Blog Widget by LinkWithin
Custom Search

Monday 22 February 2010

हुकुम! मुझे ईनाम नहीं मिलेगा?

ल जयपुर यात्रा हुई। मुझे और बार कौंसिल सदस्य और पूर्व अध्यक्ष महेश गुप्ता जी दोनों को जाना था। तय हुआ कि जबलपुर जयपुर दयोदय एक्सप्रेस पकड़ेंगे। उस का समय सुबह 8.15 पर कोटा से रवाना होने का है। मैं सात बजे घर से कार लेकर निकला महेश जी के घर उसे पार्क किया और ऊपर उन के यहाँ पहुँचा तो जनाब अभी स्नान किए बिना बैठे अखबार देख रहे थे। मेरे पहुँचते ही तुरंत बेटे को टिकट लाने की कह बाथरूम में घुसे। तैयार होने पर नाश्ता किया गया। मुझे भी टोस्ट के साथ कॉफी मिली। घर से आ कर दो ऑटोरिक्षा बारगेनिंग में छोड़े तीसरे में बैठ स्टेशन पहुँचे। आठ बज रहे थे। ट्रेन को अब तक प्लेटफॉर्म पर पहुँच जाना चाहिए था। लेकिन प्लेटफॉर्म खाली था। हाँ वहाँ सूचना अवश्य थी कि ट्रेन किसी भी समय आ सकती है। पौने नौ बजे ट्रेन पहुँची। हम सीधे एक आधे खाली स्लीपर में जा कर बैठ गए। नौ बजे ट्रेन चली। हमारी बैठक जयपुर में एक बजे थी। ट्रेन ही पौन घंटे लेट चली थी तो हमें भी पहुँचने में इतनी ही देरी हो सकती थी। कुछ ही देर में कंडक्टर आ गया। उसने टिकट को स्लीपर में बदल दिया। दोनों की रात की नींद शेष थी। लेकिन अब हम वैधानिक रूप से बर्थ पर आराम कर सकते थे। पर कुछ देर पढ़ते रहे। मैं ने महेश जी को लेटने के लिए बोला तो कहने लगे -माधोपुर में बड़े खा कर लेटेंगे। घंटे भर में सवाई माधोपुर पहुँच गए। महेश जी तुरंत उतर गए और कुछ देर में मूंग के बड़े ले कर लौटे। कहने लगे एक दम तो नहीं पर कुछ गर्म जरूर मिल गए हैं। बड़े (वड़ा) खा कर हम दोनों लेट गए कब नींद लगी पता नहीं। नींद खुली तो ट्रेन जयपुर के बाईस गोदाम स्टेशन पर खड़ी थी। वहाँ से हाईकोर्ट नजदीक था। मैं ने वहीं उतरने को कहा। लेकिन हम कुछ सोचते उस के पहले ही ट्रेन चल पड़ी। महेश जी ने आराम से कहा -हम जंक्शन पर ही उतरेंगे, वहाँ से वापसी का टिकट लेंगे फिर हाईकोर्ट चलेंगे। ट्रेन जयपुर जंक्शन पहुँची तो बिलकुल समय पर थी। पौन घंटे की देरी को उस ने कवर कर लिया था। 
यपुर में हाईकोर्ट में अपनी बैठक निपटा कर हम ने काका जी हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पानाचंद जी जैन से मिलना तय किया। उन्हें कोटा में सभी काका जी कहते हैं। हम ने दोपहर का भोजन किया और उन के कार्यालय पहुँचे। काका जी जब कोटा में वकालत में थे तो महेश जी उन के कनिष्ट थे और वकालत के आरंभ में मेरे तो तीन मुकदमों में से दो में वे खिलाफ वकील हुआ करते थे। उन से भिड़ते-भिड़ते ही मैं ने वकालत सीखी थी। बहुत दिनों के बाद हमें देख कर काका जी बहुत प्रसन्न हुए। वहाँ हमें कॉफी पीने को मिली। करीब एक घंटे हम उन से बातें करते रहे। फिर शाम साढ़े पाँच की दयोदय एक्सप्रेस पकड़ कर रात नौ बजे कोटा स्टेशन पर उतर गए। इस मुलाकात में काका जी ने राजस्थान के एक मुख्य न्यायाधीश का संस्मरण सुनाया जिसे आप के साथ बांटता हूँ ---
........... वे हाई कोर्ट में वकालत कर रहे थे। हाईकोर्ट जज नियुक्त करने हेतु उन का नाम  प्रस्तावित किया गया था। नियुक्ति की प्रक्रिया में पुलिस वेरीफिकेशन आवश्यक था। हाईकोर्ट ने राज्य के आई.जी. को इस के लिए पत्र भेजा। आई. जी. पुलिस ने इसे जिले के एस.पी. को और एस.पी ने इसे संबंधित पुलिस थाने को अग्रेषित कर दिया। थानाधिकारी ने एक सिपाही को जाँच करने भेजा। सिपाही सीधा वकील साहब के घऱ पहुँचा और घंटी बजा दी। 
कील साहब अदालत से लौटे ही थे। खुद ही दरवाजा खोला और सामने सिपाही को देख कर चौंके। पूछा -कैसे आए? सिपाही ने बताया कि हाईकोर्ट से आप का पुलिस वेरीफिकेशन आया है, उसी के लिए आया था। वकील साहब बोले उस के लिए तो आप को थाने का रिकार्ड देखना पड़ेगा और पडौस में पूछताछ करनी होगी। सिपाही ने कहा बात तो आप की सही है। वकील साहब ने कहा -भाई जिस से भी पूछताछ करनी हो कर लो। उन्हों ने दरवाजा बंद किया और अंदर आ गए।
तीन-चार मिनट बाद ही फिर घंटी बज उठी। वकील साहब ने फिर दरवाजा खोला तो वही सिपाही बाहर खड़ा था। उस से पूछा -भाई! अब क्या रह गया है। सिपाही बड़ी मासूमियत से बोला -हुकुम! अब तो आप हाईकोर्ट के जज हो जाएँगे। मैं पुलिस वेरीफिकेशन के लिए आया हूँ मुझे ईनाम नहीं मिलेगा? ..........
फिर क्या हुआ यह काका जी ने नहीं बताया। इतना जरूर पता है कि वे वकील साहब हाईकोर्ट के जज ही न बने मुख्य न्यायाधीश हो कर सेवानिवृत्त हुए।

16 comments:

राज भाटिय़ा 22 February 2010 1:26 AM  

बहुत सुंदर लगी आप की जय पुर यात्रा, ओर माधो पुर के बडे भी, सब से अच्छी बात लगी कि...सिपाही बड़ी मासूमियत से बोला -हुकुम! अब तो आप हाईकोर्ट के जज हो जाएँगे। मैं पुलिस वेरीफिकेशन के लिए आया हूँ मुझे ईनाम नहीं मिलेगा? ..........
मजेदार ओर धन्यवाद

अजित वडनेरकर 22 February 2010 2:43 AM  

बढ़िया संस्मरण और यात्रा वृत्तांत। आपके ब्लागों पर आकर सुख पाता हूं। अक्सर राजस्थान के बिताए दस वर्षों के चर्चित-परिचित चेहरों का स्मरण करानेवाले संदर्भ यहां मौजूद रहते हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar 22 February 2010 6:05 AM  

आपके यात्रा विवरण बहुत अच्छे होते हैं.

dhiru singh {धीरू सिंह} 22 February 2010 6:30 AM  

कितना भोला था वह सिपाही ... यात्रा अच्छी पढी

Udan Tashtari 22 February 2010 6:32 AM  

यात्रा वृतांत और काका जी का संस्मरण मजेदार रहा.

Arvind Mishra 22 February 2010 7:11 AM  

वाह यात्रा संस्मरण में एक और संस्मरण का तड़का

डॉ. मनोज मिश्र 22 February 2010 7:45 AM  

बहुत सामयिक aur मजेदार लगी सिपाही वाली बात.

ali 22 February 2010 9:39 AM  

सिपाही और हुकुम पर केन्द्रित संस्मरण पर कुछ भी लिखने हिम्मत नहीं हुई !

ताऊ रामपुरिया 22 February 2010 10:43 AM  

सिपाही बड़ी मासूमियत से बोला -हुकुम! अब तो आप हाईकोर्ट के जज हो जाएँगे। मैं पुलिस वेरीफिकेशन के लिए आया हूँ मुझे ईनाम नहीं मिलेगा? ..........

हमेशा की तरह रोचक यात्रा वृतांत.

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey 22 February 2010 10:56 AM  

मौसमानुकूल पोस्ट। आओ हम सब सिपाही बन जायें!

Mithilesh dubey 22 February 2010 4:57 PM  

क्या बात है सर जी खूब सफर किया जा रहा है ,। बहुत बढ़िया लगा संस्मरण

नीरज मुसाफिर जाट 22 February 2010 5:05 PM  

बढिया जी बढिया,
एकदम मस्त यात्रा विवरण.

रंजना [रंजू भाटिया] 22 February 2010 6:01 PM  

बहुत बढ़िया लिखते हैं आप यात्रा और संस्मरण रोचक रहा यह भी शुक्रिया

निर्मला कपिला 22 February 2010 6:20 PM  

बहुत रोचक लगी जयपुर यात्रा। आप यूँ ही यात्रा करते रहें ताकि हमे सुन्दर च्र्तांम्त पढने को मिलते रहें धन्यवाद्

psingh 23 February 2010 3:45 PM  

sundar yatra charcha
abhar.........

विष्णु बैरागी 24 February 2010 12:02 AM  

आपने उलझन में डाल दिया। तय नहीं कर पा रहा कि इसे पुलिसिया दुस्‍साहस कहूँ या मासूमियत। बहरहाल, पढकर आनन्‍द आया।

Recent Posts

  © Blogger template Newspaper III by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP