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शनिवार, 9 मई 2026

भीतरी मोर्चा

देहरी के पार, कड़ी - 48
आमसभा ने निर्णय किया था कि कार्यसमिति के सदस्य हर मजदूर से मिलेंगे और उसकी राय जानेंगे. प्रिया और उसकी टीम पहले मजदूरों के परिवारों के बीच रैंडम सर्वे कर चुकी थी. लगभग सबके परिवार चाहते थे कि ट्रक सिस्टम झेलने के बजाय नौकरी छोड़ देना बेहतर था. दूसरी नौकरी तलाशी जा सकती थी या खुद का कुछ काम किया जा सकता था. किन्तु अब कार्यसमिति को प्रत्येक मजदूर से उसकी और उसके परिवार की राय जाननी थी. इसकी कार्यविधि तय करने के लिए कार्यसमिति की बैठक रविवार 19 मई अपराह्न चार बजे होनी थी.

19 मई को सुबह आकाश मुंबई पहुँच रहा था. प्रिया ने उसे अपने यहाँ आने को कहा था लेकिन उसने मना कर दिया. आकाश ने मना करते समय जो बात कही थी, उसकी गूंज उसके ज़ेहन से नहीं जा रही थी. "यहाँ तुम अकेली रहती हो. मेरे साथ तुम्हारा ऐसा कोई रिश्ता नहीं जिससे मेरा वहाँ रुकना समाज बर्दाश्त कर सके." फिर भी आकाश के मुंबई आते ही उससे मिलना चाहती थी.

आकाश के तर्क से प्रिया निरुत्तर हो गई थी, लेकिन जब उसने फुरसत में इस वाक्य की परतों को टटोला. वह खुद से सवाल कर रही थी कि आखिर आकाश ने यह तर्क क्यों रखा? क्या आकाश प्रिया की सामाजिक छवि को लेकर चिंतित है? या फिर वह खुद अपनी छवि के प्रति सचेत है? यह सही था कि उसके घर छोड़ देने के बाद जब आकाश का जयपुर निवास उसकी अस्थायी शरणस्थल बना था तो उसके मंगेतर विक्रांत ने वहाँ पहुँचकर हंगामा करने का दुस्साहस किया था और प्रिया और आकाश के नामों को जोड़कर बवाल खड़ा किया था, हालाँकि तब वह आकाश को ठीक से जानती तक नहीं थी, उसके लिए वह मात्र एक सहकर्मी था. तो क्या विक्रांत का मिथ्या आरोप लगाकर बवाल करना ही आकाश की इस सतर्कता का कारण है.

बहुत सोचने के बाद प्रिया को अहसास हुआ कि वह खुद किसी गहरी भावना से संचालित होकर उसे अपने यहाँ रुकने का न्योता दे रही थी, यह भूलकर कि जिस समाज में वे रहते हैं, वहाँ एक युवक और युवती का 'बिना रिश्ते' के एक छत के नीचे होना आज भी संदेह की नज़र से देखा जाता है. उसने सोचा, "क्या आकाश के मन में भी मेरे प्रति वैसी ही भावना है जिसे वह अपनी इस 'मर्यादा' के पीछे छुपा रहा है?" आकाश के संस्कार और उसका ठहराव प्रिया को उसकी ओर और अधिक खींच रहे थे. उसे महसूस हुआ कि आकाश ने यह दूरी बनाकर दरअसल उनके बीच के सम्मान को और ऊँचा कर दिया था.

बुधवार को ऑफिस में अधिक काम होने से प्रिया बहुत थक गई थी. ऑफिस से निकलते हुए भी उसे देर हो गई थी. घर पहुँचकर खुद के लिए डिनर तैयार करना उसे अपने बस का नहीं लग रहा था. उसने तय किया कि वह एमबी (मेवाड़ भोजनालय) से डिनर करके घर पहुँचेगी, रामजी काका से मिलना भी हो जाएगा. लेकिन उसकी आशा के विपरीत प्रशांत बाबू भी वहीं मिल गए. वे डिनर खत्म करने वाले थे. प्रिया को देखकर प्रसन्न हो गए. बोले, आओ प्रिया, मैं तुम्हें फोन करने की सोच ही रहा था. और देखो, तुम यहीं मिल गई।”

“नमस्ते सर, कोई जरूरी बात थी?” प्रिया ने बैठते हुए पूछा.

“रविवार को ईसीआई यूनियन की कार्यसमिति बैठक होगी. उससे पहले कार्यसमिति के कुछ खास सदस्यों की एक बैठक रविवार दोपहर दो बजे रखी है. तुम्हारी टीम एक रैंडम सर्वे पहले कर चुकी है इसलिए मैं चाहता हूँ इस दो बजे वाली बैठक में तुम भी शामिल रहो.”

“पर मैं तो उस यूनियन की सदस्य भी नहीं हूँ. क्या ऐसी बैठक में शामिल रहना मेरे लिए उचित होगा? और कार्यकारिणी की बैठक के पहले उसी कार्यकारिणी के कुछ खास सदस्यों का मिलना एक तरह से कार्यकारिणी में एक गुट जैसा व्यवहार नहीं होगा?. प्रिया ने सवाल किया.

“मुझे तुमसे ऐसे ही सवाल की उम्मीद थी. ....” प्रशांत बाबू आगे कुछ बोलते उससे पहले ही रामजी पानी का गिलास लेकर आ गए. “बिटिया आज तुमने आकर बहुत अच्छा किया, मुझे भी तुम्हारी याद आ रही थी. पहले बताओ, तुम्हारे लिए चाय भिजवाऊँ या खाना ही लगवा दूँ.”

“नहीं काका, अब चाय का समय नहीं रहा. बहुत भूख लगी है, खाना ही लगवा दो. बस दाल, एक अच्छी सी सब्जी, एक कटोरी दही और चपाती भिजवा दो आप. मैं प्रशांत बाबू से कुछ बातें कर लूँ. डिनर के बाद आपसे खूब बातें करके जाउंगी.” प्रिया ने कहा.

“ठीक है बिटिया मैं खाना ही लगवाता हूँ, तुम प्रशांत बाबू से बात कर लो.”

प्रशांत बाबू ने फिर से बात आरंभ की, “यही तो तुम्हारी विशेषता है कि तुम बात का विश्लेषण तुरन्त कर लेती हो. तुम फौरन गुट वाली बात पर पहुँच गई, यह किसी और के लिए इतना आसान नहीं था. तुम जानती हो मैं, कामरेड कुलकर्णी, शिंदे और रामजी काका डब्लूपीवीसी (वेनगार्ड पार्टी ऑफ वर्किंग क्लास) के मेंबर हैं.”

“हाँ मुझे पता है, इस पार्टी का राजनैतिक कार्यक्रम आपने ही मुझे पढ़ने को दिया था. और भी कुछ किताबें आपने मुझे दी थीं. मैंने सभी पढ़ी हैं.”

“फिर तुम समझ सकती हो कि यह गुट की नहीं बल्कि ईसीआई यूनियन में पार्टी के फ्रेक्शन की मीटिंग है.” प्रशांत बाबू ने कहा. “इस मीटिंग में हम विचार करेंगे कि मजदूरों के व्यापक हित में क्या है? मैं चाहता हूँ कि तुम भी इस मीटिंग में रहो.”

“सर, एक राजनैतिक पार्टी के फ्रेक्शन में क्या गैर पार्टी मेंबर भी शामिल हो सकता है?” प्रिया ने अपनी शंका जाहिर की.

“सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता. किन्तु तुम्हारी समझ बहुत वस्तुनिष्ठ है. तुम ईसीआई मजदूरों और उनके संघर्ष से यकायक ही गहराई के साथ जुड़ चुकी हो. तुम उनके बारे में सोचती हो और मुझसे या शिंदे से बहुत भिन्न भी नहीं हो. मैं स्वयं तुम्हारी तरह मध्यवर्ग से आता हूँ, इसलिए मुझपर उस वर्ग की सोच का प्रभाव अभी भी बहुत है और मैं उतना वस्तुनिष्ठ तरीके से नहीं सोच पाता हूँ जितना कि तुम. इसलिए हमने सोचा है कि तुम भी उस मीटिंग में रहो तो अच्छा है.”

प्रशांत बाबू की बात सुनकर प्रिया हँस पड़ी. “सर ऐसा भी नहीं है मैं भी जल्दी ही भावना में बह जाती हूँ.”

“हम सभी मनुष्य हैं और संवेदनशील भी, भावनाएँ हम सभी को प्रभावित करती हैं, लेकिन जीवन भावनाओं से नहीं बल्कि ठोस जमीनी यथार्थ से चलता है और तुम बहुत जल्दी भावनात्मक आवेग से मुक्त होकर वस्तुनिष्ठ रीति से सोचने लगती हो. तुम्हारे साथ अक्सर मुझे लगता है कि तुम एक रेडीमेड पार्टी मेंबर हो.”

इस बार प्रिया को हँसी चली तो ठहाके में बदल गई. पास की टेबलों पर बैठे लोग उसकी ओर देखने लगे. लोगों का ध्यान आकर्षित होते देख प्रशांत बाबू ने पूछा, “तुम बताओ इस मीटिंग में आ रही हो या नहीं?”

“मुझे सोचना पड़ेगा, सर. उसी दिन सुबह आकाश आ रहा है वह मंडे को नई कंपनी जॉइन कर रहा है. मैं उससे तुरंत मिलना चाहती हूँ. मैंने उसे अपने यहाँ ही रुकने को बोला था, पर उसने मना कर दिया. वह सीधे गेस्ट हाउस जाना चाहता है. मैं उससे बात करके आपको बताऊंगी कि मैं मीटिंग में आ सकती हूँ कि नहीं.”

“वह तुम्हारा आउटलुक है, पर कोशिश करना कि तुम आ सको. मुझे लगता है तुम्हारे होने से हम सही निर्णय ले सकेंगे.”

“ठीक है, मैं कोशिश करूंगी. यदि आज ही आकाश से बात हो सकी तो कल आपको फोन कर के बता दूंगी.” प्रिया ने कहा.

तब तक प्रिया का खाना टेबल पर आ चुका था और प्रशांत बाबू अपना भोजन समाप्त कर चुके थे. “ठीक प्रिया, मैं तुम्हारे उत्तर का इंतजार करूंगा.” इतना कहकर प्रशांत बाबू टेबल से उठ गए.
... क्रमशः

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