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बुधवार, 13 मई 2026

समानांतर मोर्चे

देहरी के पार, कड़ी - 51
आकाश को प्रिया ने आटोरिक्शा में बिठाकर विदा किया तो वह भी बाहर सिर निकालकर उसे ओझल होने तक देखता रहा. बब्बन भाई ने कुशलता से अपना रिक्शा अंधेरी की भीड़भाड़ वाली सड़क से निकालकर विक्रोली की ओर मोड़ दिया. आकाश की आँखों में उसे विदा करती प्रिया की छवि अब भी तैर रही थी.

प्रिया की छवि ने आकाश के मन में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी थी. उससे पहली बार कोटा में प्रत्यक्ष मिलने के बाद तीन रात जयपुर में साथ बिताने के बीच प्रिया उसे अच्छी लगने लगी थी. लेकिन कंपनी के नियमों के चलते वह उसकी चाहत के उस दायरे से बाहर रही जो उसे जीवनसाथी बनाने की ओर बढ़ता.. लेकिन जैसे ही आकाश ने कंपनी स्विच की, प्रिया उसकी चाहत के उस दायरे में प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया को उसने अब तक केवल एक गंभीर प्रोफेशनल और संकट में घिरी एक युवती के रूप में देखा था, लेकिन आज मुंबई की सड़कों पर उसकी 'पहुँच' और लोगों का उसके प्रति 'सम्मान' देखकर वह चकित था. बब्बन भाई जैसे मेहनतकश का उसे 'दीदी' कहना और रामजी काका का उस पर अगाध भरोसा—आकाश को समझ आ रहा था कि प्रिया ने इस शहर में आकर सिर्फ नौकरी नहीं की थी, बल्कि अपने आचरण से एक स्थान हासिल कर लिया था. वह मुम्बई में रोजगार के लिए आकर रहने वाली सामान्य लड़की नहीं लगती थी, बल्कि ऐसा लगता था जैसे वह यहीं कहीं पैदा हुई, और पली बढ़ी थी. उसमें इस शहर के प्रति अजनबीपन पूरी तरह समाप्त हो चुका था. उसे ऐसा लगा कि वह जयपुर में उसके जितने निकट आई थी उतनी ही दूर चली गई थी.

विक्रोली के गेस्ट हाउस पहुँचते-पहुँचते आकाश के मन में यह विचार पुख्ता हो गया कि प्रिया के साथ जुड़ना आसान नहीं होगा. प्रिया के विस्तृत और संघर्षशील व्यक्तित्व को स्वीकार करना होगा. इसके लिए उसे प्रिया को और गहराई के साथ समझने की कोशिश करनी होगी. उसे खुद भी अपने व्यक्तित्व को विस्तार देना होगा और उसके व्यक्तित्व से दूरी कम करनी होगी. उसने अपना सामान कमरे में रखा और खिड़की से बाहर फैली मुंबई की इमारतों की ऊँचाइयाँ देखते हुए सोचा, "क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ? क्या मैं यह कर सकूंगा?"

आईआईडीईए के उस छोटे हॉल में कुछ कुर्सियाँ बढ़ा दी गई थीं, अब वहाँ 24 लोग बैठ सकते थे. कार्यसमिति के 21 में से 19 सदस्य ही आए थे. एक सदस्य के रिश्ते में किसी का देहान्त हो गया था और एक किसी जरूरी काम से मुंबई से बाहर था. बैठक में प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी सहित 21 व्यक्ति थे. कमरे में ज्यादा लोगों के कारण उमस बढ़ गई थी, पंखा अपनी पूरी रफ्तार से चलते रहने के बावजूद उसे कम करने में नाकाम था.

जैसे ही सचिव शिंदे ने 'प्रोफेशनल रिसर्च एनालिस्ट' बुक करने, उससे प्रश्नावली तैयार करवाने और कुछ घंटों की ट्रेनिंग के साथ 'साइंटिफिक सर्वे' का औपचारिक प्रस्ताव रखा, हॉल में विरोध के स्वर उभरने लगे. एक वरिष्ठ सदस्य ने मेज थपथपाते हुए कहा, "शिंदे, हमें इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों की क्या ज़रूरत है? हम बरसों से अपने मजदूर साथियों के साथ जी रहे हैं. हम जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं. यह सर्वे सिर्फ वक्त की बर्बादी है और इससे मैनेजमेंट को हमारी रणनीति का पता चल जाएगा."

बहस गरम हो गई. कुछ सदस्यों को लगा कि यह 'सर्वे' दरअसल उनकी अपनी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. प्रशांत बाबू शांत थे, वे जानते थे कि यह प्रतिरोध होना ही था. उन्होंने सभी सदस्यों को इस विषय पर अपने विचार रखने को कहा. फ्रेक्शन में उपस्थित सदस्यों सहित कुल 9 सदस्यों ने ही इस सर्वे के समर्थन में राय दी, बाकी सबने उसे व्यर्थ बताया. इस मुद्दे पर बहस इतनी तेज हो गई कि दो-तीन मेंबर एक साथ ऊँची आवाज में बोलने लगे.

कॉमरेड कुलकर्णी ने हस्तक्षेप कर ऊँचा बोलने वालों को चुप कराया. “यह बैठक कुछ निर्णय लेने के लिए बुलाई गयी है. उसके लिए विचार विमर्श सहज रीति से हो सकता है. सब अपनी राय शांति से रख सकते हैं. अब जिस बिंदु पर विवाद है, पहले हमें समझ लेने चाहिए उसके बाद हम फिर से राय कर सकते हैं. यहाँ कितने लोग हैं जो एक विज्ञान सम्मत रीति से किए जाने वाले सर्वे के लाभों और नुकसान के बारे में समझते हैं?”

इस प्रश्न से बैठक में एकदम शांति छा गई. उनमें से कोई भी सर्वे के तरीके के बारे में कोई जानकारी नहीं रखता था. कॉमरेड कुलकर्णी ने बोलना जारी रखा. “पहले तो आप सबको यह समझना चाहिए कि यह सर्वे हमारी राय बदलने के लिए नहीं, बल्कि हमारी राय को 'सबूत' में बदलने के लिए है. इसके दो उद्देश्य हैं. एक तो मजदूरों की राय स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ जाए. दूसरे जब इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में बात हो तो हम मैनेजमेंट के तर्क का कि मजदूर खुश हैं हम जवाब दे सकें. तब हमारे पास सबूत होगा. यह सर्वे वह दस्तावेज़ बनेगा जिसे अदालत नकार नहीं सकेगी."

कॉमरेड कुलकर्णी के 'कोर्ट', 'सबूत' और स्पष्ट राय वाले तर्क से विरोधी कुछ शांत हुए. प्रशांत बाबू ने मौके का फायदा उठाते हुए जोड़ा, "अगर हम विज्ञान और डेटा का साथ नहीं लेंगे, तो पूंजीवाद हमें पुरानी तकनीकों की तरह ही कुचल देगा." काफी तर्क-वितर्क के बाद, प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया, हालांकि दो-तीन चेहरे फिर भी तने हुए नजर आते रहे.

फ्रेक्शन मीटिंग से घर लौटते समय शेयरिंग ऑटो में बैठी प्रिया ने अपनी आँखें मूँद लीं. वह आज के दिन के बारे में सोचने लगी. सुबह पाँच बजे उठना, स्टेशन पहुँचकर आकाश को रिसीव करना, उसका छह घंटों का साथ, उसे विदा करने के बाद फ्रेक्शन मीटिंग— सब कुछ उसके मस्तिष्क पटल पर किसी फिल्म के दृश्यों की तरह चल रहा था.

उसे महसूस हुआ कि उसका अपना जीवन अब दो समानांतर मोर्चों पर चल रहा था. एक मोर्चा 'व्यक्तिगत' था, जहाँ आकाश का साथ उसे एक शांत कोमलता से भर देता था, और दूसरा मोर्चा 'सामाजिक' था, जहाँ हर कदम पर वह सहज ही रणनीति का हिस्सा बन जाती थी.

फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही उसे उस सन्नाटे का अहसास हुआ जो आकाश के जाने के बाद और गहरा गया था. उसने चाय के लिए दूध, चीनी, पत्ती और पानी सब एक साथ पतीली में डाल गैस पर चढ़ा दिया और बालकनी में आकर खड़ी हो गई. आज उसने एक बहुत बड़ी जीत हासिल की थी—फ्रेक्शन को एक आधुनिक सोच के लिए मनाना आसान नहीं था.

तभी उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी. आकाश का मैसेज था. "प्रिया, तुम्हें आज मुंबई में फिर से देखा तुम्हारा सुबह जल्दी उठकर बोरिवली स्टेशन पर मुझे लेने आना, अपने घर ले जाना, फिर रामजी का मेवाड़ भोजनालय, तुम्हारा मीटिंग में समय से पहुँचने का जुनून और फिर वे बब्बन भाई जो मुझे छोड़ने आए. इन सब के बीच तुम्हारे व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू आज मैंने देखा, तुम कुछ अपरिचित सी लगने लगी. तुम्हारे इस रूप ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन उसे देख मन कुछ भय भी पैदा हुए. उनपर मिलने पर बात करेंगे. उम्मीद है तुम्हारी मीटिंग सफल रही होगी."

मुस्कुराते हुए मैसेज का जवाब टाइप करने लगी— "मीटिंग सफल रही, आकाश. हम बात करेंगे लेकिन ये मुंबई अभी तुम्हें और भी बहुत कुछ दिखाएगी."
... क्रमशः

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