पेज

शुक्रवार, 1 मई 2026

अंदेशा

देहरी के पार, कड़ी - 40
प्रशांत बाबू और रामजी काका से दिन में हुई बहस का हाल जानने के बाद प्रिया डिनर के बाद ही घर लौट सकी. उसने कपड़े बदले ही थे कि फोन घनघना उठा. कोटा से मयंक था.

“हेलो मयंक कैसे हो? मम्मा और पापा कैसे हैं?”

“दीदी, फोन मैंने किया, तो पहले मुझे बोलने दो. मैं बोलता उसके पहले तीन सवाल दाग दिए आपने.”

“सॉरी मयंक, मैं पिछले दिनों बहुत व्यस्त रही, फोन नहीं कर सकी. आज ही कुछ फुरसत है तो फोन करने वाली ही थी कि तुम्हारा फोन आ गया, मैं खुद को रोक नहीं पाई.”

“रहने दो दीदी, असल बात तो ये है कि आप हमें भूल गई हैं. और वहाँ पता नहीं क्या-क्या करती रहती हैं. आकाश भाई ने सब बता दिया है मुझे. ....अच्छा अब सुनो, सबसे ताजा समाचार यह है कि हमारे भूतपूर्व होने वाले जीजाजी ‘श्रीमान विक्रांत जी’ की जमानत अर्जी आज मुम्बई हाईकोर्ट ने मंजूर कर ली है, एक दो दिन में आदेश निचली अदालत को पहुँचेगा और जमानत पेश करने पर वे छूट जाएंगे. वैसे तो आपने उनकी हुलिया बढ़िया कर दिया है इसलिए उनकी हिम्मत नहीं होगी, फिर भी अंदेशा तो बना रहेगा. सावधान रहने में बुराई क्या है?” मयंक ने बात परिहास से आरंभ की थी और गंभीरता से समाप्त की.”

“तू मेरी चिन्ता मत कर, यह मुम्बई है. इस महानगर में विक्रांत की हैसियत किसी गली के गुंडे बराबर भी नहीं है. फिर यहाँ मेरा साथ देने वाले बहुत हैं, मैं पूरी तरह सुरक्षित हूँ. तू बता, मम्मा-पापा कैसे हैं? पापा बिलकुल ठीक हैं, बिजनेस को पूरे जोर शोर से संभाल लिया है. मुझे अपनी पढ़ाई और आवारागर्दी के लिए पूरी छूट मिल गई है. माँ तुम्हारे ले दुखी रहती हैं. उनकी इच्छा होती है कि वे आपसे रोज बात करें. वे मेरे पास ही हैं, उन्हें फोन दे रहा हूँ.

“हेलो प्रिया, कैसी है बेटा? कितने दिन हुए तुझे मुझसे बात किए हुए? मुझे तेरी बहुत फिकर रहती है. तू रोज मुझसे बात किया कर, वरना मैं जल्दी ही बूढ़ी होकर चल दूंगी.” बात करते-करते मम्मा का स्वर रुआँसा हुआ तो प्रिया बोल पड़ी.

“माँ, तुम्हें पता है मैं कैसे घर से निकली, फिर कुछ दिन जयपुर रही. मुम्बई आई तो यहाँ भी विक्रांत ने मुझे चैन से न रहने दिया. वो तो मुझे ऐसे साथी मिल गए जिनकी वजह से वह कुछ नहीं कर सका और उसे जेल जाना पड़ा. उसके बाद जिन्होंने साथ दिया वे कुछ संकट में थे तो मुझे उनकी मदद करनी पड़ी.” आज ही फुरसत मिली थी. मैं फोन करने वाली थी कि मयंक का फोन आ गया. प्रिया ने माँ को समझाने की कोशिश की.”

“मैं जानती हूँ बेटा, तू काम में व्यस्त ही रही होगी. पर माँ का मन नहीं मानता. बस आज से नियम बना ले, रात को जब भी तूझे फुरसत मिले तू मुझे फोन जरूर करेगी.”

“हाँ माँ, आज से मैं रोज आपको फोन करूंगी.”

“और सुना है विक्रांत छूटने वाला है, तू सावधान रहना. यहाँ तो तेरे पापा अब वापस बिजनेस और समाज में सक्रिय हो गए हैं तो यहाँ उसकी हिम्मत नहीं पड़ेगी.”

“माँ, यहाँ भी उसकी जो दुर्गत हुई है वह हिम्मत नहीं करेगा. और कुछ करने की कोशिश की तो इस बार और अधिक मुहँ की खाएगा. अच्छा माँ, आप अपना खयाल रखना. मैं रखती हूँ.”

प्रिया फोन बंद करने के बाद सोच में पड़ गई कि विक्रांत आखिर छूटने के बाद क्या करेगा? निश्चय ही वह पहले अपने बिजनेस को संभालेगा. खैर, वह कल सुबह प्रशांत बाबू को कहेगी. विक्रांत के ऑफिस के इलाके में कुछ लोग तो यूनियन के जरूर होंगे, उसकी गतिविधियों की जानकारी मिल जाएगी.

प्रिया ने सुबह ऑफिस के लिए निकलने के पहले दस बजे प्रशांत बाबू को फोन किया और विक्रांत की जमानत की खबर दी.

“प्रिया, जिस तरह हमने उसे दबोच कर पुलिस के हवाले किया था. उसकी अब तुम्हारी तरफ नजर उठाने की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी. फिर भी मैं उसके दफ्तर के इलाके में रहने वाले लोगों को कह दूंगा. वे विक्रांत की गतिविधियों पर नजर रखेंगे. कुछ खास होगा तो हमें सूचना दे देंगे. तुम चाहो तो चव्हाण साहब को बता सकती हो वे हाईकोर्ट में अपने असिस्टेंट को कह देंगे कि वह विक्रांत की जमानत की शर्तों का पता लगा कर बताए.”

“ठीक है, मैं चव्हाण साहब से बात करती हूँ. कल एएसएल ने लेबर सेक्रेटरी को अपनी रिपोर्ट दे दी होगी. आगे की गतिविधि की क्या खबर है?” उसने ईसीआई के क्लोजर वाले मामले में प्रशांत बाबू से पूछा.

“अभी तक कोई खबर नहीं है, एएसएल की रिपोर्ट गोपनीय है इसलिए उसकी कोई खबर नहीं है लेकिन महाराष्ट्र सरकार मार्च 2012 से ई-फाइलिंग सिस्टम का उपयोग कर रही है. एएसएल के यहाँ सुनवाई की प्रत्येक पेशी की ‘ऑर्डर शीट’ भी वेब पर उपलब्ध है. एएसएल ने अपनी रिपोर्ट को भी इलेक्ट्रोनिकली सेक्रेटरी को भेजा होगा. यदि ऐसा है तो फाइल मूवमेंट ट्रेस किया जा सकता है. तुम चाहो तो कोशिश कर सकती हो.”

“यह तो बहुत अच्छी बात है. जरूर मैं आज कोशिश करती हूँ कि क्या हुआ है, यदि एक मूवमेंट का पता लगा तो फिर हर मूवमेंट पर नजर रखी जा सकती है.” प्रिया ने कहा.

“आज शाम ईसीआई यूनियन के सेक्रेटरी शिन्दे और मेरी एआईसीसीटीयू (All India Central Council of Trade Unions) के स्टेट सेक्रेटरी से मीटिंग है. वे इस मामले में क्या सुझाते हैं. मैं तुम्हें बताऊंगा. अच्छा मैं फोन रखता हूँ, जरूरी कॉल आ रही है.”

प्रिया ने घड़ी देखी, सवा दस बज चुके थे. वह आज नियमित समय पर ठीक ग्यारह बजे ऑफिस पहुँच जाना चाहती थी. उसने फ्लैट से बाहर आकर दरवाजा लॉक किया और तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़ गई. लिफ्ट में उसका ध्यान फिर ईसीआई के मजदूरों की ओर चला गया. उनका जीवन कितना संघर्षशील रहा है? प्रबंधन ने उन्हें कितने लंबे समय तक ट्रक सिस्टम में जकड़े रखा. वे उससे मुक्त होना चाहते थे, यहाँ तक कि उससे मुक्त होने के संघर्ष में उनकी नौकरी चली जाए तो वे उसके लिए तैयार थे. कम से कम उसके बाद वे किसी बेहतर काम की तलाश करने की संभावनाएँ तो उनके पास थीं. इस संघर्ष को शुरू करते ही उन पर क्लोजर की लड़ाई थोप दी गई. मजदूरों और उनकी यूनियन ने अब तक इस लड़ाई को बेहतरीन तरीके से लड़ा था. फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि अब कारखाने के मजदूर अपने जीवन और भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं. उसने तय किया कि इस पर वह प्रशांत बाबू से बात भी करेगी और जब भी संभव हुआ मजदूरों से भी बात करने की कोशिश करेगी.
... क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कैसा लगा आलेख? अच्छा या बुरा? मन को प्रफुल्लता मिली या आया क्रोध?
कुछ नया मिला या वही पुराना घिसा पिटा राग? कुछ तो किया होगा महसूस?
जो भी हो, जरा यहाँ टिपिया दीजिए.....