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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

साजिश

देहरी के पार, कड़ी - 33
प्रिया ने अपना कोड पूरा करके सिस्टम में छोड़ा. जब तक वह कंपाइल हो, उसके पास कुछ मिनटों की फुरसत थी. उसने अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़कर सिर के पीछे रखा और पेट व सीने को एक बार पूरी ताकत से आगे की ओर खींचकर छोड़ दिया. इससे उसके शरीर की अकड़न कुछ दूर हुई. उसने अपने वातानुकूलित ऑफिस की खिड़की से बाहर देखा. नीचे मुंबई की सड़क पर ट्रैफिक हमेशा की तरह दौड़ रहा था, लेकिन उसे लगा कि उसके भीतर कुछ अटक रहा है. उसके लैपटॉप की स्क्रीन पर कोड की पंक्तियाँ तैर रही थीं, पर उसका दिमाग उन 350 परिवारों के भविष्य के बीच उलझा था.

पिछले कुछ महीनों में वह गहरी 'लर्निंग और अनलर्निंग' से गुजरी थी. एक आईटी इंजीनियर होने के दौरान उसकी मध्यवर्गीय कंडीशनिंग ने उसे सिखाया था कि सफलता का मतलब व्यक्तिगत सुरक्षा और ऊँचा पैकेज है. लेकिन विक्रांत की उत्पन्न की गई परेशानियों से निपटने के दौरान रामजी काका, प्रशांत बाबू और IIDEA के उनके साथियों की अनकंडीशनल मदद ने उसे बहुत कुछ सिखाया था. उसके बाद ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष में बिताए वक्त ने उसकी कंडीशनिंग के खोल को तोड़ दिया था. वह समझ गई थी कि चाहे वह हाई-टेक सॉफ्टवेयर लिख रही हो या कोई मजदूर क्लीन-रूम में सर्किट बोर्ड जोड़ रहा हो या फिर किसी रेडीमेड क्लॉथ इंडस्ट्री में कपड़े सिल रहा हो—पूँजी की नज़र में वे सभी एक जैसे हैं. इन सबको मौजूदा खिचड़ी व्यवस्था 'डिस्पोजेबल' समझती है.

शाम साढ़े सात बजे अपने ऑफिस से छूटकर वह खुद को IIDEA के जाने से नहीं रोक सकी. वहाँ का माहौल किसी युद्ध-स्तर की तैयारी जैसा था. हड़ताल खत्म हो चुकी थी, लेकिन जीत का उत्साह पूरी तरह नदारद था. प्रशांत बाबू एक फाइल पर उंगलियाँ फेरते हुए गंभीर सोच में डूबे थे. वह चुपचाप प्रशांत बाबू के निकट जाकर खड़ी हो गई. जब उन्हें प्रिया के आने का अहसास हुआ तो उसे पास की कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए बोल पड़े.

"बैठो प्रिया, हड़ताल खत्म हो गयी है, मजदूरों को हड़ताल अवधि का वेतन एडवांस रूप में भी मिल गया है, वे फिर से काम पर हैं. फैक्ट्री को बंद करने की अनुमति के आवेदन की सुनवाई में प्रबंधन पूरी तरह नंगा हो गया है. फिर भी मजदूरों के हाथ में जो वेतन वही ट्रक सिस्टम वाला है जिससे छुटकारा पाने और फेयर वेजेज प्राप्त करने के लिए उन्होंने लड़ाई शुरू की थी.”


“लेकिन उसे तो अब ट्रिबुनल तय करेगा, वह भी तीन महीनों में.” प्रिया ने कहा.

“ट्रिबुनल और लेबर कोर्ट पर मजदूरों को अधिक विश्वास नहीं वे पिछले अनेक वर्षों के अपने अनुभवों से जानते हैं कि अदालतें भी मजदूरों को और प्रबंधन को समान पलड़ों में तौलने लगी हैं, जबकि मजदूर विक्टिम है. सामाजिक न्याय का सिद्धांत पता नहीं कहाँ हवा हो चुका है. उधर क्लोजर वाले मामले में प्रबंधन ने हथियार नहीं डाले हैं, बस मोर्चा बदला है,"

“अब कोई नई सूचना मिली है क्या आपको?” प्रिया ने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा.”

"हमें खबर है कि प्रबंधन 'डीम्ड परमिशन' (Deemed Permission) का खेल खेलने की कोशिश में है. कानून कहता है कि यदि क्लोजर का आवेदन पेश होने से 60 दिनों के भीतर एएसएल आवेदन पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट नहीं करते हैं उसे स्वतः स्वीकृत मान लिया जाएगा. एएसएल को अचानक किसी 'इमरजेंसी' सरकारी ट्रेनिंग या मीटिंग में उलझाने की तैयारी है ताकि आदेश में देरी हो और उसका कम्युनिकेशन बाधित हो जाए और समय सीमा पार हो जाए."

"यह तो सरासर जालसाजी होगी!" प्रिया के भीतर की मध्यवर्गीय नैतिकता चीख उठी.

"यही पूँजी का असली चरित्र है प्रिया. वह कम मुनाफे से अधिक मुनाफे की ओर बहती है. जहाँ फैक्ट्री खड़ी है, उस जमीन की रियल एस्टेट वैल्यू बुक वैल्यू से सात गुना ज्यादा है. वे जमीन बेचकर मॉल और ऊँची बहुमंजिला इमारतें खड़ी करना चाहते हैं, मजदूरों के भविष्य की बलि देकर."

प्रिया ने महसूस किया कि अब एक्शन का वक्त है. "हमारे पास कितना समय है?"

"कल 26 अप्रैल है. प्रबंधन का आखिरी अवसर. हमें कल ही उनसे जिरह समाप्त करनी होगी. जिसके कारण हम अपनी साक्ष्य के लिए समय निकालें और एएसएल को अपना निर्णय लिखने और उसे कम्युनिकेट करने के लिए कम से कम दस दिनों का समय मिले. तुम्हारी टीम आज जितना सच खोज सकेगी, वही कल काम आएगा.”

प्रिया ने वहीं से राहुल को फोन किया कि ‘वह घर पहुँच रही है, प्रशांत बाबू चाहते हैं कि प्रबंधन के गवाहों से कल ही जिरह खत्म हो. हमें आज रात ही उन 'लायबिलिटीज' का सच तलाशना होगा जो प्रबंधन ने अपने अंतिम शपथ-पत्र में दी हैं. तुम स्नेहा और राहुल को भी कहो कि हमें काम में जुटना है.’

फोन करने के बाद वह प्रशांत बाबू की ओर मुखातिब हो बोली, “मैं घर पहुँच कर अपनी टीम के साथ काम पर जुटती हूँ.”

“बिलकुल, मैं चव्हाण साहब से फोन करके उन्हें सारी स्थिति बताता हूँ जिससे वे कल की तैयारी कर सकें.”

सुबह के चार बज रहे थे. प्रिया की आँखें लाल थीं, पर दिमाग साफ था. उसकी टीम ने वह 'चक्रव्यूह' ढूंढ निकाला था जिससे सरकार और प्रबंधन की जुगलबंदी को काटा जा सकता था. वह अब केवल एक मददगार इंजीनियर नहीं रह गयी थी; वह एक ऐसी सिपाही थी जिसने अपनी मध्यवर्गीय देहरी लांघकर मेहनतकश वर्ग के संघर्ष की असली जमीन पर लड़ने के लिए तैयार कर लिया था. उसकी टीम भी उसके साथ थी.

कल 26 अप्रैल थी. आखिरी मोर्चा. प्रिया ने डायरी में लिखा— "पूँजी के पास पैसा है, पर हमारे पास भी डेटा का सच है. अब देखते हैं चक्रव्यूह कौन तोड़ता है."
... क्रमशः

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 25 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. बहुत ही रोचक और शानदार सादर

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