Saturday, April 27, 2013

मजदूरों के पास लड़ने और मर मिटने के सिवा रास्ता क्या है?

सेमकोर ग्लास लि. और सेमटल कलर लि. के पिक्चर ट्यूब बनाने वाले दो कारखाने कोटा में हैं। पिछली नवम्बर में दोनों कारखानों को चलता छोड़ कर प्रबंधन चलता बना। कारखाना रह गया और मजदूर रह गए। कारखाना बंद हो गया। प्रबंधन ने अनेक दस्तावेजों में खुद यह माना कि कारखाना बंद हो गया है और अब वह नहीं चला सकता। लेकिन कारखाना सरकार से इजाजत लिए बिना बंद करना अपराध है। इस लिए बाद में कारखाना बंद करने की अनुमति के लिए सरकार के पास प्रबंधन ने आवेदन प्रस्तुत किया। मई और जून 2013 में कारखाने को बंद करने की अनुमति मांगी गई। राजस्थान सरकार ने न तो अनुमति दी और न ही इन्कार किया। कुल मिला कर प्रबंधन को अनुमति मिलना मान लिया गया क्यों कि कानून यह है कि यदि राज्य सरकार आवेदन देने के 60 दिन में आवेदन को निरस्त करने का आदेश प्रबंधन को न पहुँचाए तो प्रबंधन को यह मानने का अधिकार है कि उसे कारखाना बंद करने की अनुमति मिल गई है। यानी सरकार ने अनुमति नहीं दी, उस में सरकार को आदेश लिखना पड़ता जिस में कलम घिसती ऊपर से मजदूरों का बुरा बनना पड़ता। इसलिए सरकार चुप हो गयी। अब जबर किसी को मारे और राजा जी चुप रहें इसे राजा जी का अन्याय थोड़े ही कहा जाएगा। अब कारखाने के मालिक खुश हैं और मजदूर साँसत में। 

कारखाने अभी कागज में बंद नहीं है। एक मई में और दूसरा जून में बंद होगा। मजदूरों को अक्टूबर 2012 से वेतन नहीं मिला है। मजदूर खूब आंदोलन कर चुके हैं। उन्हों ने सब किया है। सरकार और प्रशासन कहता है कि वे उन की पूरी मदद करेंगे। लेकिन कोई करता नहीं है। परदे के पीछे से सब मालिक की मदद करने पर उतारू हैं। अब मजदूर न सरकार का पेट भर सकता है और न अफसरों का वह तो केवल कारखाने का मालिक ही भर सकता है। मजदूर पहले मार्च 2013 में पानी की टंकी पर चढ़ गए थे। तब मुख्यमंत्री के आश्वासन पर उतरे थे। आज तक कुछ नहीं हुआ तो आज फिर टंकी पर चढ़े हुए हैं। सरकार ने इस बार कुछ ठान लिया है। टंकी के नीचे जो मजदूर इकट्ठे थे उन्हें पकड़ कर शहर के विभिन्न थानों में बैठा दिया गया है। विपक्षी दल भाजपा की भी इस मामले में वही नीति है जो मौजूदा कांग्रेस सरकार की है। उस ने भी मजदूरों से सहानुभूति दिखाने के सिवा पिछले सात महीने में कुछ नहीं किया, यहाँ तक कि मजदूरों के साथ खड़ा तक न हुआ। उसे अपना राज लाना है। ताकि मौजूदा सरकार के स्थान पर वे मालिकों की चाकरी बजा सकें।  मजदूरों के पास लड़ने और मर मिटने के सिवा रास्ता क्या है?

जदूर जानते हैं कि कारखाने नहीं चलेंगे। वे केवल कारखाना बंद होने की अनुमति जिस दिन के लिए मिली है उस दिन तक का वेतन उन्हें मिले, छंटनी का मुआवजा मिल जाए और उनकी ग्रेच्यूटी व प्रोवीडेण्ट फण्ड का पैसा मिल जाए। ये सब उन के कानूनी अधिकार हैं।  फिर वे जाएँ और कहीं और रोजगार तलाशें। लेकिन मालिक केवल नवम्बर 2013 तक का वेतन देना चाहता है और उसी हिसाब से मुआवाजा आदि। वह भी तब देगा जब मजदूर इस पर  समझैौता कर लें उस के आठ-दस महिने बाद। तब तक मजदूर क्या करें? मालिक जानता है कि कानूनी हक वह न देगा तो मजदूर अदालत जाएंगे जहाँ अगले बीस साल फैसला नहीं होने का। तब तक मजदूर कहाँ बचेंगे। इस लिए कानूनी हक क्यों दिया जाए। सरकार में इतना दम नहीं कि वह मालिक से मजदूरों का हक दिलवा दे। उसे सिर्फ मजदूरों पर लाठी भाँजना, गोली दागना, उन्हें जेल भेजना, दंडित करना आता है वही कर रही है। मजदूर समझ रहे हैं कि अब जब तक निजाम को बदला नहीं जाता। खुद एक राजनैतिक ताकत बन कर इस पर कब्जा नहीं किया जाता तब तक उन्हें न्याय नहीं मिलेगा। वे जानते हैं कि ये रास्ता दुष्कर है लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं। कब तक ऐसे ही पिटते लुटते रहेंगे?

2 comments:

अनूप शुक्ल said...

मजदूरों से सहानुभूति है।

Vivek Rastogi said...

जब मालिक अपने आप ही नवम्बर २०१३ तक मुआवजा देना चाहता है तब तो मजदूरों को सहर्ष ही मांग स्वीकार कर लेनी चाहिये ।