पिंजरा और पंख-53
लघुकथा श्रृखंला : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-3
रविवार सुबह से ही गुप्ता निवास में हलचल शुरू हो गई थी. अनिल चाचा सुबह तैयार होकर नाश्ते के बगैर ही निकले और स्कूटर से होटल ऋतुराज का एक चक्कर लगा आए. वे दस बजे लौटे तब तक नाश्ते के बाद घर में सभी नहा-धो कर तैयार हो चुके थे. चाची और मम्मा मेहमानों के लंच की तैयारी में जुटी थीं. वापस लौटते ही चाचा ने घोषणा कर दी कि मेहमान साढ़े ग्यारह से बारह बजे के बीच यहाँ पहुँच जाएंगे. फिर वे ड्राइंग रूम की सजावट को परखने लगे, जिसे पहले ही उनके निर्देशानुसार किसी वीआईपी लाउंज की तरह सजा दिया था. मेज़ पर काजू-किशमिश के डोंगे, ताज़ा रसगुल्ले और नमकीन सजा दिए गए थे. पर वातावरण में एक अजीब सा तनाव भरा था. डेढ़ साल की मुक्ति इस तनाव से बेखबर सजावट से खुश होकर इधर से उधर और उधर से इधर दौड़ लगा रही थी.
पौने बारह बजे इंदौर वाले मेहमानों की लंबी कार घर के बाहर रुकी. विवेक, उसके माता-पिता और उसकी विवाहित बहन नीचे उतरे. चाचा ने बाहर आकर उनका स्वागत किया और उन्हें ड्राइंग रूम में ले आए. औपचारिक बातचीत शुरू हुई. विवेक के पापा लगातार बोले जा रहे थे, जिसमें उनके बिजनेस के टर्नओवर, खानदान की शहर में प्रतिष्ठा, सरकारी अफसरों और राजनेताओं से उनके रिश्ते वगैरह का उल्लेख था जो खत्म नहीं हो रहा था. बीच-बीच में विवेक की माँ कुछ न कुछ अपनी ओर से जोड़तीं और हर बार अपने गहने और साड़ी ठीक करने का अभिनय करतीं. जबकि विवेक की नज़रें बार-बार अंदर के दरवाज़े की ओर उठ रही थीं, जो किसी को भी उसकी तरफ देखते देखकर वापस अपने पिता और बहिन की तरफ मुड़ जाती थीं. टेबल पर सजे महंगे नाश्ते की ओर किसी ने देखा तक नहीं. चाचा ने एक दो बार नाश्ते की और इशारा कर मेहमानों से कहा भी कि ‘कुछ तो लीजिए’. जवाब में सुनने को मिला कि ‘अब सीधे लंच ही करेंगे.’
लंच के बाद फिर से सब ड्राइंग रूम में बैठे. विवेक की माँ ने शगुन को भी वहीं बुलाने को कहा. कुछ देर में वह कॉफी लेकर आयी और सर्व करने के बाद जब वह बैठने लगी, तो विवेक की माँ ने उसे अपने पास बिठा लिया. उससे कुछ किताबी सवाल पूछे. विवेक बेचैन था, उसने माँ को इशारा किया कि वह अकेले में शगुन से बात करेगा. उसकी माँ ने मुस्कुराकर कहा, "भाई साहब, अगर बुरा न मानें तो बच्चों को आपस में दस मिनट बात करने दें?"
“क्यों नहीं? जरूर.” कह कर गुप्ताजी ने अनुमति दी और शगुन विवेक को साथ लेकर ऊपर की छोटी बालकनी में आ गई. दरवाजा बंद होते ही बात शुरू हुई. परिचय की औपचारिक बातें करने के बाद विवेक बोला, “आपका बी.एससी. मनोविज्ञान में करना बहुत बढ़िया है. व्यापार और सभी तरह के संबंधों को बनाए रखने में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा. वैसे अब आपका आगे क्या करने का इरादा है?”
शगुन तो इसी सवाल का जैसे इन्तजार कर रही थी. उसने मेज पर रखी अपनी 'संबल' नोटबुक को हौले से हाथ से छुआ और बोली, "विवेक जी, मैं अपने भविष्य के बारे में निर्णय कर चुकी हूँ."
शगुन की आवाज़ में एक ऐसी स्पष्टता थी कि विवेक स्तब्ध रह गया.
"मेरा चयन बनस्थली में 'टीचिंग असिस्टेंट' के पद पर हो चुका है. मुझे जून के अंतिम सप्ताह में वहाँ जोइन करना है. इसके बाद मैं पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुकी होऊंगी. मुझे मनोविज्ञान में एम.एससी. करना है और सके बाद पी.एच.डी. करनी है. मेरा भविष्य अध्यापन और रिसर्च में है. मुझे बिजनेस में रत्ती भर भी रुचि नहीं है."
सुन कर विवेक हैरान था, एक लड़की जिसे वे देखने आए हैं, ऐसी बात कैसे कर सकती थी. शगुन ने आगे कहा, "नीचे आपके परिवार ने मेरे लिए एक 'पिंजरा' तैयार किया है जहाँ मुझे घर की बहू बनकर घर-परिवार के साथ कपड़ों का बिजनेस संभालना होगा. मैं उस पिंजरे में नहीं रह सकती. मैं नीचे सबके सामने मना करने वाली हूँ. इससे आपके माता-पिता अपमानित महसूस कर सकते हैं. मैं नहीं चाहती कि किसी का अपमान हो."
विवेक ने कुछ बोलना चाहा, पर शगुन ने हाथ के इशारे से उसे रोका. "बेहतर होगा कि आप नीचे चलकर कहें कि आप 'सोचकर बताएंगे' और यहाँ से निकल जाएँ. बाद में होटल या इंदौर पहुँचकर आप मना कर दीजिएगा. लेकिन यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो मैं खुद सबके सामने मना कर दूंगी. चुनाव आपका है."
विवेक ने शगुन के आत्मविश्वास को देखा. उसने ऐसी लड़की पहले कभी नहीं देखी थी जो इतनी विनम्रता से इतनी बड़ी चोट कर सकती थी. पाँच मिनट बाद जब वे नीचे उतरे, विवेक का चेहरा उतरा हुआ था. शगुन जानती थी कि अपमान के भय (Gelotophobia) का उसका प्रयोग सफल रहा था.
अनिल चाचा तिलक का थाल तैयार रखे थे, पर विवेक ने अपने पिता के कान में कुछ कहा. उसके पिता ने गला साफ़ करते हुए गुप्ता जी से कहा, "भाई साहब, बच्चे ने कहा है कि वह थोड़ा और सोचना चाहता है. हम इंदौर पहुँचकर आपको फोन करेंगे."
अनिल चाचा को कुछ नहीं सूझा, हड़बड़ाहट में उनका हाथ तिलक के थाल पर लगा और उसमें रखी रोली की कटोरी उछल कर टेबल के नीचे गिर गयी. सब अवाक थे. मेहमान इसके साथ ही उठ खड़े हुए. गुप्ता, अनिल और श्रीमती गुप्ता उन्हें छोड़ने के लिए बाहर सड़क तक आए. शगुन ऊपर अपने कमरे में चली गयी, चाची रसोईघर में. ड्राइंगरूम में बस आयुष और मुक्ति ही रह गए. मुक्ति को बस यह पता लगा कि मेहमान जो आए थे वे गए. उसने आयुष की ओर मुड़ कर कहा, "दादा...... गए" आयुष के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई. "हाँ, मुक्ति, गंदे वाले मेहमान गए.
... क्रमशः
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