Saturday, May 3, 2008

चाय की रेट और गाँजा-सिगरेट

सुबह की अदालतें साढ़े सात बजे आरम्भ होती हैं, हम अधिकतर दीवानी काम करने वाले वकील साढ़े आठ तक अदालत पहुँचते हैं। एक-दो जरुरी काम निपटाते हैं, तब तक साढ़े नौ हो जाते हैं और चाय का वक्त भी। चाय पीने पहुँचे तो आज आफ्टर लंच आन्ट्रॅप्रॅनर (Entrepreneur) वाली दुकान बन्द थी। हम दूसरी दुकान पर सरक लिए।

बैठे ही थे कि हमारे साथी ने बताना शुरु किया, कल सुबह-सुबह आन्ट्रॅप्रॅनर पर खूब तमाशा हुआ। मैं ने जानना चाहा- क्या?

कलुआ ( दुकान का सीनियर नौकर) सुबह सुबह दारू पीकर आ गया और लगा गालियाँ देने मालिक को। माँ... तुमने हमारा जीना हराम कर दिया है। एक तो चाय के अलावा कुछ बेचते नहीं। बनाने भी नहीं देते। चाय देते हो चार रुपए की कट, पांच रुपए की पूरी। दिन की आधी दुकन्दारी भी नही होती, कि गाँजा भर सिगरेट पी कर लाट हो जाते हो। किसी को भी कुछ भी बोलते रहते हो। सारे ग्राहक दुकान छोड़ कर दूसरी जगह जाने लगे हैं। हमें भी भूखे मारोगे, और खुद भी भूखे मरोगे।

उपरोक्त सभी डायलॉग शुद्धिकृत हैं। वह कुछ भी बके जा रहा था। मालिक था सन्न, और ग्राहक तमाशा देख रहे थे। थोड़ी देर में सभी जूनियर नौकर भी कलुआ के साथ हो लिए। कलुआ की हिम्मत बढ़ गई। उस ने मालिक को कहा- निकल बाहर हम दुकान चलाएंगे। हमारा भी पेट भरेंगे और तेरा भी। उन्होंने सचमुच मालिक को दुकान से हटा दिया। मालिक दूर जा कर खड़ा हो गया। नौकर दुकान चलाने लगे। ग्राहकों को बता दिया गया कि दुकान पर आज से चाय तीन रुपए की, और कट पाँच रुपए की दो मिलेगी, काँफी चार रुपए में मिलेगी। दो-चार दिन बाद दूसरा माल भी बनाया-बेचा जाएगा। ग्राहक जम गए। नौकरों ने चाय बना-बना कर देना शुरु कर दिया।

मैं बोला -तभी दोपहर में मैं आया तो जूनियर नौकर बता रहा था अब से चाय-कॉफी कम रेट पर मिलेगी।

हमारा साथी फिर आगे बताने लगा। जब दुकान चलने लगी मालिक दुकान के पास आ गया तो कलुआ ने उसे कहा -क्यों आ गए तुम यहाँ, तुम्हारी यहां कोई जरूरत नहीं। तुम्हारा रोज का मुनाफा पहुँच जाएगा। मालिक वहाँ से चला गया।

फिर थोड़ी देर बाद वापस लौटा। नौकरों से बोलने लगा - मुझे ग्राहक समझ कर चाय तो पिला दो। तो नौकर बोला निकालो तीन रुपए। मालिक ने तीन रुपए दे कर अपनी ही दुकान पर चाय पी। नौकरों से बोला -ठीक है, कल से चाय इसी रेट पर बिकेगी। दुकान पर तो आने दोगे?

नौकर बोले गाँजा सिगरेट बन्द करनी होगी। हाँ, हाँ कल से बन्द, बिलकुल बन्द।

उस हादसे के बाद आज दुकान बन्द थी। हम कयास लगा रहे थे कि, क्यों बन्द है?

साथी ने जवाब दिया -सिगरेट छूटने के अवसाद में। कल से दुकान फिर पहले की तरह चलने लगेगी। उन्हीं पुराने नौकरों के साथ।

चाय की रेट और गाँजा-सिगरेट का क्या?

उस का पता तो दो-चार दिन बाद ही लगेगा।

9 comments:

Aflatoon said...

उस दुकान में जम्हूरियत का तकाज़ा था जो यह सब हुआ । वकील साहब ,आप बताये कि देश भर की कचहरियों में चाय-पान-नाश्ता बाजार से मँहगा क्यों होता है ?

शोभा said...

दिनेश जी
रोचक लगा यह लेख।

Gyandutt Pandey said...

दुकान जम्हूरियत से चलेगी तो गरियार बैल की तरह बैठ जायेगी! दुकान तो बाजार के सिद्धान्त से चलनी चाहिये, जम्हूरियत के पेंच से नहीं!

Udan Tashtari said...

बताईयेगा-क्या हुआ जब फिर से दुकान खुली. :) रोचक है.

rakhshanda said...

सचमुच बहुत interesting लगा आपका लेख...

Rajesh Roshan said...

भाई रोचक तो है लेकिन कई पेट का सवाल है. जम्हूरियत से चले या बाजार के अपने नियम से चलनी जरुर चाहिए

अभिषेक ओझा said...

रोचक... पर आगे क्या हुआ?

डा० अमर कुमार said...

अरे ददू ,
आपने तो लटका कर छोड़ दिया । यह मेरा पाँचवा चक्कर है,
दुकनिया खुली कि नहीं ? यही बता दो कि यहाँ कितने हिट
काउंट बढ़ाने के बाद, कथा को आगे बढ़ाओगे ? यह नुस्ख़ा
बड़े काम का लगता है, वकील की बुद्धि हम जैसों को नसीब
कहाँ ? ख़ैर, दुकनिया का क्या हुआ ? ज़रूर थाना कचहरी पर
जाकर टिकेगी, नहीं तो साबित करो कि असलियत क्या है ?

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी, आप तो वकील हे किसी तरह से दुकान खुलवादो फ़िर से या हमे बता दो,भाई ** कल से दुकान फिर पहले की तरह चलने लगेगी। उन्हीं पुराने नौकरों के साथ। लेकिन केसे, क्या मनमोहनी सरकार के सभी ??? मान गये परमाणु समझोते को,