Tuesday, October 27, 2009

जनतंत्र की असली ताकतें

पिछली 30 अगस्त से कोटा के वकील हड़ताल पर हैं, मैं भी। कमाई बंद है। कभी-कभी कोई मुवक्किल आ जाता है और फीस जमा कर भी जाता है।  लेकिन वकालत के खर्चे बदस्तूर जारी हैं। जैसे रोज अदालत जाने के लिए पेट्रोल फूंकना, वहाँ चाय पान, मुंशी का वेतन, किताबें और जर्नल के खर्चे आदि आदि। इस बीच आने वाली राशि खर्चे की रकम की दसवाँ हिस्सा भी नहीं है। इस तरह वकील कमा नहीं रहे हैं बल्कि खर्च कर रहे हैं। इस तरह यह हड़ताल वकील अपनी रिस्क पर कर रहे हैं। मांग है कोटा में हाईकोर्ट की बैंच खोलना। हाईकोर्ट जो अब चालीस जजों का हो गया है उस का विकेन्द्रीकरण करना।
यूँ तो राज्य की शक्तियों का सतत विकेंद्रीकरण ही जनतंत्र का जीवन है। यह रुक जाता है तो जनतंत्र का ग्राफ मृत्यु की तरफ बढ़ने लगता है। इस कारण से राज्य की कार्यकारी शक्ति अर्थात् संसद, विधानसभा और सरकारों को यह काम स्वतः ही करना चाहिए। लेकिन पिछले दो दशकों से जो सरकारें आ रही हैं उन्होंने विकास के दूसरे काम भले ही किए हों लेकिन जनतंत्र के विकास के लिए उन में से कोई भी चिंतित नजर नहीं आया।  उस के विपरीत उन की रुचि उसे नष्ट करने में अधिक नजर आई। चुनाव में सरकार बदली कि चौथा खंबा ढोल पीटना आरंभ कर देता है कि भारत सब से बड़ा जनतंत्र है, सब से मजबूत जनतंत्र है। जब कि वास्तविकता तो यह है कि चुनाव तक में जन की आवाज नहीं सुनी जाती। केवल जन को सुनाया जाता है। जन जा कर मशीन का कोई बटन दबा आता है। जो बटन वह दबाना चाहता है वह मशीन में है ही नहीं। आखिर वे ही लोग चुन कर फिर चले आते हैं जो जनतंत्र को मृत्यु की तरफ ढकेलने का कर्म कर रहे हैं। जो हर चुनाव के बाद अधिक शातिर होते जाते हैं।

बात चली थी वकील हड़ताल से बीच में ये जनतंतर कथा घुस आई। मुई, य़े कहीं पीछा नहीं छोड़ती। चलो इसे यहीं छोड़ कर आगे बढ़ते हैं। वकीलों इस हड़ताल में क्या क्या न किया? पहले अदालतों का बहिष्कार किया। फिर धरना भी लगाने लगे। एक महीना गुजर गया लेकिन सरकार को उन्हें सुनने की फुरसत तक नहीं मिली। फिर उन्होंने अदालत परिसर में प्रवेश करने के दो बड़े दरवाजों पर तालाबंदी आरंभ कर दी। सुबह स्टाफ और जज परिसर में घुसे कि ताला लगा दिया। एक छोटा दरवाजा और है उस के सामने खुद धरना दे बैठे। अंदर किसी को घुसने तक नहीं दिया। यह आलम रोज का है। वकील रोज इकट्ठा होते हैं और दो बजे तक रोज या तो धरने पर होते हैं, या परिसर के बाहर की सड़कों पर या फिर चाय की दुकानों पर। कोई भी अदालत परिसर में प्रवेश नहीं पाता। एक दिन कलेक्ट्री में घुसे और सीधे कलेक्टर के चैम्बर में पहुँचे और मुख्य मंत्री से बात कराने को कहा। कलेक्टर ने आश्वासन तो दिया, बात आज तक नहीं करवा सका। यह जरूर किया कि उसने कलेक्ट्री के आस पास इतने अवरोध लगवा दिए कि वकील तो वकील जनता भी वहाँ परिंदा न मार सके। दो बजे बाद अदालत परिसर का ये वकील कर्फ्यू टूटता है तो सब परिसर में जाते हैं, तब तक अदालतें पेशियाँ बदल चुकी होती हैं। मुंशी जाते हैं और मुकदमों की पेशियों की आगामी तारीखें नोट कर बाहर आ जाते हैं। वकील एक दिन कोटा शहर में आने वाले सारे राज मार्गों पर तीन घंटे का जाम भी लगवा चुके हैं। अब तक की सारी कार्यवाहियाँ बिलकुल शांतिपूर्ण हैं।
शांतिपूर्ण इसलिए कि वकीलों ने बहिष्कार किया, सरकार ने कहा करने दो, क्या फर्क पड़ता है? अदालत परिसर की तालाबंदी की, सरकार ने कहा करने दो, क्या फर्क पड़ता है? वे कलेक्ट्री में घुसे, कलेक्टर ने खुद को सुरक्षित कर लिया, इतना कि जनता भी उस तक नहीं पहुँचे। उन्हों ने शहर में घुसने वाले राजमार्गों पर जाम लगाया। पुलिस ने पहले ही ट्रेफिक को दस-दस किलोमीटर दूर रोक लिया। जब वकीलों ने जाम हटाने की घोषणा की और मार्गों पर से हट गए तो उस के आधे घंटे बाद ट्रेफिक चालू कर दिया। देखो कितनी अच्छी सरकार है। वकीलों के आंदोलन के लिए सारा इंतजाम कर रही है और शायद करती ही रहेगी। नहीं करेगी तो सिर्फ बात नहीं करेगी। करेगी भी तो तब जब उस के जच जाएगी। अब अफवाहें फैल रही हैं कि मुख्य मंत्री कहते हैं। अदालतें कैसे खोलें? धन ही नहीं है। हाईकोर्ट की बैंच खोलने में भी धन लगता है। फिर एक जगह हो तो खोलें। उदयपुर, बीकानेर भी तो पीछे लगे हैं। फिर उन से ज्यादह महत्वपूर्ण जोधपुर है जहाँ से मैं चुनाव लड़ता हूँ। वहाँ से मुकदमे और जगह चले जाएंगे तो वहाँ के वकील नाराज हो जाएंगे।
चलते-चलते यह आंदोलन वकीलों का नहीं रह गया है, बल्कि जनता का हो गया है। वह समझने लगी है कि लाभ भी उस का होना है। उन का आना-जाना बचेगा, अपरिचित वकील से मुकाबला बचेगा। जनता साथ भी है। अब तीस अक्टूबर को जब हड़ताल को दो माह पूरे होंगे। पूरे संभाग या यूँ कहिए पूरे हाड़ौती अंचल का बंद आयोजित किया है। अब वकील तो अकेले यह काम कर नहीं सकते। जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई गई। याद आए जन संगठन, बोले तो, संभाग के सारे सामाजिक संगठन, व्यापारिक संगठन, ट्रेडयूनियनें, शिक्षण संस्थाएँ, मोहल्ला समितियाँ और भी बहुत से स्वैच्छिक संगठन और संस्थाएँ। सब ने बंद को समर्थन और सहयोग देने का वचन दिया। मैं समझता हूँ कि बंद शांतिपूर्ण रीति से हो लेगा।

जनतंत्र यहाँ बसता है, इन जन संगठनों में। ये सभी विभिन्न पेशों में काम कर रहे लोगों के संगठन हैं। जो राजनीति से परे रह कर काम करते हैं। उन के चुनाव होते हैं और उन पर उन के सदस्यों का नियंत्रण भी रहता है। इन में कुछ कम जनतांत्रिक हैं, कुछ अधिक, पर जनतांत्रिक हैं। कुछ कमजोर हैं कुछ बहुत मजबूत। जनतंत्र की ताकत भी इन में ही बसती है। ये जितने मजबूत होंगे, जितने जनतांत्रिक होंगे और जितने एक दूसरे के साथ तालमेल बनाएंगे उतना ही जनतंत्र मजबूत होता जाएगा। जनतंत्र की इस ताकत का अपहरण करने को राजनीतिक दल लालायित रहते हैं और बस चल जाता है तो कर भी लेते हैं। लेकिन ये संगठन उन से जितने अप्रभावित रह कर अपने सदस्यों के हितों के लिए काम करेंगे जनतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

9 comments:

Mired Mirage said...

कामना है कि कोई हल शीघ्र निकल आए। वैसे ही भारत की न्याय प्रक्रिया में जितना समय लगता है वह शायद विश्व रिकॉर्ड हो। आप लोगों के साथ साथ जनता भी परेशान हो रही होगी।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन आलेख.

Arvind Mishra said...

इतनी हड़ताल अभी कुछ दिन पहले ही तो हुयी थी वह कब खत्म हुयी जो यह मुई नई हुयी !

Suman said...

nice

ताऊ रामपुरिया said...

शायद जल्दी ही हल निकलेगा.

वैसे आपके इस कथन इस बीच आने वाली राशि खर्चे की रकम की दसवाँ हिस्सा भी नहीं है। इस तरह वकील कमा नहीं रहे हैं बल्कि खर्च कर रहे हैं। के जवाब में ताऊ यह कहना चाहता है कि पुराना कमाया हुआ खर्च करने का मौका है, दिल खोलकर करें.:)

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

एक सोचने वाला आलेख है .कई प्रश्नों को उठाता हुआ

अभिषेक ओझा said...

आपके आलेख से तो यही लगता है हड़ताल से अब किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती. होने तो क्या फर्क पड़ता है. मामले तो वैसे ही पड़े रहते हैं. हड़ताल से सबसे ज्यादा परेशानी तो जनता को ही है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

बड़ी अराजकता है। यह तो हड़ताल मात्र है, कल अलीगढ़ के किसी छात्र का कत्ल हुआ और पांच घण्टे रेल यातायात बन्द कर दिया! जनता की फिक्र ही नहीं।

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी हमारे यहां ( भारत मै) सुनने वाला ही कानो मे तेल डाले बेठा हो तो क्या करे... बहुत चिंतनीया बात है, जेसे जेसे जनसंख्या बढ रही है उस के हिसाब से यह सब भी तो बढने चाहिये....बहुत अच्छा लिखा