देहरी के पार, कड़ी - 41
मई के महीने की तपिश और समंदर से उठती नमी से भरपूर हवा से वातावरण भारी था. पसीना किसी तरह रुकता नहीं था. शनिवार की सुबह, जब ज्यादातर मुंबईकर वीकेंड की सुस्ती में डूबे थे, प्रिया अंधेरी (पूर्व) के चकाला इलाके की एक तंग गली के मुहाने पर खड़ी थी. राहुल और स्नेहा भी उसके साथ थे.
दो मई को दोपहर बाद ही असिस्टेंट सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से कार्यवाही समाप्त हुई थी. उसी दिन उसे सेक्रेटरी को रिपोर्ट देनी थी लेकिन तीन मई की दोपहर ट्रैकिंग से पता लगा कि रिपोर्ट सुबह सेक्रेटरी को मिली थी और शाम को यह जानकारी कि फाइल को सेक्रेटरी ने राय देने के लिए लॉ सेक्रेटरी को भेज दिया है. अगले दो दिन अवकाश होने के कारण फाइल को वहीं रहना था, जिससे ट्रैकिंग से कुछ हासिल नहीं हो सकता था.
प्रिया को ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बीच हमेशा यह लगा कि जब वे फैक्ट्री में या संघर्ष के दौरान साथ रहते हैं तो नौकरी या फैक्ट्री के बंद होने के संबंध में उनका विचार लगभग एक जैसा रहता है. लेकिन इनके परिवार के लोग क्या सोचते हैं? और परिवार के बीच रहकर खुद मजदूर क्या सोचते हैं? इसे अवश्य जानना चाहिए. उसने अपना यह विचार अपने शेष तीनों साथियों के सामने रखा कि क्यों न इस वीकेंड पर इन मजदूरों के परिवारों के बीच जाया जाए. क्योंकि जब तक वह उन ३५० परिवारों के चूल्हों की आग और उनके संघर्ष की नमी को महसूस न किया जाए तब तक इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता कि आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?
आदित्य का कार्यक्रम इस वीकेंड पर अपने किसी मित्र से मिलने पुणे जाने का था. स्नेहा फौरन इस काम के लिए तैयार हो गई. राहुल पहले तो आने में हिचकिचा रहा था, उसे चकाला और जे.बी. नगर की तंग गलियों में धूल फाँकने के विचार में कोई औचित्य नजर नहीं आता था. लेकिन प्रिया ने जब कहा कि, “औचित्य का पता तो वहीं जाकर लगेगा. हम शनिवार को चलते हैं, यदि हमें लगेगा कि यह औचित्यहीन है तो रविवार नहीं चलेंगे.” यह सुनने के बाद वह अनमने तरीके से ही सही पर तैयार हो गया था और अब साथ था.
जैसे-जैसे वे गलियों के भीतर बढ़े, शहर का शोर पीछे छूटता गया और एक अलग ही दुनिया सामने आई. यहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे, मानों एक-दूसरे का सहारा लेकर खड़े हों. उनके पास यूनियन सेक्रेटरी शिंदे का पता था. वे तलाश करके सबसे पहले वहाँ पहुँचे. दो कमरे, एक छोटी सी रसोई, एक टॉयलेट और एक कॉमन हॉल. हॉल में ही एक कोने में रखी मशीन पर शिंदे की पत्नी सावित्री कपड़े सिल रही थीं. मशीन की 'पच-पच' की आवाज़ हवा में एक लय पैदा कर रही थी. प्रिया को देखते ही वे मुस्कुराईं. उन्होंने मशीन रोक दी. उनसे पास ही रखे चीड़ की लकड़ी के ढाँचे पर बने स्प्रिंग वाले पुराने सोफे पर बैठने को कहा. राहुल के उस पर बैठते ही वह करीब आठ इंच अंदर बैठ गया. प्रिया और स्नेहा बहुत सावधानी से उस पर बैठे.
“दीदी, मैं दो तीन साल से शिंदे साहब से कह रही हूँ कि इसे ठीक करा लें. लेकिन वे कहते हैं बोनस मिलेगा तो नया ले लेंगे. जब बोनस आता है तो और दूसरे जरूरी खर्चे निकल आते हैं.” सावित्री जी ने कहा. उन्होंने बताया कि “शिंदे साहब की तो सुबह की शिफ्ट थी वे सुबह सवा पाँच बजे ही निकल गए थे. आप आईं, बहुत अच्छा लगा," सावित्री जी ने कहा. उनके हाथों की फुर्ती बता रही थी कि वे सिर्फ एक गृहिणी नहीं, बल्कि घर की आर्थिक रीढ़ भी हैं.
प्रिया ने देखा कि पास ही में एक 12-13 साल का लड़का, जिसे शिंदे का पोता 'छोटू' बताया गया, स्कूल का बस्ता एक तरफ रखकर कुछ पुराने रेडियो और बिजली के बोर्ड खोलकर बैठा था. राहुल ने उत्सुकता से पूछा, "बेटा, ये क्या कर रहे हो?"
छोटू ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, " स्कूल से आने के बाद बिजली वाले चाचा की दुकान पर बैठता हूँ. तार जोड़ना और सोल्डरिंग करना सीख रहा हूँ. अगले साल तक मैं खुद के छोटे-मोटे काम करना सीख जाऊंगा.”
प्रिया के मन में एक टीस उठी. ये बच्चे बचपन से ही जानते हैं कि ज़िंदगी की लड़ाई उन्हें जल्दी शुरू करनी है. सावित्री जी ने चाय के प्याले बढ़ाते हुए कहा, "बेटा, ईसीआई की नौकरी ने हमें सिर्फ अनिश्चितता दी है. पिछले दस साल से उस 'ट्रक सिस्टम' ने उनको आधा कर दिया है. हफ़्ते के छहों दिन काम मिलता है, बस इसी लालच में वे वहां बंधे रहे. पर अब हम सब चाहते हैं कि बस बहुत हुआ."
डेढ़ बजे तक प्रिया और उसके साथी पाँच-छह घरों में जा चुके थे. स्नेहा, जो आमतौर पर काफी चुलबुली रहती थी, खामोशी से डायरी में कुछ नोट कर रही थी.
तीनों ने पास ही एक रेस्टोरेंट में दोपहर का लंच किया और फिर से बस्ती में घुस गए. एक घर में वे बिठ्ठल भाई से मिले, जो ईसीआई में करीब 15 साल से थे. उनके पैर में चोट थी, फिर भी वे एक कोने में बैठकर प्लास्टिक के कुछ खिलौने जोड़ रहे थे. बिठ्ठल भाई की राय ने प्रिया को चौंका दिया. उन्होंने कहा, "दीदी, सब कहते हैं कि यूनियन नौकरी बचाने के लिए लड़ती है. पर हम? हम इस नौकरी से 'मुक्ति' चाहते हैं. ईसीआई अब कारखाना नहीं, एक ऐसी जेल है जिसका जेलर हमें न मारता है, न जीने देता है. हमें बस हमारा हिसाब ठीक-ठीक मिल जाए, हम अपनी मेहनत से कहीं भी पेट पाल लेंगे."
प्रिया ने महसूस किया कि ये मजदूर हार नहीं मान रहे थे, बल्कि वे एक ऐसी आज़ादी माँग रहे थे जहाँ उनके पसीने की कीमत तय हो, न कि कोई प्रबंधन उन्हें 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों में जकड़े रखे.
अगले दिन, रविवार सुबह भी तीनों अपनी इस 'जाँच' में जुटे रहे. अपने-अपने घरों को लौटने के पहले उन्होंने बाहर ही लंच किया. तीनों का मन विचारों से भरा हुआ था. खाना खाते समय प्रिया के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. यह विक्रांत के किसी पुराने व्यावसायिक सहयोगी का सोशल मीडिया पोस्ट था. फोटो में विक्रांत एक आलीशान रेस्टोरेंट में कुछ लोगों के साथ बैठा था. चेहरे पर वही पुराना अहंकार वापस लौट रहा था.
प्रिया ने नोटिफिकेशन देखकर भी अनदेखा कर दिया. विक्रांत अब उसके लिए एक 'अदृश्य साया' था, जिससे वह डरती नहीं थी, पर सावधान जरूर थी. उसे पता था कि विक्रांत अपनी खोई हुई साख पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. लेकिन चकाला की उन गलियों में मिले अनुभवों ने उसे एक अलग ही सुरक्षा कवच दे दिया था.
शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया, "प्रिया, शाम छह बजे IIDEA ऑफिस में यूनियन की मीटिंग है उसमें एआईसीसीटीयू के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी भी होंगे. मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार होगा. तुम आ सको तो बेहतर होगा."
उसने तय किया कि वह इस मीटिंग में अवश्य जाएगी. दो दिनों में उसने जो कुछ मजदूरों के परिवारों से मिलकर जाना है, उसे सभी को बताया जाना आवश्यक है.
... क्रमशः
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कैसा लगा आलेख? अच्छा या बुरा? मन को प्रफुल्लता मिली या आया क्रोध?
कुछ नया मिला या वही पुराना घिसा पिटा राग? कुछ तो किया होगा महसूस?
जो भी हो, जरा यहाँ टिपिया दीजिए.....