देहरी के पार, कड़ी - 55
शनिवार को यूनियन ऑफिस में कणिका के साथ मीटिंग समाप्त हुई, तब 3 बज चुके थे. सुबह उसने खाना बनाने के बाद धुलने वाले कपड़े मशीन में धुलने के लिए डाले थे. सोचा था खाना खाने के बाद उन्हें निकाल कर सुखा देगी. लेकिन मीटिंग का समय हो जाने पर वह निकल ली थी. उसे ध्यान आया कि कपड़े सुखाकर उन्हें इस्त्री के लिए डालना है वरना सोमवार को ऑफिस जाने के लिए कपड़ों का संकट हो सकता है. वह फौरन घर पहुँची, मशीन से कपड़े निकालकर उन्हें बालकनी में सूखने डाल दिया और कुछ देर विश्राम के लिए बिस्तर पर लेट गई.
उसकी आँखें खुलीं तो खिड़की के शीशे से आता हलका प्रकाश देख उसे लगा सुबह हो गई है. उसने समय देखने के लिए आदतन पास रखा मोबाइल उठाकर देखा, आकाश की अनेक मिस-कॉल थीं. ‘यह कैसे हुआ? उसे रिंग क्यों नहीं सुनाई दी? देखने पर पता लगा कि यूनियन ऑफिस में मीटिंग के पहले उसने मोबाइल साइलेंट मोड पर डाला था और बाद में मोड बदलना भूल गई. उसने तुरंत मोबाइल का मोड बदला. मोबाइल से ही पता लगा कि अभी सुबह नहीं हुई है, बल्कि सूरज डूब चुका है और रात होने वाली है. उसे ध्यान आया, ‘कपड़े सूख गए होंगे, उन्हें इस्त्री के लिए डालना है’. तभी मोबाइल पर रिंग बज उठी. आकाश का फोन था.
"हाँ आकाश, बताओ. फ्लैट देख लिए?" प्रिया ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.
“फ्लैट की बात बाद में, पहले ये बताओ कि तुम्हें क्या हो गया है? डेढ़ बजे से अब तक बीस कॉल कर चुका हूँ, तुम फोन क्यों नहीं उठा रही थी?” आकाश की आवाज से लगा वह बुरी तरह झल्ला रहा था. प्रिया को हँसी आ गई.
“कुछ नहीं आकाश मीटिंग में फोन साइलेंट मोड पर डाल कर पर्स में रख दिया था. वहाँ से आई तो थकी थी. थोड़ी लेटी की आँख लग गई. अभी उठी हूँ तो समझ रही थी कि सुबह हो गई है.” प्रिया फिर हँस पड़ी. हँसते-हँसते ही बोला, “मोबाइल पर टाइम देखा तो पता लगा अभी तो शाम हुई है. इतने में तुम्हारी कॉल आ गई.”
आकाश का गुस्सा उसकी हंसी से पल भर में काफूर हो गया. उसे भी हँसी आ गई. दोनों की हँसी कम हुई तो आकाश बोला, "हाँ प्रिया, डेढ़ बजे तक संदीप ने मुझे करीब सात फ्लैट दिखाए. उन्हें देखने के बाद अब मैं एक अजीब असमंजस में हूँ. दो विकल्प बिल्कुल विपरीत हैं और मैं फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि किसे फाइनल करूँ? मैं चाहता हूँ कि पहले तुम एक बार दोनों फ्लैट देख लो," आकाश की आवाज़ में उलझन साफ़ महसूस हो रही थी.
"ऐसी भी क्या दुविधा है, आकाश?"
"एक फ्लैट पवई में है—पूरी तरह फर्निश्ड. ए.सी., पंखा, फ्रिज, वाशिंग मशीन, पर्दे, बेड से लेकर किचन के तमाम उपकरणों से लैस है. मुझे सिर्फ अपना सूटकेस लेकर जाना है और चादर बदलनी है. सबसे बड़ी बात है कि यह फ्लैट विक्रोली में मेरे नए ऑफिस के बिल्कुल पास है, एकदम वाकिंग-डिस्टेंस. वहाँ जाने-आने का समय और रोज़ का ऑटो का खर्चा बचेगा. लेकिन उसका रेंट थोड़ा अधिक है. दूसरा विकल्प मैंने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा है—एक छोटा 1BHK, जिसका किराया मेरे बजट में है, लेकिन वह पूरी तरह कोरा है. एक बेड के सिवा सब कुछ जुटाना पड़ेगा. ऑफिस से दूर है लेकिन तुम्हारे फ्लैट के नजदीक है," आकाश ने दोनों विकल्प उसके सामने रख दिए.
प्रिया उसकी बात सुनकर मन ही मन मुस्कुराई. पवई की कॉरपोरेट चमक और आधुनिक सुविधाएँ एक तरफ थीं, और अंधेरी का बजट तथा उसका सामीप्य दूसरी तरफ. उसने कुछ पल सोचा और कहा, "ठीक है आकाश, तुम कल दोनों फ्लैट मालिकों से दोपहर दो बजे बाद का समय ले लो. मैं कल सुबह यूनियन ऑफिस की एक ज़रूरी मीटिंग के बाद सीधे मेरे फ्लैट पर पहुँचती हूँ, हम वहीं से दोनों फ्लैट देखने चलते हैं."
रविवार सुबह दस बजे आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर में ईसीआई यूनियन के करीब बीस कार्यकर्ता मौजूद थे. कणिका जोशी ने प्रश्नावली के फार्म न केवल तैयार कर लिए थे बल्कि उनकी करीब चार सौ प्रतियाँ करवा कर लाई थी और अब बोर्ड के पास खड़ी होकर सर्वे का 'प्रोटोकॉल' समझा रही थी. वह कार्यकर्ताओं को जो खुद भी उसी कारखाने के मजदूर थे, अपने साथी मज़दूरों से उनके मनोवैज्ञानिक स्तर पर जाकर बात करने, उनका भरोसा जीतने और बिना किसी पूर्वाग्रह के सांख्यिकीय डेटा दर्ज करने का तरीका सिखा रही थी. प्रिया वहाँ बैठकर कणिका को देखते हुए सीख रही थी कि सर्वे का वैज्ञानिक तरीका क्या है. वह जरूरी बिंदुओं को अपनी नोटबुक में नोट भी करती जा रही थी. बाद में उसने प्रश्नावली फार्मों को व्यवस्थित करने और प्रत्येक कार्यकर्ता को उसकी जिम्मेदारी सौंपने में कणिका की मदद की. ट्रेनिंग मीटिंग खत्म हुई तब एक बज चुका था.
प्रिया ने आकाश को फोन लगाकर पूछा, “दोनों फ्लैट मालिकों से समय तय हुआ?”
“हाँ मैं तुम्हारे फ्लैट पर डेढ़ बजे पहुँच रहा हूँ, पास वाले फ्लैट का मालिक दो बजे वहीं मिलेगा. लेकिन पवई वाले ने शाम साढ़े तीन बजे का टाइम दिया है.”
“ये तो बढ़िया है? तुमने लंच किया या नहीं?”
“नहीं, सोचा था साथ कर लेंगे.”
“फिर ऐसा करते हैं, हम पहले अंधेरी का फ्लैट देखेंगे. पवई के रास्ते में रामजी काका के ‘एमबी’ पर लंच करेंगे और फिर साढ़े तीन बजे पवई वाला फ्लैट देखेंगे. ठीक?”
“ठीक.” आकाश ने कहा.
“तो मैं अपने फ्लैट के लिए निकलती हूँ.”
ठीक दो बजे, प्रिया और आकाश ने अंधेरी ईस्ट की उस सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल वाला फ्लैट देखा. दिन के उजाले में वह 1BHK और भी छोटा लग रहा था. दीवारें खाली थीं और कमरा पूरी तरह सूना था. सामान रखने पर और भी छोटा दिखने लगता. दोनों ने ‘एमबी’ में लंच किया और वहाँ से निकलकर वे दोनों पवई वाले उस आधुनिक फ्लैट में पहुँचे. फ्लैट साफ-सुथरा था, खिड़की से बाहर का दृश्य बेहतर था. घर के सारे उपकरण चमचमा रहे थे. आकाश ने खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, "देखो प्रिया, यहाँ से मेरा ऑफिस सिर्फ दस मिनट की दूरी पर है. बस समस्या इसके थोड़े अधिक रेंट की है."
प्रिया ने फ्लैट का एक चक्कर लगाया, उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और उसका इंजीनियरिंग बैकग्राउंड तुरंत सक्रिय हो गया. उसने अपने बैग से एक छोटा नोटपैड और पेन निकाला और आकाश के सामने खड़े होकर कहा, "आकाश, मेरे विचार से तुम्हें यह पवई वाला फ्लैट ही किराए पर लेना चाहिए."
आकाश ने चकित होकर उसे देखा, "लेकिन इसका किराया बहुत है, प्रिया?"
"यही तो मुंबई का भ्रम है, आकाश," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा. "अब मेरा गणित सुनो. यदि तुम अंधेरी में रहते हो, तो तुम्हें यहाँ से रोज़ पवई जाना और आना पड़ेगा. मुंबई के इस ट्रैफिक में रोज़ आने-जाने में तुम्हारे कम से कम दो से तीन घंटे सफर में बर्बाद होंगे. अगर तुम ऑटो का रोज़ का खर्च जोड़ो, तो महीने में कम से कम 3 से 5 हज़ार रुपये तो सिर्फ किराए और ट्रैवलिंग में ही अतिरिक्त खर्च हो जाएंगे."
प्रिया ने कमरे के खाली कोनों की तरफ इशारा करते हुए आगे कहा, "दूसरी बात, अंधेरी वाला फ्लैट पूरी तरह खाली है. वहाँ रहने लायक बुनियादी सुविधाएँ जुटाने के लिए—जैसे फ्रिज, वाशिंग मशीन, बेड और किचन का सामान—तुम्हें तुरंत अपनी जेब से कम से कम 50 हज़ार रुपये एकमुश्त खर्च करने पड़ेंगे. यहाँ पवई में वो सारा 'कैपेक्स' (कैपिटल एक्सपेंडीचर) बचा हुआ है. पवई का फ्लैट दिखने में महंगा है, लेकिन समय, ऊर्जा और तात्कालिक खर्च के हिसाब से यह तुम्हें बिल्कुल महंगा नहीं पड़ेगा. यहाँ रहना तुम्हारे लिए मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से बेहतर रहेगा और तुम अपनी नई नौकरी पर पूरा ध्यान दे सकोगे."
आकाश विस्मय से प्रिया को देखता रह गया. वह उसकी तार्किक क्षमता, वित्तीय समझ और इतनी बारीक व्यावहारिक सोच का कायल हो गया. उसके मन का सारा असमंजस और कशमकश पल भर में दूर हो गए. उसे समझ आ गया कि प्रिया ने भावुकता से ऊपर उठकर उसके आराम और भविष्य के हक में फैसला दिया था. अब उसका नया आशियाना लगभग तैयार था.
उसने तुरंत जेब से मोबाइल निकाला और प्रॉपर्टी डीलर संदीप का नंबर डायल किया, "हेलो संदीप, मैं पवई वाला फ्लैट फाइनल कर रहा हूँ. ओनर से बात करके सोमवार सुबह रेंट एग्रीमेंट तैयार रखिएगा."
फोन रखकर उसने प्रिया की ओर देखा. दोनों के चेहरों पर एक बड़ा काम मुकम्मल होने का अनकहा सुकून तैर रहा था.
... क्रमशः
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