पेज

गुरुवार, 19 मार्च 2026

देहरी के पार

रात डेढ़ बजे ऋचा को प्रिया का व्हाट्सएप मैसेज मिला, “मैंने घर छोड़ दिया है. मुझे छुपना नहीं है, बस खड़ा होना है.”

दो दिन बाद ही तो प्रिया की शादी होने वाली थी. उसे पता भी था कि प्रिया को लड़का पसंद नहीं था, उसने अपने मम्मी पापा को बता भी दिया था कि वह इस लड़के से शादी नहीं करना चाहती. फिर भी वे न केवल रिश्ता पक्का कर आए, बल्कि शादी की तारीखें भी तय हो गयीं. पापा के सामने कभी प्रिया ने अपनी इच्छा प्रकट नहीं की, लेकिन माँ से अवश्य वह रोज कहती रही कि, मैं यह शादी किसी हालत में न करूंगी. उसके बावजूद उसके पापा को न जाने क्यों ऐसा विश्वास था कि उन्होंने जो वर और घर देखा है उससे बेहतर कोई प्रिया के लिए कोई और नहीं हो सकता. वे दहेज और शादी पर भी लाखों खर्च कर रहे थे.

... तो आखिर प्रिया के सब्र का बांध टूट ही गया. उसने फौरन प्रिया को फोन लगाया और कहा, “तुम जहाँ भी हो वहाँ से फौरन मेरे फ्लैट में आ जाओ”. इसके बाद उसने तीनों दोस्तों अमित, समीर और नेहा को मैसेज किया कि, “प्रिया मेरे यहाँ पहुँच रही है, तुम भी पहुँचो.”

कुछ देर बाद प्रिया ऋचा के वन बीएचके फ्लैट में थी. आधे घंटे में अमित और समीर नेहा भी पहुँच गए. सबने मिल कर तय किया कि प्रिया रात को ऋचा के साथ उसके बेडरूम में रहेगी और अमित और समीर बाहर हॉल में रहेंगे. जिससे कोई आए तो उसे संभाला जा सके. समीर ने बताया कि उसने नेहा को अपने घर पर रुकने और सुबह जल्दी से जल्दी उसकी कंपनी के वकील को संपर्क करने को कहा है.

प्रिया अपने साथ ज्यादा कुछ नहीं लायी थी. उसने शाम को ही एक पुराने झोले में अपनी ज़रूरी डिग्रियाँ, लैपटॉप और कुछ जोड़ी कपड़े एक ठूँस कर रख लिए थे. घर के बाहर शामियाना लग रहा था, हलवाई की कड़ाही में चाशनी उबल रही थी और घर के बड़े-बुजुर्ग 'लाखों के लेनदेन' और 'खानदान की नाक' की चर्चा में मशगूल थे. प्रिया के लिए यकायक अपना ही घर एक ऐसी जेल बन चुका था जिसकी दीवारें नोटों और गहनों से चुनी गई थीं.

जिस लड़के से उसकी शादी तय हुई थी, उससे प्रिया दो बार मिली थी. दूसरी मुलाक़ात में ही उसने साफ़ कह दिया था, "नौकरी छोड़ देना, हमारे यहाँ बहुएं बाहर हाथ-पैर नहीं मारतीं." पिता ने जब यह सुना तो मुस्कुराकर बोले थे, "राज करेगी मेरी बेटी, कमाने की ज़रूरत ही क्या है?"

प्रिया के लिए वह 'राज' नहीं, अपनी पहचान की आहुति थी.

वह रात सवा बजे जब पूरा घर थकान और उत्सव के बीच गहरी नींद में था, हलवाई भी घर जा चुका था, प्रिया ने अपनी सैंडल हाथ में ली और पिछले दरवाज़े से बाहर निकल आई. उसके पास कोई 'ठिकाना' नहीं था. उसे पता था कि सुबह होते ही वह एक 'भगोड़ी' कहलाएगी.

शहर की पुलिस, समाज और खुद उसका परिवार—सब एक तरफ होंगे. उसके भागने को किसी 'अफेयर' या 'चरित्रहीनता' से जोड़ने की कोशिशें शुरू हो जाएंगी, क्योंकि समाज यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि एक लड़की सिर्फ अपनी आज़ादी के लिए भी घर छोड़ सकती है.

सुबह होते ही तूफान आया. पुलिस स्टेशन में प्रिया के पिता दहाड़ रहे थे, "बहला-फुसलाकर ले गया है कोई उसे!" पुलिस का पहला सवाल था, "लड़के का नंबर दो, किससे बात करती थी?" किसी ने यह नहीं पूछा कि क्या वह अपनी मर्ज़ी से गई है.

प्रिया के पुलिस के पास जाकर संरक्षण मांगने के प्रस्ताव को उसके दोस्तों ने खारिज कर दिया था. उन्हें पता था कि वहां उसे 'समझा-बुझाकर' वापस घर पहुँचा दिया जाएगा या फिर उसके पेरेंट्स को सूचना दी जाएगी और वे खुद पहुँच जाएंगे.

अगले तीन दिन प्रिया के लिए अग्निपरीक्षा जैसे निकले. मोहल्ले में चर्चाएँ हो रही थी, "इतना पैसा खर्च कर रहे थे माँ-बाप, नमकहराम निकली." प्रिया ने फेसबुक पर एक छोटा सा वीडियो पोस्ट किया:

"मैं किसी के साथ नहीं भागी हूँ. मैं उस शादी से भागी हूँ जहाँ मेरा वजूद खरीदा जा रहा था. मैं बालिग हूँ, कमाती हूँ और मुझे अपनी ज़िंदगी का फैसला लेने का हक है. पुलिस से मेरी विनती है कि इसे 'अपहरण' का रंग न दें."

यह वीडियो जंगल की आग की तरह फैल गया. कुछ ने उसे 'कुलटा' कहा, तो कुछ कामकाजी लड़कियों ने उसके साहस की तारीफ की.

चौथे दिन, प्रिया अपने दोस्तों और कंपनी के वकील के दफ्तर के एक सहायक वकील के साथ खुद पुलिस स्टेशन पहुँची. वहाँ उसके पिता और होने वाले ससुराल वाले मौजूद थे. माहौल तनावपूर्ण था. पुलिसवालों ने उसे झिड़का, "पागल हो गई हो? मां-बाप की इज़्ज़त की धूल उड़ा दी."

प्रिया ने शांति से अपना आई कार्ड और बैंक स्टेटमेंट मेज़ पर रखा. उसने कहा, "सर, मैं बालिग हूँ. कानून मुझे अपनी मर्ज़ी से रहने का अधिकार देता है. न तो मेरा अपहरण हुआ है, न मैं किसी दबाव में हूँ. मैं बस उस घर में नहीं रह सकती जहाँ मेरी मर्ज़ी के बिना मेरा सौदा हो रहा हो."

पुलिस के पास उसे रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं था. प्रिया के पिता की आँखों में गुस्सा था, पर प्रिया की आँखों में एक अजीब सी शांति. वह जानती थी कि अब उसके पास परिवार नहीं है, समाज का समर्थन नहीं है और न ही कोई बड़ा एनजीओ उसके पीछे खड़ा है.

उसके पास बस उसके चंद दोस्त थे और वह 'खुद' थी. उस रात प्रिया ने एक नए शहर के एक छोटे से हॉस्टल में सिर छिपाया. वह अकेली थी, डरी हुई भी थी, लेकिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी साँसों पर सिर्फ उसका हक है.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कैसा लगा आलेख? अच्छा या बुरा? मन को प्रफुल्लता मिली या आया क्रोध?
कुछ नया मिला या वही पुराना घिसा पिटा राग? कुछ तो किया होगा महसूस?
जो भी हो, जरा यहाँ टिपिया दीजिए.....