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बुधवार, 10 जून 2026

नया सिलसिला

देहरी के पार, कड़ी - 64
एसोसिएशन लाइब्रेरी से कुछ नई किताबें लेकर निकलते समय सूरज डूब चुका था. धूप गायब थी, जिससे गर्मी कम हो गयी थी. उसकी सोसायटी मुश्किल से दो किलोमीटर भी नहीं थी. वह पैदल ही चल दी. उसे फिर आकाश का ध्यान आया. पूरा हफ्ता बीत चुका था, लेकिन आकाश का फोन नहीं आया था. पिछले शनिवार की उस लंबी मुलाकात के बाद प्रिया ने मन ही मन तय किया था कि इस बार वह पहल नहीं करेगी; आकाश को खुद आगे बढ़कर फोन करना चाहिए. लेकिन जैसे-जैसे दिन गुज़रते गए, फोन की खामोशी उसके भीतर एक अजीब सी छटपटाहट पैदा करने लगी थी. क्या आकाश उसकी बातों से आहत हो गया था? या उसने प्रिया के उस गंभीर रुख को कोई आखिरी फासला समझ लिया था? सवालों का एक सिरा था जो थमता नहीं था. वह सौ मीटर भी नहीं चली थी कि पसीने में तर हो चुकी थी. मुंबई की उमस भरी गर्मी सबसे मुश्किल मौसम है. उसे शेयरिंग ऑटो जाता दिखा. वह उसे रोककर बैठ गई.

फ्लैट का दरवाजा खोल अंदर प्रवेश करते ही उसने एसी चालू किया. किताबें मेज पर रखकर सोफे पर पसर गई. दस मिनट बाद उसे गर्मी से कुछ राहत मिली. उसने घड़ी देखी, सवा सात बज रहे थे. अब सवाल शाम के खाने का था. आज सुबह सफाई और कपड़े धोने सुखाने के काम में लग जाने से दोपहर का खाना देर से, करीब ढाई बजे हुआ था. पेट में भूख कम थी, लेकिन थी कि कुछ न कुछ तो पेट में जाना ही चाहिए. वह रसोई की तरफ कदम बढ़ाने ही वाली थी कि ड्रॉइंग रूम में रखे फोन की घंटी बज उठी.

प्रिया ने लपककर फोन उठाया. स्क्रीन पर 'आकाश्' का नाम चमक रहा था. दिल की धड़कन ने एक हल्की सी रफ्तार पकड़ी, लेकिन अपनी आवाज़ को बेहद सामान्य रखते हुए कहा, "हेलो आकाश."

"हेलो प्रिया! कैसी हो? परेशान तो नहीं किया?" उधर से आकाश की वही परिचित, हिचकिचाती हुई आवाज़ आई.



"नहीं, बिल्कुल नहीं. बस अभी-अभी एसोसिएशन लाइब्रेरी से लौटी हूँ. सोच ही रही थी कि शाम के खाने का क्या किया जाए. तुम बताओ, पूरे हफ्ते भर से तुम्हारी कोई खबर नहीं? एक फोन कॉल तक नहीं. सब ठीक तो है?" प्रिया के उलाहने में भी अपनापन था.

उधर से आकाश थोड़ा हँसा, उसकी हँसी ने प्रिया को एक राहत दी. "हाँ, सब ठीक है प्रिया. असल में इस हफ्ते ऑफिस में एक नया मॉड्यूल डिप्लॉय होना था, रातों की नींद गायब थी. और... सच कहूँ तो थोड़ा समय खुद को भी देना चाहता था. पिछले वीकेंड की बातें दिमाग में घूम रही थीं. मुझे लगा तुम्हें भी थोड़ा स्पेस चाहिए."

प्रिया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई. आकाश की इस परिपक्वता ने उसके मन के सारे संशयों को एक पल में पिघला दिया. "स्पेस तो ठीक है आकाश, पर इतनी खामोशी भी अच्छी नहीं. खैर, डिप्लॉयमेंट पूरा हो गया?"

"हाँ, कल रात ही साइन-ऑफ मिला है. आज दिनभर सोता रहा. अभी उठा तो तुम्हारी याद आई. खाना खा लिया तुमने?"

"नहीं, दोपहर का लंच लेट था, तो अभी भूख नहीं है. कुछ हल्का-फुल्का बना लूंगी. तुमने?" प्रिया ने पूछा.

"मैं बस अभी नीचे जा रहा हूँ, रामजी काका के 'एमबी' से कुछ पैक करवाकर लाऊँगा. तुम कहो तो तुम्हारे लिए भी पैक करवाकर उधर आ जाता हूँ, साथ में खाएंगे और बतियाएंगे," आकाश ने कहा.

"नहीं, मुझे इतनी भूख नहीं है, कुछ बना लूंगी. तुम्हारा ये हफ्ता काम में गुजरा है तो आज तुम भी खाना खाकर आराम करो, इधर आओगे तो बहुत रात हो जाएगी. अच्छा आकाश. गुड नाइट," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा और फोन रख दिया. उस एक छोटी सी बातचीत ने पूरे हफ्ते के सन्नाटे को दोनों के बीच से खदेड़ दिया था.

अगले दिन रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मुंबई के आसमान में हल्के बादल थे और खिड़की से आती हवा ठंडी थी. प्रिया सुबह आराम से सोकर उठी. उसे किसी काम की कोई जल्दी नहीं थी. उसने इत्मीनान से रसोई में जाकर अपने लिए अदरक वाली कड़क चाय बनाई. ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठकर, चाय की चुस्कियां लेते हुए वह अपने लैपटॉप पर ऑनलाइन अखबार पढ़ने ही लगी थी कि उसके फोन की रिंग बजी.

स्क्रीन पर 'मयंक' का नाम था. प्रिया के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत कॉल रिसीव किया, "हाँ मयंक! आज सुबह-सुबह दीदी की याद कैसे आई?"

"गुड मॉर्निंग दीदी! याद तो रोज़ आती है, पर आज आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है," उधर कोटा से मयंक की उत्साह भरी आवाज़ गूँजी.

"अच्छा! क्या खबर है? तेरे एमबीए के एग्जाम्स खत्म हो गए?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

"हाँ दीदी! कल शाम ही फाइनल सेमेस्टर का आखिरी पेपर खत्म हुआ है. अब बस रिज़ल्ट और प्लेसमेंट का इंतज़ार है. बीच में तीन-चार हफ्ते का गैप है. मैं सोच रहा हूँ मुंबई घूमने आ जाऊँ? तुम्हारे पास रुकूंगा, मुंबई भी देख लूंगा और तुमसे मिले भी कितने दिन हो गए हैं!" मयंक ने अपनी पूरी योजना एक सांस में कह डाली.

प्रिया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह इस महानगर में परिवार से महीनों से दूर थी. ऐसे में भाई का आना किसी उसके लिए उत्सव जैसा था. "यह तो बहुत बढ़िया आइडिया है मयंक! कब आना चाहते हो? बताओ. मैं तुम्हारा रिजर्वेशन करवा देती हूँ. तुम आ जाओ. यहाँ हम दोनों खूब घूमेंगे."

"दीदी, सच बताऊँ, आना तो मम्मी भी चाहती हैं. उनका बहुत मन है तुम्हारे पास आने का," मयंक का लहजा थोड़ा धीमा हुआ. "लेकिन अगर मम्मी भी आ जाएंगी, तो पापा घर पर बिल्कुल अकेले रह जाएंगे. पापा का तो तुम्हें पता ही है, गुस्सा भले ही ठंडा पड़ गया हो, पर अपनी ज़िद पर अभी भी अड़े हैं. इसलिए मम्मी ने कहा है कि ‘अभी तुम्हारी छुट्टियाँ हैं तुम हो आओ, फिर जब मैं वापस लौटूंगा, तब मम्मी और पापा दोनों एक साथ कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास मुंबई आएंगे."

मयंक की बात सुनकर प्रिया की आँखें थोड़ी नम हो गईं. पापा का सीधे फोन न करना, लेकिन मम्मी के ज़रिए मुंबई आने की इच्छा जताना—यह दिखा रहा था कि समय के साथ दूरियों की बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही है. देहरी लांघने का जो मलाल था, वह अब धीरे-धीरे स्वीकार्यता में बदलता जा रहा था.

"कोई बात नहीं मयंक. मम्मी-पापा को बाद में ले आना, अभी तुम आ जाओ. आने का दिन बताओ. मैं अभी टिकट बुक करवाती हूँ," प्रिया ने अपनी आवाज़ को सँभालते हुए कहा.

"ठीक है दीदी, मैं सोच रहा हूँ कि गुरुवार को यहाँ से रवाना होकर शुक्रवार पहुँच जाऊँ. उस दिन तुम ऑफिस जाना, मैं दिन भर आराम करूंगा. तुम शाम को लौटोगी तब मुंबई घूमने का प्लान बनाएंगे. हमें पूरे दो रोज लगातार घूमने को मिल जाएंगे," मयंक ने चहकते हुए कहा.

“ठीक है मयंक, मैं अभी टिकट बुक करवाकर तुम्हें मेल करती हूँ.” प्रिया ने फोन रख दिया और टिकट बुक करवाने के लिए लैपटॉप स्टार्ट करने का बटन दबा दिया.

प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा. सुबह अब और खूबसूरत लगने लगी थी. एक तरफ आकाश के साथ बढ़ती हुई यह अनकही सहजता और दूसरी तरफ भाई का आगमन और माता-पिता के आने की सुगबुगाहट—जिंदगी में परिवार फिर से नजदीक लौट रहा था.
... क्रमशः

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