्या अर्थ है। अनुमति का अर्थ है। उस कार्य को बिना अनुमति नहीं किया जा सकता है। मेरे विचार में आप थोड़ा और आगे बढ़ें और इसे सहमति कहना अधिक उचित होगा। हालांकि कन्या की इच्छा को सहमति देने की स्थिति आना भी अभी वर्षों दूर है हमारे समाज से अभी तो हम ही उस के लिए तैयार नहीं दिखाई पड़ते।

रचना said...

human trafficking

first the society needs to THINK that woman are human too

WOMAN IN INDIAN SOCIETY ARE JUST BODIES
and are second grade citizens because they are WOMAN

constitution and law treats them equally as human being but the society does not

kanyadaan should be stopped immediately but no people say its a prathaa

राजन said...

इस शब्द और रस्म के तो मैं भी खिलाफ हूँ क्योंकि इससे लड़की के संपत्ति होने का भाव आ ही जाता है लेकिन आपने जो व्याख्या की वह माफ करना पर कुछ ज्यादा ही लग रहा है ऐसा लग रहा है कि आप केवल एक सनसनीख सी टिप्पणी करना चाहते थे जो आपने कर दी ।पता नहीं सोशल साईट्स पर जाते ही लोगों को क्या हो जाता है ।कल को आप ये भी कहेंगे कि बेटी का विवाह करना उसे वैश्यावृति में धकेलना है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

@ राजन
इसे सनसनी समझ लीजिए। प्रश्न लोगों के दिमागों में से स्त्री की वह तस्वीर मिटाना है जो उसे वस्तु के समकक्ष रखती है। बेटी का विवाह माता-पिता की जिम्मदारी क्यों बनी रहे? बेटी को इतना सक्षम क्यों न बनाया जाए और समाज ऐसे अवसर क्यों न प्रदान करे कि वह अपने जीवन साथी का चुनाव खुद कर सके। माता-पिता-भाई-बहिन चुनाव में सलाहकार की भूमिका अदा करें। एक स्त्री को जीवन जीने की स्वतंत्रता क्यों न मिले। अभी तो हम कन्यादान और उस के साथ पुण्य के जुड़े मिथक से पीछा नहीं छुड़ाना चाहते। आप को पता है जब लोग जड़ हो जाएं तो धमाके करने होते हैं, सनसनी फैलानी पडती है। इस के लिए तो लोग हँसते हँसते फाँसी की सजा झेलने को तैयार रहते हैं।

kaushal mishra said...

jab bakwas hi sochane hai tab ham bhee ek daan aur bata dete hai...jo ki aap sab log bade man se karte hai..uska daan bhee band kar dena jaruri hoga aap jaise maha puruso ko...

mutradaanm mahadanam sarv daanam primam ...

is par bhee aap maha puruso ko gyan bagharane ka mauka diya jaa raha hai...

jai baba banaras...

Ratan singh shekhawat said...

बेटी का विवाह माता-पिता की जिम्मदारी क्यों बनी रहे? बेटी को इतना सक्षम क्यों न बनाया जाए और समाज ऐसे अवसर क्यों न प्रदान करे कि वह अपने जीवन साथी का चुनाव खुद कर सके। माता-पिता-भाई-बहिन चुनाव में सलाहकार की भूमिका अदा करें। एक स्त्री को जीवन जीने की स्वतंत्रता क्यों न मिले।
@ यहाँ तक पहुँचने से पहले हमें सर्वप्रथम इस कन्यादान और उस के साथ पुण्य के जुड़े मिथक से पीछा छुड़ाना होगा!
- मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि कन्या की शादी के अवसर पर हमें इस "कन्यादान" शब्द का परित्याग करना होगा इसकी जगह हमें वर-वधु को भावी जीवन में सफल होने का आशीर्वाद देने तक सीमित रहना होगा|
साथ ही कन्या की शादी में कन्या के रिश्तेदारों व अन्यों द्वारा दी गयी भेंट, उपहार को भी कन्यादान नहीं मानना चाहिये उसे इस नाम की जगह भेंट, उपहार आदि शब्दों से ही संबोधित करना चाहिये|
मैं तो अपनी पुत्री की शादी में कन्यादान के नाम से दिए गये किसी उपहार को स्वीकार करने की अनुमति नहीं दूंगा क्योंकि मेरी बेटी किसी से दान नहीं ले सकती और ना लेगी यह उसके स्वाभिमान के खिलाफ होगा!
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बेटी को इतना सक्षम क्यों न बनाया जाए और समाज ऐसे अवसर क्यों न प्रदान करे कि वह अपने जीवन साथी का चुनाव खुद कर सके।
@ प्राचीन काल में "स्वयंवर" परम्परा के रूप में यह व्यवस्था कायम थी जो कालांतर में लुप्त हो गयी| हमारे पूर्वज स्त्री सशक्तिकरण के मामले में हमसे आगे थे!!

सुज्ञ said...

द्विवेदी जी,
मात्र शब्दोँ के फेर में पडकर किस किस बात को ह्यूमन ट्रेफिकिंग मानेँगे.मात्र शब्द का अनर्थ है किंतु जो यथार्थ में घट रहा है उस पर विश्वास नहीँ.घट यह रहा है कि संतोषप्रद जीवन का आशीर्वाद दिया जा रहा है.
सम्पत्ति भाव? जब हम 'मेरी पत्नी','मेरी बेटी' कहते है तो इस सम्बोधन मेँ अधिकार भाव नहीँ है? उस मेरे पने में सम्पत्ति भाव नहीँ है? किस किस से पिंड छुडाओगे? मात्र शब्दार्थ का आशय लेकर? 'अधिकार' को आप उस के स्वतंत्र अस्तित्व से इंकार करना कह रहे हैं? क्या माता-पिता का संतान पर कोई अधिकार नहीँ? और अधिकार दर्शाता कोई भी व्यवहार करे तो 'ह्यूमन ट्रेफिकिंग'? सँतान की स्वतंत्र अस्तित्व वाली धारणा मेँ यदि स्वछंदता लक्षित हो तो अपना मोलभाव उसी के हाथ, उसे खुल्ला छोड देना चाहिए? तो जन्म देकर जब वह अपना भोजन स्वयं लेने लायक होते ही अपना अधिकार छोड कर इस जंगल की दुनिया मेँ छोड देना चाहिए जैसा कि जानवर करते ही है.उस दुनिया मेँ न अधिकार न कर्तव्य न ही निष्ठा सब कुछ स्वतंत्र!! न 'ह्यूमन ट्रेफिकिंग'की सम्भावना. ना कोई रिश्ते न कोई रिश्तों पर अधिकार, न ही रिश्तों को निभाने की आवश्यकता. कुदरती जंगल समाज!!

सुज्ञ said...

स्वतंत्र अस्तित्व के प्रबल समर्थको को अपनी बेटी का कन्यादान न करने का प्रण लेने से पहले स्वतंत्र अस्तित्व को मान देते हुए पहले बेटी से जान लेना चाहिए कि कन्यादान को क्या वह वाकई सम्पति की तरह दिए जाने की ग्लानी से लेती है या एक विवाह विधि की तरह. कन्या को लगे कि उसे वस्तु भाव ही महसुस होता है तब प्रण लेना चाहिए.

सुज्ञ said...

@कल को आप ये भी कहेंगे कि बेटी का विवाह करना उसे वैश्यावृति में धकेलना है।

राजन जी,

बहुत सही कटाक्ष किया है। वस्तुतः दान शब्द को विकार युक्त अभिप्राय में लेने की सोच पर पुनर्विचार होना चाहिए………

अन्यथा ऐसे भी अर्थ निकाले जाएंगे कि बेटी को किसी 'एक' के साथ वचनबद्ध कर भेजना उसके लिए असीमित सम्भावनाओं को बाधित करना होगा। इसलिए सप्तपदी निष्ठा सहित ब्याहना उसके स्वतंत्र विचारों पर कुठाराघात है और ब्याह देने का अधिकार आपको किसने दिया? अतः स्वतंत्र अस्तित्व के लिए सभी अधिकार और उन अधिकारों के निर्वाह का स्वयंभू कर्तव्य छोड देना चाहिए……????????

Arvind Mishra said...

जैसे गऊ दान वैसे ही कन्यादान

सुज्ञ said...

गऊ दान और कन्यादान में अन्तर है, अरविन्द जी!!
ब्राहमण को गऊ दान करने से इन्कार भी कर सकते है या दान की इच्छा का त्याग भी कर सकते है। उस गाय को उसके जीवन भर अपने घर में रख दूह सकते है। लेकिन कन्या को दान से इन्कार करके भी हम उसके अपने जीवन सुखों के, सपनो के बाधक नहीं बन सकते। कन्या ही आजन्म पिता के घर रहना चाहे तो बात दूसरी। गाय निर्णय सुना नहीं सकती।

कालीपद प्रसाद said...

गाय को एक वस्तु समझ कर दान दिया जाता है , पुत्री वस्तु नहीं है , ना संपत्ति समझकर उसे दान में किसी को देना है।उसे उपने जैसे एक इंसान समझकर अपनी मर्जी से शादी करने का अधिकार देना है। झगडा "कन्यादान " शब्द पर है तो इसको विवाह प्रक्रिया से ही हटा दिया जाय। चूँकि भारत में अधिक्तर विवाह परिवार के अनुमति से होता है इसलिए इसे अनुमति या सहमती कह सकते है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

@ कालीपद प्रसाद
आप के सुझाव से सहमत हूँ। जब माता पिता की सहमति से विवाह हो तो उसे सहमति कहना चाहिए कन्यादान क्यों। हमें संस्कृत के उन अबूझ मंत्रों की विवाह पद्धति से बाहर आना चाहिए। जब तक कन्यादान के कर्मकांड को विवाह से अलग नहीं किया जाता उस से संबंधित पुण्य के मिथक को भी अलग करना असंभव है। विवाह में स्त्री-पुरुष के आपसी वचन और सप्तपदी पर्याप्त है। शेष को केवल विवाह के आमोद प्रमोद से जोड़ना चाहिए और सभी अन्य कर्मकांड बंद होने चाहिए।