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बुधवार, 9 मार्च 2011

महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस था। हिन्दी ब्लाग जगत की 90% पोस्टों पर महिलाएँ काबिज थीं। उन की खुद की पोस्टें तो थीं ही, पुरुषों की पोस्टों पर भी वे ही काबिज थीं। महिला दिवस के बहाने धार्मिक प्रचार की पोस्टों की भरमार थीं। कोई उन्हें देवियाँ घोषित कर रहा था तो कोई उन्हें केवल अपने धर्म में ही सुरक्षित समझ रहा था। मैं शनिवार-रविवार यात्रा पर था। आज मध्यान्ह बाद तक वकालत ने फुरसत न दी। अदालत से निकलने के पहले कुछ साथियों के साथ चाय पर बैठे तो मैं ने अनायास ही सवाल पूछ डाला कि क्या कोई धर्म ऐसा है जो महिलाओं को पुरुषों से अधिक या उन के बराबर अधिकार देता हो। जवाब नकारात्मक था। दुनिया में कोई धर्म ऐसा नहीं जो महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देता हो। कोई उन्हें देवियाँ बता कर भ्रम पैदा करता है तो कोई उन्हें केवल पुरुष संरक्षण में ही सुरक्षित पाता है मानो वह जीती जागती मनुष्य न हो कर केवल पुरुष की संपत्ति मात्र हों। मैं ने ही प्रश्न उछाला था, लेकिन चर्चा ने मन खराब कर दिया। 
चाय के बाद तुरंत घर पहुँचा तो श्रीमती जी  टीवी पर आ रही एक प्रसिद्ध कथावाचक की लाइव श्रीमद्भागवतपुराण कथा देख-सुन रही थीं। साथ के साथ साड़ी पर फॉल टांकने का काम भी चल रहा था। फिर प्रश्न उपस्थित हुआ कि क्यों महिलाएँ धर्म की ओर इतनी आकर्षित होती हैं?  जो चीज उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने से रोक रही हैं, उसी ओर क्यों प्रवृत्त होती हैं। लाइव कथा में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से दुगनी से भी अधिक थी। वास्तव में उन में से अधिक महिलाएँ तो वे थीं जो स्वतंत्रता पूर्वक केवल ऐसे ही आयोजनों में जा सकती थीं। लेकिन इन आयोजनों को करने में पुरुषों और व्यवस्था की ही भूमिका प्रमुख है। शायद इस लिए कि पुरुष चाहते हैं कि महिलाओं को इस तरह के आयोजनों में ही फँसा कर रखा जाए। इन के माध्यम से लगातार उन के जेहन में यह बात ठूँस-ठूँस कर भरी जाए कि पुरुष के आधीन रहने में ही उन की भलाई है।
न सब तथ्यों ने मुझे इस निष्कर्ष तक पहुँचाया कि महिलाओं की पुरुषों के समान अधिकार और समाज में बराबरी का स्थान प्राप्त करने का उन का संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वे धर्म से मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेती। महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है। इस बात से महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने के विरोधी धर्म-प्रेमी बहुत चिंतित हैं।  आजकल ब्लाग जगत में  इस तरह के लेखों की बाढ़ आई हुई है और वे स्त्रियों को धर्म की सीमाओं में बांधे रखने के लिए न केवल हर तीसरी पोस्ट में पुरानी बातों को दोहराते हैं, अपितु एक ही पोस्ट को एक ही दिन कई कई ब्लागों पर चढ़ाते रहते हैं। मुझे तो ये हरकतें बुझते हुए दीपक की तेज रोशनी की तरह प्रतीत होती हैं।

34 टिप्‍पणियां:

  1. दिनेशराय द्विवेदी जी महिलाओं को समान अधिकार नहीं बराबरी के अधिकार मिलने चाहिए.और इस्लाम तो बराबरी नहीं बल्कि मर्द से अधिक अधिकार देता है औरत को . यह और बात है इस्लाम को मानने वाले ही इस बात से अनजान बने बैठे हैं क्यों कि आखिर पुरुषप्रधान समाज जो है.

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  2. दिनेशराय जी जिस देश मे मै रहता हुं यहां महिलाओ को पुरुषो के से ज्यादा हक हे, यहां महिलाये पुरुषो से आगे चल रही हे.... ओर अब इतना आगे निकल गई कि अकेली पड गई हे, ओर पुरुष अब इस दोड मे पिछड गया हे, अब यहां महिलाये सोचती हे कि उन्हे क्या मिला... अपना हक पाने मे... ना बच्चे, ना घर ओर ना ही मर्द...यहां उन्ही महिलाओ का घर बसता हे जो सहन शील हे, वर्ना हक के चक्कर मे तीन तीन बार तलाक ले कर अकेली घरो मे बेठी टी वी देखती हे, हम भारतियो की नारी आज भी पुरे विश्व मे सब से ज्यादा सुखी हे, कोई माने या ना माने,

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  3. एक द्वन्द है यह.... कुछ हाथ आया तो कुछ छूटना तय है..... विचारणीय पोस्ट

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  4. सहमत हूँ -धर्म के विकृत स्वरुप ने ही एक बड़ी दीवार खडी कर रखी है!

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  5. बुझते हुए दीपक की तेज रोशनी- सही है!

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  6. @एस.एम.मासूम
    मासूम जी,
    या तो आप वाकई मासूम हैं,या फिर जानबूझ कर किसी उद्देश्य के लिए हकीकत से आँख मूंदे हुए हैं।
    समान अधिकार और बराबरी के अधिकार में क्या फर्क है? जरा शब्दकोषों को टटोल कर देखें। इस्लाम में दिए गए अधिक अधिकार कौन से हैं? जरा सोच समझ कर तसल्ली से अपने ब्लागों पर बताइयेगा।
    इस्लाम में औरत को सिर्फ दायित्व गिनाए हैं, अधिकार तो एक भी नहीं, सिवाय मेहर के, जो पूरे जीवन गुलामी का एक-मुश्त मुआवजा मात्र प्रतीत होता है। वह भी निकाह के वक्त नाम मात्र का तय किया जाता है। अधिक अधिकार की बात तो छोड़ें, बराबरी की ही बात करें, इस धर्म ने मर्द को एक साथ चार पत्नियाँ रखने का अधिकार दिया है(?) लेकिन क्या एक औरत को भी मर्द की तरह एक साथ चार पति रखने का अधिकार दिया है? मर्द को जब चाहे तलाक का अधिकार प्राप्त है, लेकिन औरत को तो निकाह के बाद शादी की कैदी ही बना दिया गया है,उसे तो शादी से निकलने की कोई राह ही नहीं दी गई है।

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  7. महिलाओँ को व्यस्त रखने के लिए और उनकी मानसिकता को अपने अनुकूल ढालने के लिए धर्म का उपयोग होता रहा है .लेकिन अब शिक्षा के प्रसार से और घर की दीवारों से बाहर आने पर उन्हें वस्तुस्थिति का भान होने लगा है .क्रिया की प्रतिक्रिया नियम के अनुसार कहीं अतिवादिता भी देखने में आती है.लेकिम कुल मिलाकर परिवर्तन दिखाई देने लगा है .

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  8. आपकी बात शत प्रतिशत सही है और आपकी शुभेच्‍छा से मैं भी सहमत हूँ। लेकिन यह सब हमारे रक्‍त-कणों की संरचना का तत्‍व बन गया है। रक्‍त शुध्दि के बिना आपकी शुभेच्‍छा साकार होती नजर नहीं आती।

    विचारोत्‍तेजक पोस्‍ट है। आज का दिन अच्‍छा निकलेगा।

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  9. दिनेशराय द्विवेदी जी मैं मासूम हूँ या नहीं मुझे पता नहीं लेकिन मेरा उद्देश्य समाज से अज्ञानता को ख़त्म करना और धर्म के नाम पे जो गलतफहमियां फैली हुई हैं ,उनको दूर कर के आपस मैं सभी इंसानों को एक साथ लाना है और मैं इसी मकसद के तहत काम करता हूँ. ,मैं मुसलमान हूँ इसलिए जब भी मैं इस्लाम कि कानून कि अच्छी बातें बताता हूँ तो लोगों को लगता है मैं अपने धर्म कि अच्छाई बता रहा हूँ जबकि मैं समाज मैं फैली इस धर्म के खिलाफ गलतफहमियां दूर कर रहा होता हूँ.यही काम दूसरे धर्म के माने वालों को भी करने चाहिए जिस से दो इंसानों के बीच कि धर्म के नाम पे खड़ी कि गयी दीकार टूट सके.
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    शब्दकोष का तो इतना अधिक ज्ञान नहीं लेकिन यह जानता हूँ कि पश्चिमी सभ्यता औरत कि समानता कि बात करती है जबकि दोनों सामान नहीं है और इस्लाम हक मैं बराबरी कि बात करता है.
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    औरत मर्द एक जैसे कपडे नहीं पहन सकते लेकिन जब जीवन मैं जीने का हक और इज्ज़त कि बात आ जाए तो बराबरी का दर्जा दिया जाना चाहिए.और इस्लाम मैं यह हक दिया गया है. इस्लाम मैं हर कानून इन्साफ के साथ है. इश्वेर ने औरत मर्द का जिस्म एक जैसा नहीं बनाया तो उनकी ज़रूरतें भी एक जैसे नहीं है. यह सभी जानते हैं कि ४ शादी यदि औरत करने लगे तो औलाद के बाप का नाम बताना मुश्किल जो जाएगा लेकिन मर्द करे तो कोई मुश्किल नहीं.

    आशा है मेरी बात को समझेंगे

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  10. विचारोत्तेजक आलेख। सोचने पर मजबूर करता है। धन्यवाद।

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  11. यह सभी जानते हैं कि ४ शादी यदि औरत करने लगे तो औलाद के बाप का नाम बताना मुश्किल जो जाएगा लेकिन मर्द करे तो कोई मुश्किल नहीं.

    धन्य हो आप
    मुस्लिम समाज मे चार शादियाँ केवल तब जयाज हैं जब किसी ऐसी औरत से की जाए जिसका कोई नहीं हैं और पुरुष उसको सहारा देने के लिये अपने घर मे उसको रखता हैं . ये इसलिये किया गया था ताकि देह व्यापर ना हो . दूसरी शादी भी तब करे अगर पहली पत्नी के बच्चा ना हो .

    चार शादिया जायज नहीं हैं , चार शादियों का प्रावधान .

    दूसरी बात मुस्लिम भारत मे रह कर भारतीये संविधान को नहीं मानते सो उनको संविधान मे दी गयी स्वतंत्रता और बराबरी कि बात का कोई पता नहीं हैं .
    औरत के लिये क्या जयाज हैं कि बात करते हैं पर कभी मर्द के लिये क्या गलत हैं इस पर लिखो

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  12. आपकी यह पोस्ट अच्छी लगी ! इस प्रकार की उम्मीदें बुझते दीपक की लौ ही हैं ! शुभकामनायें आपको !

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  13. रचना जी @ इस्लाम के हर कानून मैं (Condition Apply) अवश्य लगा होता है , जिसको समझने और समझाने के लिए समय चाहिए.हाँ मर्दों को क्या नहीं करना चाहिए इस पे लिखूंगा क्योंकि आप कि डिमांड सही है.
    .
    मुस्लिम भारत मे रह कर भारतीये संविधान को नहीं मानते भी एक ग़लतफ़हमी है और इस कि कोई वजह भी मुझे नहीं दिखती. रचना जी मैं किसी को इस्लाम सीखाने या समझाने कि कोशिश नहीं करता बस उस ग़लतफ़हमी को दूर करने कि कोशिश करता हूँ जिनके कारण एक इंसान दूसरे से दूर होता जा रहा है. इसी लिए मैं किसी को इस बात के लिए भी बाध्य नहीं करता कि जो मैं कहूँ उसे मानो भी. मेरे किरदार का आइना यह लव्ज़ हैं.
    उनका जो फ़र्ज़ है वो अहले सियासत जानें मेरा पैग़ाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे

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  14. द्विवेदी जी,

    मासूम साहब का उद्देश्य तो मैं भी जानता हूँ जो कि उनका ब्लॉग अमन का पैगाम है, क्या कोई दूसरा उद्देश्य भी है? ;-)

    वैसे मर्दों को भी दुसरी शादी करने का अधिकार नहीं है, केवल कुछ परिस्थितियों में इजाज़त भर है... वह भी इस शर्त के साथ की दोनों को बराबर हक दिया जाएगा... और बराबर हक देना किस आम इंसान के बस की बात नहीं है, ख़ास के लिए भी मुश्किल है... लेकिन कुछ मर्द अपनी हुकुमत जताने की लिए सही बात सामने लाना ही नहीं चाहते...

    ठीक यही बात तलाक को लेकर भी है, जैसे मर्द तलाक दे सकता है वैसे ही औरत को भी तलाक का हक है... जिसको 'खुला' कहा जाता है.... हक तो दोनों को बराबर हैं लेकिन औरतों को अपने हक पता ही नहीं है...

    जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार हो रहा है, औरतों को अपने हक पता चलते जा रहे हैं और स्थिति बदल रही है... बात जब हक की चल रही है तो एक छोटी सी बात बता दूं... जिससे अंदाजा लग सकता है.... औरतों के ऊपर यह भी फ़र्ज़ नहीं है कि अपने पति के लिए खाना बनाए, पूरे परिवार के घर का काम करने की तो बात ही क्या!!!

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  15. औरतों के ऊपर यह भी फ़र्ज़ नहीं है कि अपने पति के लिए खाना बनाए, पूरे परिवार के घर का काम करने की तो बात ही क्या!!!


    yae kaam kaa batwaara kisnae kiyaa aur kab kiyaa bhartiyae sanskriti kae naam par aurat kae shoshan ko ham kab tak justify karaegae

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  16. aap ki post daer sae padhi apni psot dae chukane kae baad varna naa daeti !!!!!!!

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  17. हम भारतियो की नारी आज भी पुरे विश्व मे सब से ज्यादा सुखी हे, कोई माने या ना माने,


    any statistics to prove this mr raj bhatia

    i have read that indians settle abroad dont marry indian girls settled there rather they come back to india find a devi and settle with her

    and come to think of it how can anyone think of marrying a devi !!!

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  18. आपके एक सवाल का जवाब तो है मेरे पास और उस संशय का समाधान जो आपने इस पोस्ट के ज़रिये ज़ाहिर किया कि किसी भी धर्म में महिला सुरक्षित नहीं तो जनाब इसका सीधा और बहुत सरल जवाब है ::: इस्लाम, आप एक वकील है और मैं उम्मीद करता हूँ आप इस ओर भी कुछ अपनी आँखों को ज़हमत देंगे पढने और अध्ययन करने के लिए तो बात समझ आ जायेगी.

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  19. यह निश्चय है कि जो कारण दिखता है अन्याय का, उसके प्रति आक्रोश होता है पर धर्मपरायणता भारतीयों में कूट कूट कर भरी है।

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  20. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (10-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  21. .
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    .
    इन सब तथ्यों ने मुझे इस निष्कर्ष तक पहुँचाया कि महिलाओं की पुरुषों के समान अधिकार और समाज में बराबरी का स्थान प्राप्त करने का उन का संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वे धर्म से मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेती। महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है। इस बात से महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने के विरोधी धर्म-प्रेमी बहुत चिंतित हैं।

    आप शतप्रतिशत सही हैं, धर्म का एकमात्र व सबसे बड़ा काम ही है यथास्थिति का पोषण... महिलायें ही नहीं, दलित, आदिवासी तथा हाशिये पर डाल दिये गये अन्य तबकों की मुक्ति 'धर्म' (???) की सत्ता की समाप्ति के बाद ही संभव है।

    लेकिन आज की तारीख में बहुत मुश्किल है यह काम... आप टिप्पणियों में ही देखिये दाँये-बाँये कतरा कर निकल रहे हैं साथी... कोई नहीं कह रहा कि आप जो कह रहे हो वह सही है... :(

    आदरणीय मासूम जी व फखरे आलम जी की प्रतिक्रियाँयें अच्छा खासा मनोरंजन प्रदान कर रही हैं... जब मासूम जी कहते हैं कि "शब्दकोष का तो इतना अधिक ज्ञान नहीं लेकिन यह जानता हूँ कि पश्चिमी सभ्यता औरत कि समानता कि बात करती है जबकि दोनों समान नहीं है और इस्लाम हक मैं बराबरी कि बात करता है."... तभी पता चल जाता है कि धर्म की सत्ता (जिसे समाप्त करने की बात यह पोस्ट कर रही है) ने उनकी आँखें इस कदर बंद कर दी हैं कि स्त्री-पुरूष की समानता व सबको समान अधिकार जैसी अवधारणायें समझ ही नहीं सकते... यही हाल जनाब फख़रे आलम का है जो अपने धर्म को हर मर्ज की दवा सा मान समाधान के तौर पर पेश कर रहे हैं ।

    रचना जी, आप जो कह रही हैं या कहना चाह रही हैं उसे सही संदर्भ व सही भावना से समझने वाले यहाँ बहुत ही कम हैं, ब्लॉगवुड में बहुत सी महिलाये हैं परंतु आपको छोड़ लगभग सभी मौन या निरपेक्ष रहना सुविधाजनक समझती हैं, ऐसे माहौल में आपका यह दखल बहुत ही आश्वस्तिपूर्ण होता है मेरे जैसों के लिये... कैरी ऑन युवर गुड वर्क... कभी न कभी स्थितियाँ बदलेंगी... मैं घोर आशावादी हूँ, और पूरा विश्वास है मुझे कि अपनी बच्चियों के लिये पहले से एक बेहतर दुनिया छोड़ कर जाउंगा, जहाँ उनको अपने अधिकारों के लिये लड़ना नहीं होगा...

    और हाँ बात-बात पर पश्चिम की महिलाओं को ज्यादा हक मिलने से हुई उनकी तथाकथित बुरी हालत का बखान करने वाले मुझे पश्चिम की एक भी ऐसी महिला का उदाहरण नहीं दिखा सकते जो यह कहे कि उसके अपने समाज के मुकाबले उसे पूर्व की औरतों की स्थिति बेहतर लगती है।


    ...

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  22. महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है...

    क्या खूब उद्‍घोष है...

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  23. महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है!!

    sahi kaha iska jawaab shighr hi main aap ko deta hoon dwivedi jee agar aap swasth bahas ke liye taoyar ho to !

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  24. आज की भारतीय नारी सब से आगे है। हम घर में देखते हैं ना :) :)

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  25. धर्म से मुक्ति से पहले स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना पडेगा। वहीं से आगे ही राह खुलेगी। परिवर्तन दिख भी रहा है और परिवर्तन की गति उत्तरोत्तर तेज ही होती जायेगी, समय लगेगा लेकिन समाज भी बदलेगा। मुझे पूरा विश्वास है।

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  26. द्विवेदी जी बाकी चीजों के बारे में छोड़ दीजिये, हिन्दू तो अपनी मान्यताओं में परिवर्तन स्वीकार कर लेगा और आधे हिन्दुओं की टिप्पणियां इसकी प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, लेकिन मुस्लिम... यही अन्तर साक्षात है..

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  27. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  29. http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/03/blog-post_1125.html

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  30. वैसे अगर गौर से सोचा जाये तो ये अधिकार है क्या चीज़ शायद वही न सम्मान ? अधिकार , अधिकार और अधिकार कहाँ ले कर जाना है ये सब , सब कुछ तो यही रहेगा न किसी से ज्यादा न ही कम हमें तो सिर्फ आप सबका साथ चहिये जिससे ज्यादा पाने से आपके लिए दुःख न हो और तिरस्कित होने पर औरत अपना संतुलन न खो दे क्युकी न ज्यादा मिलने में ही ख़ुशी होगी क्युकी बेटा , बाप , भाई और पति इन सबका रिश्ता भी तो हमसे ही जुड़ा है न , तो इन्हें भी कोई तकलीफ हो तो ये नारी फिर भी न सह पायेगी तो सिर्फ सम्मान, इज्ज़त और प्यार मेरे ख्याल से बहुत है |
    अच्छा विषय शुक्रिया दोस्त |
    वैसे किसी भी मुद्दे का हल एक साथ बैठ कर निकला जा सकता है क्युकी बहस का तो कभी अंत होता ही नहीं |

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  31. पढ़ लिया और टिप्पणियाँ भी देख लीं। धर्म तो स्त्री के लिए बाधक है, इससे असहमति नहीं है। पूरी दुनिया में स्त्री की हालत पर सीमोन-दा-बोउवार की किताब शानदार है।

    लेकिन मैं स्त्रियों से बात करना बहुत कठिन मानता हूँ। कभी समझाकर देखिए। माथा पीटना पड़ता है इनके धर्म के जबरदस्त दुष्प्रभाव से। धर्म में इन्हें पुरुषों ने डाला है, यह बात पूरी तरह सही नहीं क्योंकि वह भी तो अटका हुआ है धर्म के जाल में।

    लेकिन एक वर्ग के पास तो हर समस्या का समाधान है!

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  32. न जाने आपकी यह पोस्ट मेरी नजर में क्यों न आई? आपसे सहमत हूँ.
    संसार की हर असमानता, हर गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की शक्ति मनुष्य में प्राय: होती है. किन्तु उसके लिए इस अन्याय के प्रति एक क्रोध की आवश्यकता होती है. यदि क्रोध की धार तेज होगी तो जंजीर काट ही देगी. अत: इस क्रोध की धार को कुंद करने के लिए धर्म या भाग्य का सहारा लिया जाता है. ताकि क्रोध अत्याचारी पर जब भी आए तो उसका एक बड़ा हिस्सा अपने भाग्य की तरफ छिटक जाए, कि मैं इस जाति, या लिंग में पैदा ही क्यों हुई. क्योंकि इस जाति या लिंग के लिए तो धर्म ने यही व्यवस्था की है.

    जो अपने धर्म को स्त्रियों के लिए बेहतर कह रहे हैं वे गलत कह रहे हैं. और इसमें भारतीय समाज का दोष नहीं है. जिस भूमि में वह धर्म जन्मा वहाँ तो स्त्रियों की दशा और भी बदतर है. खैर दिल बहलाने को वे सोचें तो सोचते रहें.
    मुझे लगता है कि सिख धर्म में शायद सबसे अधिक बराबरी है. अध्ययन करने पर पता चलेगा.
    घुघूतीबासूती

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कैसा लगा आलेख? अच्छा या बुरा? मन को प्रफुल्लता मिली या आया क्रोध?
कुछ नया मिला या वही पुराना घिसा पिटा राग? कुछ तो किया होगा महसूस?
जो भी हो, जरा यहाँ टिपिया दीजिए.....