Friday, April 25, 2008

गेम "कैसे बनें सफल व्यापारी"

मैं ने 1978 में वकालत शुरु की। साल भर कुछ भी नहीं कमाया। केवल काम की धुन सवार थी। सोचते थे, काम करो, तो नाम होगा। नाम होगा, तो काम भी मिलेगा, और दाम भी।

एक कहावत हाड़ौती में बहुत कही जाती है। घर का जोगी जोगणा, आन गाँव का सिद्ध। मतलब ज्ञान की पूछ घर में नहीं होती, बाहर वाले को अधिक पूछा जाता है।

हम बाराँ से निकल लिए। आ गए कोटा। काम यहाँ जैसे हमारे इन्तजार में था। खूब काम किया, नाम भी हुआ, दाम भी मिलने लगा। बच्चे हुए, घर बनाया।

यही हाल अभी हिन्दी ब्लॉगिंग यानी हिन्दी चिट्ठाकारी का है। उस का अभी बचपना है, यानी खेलने-खाने के दिन। हम एडसेंस का बिल्ला चिपका कर "कैसे बनें सफल व्यापारी" खेल रहे हैं। अभी हमें मीलों चलना है। दुनियाँ अपनी बनानी है।

बकौल रवि रतलामी के तीन हजार चिट्ठे हैं, उन पर भी आपसी बातें अधिक, ज्ञान कम। तो पाठक भी कम हैं। अपने काम के प्रति समर्पित कम और शौकिया अधिक। टिप्पणियों में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा वाले अधिक। उन की परवाह न करने वाले कम। हम अपना काम किए जाएँ। लोग अपने आप पहचानेंगे। रोज दस्तक देंगे आप के द्वारे, अगर हम अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए।

यह तकनीक और अर्थव्यवस्था का युग है। हम नहीं  देखते कि हम क्या उत्पादित कर रहे हैं? हमारा उत्पाद लोगों की जरुरतों और आकांक्षाओं के अनुरूप है या नहीं? फिर लोगों को पता भी है या नहीं कि हम उन की जरुरत का माल पैदा कर रहे हैं? हम लोगों तक पहुँचने का प्रयत्न कर ही नहीं रहे हैं। जंगल में मोर नाचा किसने देखा?

सब से पहले हमें जानना चाहिए कि हमारे श्रेष्टतम उत्पाद क्या-क्या हो सकते है? उन में कौन सा उत्पाद है, जिस की लोगों को सर्वाधिक आवश्यकता है? हम यह शोध कर लें, फिर जरुरत का माल उत्पादित करें, और इसे घर में रख कर न बैठ जाएँ।

जी हाँ अपने चिट्ठे को ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत या कुछ और एग्रीगेटरों पर दर्ज करा देना, उत्पादन को घर में डाल देना ही है। कितने नैट प्रयोगकर्ताओं को ब्लॉगवाणी चिट्ठाजगत पता है? हम ने माल पैदा किया, और घर में डाला। अब घर के मेम्बर ही एक दूसरे के माल की तारीफ कर रहे हैं, या मीन-मेख निकाले जाते हैं। एक दूसरे का माल खरीदने से रहे।

शानदार संगीत महफिल जमी है। सभी संगीतकार हैं। गाए जा रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि कोई दूसरा उस की तारीफ कर दे, तो जीवन सफल हो जाए। नया पुराने से और पुराने नयों से तारीफ की आकांक्षा करते हैं। असली गाहक कोई नहीं। बस रियाज हो रहा है। शिष्य गा रहे हैं, उस्ताद कमी निकाल कर बता रहे हैं। यहाँ, यहाँ और यहाँ सुर और साध लो, बस फिर तुम्हारी फतह। उस्ताद गा कर बता रहे हैं, ऐसा! शिष्य साधने में लग जाते हैं। असली परीक्षा, प्रदर्शन का दिन अभी बहुत दूर है।

कुछ शिष्य थकने लगे हैं। वापस भागने लगते हैं, तो दूसरे आस बंधाते हैं और रोक लेते हैं। वे फिर रियाज में लग जाते हैं। गुरुकुल में नए-नए लोग आ रहे हैं। गुरुकुल आबाद हो रहा है। गुरुकुल को आबाद होने दीजिए। इतना, कि दूर से ही अलग दिखाई देने लगे। तब वे भी आएंगे जो सिर्फ गाहक होंगे। दुनियाँ बहुत बड़ी है। हिन्दी की दुनियाँ भी बहुत बड़ी है, और हम अभी बहुत छोटे। इतने, कि ठीक से दिखाई ही नहीं देते। बस कुछ दिखने लायक हो जाएं, कुछ हमारे पास दिखाने लायक हो जाए। फिर घर से निकलें। फेरी लगाएं, गाहक के पास जाएँ, या फिर गाहक को दुकान तक पकड़ कर लाएँ। दुकान में ऐसा कुछ होगा तो गाहक दुबारा, तिबारा और बार-बार वहाँ आएगा।

आप गाहक को लाए, और वहाँ ऐसा कुछ न हुआ कि वह दुबारा वहाँ आए, तो उसे वहाँ लाना भी बेकार ही सिद्ध होगा।

Post a Comment