@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: दूध का जला

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

दूध का जला


‘एक लघुकथा’

दिनेशराय द्विवेदी


नौकरी से निकाले जाने का मुकदमा था। सरवर खाँ को जीतना ही था, उसका कोई कसूर न होते हुए भी बिना कारण नौकरी से निकाला गया था। पर फैसले का दिन धुकधुकी का होता है। सुबह सुबह जज ने सरवर खाँ के वकील को चैम्बर में बुलाया और बोला, “आप मुकदमा लड़ रहे हैं, बता सकते हैं आज क्या फैसला होने वाला है।” वकील ने जवाब दिया,“मेरे मुवक्किल को जीतना ही चाहिए।” 

जज ने बताया कि, “आप सही हैं वकील साहब। आपके मुवक्किल ने मुझे मेरे एक रिश्तेदार से सिफारिश करवाई है, इसलिए मैं अब इस मामले का फैसला नहीं करूंगा।” आगे की पेशी पड़ गयी। वकील ने मुवक्किल को कहा, “तेरी किस्मत में पत्थर लिखा है, अच्छा खासा जीतने वाला था, सिफारिश की क्या जरूरत थी, वह भी मुझे बिना बताए, अब भुगत।

जज का ट्रांसफर हो गया, दूसरा जज आ गया। उसने बहस सुनी और फैसला सुना दिया। सरवर खाँ मुकदमा हार गया। उसने अपने वकील को बताया कि, “पहले उसने सिफारिश उसके दिवंगत मित्र की पत्नी से कराई थी जो जज की निकट की रिश्तेदार थी। इस बार उसने ऐसी कोई कोशिश नहीं की। पर एक बन्दा आया था उसके पास, जो कह रहा था कि नया जज उसका मिलने वाला है, चाहो जैसा फैसला कर देगा। पर कुछ धन खर्च होगा। पर साहब दूध का जला छाछ को फूँक फूँक कर पीता है। मैंने उसे साफ इन्कार कर दिया। 

सरवर खाँ ने  हाईकोर्ट में फैसले की अपील कर रखी है। 


4 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

केस अपने जगह लेकिन सोर्स सिफारिश का दौर कभी ख़त्म नहीं होता
ये सच है सोर्स सिफारिश बहुत से फैसलों को प्रभावित करने में सक्षम होते है
किस्मत अपनी-अपनी

Meena Bhardwaj ने कहा…

सादर नमस्कार,
आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 21-08-2020) को "आज फिर बारिश डराने आ गयी" (चर्चा अंक-3800) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

"मीना भारद्वाज"

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

:) बढिया

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जगत में भांत-भांत के लोग