देहरी के पार कड़ी - 4:
उस डरावनी धमकी के बाद कोशिश करके भी प्रिया सो
नहीं सकी. उसकी रात करवटें बदलते ही गुजरी. तान्या के कमरे की खिड़की से उसे जयपुर
की सड़कें शांत नजर आ रही थीं, बस कभी कोई वाहन सड़क से गुजर
जाता. उसके मन में विक्रांत की वह आवाज़ गूंज रही थी— "पराई अमानत". वह
किसी की अमानत कैसे हो सकती थी? उसका स्वतंत्र अस्तित्व था. वह एक स्वतंत्र नागरिक
थी. लेकिन उसे लगा कि उसे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए बहुत लड़ाइयाँ लड़नी
पड़ेंगी. घर से निकल लेना तो केवल आग़ाज था. सुबह जैसे ही उसे लगा कि आकाश की माँ विमलाजी
जाग गयी हैं, वह भी उठ बैठी. वे रसोई में थीं और अपने लिए चाय गैस पर चढ़ा चुकी
थीं. प्रिया को देख पूछा, “तुम्हारे लिए भी बना लूँ चाय?”
प्रिया ने ‘हाँ’ कह दी और डाइनिंग की कुर्सी
खिसका कर वहीं विमलाजी के पास बैठ गयी.
चाय पीकर लौटी तब तक तान्या जागी नहीं थी.
प्रिया बाथरूम में घुस गयी. वह स्नान करके लौटी तब तान्या कमरे में नहीं थी. वह
सुबह 8:00 बजे वह तैयार होकर निपटी. तभी तान्या आ पहुँची.
“दीदी नाश्ता तैयार है आकाश और पापा डाइनिंग में
आपका इन्तजार कर रहे हैं. मैं बस फ्रेश हो कर पाँच मिनट में मैं भी आती हूँ, आप चलिए.”
वह डाइनिंग में पहुँची तो आकाश और के पापा,
सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, प्रकाश मल्होत्रा बैठे नाश्ता कर रहे थे.
मल्होत्राजी ने प्रिया को भी बैठने को कहा. विमलाजी उसके लिए नाश्ता रख गईं.
"देखो बच्चों, कानून
डरपोक के लिए नहीं, जागरूक नागरिक के लिए बना है,"मल्होत्राजी ने गंभीर स्वर में कहा. "विक्रांत ने जो 'अमानत' शब्द इस्तेमाल किया है, वह उसकी कुंठित मानसिकता है. हम सबसे पहले 'पुलिस थाना'
में एक इन्फोर्मेटिव रिपोर्ट (Informative Report)
दर्ज करवाएंगे. इसमें हम साफ़ लिखेंगे कि प्रिया बालिग है, अपनी मर्ज़ी से यहाँ रह रही है और उसे एक अज्ञात नंबर से जान का खतरा है.
इससे यह होगा कि हमें फोन करते ही तुरन्त मदद मिल सकेगी."
प्रिया को पहली बार महसूस हुआ कि सुरक्षा केवल
बंद दरवाजों में नहीं, बल्कि सही कानूनी प्रक्रिया में है. वह
आकाश और उसके पापा तुरन्त पुलिस स्टेशन गए. दस बजने के पहले रिपोर्ट की एक कॉपी
उनके हाथ में थी.
लौटते ही प्रिया ने जयपुर से अपना पहला 'लॉगिन' किया. सबसे पहले उसने अपने मैनेजर और एचआर (HR)
हेड को एक 'अर्जेंट मीटिंग' के लिए मैसेज किया. आकाश भी पास ही बैठा था. वीडियो कॉल पर प्रिया ने अपनी
स्थिति साफ़ कर दी:
"सर, मेरे मंगेतर ने
मेरे सहकर्मी को फोन पर धमकी दी है. मुझे लगता है कि मेरी जान और प्राइवेसी खतरे
में है. मुझे तुरंत मुम्बई ऑफिस शिफ्ट होने की अनुमति चाहिए और मेरा बेस लोकेशन
कोटा से मुम्बई बदल दिया जाए."
मैनेजर ने उसकी हिम्मत की दाद दी और तुरंत आईटी
(IT) टीम को निर्देश दिए कि प्रिया के क्रेडेंशियल्स को 'हाई-सिक्योरिटी' पर रखा जाए ताकि कोई बाहरी व्यक्ति
उसे ट्रेस न कर सके.
दोपहर के ठीक तीन बजे थे. प्रिया और तान्या ऊपर
वाले कमरे की धूल झाड़ रही थीं, जिसे प्रिया का नया 'होम ऑफिस' बनना था. तभी अचानक बाहर एक भारी एसयूवी (SUV)
के टायर चरचराए. प्रिया ने खिड़की से नीचे झांका और उसका खून जम गया.
नीचे विक्रांत खड़ा था, उसके साथ दो और गठीले बदन के युवक थे.
"आकाश! बाहर निकल!" विक्रांत का गला
फटने को था. "मेरी अमानत को लेकर तू बहुत बड़ा सूरमा बन रहा है? इज़्ज़त से उसे बाहर भेज दे, वरना तेरा ये छोटा सा घर
और तेरी सरकारी नौकरी... दोनों मिट्टी में मिला दूंगा."
विक्रांत को वहाँ देख उसके शरीर में सिहरन दौड़
गयी. उसने दो मिनट बैठ कर अपने आपको शान्त किया और नीचे की ओर चल दी.
मल्होत्राजी ने आकाश को कहा कि वह थाने को फोन
करे. फिर शांत भाव से कुर्ता पहना और बिना किसी घबराहट के गेट की ओर बढ़े. आकाश ने थाने फोन किया, "सर, वे आ गए हैं. सिद्धार्थ नगर, मकान नंबर 42." फोन जेब में डालकर वह भी अपने
पिता के पीछे चल दिया.
मल्होत्राजी ने गेट की जाली के पीछे से ही कहा,
"बेटा विक्रांत, यह घर है, कोई मंडी नहीं जहाँ तुम 'अमानत' लेने आए हो. यहाँ स्वतंत्र नागरिक हैं. तुम मर्यादा लांघ रहे हो, बेहतर होगा यहाँ से चले जाओ."
विक्रांत ने गेट पर जोर से लात मारी,
"बुड्ढे, ज्ञान मत दे! वो मेरी होने वाली
पत्नी है. मेरा उस पर कानूनी और सामाजिक हक है." उसके साथी डराने के लिए अपनी
जेबों में हाथ डालकर आगे बढ़े, जैसे कोई हथियार छिपा हो.
तभी दूर से सायरन की आवाज़ गूँजी. विक्रांत के
चेहरे का रंग यकायक उड़ गया. अगले ही पल पुलिस की एक जीप तेज़ी से मुड़कर उनके ठीक
सामने रुकी. जीप से एक इंस्पेक्टर और चार हट्टे-कट्टे कांस्टेबल उतरे.
"क्या तमाशा है यह?" इंस्पेक्टर ने अपनी बेल्ट ठीक करते हुए कड़क आवाज़ में पूछा.
विक्रांत की अकड़ धुआं हो गई. वह हकलाने लगा,
"सर... वो... पारिवारिक मामला है. मेरी मंगेतर यहाँ छिपी है."
"मंगेतर? बालिग लड़की
को तुम 'अमानत' बोलकर डराओगे?"
इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर विक्रांत की कलाई पकड़ ली. . "सुबह ही रिपोर्ट दर्ज हुई है तुम्हारी
धमकी की. चलो, अब थाने में बैठकर विस्तार से बताना कि 'अमानत' की परिभाषा क्या है."
इंस्पेक्टर ने एक कांस्टेबल को निर्देश दिया कि
वह विक्रांत की गाड़ी खुद ड्राइव करके थाने ले आए. विक्रांत और उसके साथियों को
अपराधियों की तरह जीप में बिठाया गया. जिस गली में वे शोर मचा रहे थे, अब वहाँ सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा खौफ का नहीं,
सुकून का था.
प्रिया ड्राइंगरूम की खिड़की से यह सब देख रही थी.
उसकी आँखें नम हो गयीं. उसने अपने रूमाल से उन्हें पोंछा और बाहर बरामदे में आ
गयी. आकाश के पिता ने प्रिया को देखा और धीरे से मुस्कुराए. प्रिया ने समझ लिया था
कि अब वह अकेली नहीं है. अंदर कमरे में पहुँच कर उसने अपना लैपटॉप खोला और मुम्बई
ऑफिस के मैनेजर को रिप्लाई किया— "मैं कल सुबह से ही
काम पर हूँ. और हाँ, मेरा मुम्बई शिफ्टिंग का प्रोसेस शुरू
कर दीजिए."
... क्रमशः
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